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गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

क्‍या हिंदू होना ही सांप्रदायिकता है?

जब से अयोध्‍या मसले पर हाइकोर्ट का फैसला आने की बात चली तब से हर प्रकार का मीडिया यही बात थी कि शांति बनाए रखें। मेरी जानकारी में हर मीडिया ने कमोवेश वही जिम्‍मेदारी दिखाई और उसका असर भी सामने दिख रहा है। इस पूरे लगभग एक महीने हर न्‍यूज चैनल से लेकर अखबार और वेबसाइटस से लेकर सोशल कम्‍यूनिटीज तक बस सफेद फाख्‍ते उड रहे थे।
आज ही मेरे फेसबुक वॉल पर मेरे एक मित्र ने कुछ लिखा। (http://www.facebook.com/photo.php?fbid=147455791963780&set=a.126071017435591.9610.100000980810798&il=0¬if_t=photo_reply#!/profile.php?id=1700751039) मेरे लिए उनके शब्‍द आश्‍चर्यजनक थे क्‍योंकि मैंने ऐसा कुछ नहीं लिखा था जिसका जवाब ऐसा हो…. पर मैं अपने मित्र की व्‍याकुलता समझता हूं! और यह भी समझता हूं यह सारी बातें क्‍यों ताजी हो रही हैं। खैर यह उनका निजी मामला है इसलिए टिप्‍पणी करना उचित नहीं है लेकिन उन्‍होंने मेंरे निजी मामले पर प्रश्‍न उठाए हैं सो उसका जवाब देना भी जरूरी है। यह जवाब सिर्फ इसलिए दिए जा रहे हैं क्‍योंकि इन्‍हें पूछा गया है। हो सकता है मेरे यह जवाब मुझे सांप्रदायिक की श्रेणी में ला खडा करें क्‍योंकि मैं हिंदू हूं लेकिन मुझे इस बात की चिंता नहीं है। मेरे लिखने का निहितार्थ सिर्फ इतना नहीं कि मैं अपनी बात रखूं वरन यह भी है मैं यह तो जानूं कि इस देश में क्‍या हिंदू होना ही सांप्रदायिकता है?

सवाल- राष्ट्रवाद बनाम हिंदूवाद
राष्‍ट्र माने सिर्फ देश नहीं। राष्‍ट्र मतलब राज्‍य नहीं, न ही नेशन, न स्‍टेट और न ही कंट्री। राष्‍ट्र की अवधारणा इससे कहीं व्‍यापक है, जिसका अभिप्राय भौगोलिक सीमाओं, राजनीतिक व्‍यवस्‍थाओं और वैश्‍विक मान्‍यताओं से आगे है। राष्‍ट्र इन सबके साथ सांस्कृतिक परंपराओं, धार्मिक मान्‍यताओं और वैचारिक भिन्‍नताओं और समरूपताओं का समग्र स्‍वरूप है। राष्‍ट्र वह है जिसकी भौगोलिक सीमाएं तो तय हो सकती हैं लेकिन उसका सांस्‍कृतिक और धार्मिक विस्‍तार असीम होता है। जैसे कि हमारा भारतवर्ष। मुझे स्‍पष्‍ट नहीं है कि इन सवालों में हिंदूवाद शब्‍द किस अर्थ में प्रयोग किया है। रही बात राष्ट्रवाद बनाम हिंदूवाद की तो यह तुलना निरर्थक है। इसका कोई मायने नहीं है।

