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शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

प्यादे मरेंगे और राजा-रानी नए मोहरों से चाल चलेंगे

सत्ता में अपराधियों की प्रतिष्ठा का नुकसान सड़क ही नहीं सदनों में भी प्रतिस्थापित हो चुका है। आज तमिलनाडु विधानसभा में जो हुआ वो इसकी एक और बानगी है। उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर होते हुए दक्षिण की विधानसभा तक पहुंचा यह गुंडगर्दी का खेल तो होना ही था। जिस देश में अपराधियों के लिए ऐसा सम्मान होगा कि लोग सड़कों पर उतर जाएं और सदमे में मर जाएं वहां ऐसा होना आश्चर्यचकित नहीं करता। सत्ता की सनक और भूख ऐसी कि न बेटा बाप का होता है न भाई-भाई का। वैसे भी राजनीति के लिए जान लेने का खेल नया नहीं है। विधानसभा में हुए इस दंगल की पृष्ठभूमि लंबे समय से बन रही थी।
बाहुबल-धनबल से जीतकर आए नेताओं और इन्हें लाने वाली पार्टियों से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती। वर्ना दस साल में संसद में अपराधी प्रवृत्ति के जनप्रतिनिधियों की संख्या करीब-करीब 10 फीसदी तक बढ़ न जाती।

सबसे ज्यादा ईमानदारी को ढोल पीटने वाली पार्टी सबसे ज्यादा अपराधी तत्वों को टिकट देकर उत्तरप्रदेश के मैदान में उतरी है। जिस पार्टी की विचारधारा और और अस्तित्व ही परिवारवाद के विरोध पर टिका है वह परिवार के झगड़े में टूटने की कगार पर है। सिद्धांतों की बात तो वैसे भी राजनीति में जुमला बनकर रह गई है तभी तो देश के सबसे बड़े राज्य को बदहाली से निकालने का नारा देने वाली सबसे पुरानी सियासी पार्टी बदहाल करने वालों के ही शरणगत न होती।

सार्वजनिक माध्यमों पर राजनीतिक शुचिता और पवित्रता की बातें करने वाले माइक बंद होते ही सेटिंग करने की हद तक जाने को तैयार न होते। मौसम और मन से चंचल सियासी निष्ठाएं हो गई हैं। पूरी जिंदगी फिरकापरस्ती, परिवारवाद, चाल-चरित्र के नारे देते गुजारने वालों को न जाने कौन सी अंतरआत्मा की आवाज बदल देती है। रात को सोते हैं किसी और की जय-जयकार से सुबह होती है किसी और की चरणवंदना से।

बदलाव का वादा कर सत्ता में आना फिर विरोधियों से बदला और करीबियों की किस्तम बदलना यह आज का पॉलिटिकल सिस्टम बन गया है। इस बदल में सियासी ऑपरेटिंग सिस्टम भी बदलता गया। वास्तविक सत्ता प्रतिष्ठानों को पर्दे के पीछे से शक्तिकेंद्रों के रिमोट से चलाए जाने लगे। कहीं, जेल जाने पर किसी की पत्नी हुक्मरान बन गई तो कहीं जेल गई नेता के फोटो रखकर कैबिनटे मीटिंगें होती रहीं। एक सरकार ऐसी भी रही कि हर जरूरी फाइल एक खास बंगले की ड्योढ़ी पार करने के बाद ही पास होती। राजनीतिक चौसर में जब भी प्यादे राजा-रानी के इशारे पर नहीं चलेंगे ऐसे संघर्ष होते रहेंगे। दुर्भाग्य यह है कि सदन और सड़क पर होने वाले ऐसे युद्धों में लोकतंत्र घायल होगा, प्यादे मरेंगे और राजा-रानी नए मोहरों से चाल चलते रहेंगे।

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