राज और समाज पर खरी आवाज

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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

कथानक

जंगल में चुनाव हुए.... जंगली जनता ने दवाब बनाया की राज शेर को सौपा जाये..... पर पञ्च शेर से डरे हुए थे.... वो गधे को राजा बनाना चाहते थे.. जनता अनशन पर बैठ गई. डरे पंचों ने गीदड़ की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई. कमिटी शेर को राजा बनाने पर तैयार तो गई पर कुछ शर्तों के साथ- शेर के दांत तोड़ दिए गए, उसके नाखून स्थाई रूप से काट दिए गए, उसके गले में सैलेंसेर लगा दिया गया....... इसे कहते हो लोकतंत्र की शक्ति.

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ऐसी भी क्‍या मजबूरी?


देश का दुर्भाग्‍य देखिए कि सवा अरब जनता का सर्वोच्‍च प्रतिनिधि, दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश का मुखिया, देश की सबसे पुरानी और सबसे बडी राजनीतिक पार्टी से बना प्रधानमंत्री मजबूर है? जी हां। यह सच है और इससे भी दुखद यह कि यह बात खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्‍वीकार की है। 15 फरवरी को जब यह पता चला कि प्रधानमंत्री मीडिया से मुखातिब होंगे तो महंगाई और भ्रष्‍टाचार जैसे बडे मामलों से जूझ रही जनता को लगा कि शायद वे कुछ ऐसा बोलें जिससे राहत मिले, लेकिन बंधी मुट़ठी लाख की….यहां भी ऐसा ही हुआ। प्रधानमंत्री जी पूरे समय बस यह कहते रहे कि वे ईमानदार हैं लेकिन मजबूर हैं। वे यह भी कह गए कि वे उतने बेईमान नहीं जितना उन्‍हें प्रचारित किया जा रहा है। बेईमान हैं, यह उन्‍होंने भी मान लिया। अब उस काले चेहरे को छिपाने के लिए गठबंधन का मुलम्‍मा बेमानी है। मुझे नहीं पता कि जो लोग आपसे प्रश्‍न पूछने के लिए वहां बैठे थे उनके मन में यह सवाल उठा या ऐसे सवालों को दबा दिया गया लेकिन मेरे कुछ सवाल जरूर हैं-

- प्रधानमंत्री ने आज जिन अहम मसलों पर बात की उनमें सबसे ऊपर रहा भ्रष्‍टाचार। पौने दो लाख करोड रुपए के 2जी स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन मामले में उनका यह कहना, ‘हमने ए. राजा को पत्र लिखा था। लेकिन ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की नीति पर मुझसे उनकी बात नहीं हुई।‘ क्‍या सही माना जाए? 2004 से राजा ने लूट मचा रखी थी और आठ साल आप धृतराष्‍ट्र बने बैठे रहे।

क्‍या देश के प्रधानमंत्री को यह नहीं पता होना चाहिए कि उसकी सरकार क्‍या कर रही है। एक सामान्‍य आदमी (डॉ सुब्रमण्‍यम स्‍वामी और सीताराम येचुरी) 2005 से कह रहे हैं कि 2 जी मामले में गडबड चल रही है लेकिन आप कहते हैं कि आपको पता नहीं था। अगर विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट का दबाव न होता तो क्‍या 2 जी मामले में कार्रवाई होती? पीएम साहब क्‍या आप जनता की गाढी कमाई के पौने दो करोड के गबन दोषी नहीं हैं?