अब आपने सवाल खडे किए हैं कि हिंदूवादी राष्‍ट्रवादी कैसे हो सकता है? हो सकता है आपको हिंदू या सनातन धर्म के बारे ज्ञान न हो क्‍योंकि ऐसा सवाल वही लोग खडा कर सकते हैं। वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिन:……सर्वे संतु निरामय: लेकर परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीडा सम नहिं अधमाई, अष्‍टादश पुराणेशु व्‍यासस्‍य वचनद्वयं, परोपकाराय पुण्‍याय, पापाय परपीडनम जैसे तमाम उदाहरण तो आपको हमारे धर्मग्रंथों में तो मिलेंगे ही साथ ही निरा निरक्षर भारतीय भी प्रकृति पूजा से लेकर चीटियों को आटा देने जैसे जो छोटे छोटे काम रोज करता है वही तो है हिंदुत्‍व की झलक। अन्‍य धर्मों में जो बातें पवित्र ग्रंथों में दर्ज हैं वह हमारे देश में बच्‍चे बच्‍चे की जुबान पर हैं। झूठ बोलना पाप है, जीव हत्‍या पाप है, गरीबों पर दया करो, दादी नानी की कहानियों में छिपे दर्शन को शायद आपने नहीं सुना है। यही नहीं सिर्फ इसी धर्म वाले ही हैं जो मजारों पर सजदे करके चादर पेश करते हैं और गुरुद्वारे में गुरुवाणी सुनने के बाद चर्च में जाकर ईश्‍वर के आगे पापों के लिए क्षमा मांगते हैं। यही तो है हिंदुत्‍व। अब इसमें बुराई क्‍या है। हो सकता है ऐसे सवाल पूछते हुए आपको यह सब याद नहीं आया हो लेकिन मेरा हिंदुत्‍व और हिंदू धर्म तो यही है। अब कानूनी बात करें तो जिस संविधान का आपने नीचे हवाला दिया है उसी संविधानिक उपबंधों के तहत बनी भारतीय न्‍यायपालिका ने यह कहा है कि हिंदुत्‍व जीवनशैली है, धर्म नहीं। इसलिए हिंदुत्‍व को व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में देखिए। अब शायद आप हिंदू समझ गए हों तो हिंदू होगा उसके लिए जननी जन्‍मभूमिश्‍च स्‍वर्गादापि गरीयसी।

1- हमारा राष्ट्र बहुल संस्कृति, बहुधर्मी एवं गंगा-जमुनी है।
भारत की 85 फीसदी आबादी हिंदुओं की है। 15 फीसदी में बाकी के मुस्‍लिम, जैन, बौदध, सिख, पारसी आदि आदि। दुनिया के अधिकांश देशों में बहुसंख्‍यक समाज का धर्म ही राष्‍ट्रीय धर्म है। बावजूद इसके भारत की संविधानसभा ने कोई धर्म विशेष अंगीकार नहीं किया, जबकि उस सभा के अधिकांश सदस्‍य हिंदू थे। यहां तक बाद में देश के संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्‍द जोडा गया वह भी एक हिंदू ने किया। यह हिंदुस्‍तान में भी संभव है साथी जहां एक साथ अजान, गुरुवाणी, आरती और चर्च की प्रे गूंजती है। दुनिया के किसी अन्‍य देश में ऐसा हो तो जरूर बताएं। आप बताइए अगर हिंदू के अलावा दूसरा कोई धर्म भारत में बहुसंख्‍यक होता तो क्‍या तब भी भारत धर्म निरपेक्ष राष्‍ट्र होता?

2- संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा को लक्ष्य माना गया है।
यह बेहद हर्ष की बात है। सबको उस लक्ष्‍य की पूर्ती में सहयोगी बनना चाहिए। एक धर्म निरपेक्ष देश में जन्‍माष्‍टमी, ईद-उल-फितर, गुरुनानक जयंती, बडे दिन जैसे धार्मिक पर्वों पर अवकाश होता है। धार्मिक यात्रा के लिए सरकारें अनुदान देती हैं, धर्मआधारित शिक्षण संस्‍थानों को सरकारी सहायता और स्‍वायत्‍ता दी जाती है, क्‍या यह सही है।

3- हिंदूवादी हिंदू को छोड़कर अन्य किसी धर्म का अस्तित्व नहीं मानते हैं।
ऊपर की बातों से आपको इतना तो स्‍पष्‍ट हो गया होगा कि आपकी तीसरी बात स्‍वत: खारिज हो जाती है। वैसे मैं यह भी नहीं समझ पाता हूं कि आप हिंदुत्‍व और राष्‍ट्रवाद की बात करते करते आडवाणी और कटियार आदि तक क्‍यों जाते है। अरे ये हिंदुत्‍व का झंडाबरदार नहीं हैं और न ही इनके पास ठेकेदारी है हिंदुत्‍व की। मैं हिंदू हूं सभी धर्मों का सम्‍मान करता हूं आप भी अगर नौकरी के फार्म में धर्म का कॉलम भरेंगे तो उसमें हिंदू ही टिक करेंगे आपभी सभी धर्मों का सम्‍मान करते हैं तो हिंदुत्‍व दूसरे धर्मों का विरोधी कहां हुआ। हिंदू धर्म ही है जहां पूजा करो तब भी, न करो तब भी, बुत पूजो तब भी न पूजो तब भी, साकार मानो तब भी निराकार मानो तब भी, वैष्‍णव हो तब भी शैव हो तब भी, द्वैत मानो तब भी अद्वैत मानो तब भी, व्रत रहो तब भी न रहो तब भी, तीरथ जाओ तब भी न जाओ तब भी, रहेंगे हिंदू ही। न हमें धर्म छोडना पडेगा और न ही ऐसा कोई नियम है। तो हिंदू दूसरे धर्मों के विरोधी कहां हुए?

