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रविवार, 12 मार्च 2017

वो एक रात की सरकार और यूपी में भाजपा की ट्रिपल सेंचुरी

तब उत्तरप्रदेश में समझौते के तहत बसपा और भाजपा की छह-छह महीने वाली सरकार थी। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री हुआ करते थे। बहन जी ने समर्थन वापस लिया तो कांग्रेस के 21 विधायक नई पार्टी बनाकर कल्याण के समर्थन में आए और सरकार बची रही। ज्यादातर विधायकों को मंत्री पद दिया गया। सरकार चल ही रही थी कि 21 फरवरी 1998 की रात अचानक भारतीय इतिहास का काला अध्याय लिखा गया। मंच पर इसके प्रमुख पात्र थे जगदंबिका पाल और नरेश अग्रवाल, स्क्रिप्ट मुलायम सिंह यादव और तत्कालीन केंद्र सरकार की थी। खेल किया उप्र प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने। रातों रात एक चुने हुए मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को सीएम और नरेश अग्रवाल को डिप्टी सीएम बना दिया गया। वही नरेश अग्रवाल जो कांग्र्रेस छोड़कर भाजपा के सहयोग से मंत्री बने थे। और वही जगदंबिका पाल जो आजकल भाजपा से लोकसभा सांसद हैं। मामला कितना बड़ा था इसका अंदाजा इसी से लगा लें कि तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष
अटल बिहारी वाजपेयी राज्यपाल के फैसले के विरोध में आमरण अनशन पर बैठ गए। मामला कोर्ट पहुंचा और वही हुआ जो होना था, गवर्नर के इस फैसले को कोर्ट ने खारिज करते हुए पूर्व स्थिति कायम रखी। पाल और अग्रवाल पद पर माने ही नहीं गए ऐसे में इतिहास में उनका नाम भी पूर्व सीएम या पूर्व डिप्टी सीएम के रूप में नहीं दर्ज हुआ। कल्याण सीएम बने रहे। जिस उद्देश्य से रातों-रात सरकार गिराई और बनाई गई थी पर्दे के पीछे वो पूरे हो चुके थे। वैसे तो आज इस कहानी का कोई खास मतलब नहीं लेकिन उत्तरप्रदेश की ऐतिहासिक जीत के बीच वो काला अध्याय बरबस याद आ गया। भाजपा का एक वो दिन भी था जब पूर्व पीएम अटल जी को आमरण अनशन करना पड़ा था और एक आज का दिन...

सारे समीरकण टूटे, दिल में मोदी
बात केवल उप्र और उत्तराखंड की करें तो बाभन, बनिया, ठाकुर और लाला सहित बाकी सवर्ण वोटर और प्रत्याशी की जाति के हिसाब से मिलने वाले वोट ही भाजपा के साथ हुआ करते थे। भाजपा शहर की पार्टी थी और शहरी लोग चला रहे थे। राम मंदिर जैसे बड़े आंदोलन, अटल जैसा नेतृत्व, आडवाणी जैसा संगठक, जोशी जैसा विद्वान और कल्याण जैसे दिग्गज ओबीसी जननेता जो नहीं कर पाए थे वो मोदी और शाह की जोड़ी ने कर दिखाया है।
उप्र और उत्तराखंड की जीत का पूरा श्रेय मोदी और शाह को जाता है। प्लानिंग और बूथ लेवल मैनेजमेंट का असर रहा कि 403 में 325 सीटें भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने जीत लीं। तीन साल से केंद्र में चल रही मोदी सरकार के खिलाफ कम से कम उप्र और उत्तराखंड में कोई एंटी इन्कम्बैंसी नहीं दिखी। दोनों राज्य दिल खोलकर भाजपा के साथ हुए और दोनों हाथ खोलकर सीटें दीं। सारे आंकलन, अनुमान, आशंकाएं ध्वस्त रहीं। भाजपा का उप्र में अब तक बेस्ट प्रदर्शन 221 सीट 1991 में रहा उससे 104 सीटें ज्यादा इस बार हैं। इस बार के विस चुनाव परिणाम और 1991 के चुनाव परिणाम में सीटों का अंतर भले दिखे लेकिन जीत का फॉर्मूला और तरीका लगभग वैसा ही रहा है। तब भाजपा के परंपरागत वोटरों के साथ उसे कल्याण के नाम पर गैर यादव ओबीसी वोट मिले तो राममंदिर के नाम पर हिंदू वोटों का धु्रवीकरण हुआ था। लेकिन यह फॉर्मूला उसके बाद नहीं चला। भाजपा के वोटर तो साथ जुड़े रहे लेकिन ओबीसी और अन्य वोट नहीं आ पाए जिससे उसकी सीटें घटती गईं। एक समय ऐसा भी आया जब पार्टी 30 विस सीटों से नीचे चली गई।