- आप कहते हैं कि राजा को मंत्री डीएमके के कारण गठबंधन की मजबूरी में बनाया गया। आपकी यह सफाई व्‍यावहारिक रूप से सही हो सकती है लेकिन सैद़धांतिक और संविधानिक प्रावधान तो यही कहते हैं कि मंत्री प्रधानमंत्री की सूझबूझ और पसंद नापसंद से बनते हैं। (वैसे जिस मीडिया से आप मुखातिब थे उसी का कहना है कि आपकी कैबिनेट में कौन शामिल होगा इसे राडिया जैसे लोग भी तय करते हैं।) प्रधानमंत्री जी पद और गोपनीयता की शपथ लेते समय आपने संविधान और देश के प्रति उत्‍तरादियत्‍व निभाने का वायदा किया था या गठबंधन के प्रति नहीं।

गठबंधन की मजबूरी का हवाला देकर आप ही साबित कर रहे हैं कि आपके लिए देश और संविधान से बडी आपकी सरकार हो गई थी। क्‍या भी आपको लगता है कि आपने अपनी शपथ पूरी की है? क्‍या यह दोष नहीं है?

- 2जी मामले में आपने गठबंधन की मजबूरी बताई लेकिन राष्‍ट्रमंडल खेलों की तैयारी में हुए भ्रष्‍टाचार और दुनिया पिटी भद़द के लिए कौन जिम्‍मेदार कौन है? क्‍या राष्‍ट्रमंडल खेलों की तैयारी का मामला सीधा आपसे जुडा नहीं है? लगभग आधा दर्जन बार तैयारियों के लिए बजट बढाया गया वह भी आपकी मंजूरी से।

पीएम साहब का वर्षा जब कृषि सुखाने…जब लाखों-करोडों की लूट हो ही गई तो अब दिखावे की कार्रवाई से क्‍या फायदा?

- आपने आज फिर कहा कि महंगाई मार्च तक काबू में होगी। 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान भी आपने वादा किया था कि सरकार बनने के 100 दिन के अंदर महंगाई काबू में होगी, नतीजा सिफर। उसके बाद आप कम से कम एक दर्जन बार यही बयान दे चुके हैं लेकिन महंगाई में आपके बोल आग में घी जैसे हैं। पीएम साहब आपको 10 फीसदी की ग्रोथ रेट चाहिए और जनता को दो जून की रोटी, आपको आंकडों की बाजीगरी करनी है और जनता को परिवार पालना है। कभी निकलिए बाजार में और देखिए दाल, तेल, चावल, नमक, प्‍याज, लहसुन, सब्‍जी और पेट्रोल जैसी रोजमर्रा की चीजों के भाव क्‍या हैं? कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ तो नहीं पर गरीब के गाल पर जरूर पड रहा है। आपके मंत्री आए दिन महंगाई बढाने वाले बयान देते हैं। उनपर आपकी लगाम नहीं। आखिर कब तक सहेंगे महंगाई की मार।

- आज प्रधानमंत्री ने एक और गंभीर बात कही कि –भाजपा अपने एक मंत्री पर हुई कार्रवाई का बदला निकाल रही है और जेपीसी पर हंगामा खड़ा कर रही है। उनका कहना था कि भाजपा सौदेबाजी कर रही है।

सबसे बडा सवाल यह है कि अगर किसी भाजपाई ने प्रधनमंत्री या कांग्रेस से सौदेबाजी की हिम्‍मत की तो उसके खिलाफ कार्रवाई क्‍यों नहीं की गई? क्‍यों नहीं प्रधानमंत्री उसका नाम बताने की हिम्‍मत दिखाई? आखिर यहां कौन सा गठबंधन धर्म था पीएम साहब?

आप सारी गडबडियों, घोटालों का ठीकरा गठबंधन के माथे फोडकर फारिग हो लिए लेकिन यह मत भूलिए की राजनीति के अंतिम लक्ष्‍य (सत्‍ता) तक पहुंचने के लिए आपको जनतंत्र के अंतिम सत्‍य (जनता) की चौखट पर ही जाना है। और जनता सब समझती है। बिहार के चुनाव बीतने बाद गंगा में ज्‍यादा पानी नहीं बहा है। अभी बंगाल, असम, तमिलनाडु, उप्र आना बाकी है। भारत की सवा अरब जनता को मजबूर नहीं मजबूत प्रधानमंत्री चाहिए।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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