मोदी के नाम और काम पर वोट
भाजपा में अटल, आडवाणी और जोशी के दिन बीते तो मोदी युग आया। चुनाव लडऩे और जीतने का तरीका बदला तो परिणाम बदल गए। समीकरण बदले और देखते-देखते लोगों का वोट करने का नजरिया और कारण भी बदल गया। तभी तो इस बार उप्र में दलित, ओबीसी, यादव, जाट और सामान्य सभी ने एकजाई होकर भाजपा को चुना है। भाजपा को इन वर्गों का 65 से 90 फीसदी तक वोट मिला जिसने भगवा सुनामी में वोटों के थोकबंद ठेकेदारों के नीचे से जमीन तक खिसका दी। मायावती ने भले इसके लिए ईवीएम पर सवाल उठाए हों लेकिन सच यह है कि पैसे के बदले टिकट के कारोबार के आरोपों के बीच जनता ने माया को न केवल नकार दिया बल्कि राजनीति में उनकी उपादेयता शून्य कर दी है। शून्य इसलिए क्योंकि बसपा लोकसभा में है नहीं, राज्यसभा से बहन जी खुद सालभर में चलती बनेंगी और विधानसभा का नतीजा सामने है। माया का दलित वोटबैंक दरक गया। सबसे ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशी उतारने का फायदा भी बसपा को नहीं मिल सका। वोट प्रतिशत बढऩे के बावजूद लोग जाति, धर्म और संप्रदायिकता के नाम पर नहीं बंटे।

अखिलेश ने सबकुछ खोया, डिंपल से ठिठोली
उप्र चुनाव में सबसे ज्यादा किसी ने खोया है तो वह रहे हैं अखिलेश। घर, परिवार, सरकार और विकासवादी छवि सब दांव पर लगाकर चुनाव लड़े अखिलेश फेल हो गए। भले ही मुलायम के इस बेटे ने पांच साल की सरकार में कुछ काम किए लेकिन वो काम ऐसे नहीं थे जो बोल सकें। काम मोदी का बोला। सवा दो सौ से ज्यादा रैलियां भी अखिलेश को उबार नहीं सकीं। लोग डिंपल भाभी को देखने के लिए तो आए लेकिन वोट देने के नाम पर होली की ठिठोली कर गए। अखिलेश मजबूत नेता के तौर पर उभरने में देर कर चुके थे। पौने पांच साल उनके नेतृत्व में जातिवाद का जो खुला नंगा नाच चला उससे लोग गले तक भर चुके थे। लोक सेवा आयोग सहित अन्य सभी सरकारी नौकरियों में एक क्षेत्र और जाति विशेष के लोगों का कब्जा शुरू हो गया जिससे युवा हताश था। अखिलेश सरकार की जातिवादी नीति से नाराज इन लाखों युवाओं की न कोई जाति थी न धर्म। बेरोजगारी से तंग ये युवा बदला लेने और बदल देने की ठान चुके थे जो उन्होंने कर दिखाया। सपाई गुंडाराज और गायत्री प्रजापति तथा पंडित सिंह जैसे बाहुबली भ्रष्ट मंत्रियों ने सपा की लुटिया डुबोने में जो कसर छोड़ी थी वो शिवपाल ने पूरी कर दी। बाकी अमर सिंह जिसे डुबाने पर उतारू हों उसे उबार कौन सकता है? ऊपर से नीचे तक कार्यकर्ता कन्फ्यूज थे, इस कन्फ्यूजन का उन्हें कमल तक पहुंचा दिया।

पार्षदी जैसी समझ भी नहीं दिखी कंाग्रेस में
परिणामों में ऐसा कुछ भी नहीं जिसके लिए कांग्रेस की चर्चा हो लेकिन बात चूंकि उत्तरप्रदेश की है इसलिए बिना कांग्रेस की बात किए बात पूरी नहीं होगी। जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा और सोनिया से होते हुए राहुल गांधी तक यह कांग्रेस का अब तक का सबसे बुरा प्रदर्शन रहा। देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी देश के सबसे बड़े राज्य में दहाई का आंकड़ा पार नहीं कर पाई। यह स्थिति तब बनी जब कांग्रेस को वही प्रशांत किशोर चुनाव लड़ा रहे थे जो 2014 में मोदी का कैंपेन और उसके बाद बिहार में नितीश का चुनाव अभियान संभाल चुके थे। यूपी जैसे पॉलिटकली मैच्योर राज्य में जैसे मूर्खतापूर्ण फैसले कांग्रेस ने किए वैसे तो पार्षदी के चुनावों में भी नहीं होते। खाट चौपाल के जरिए कार्यकर्ताओं को एक्टिव करने से शुरुआत करने वाली कांग्रेस नारा तो 27 साल यूपी बेहाल का लेकर चली लेकिन उसी सपा की गाड़ी में सवार हो गई जो पांच साल से यूपी बदहाल कर रही थी। शीला दीक्षित को सीएम कैंडिडेट घोषित करना फिर सपा से हाथ मिलकार विड्रॉ करना भी निहायत मूर्खतापूर्ण फैसला था। यूपी में कांग्रेस के पास कुछ नहीं बचा। अमेठी और रायबरेली जैसा किला भी ढह गया। पंजाब में बड़ा बहुमत और गोवा-मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी बनने से कांग्रेस दिखावे के लिए खुश हो ले लेकिन हकीकत यह है कि इन तीनों राज्यों में राहुल और कांग्रेस केंद्रीय नेतृत्व का चुनाव में कोई योगदान नहीं रहा। पांच राज्यों में हुए कुल 690 विधानसभा सीटों के चुनाव में 65 फीसदी यानि 438 सीटें अकेले भाजपा के खाते में गई हैं। जबकि कांग्रेस को केवल 140 सीट ही मिल पाई है। अब कांग्रेस वहां है जहां से कम से कम उप्र में उसका उठना बहुत ही कठिन है।

खुशी मनाइए लेकिन सनद रहे
क्लीन स्वीप वाले इस परिणाम से जश्न मना रही भाजपा ने चुनाव के सारे सियासी समीकरणों को ध्वस्त किया है। छप्पर फाड़कर मिले जनादेश के चलते उसके सामने चुनौतियां भी पहाड़ जैसी खड़ी हैं। पहाड़ इसलिए क्योंकि पार्षद से प्रधानमंत्री तक भाजपाई है। कहीं कोई रोक-टोक नहीं। कड़े फैसलों में भी जनता साथ दे रही है ऐसे में उसकी उम्मीदें पूरी नहीं हुई तो सनद रहे 1980 में उप्र में कांग्रेस ने भी 309 सीटें जीतीं थी और इंदिरा की मौत के बाद लोकसभा में उसका अकेले का आंकड़ा 400 के पार था। उप्र में भी पिछले दो विधानसभा चुनावों में जनता ने एक बार बसपा और एक बार सपा को पूर्ण बहुमत दिया। नेताओं ने वादे भूले तो जनता ने भी बेआबरू करके बेदखल कर दिया। बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और दुनिया के कई देशों से बड़ा एक सूबा संभालना बहुत बड़ी चुनौती है। चुनाव तो मोदी के चेहरे पर जीता जा सकता है लेकिन सरकार चलाने के लिए एक काबिल मुख्यमंत्री की जरूरत होगी जो इतने विशाल जनादेश का सम्मान कर सके।


एक आखिरी बात
होली के रंग में रंगे इन परिणामों ने जहां भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति में अब तक की सबसे बड़ी पार्टी बना दिया है वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत विपक्ष की कमी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेचैनी पैदा करती है। अब तक कांग्रेस इस भूमिका में फेल रही है। लेकिन गणतंत्र का सौंदर्य और संबलन इसी में है कि मजबूत सरकार पर नियंत्रण के लिए सरकारात्मक और सक्षम विपक्ष बना रहे। वर्ना चुनी हुई सरकारें कब तानाशाही के मोड में आ जाएं किसे पता। इतिहास खुद गवाह है।

किस शहर से आए हैं

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