4- तोड़-फोड़ की बात करने वाले राष्ट्रवादी नहीं हो सकते!
तोडफोड की बात करने वाला राष्‍ट्रवादी तो बहुत दूर की बात वह तो इनसान कहलाने लायक भी नहीं है। हिंदुत्‍व का मूल सृजन है, समाप्‍ति तो नियति है।

5- हिंदू मूलत: दलित, आदिवासी एवं मूल भारतीय विरोधी है। ये किस हिंदू की बात है। ऐसा कौन सा हिंदू है जो ऐसा है। और अगर कोई व्‍यक़ति ऐसा है तो हिंदू नहीं है। मैं जिस हिंदुत्‍व को मानता और जानता हूं वह ऐसी कोई सीख नहीं देता।

6- हिंदूवादियों के कृत्य मालेगांव एवं हैदराबाद के मक्का मस्जिद में बम धमाका कराने के मामले में आए हैं।
दरअसल अब आए हैं आप अपनी असली बात पर, इसके पहले तो आपने भूमिका बांधी थी। इन कृत्‍यों के बाद किस राष्‍ट्रवादी हिंदू ने कहा कि इन स्‍थानों पर जो हुआ वह बहुत अच्‍छा था। इसका जवाब देते समय आप राजनीतिक लोगों के नाम मत गिनाइएगा क्‍योंकि अगर ऐसा है तो मेरे पास भी कुछ नाम हैं।
वैसे क्‍या इन तीन धमाकों के अलावा देश में कभी धमाके नहीं हुए हैं। या आपको याद नहीं हैं। उनके बारे में भी सवाल उठाइए। या डर है कहीं सांप्रदायिक न हो जाएं? हर मसले के सभी पहलू देखेंगे तभी सच दिखेगा नहीं तो अर्धसत्‍य।

8- हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं ने अपने घर भरे
ऐसा करने वाले चोर हैं। उन्‍हें राजनीति में रहने का कोई हक नहीं है।

9- --------------------------------- यह टिप्‍पणी किसी व्‍यक़ति विशेष पर लगाया गया आरोप है, इसलिए इस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा। क्‍योंकि इससे मेरा कोई वास्‍ता नहीं है।

10- 1992 में अयोध्या में उत्पात मचाने वालों को राष्ट्रविरोधी ही मानना पड़ेगा
जरूर मानेंगे। आपकी बात से सहमत हूं। उसके बाद से देश बदला, लेकिन उसके पहले भी बहुत कुछ हुआ था। उसे भी तो मानिए। अयोध्‍या में जब यह सब हुआ उस दिन आपके प्रिय संगठनों के दर्जनभर ही नेता अयोध्‍या में थे। इसके अलावा हजारों लोगों की पहचान सिर्फ और सिर्फ एक भीड की थी जो धर्मिक भावनाओं के ज्‍वार में बहकर आए थे। कहिए सबको राष्‍ट्रविरोधी।
वैसे वे लोग तो राष्‍ट्रविरोधी नहीं होंगे न जो खाते भारत की हैं और गाते पडोसी की। राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो जो देश पर हमला होने पर खुशी मनाते हैं। राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो देश के एक हिस्‍से को देश से अलग करने की मांग करते हैं, राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो उनका समर्थन करते हैं जो देश के खिलाफ ही युद़ध छेडे बैठे हैं? कहिए मैं सही कह रहा हूं न।

11- अयोध्या में उत्पात मचाने वाले राष्ट्रविरोधियों के खिलाफ मुकदमा विचाराधीन है।
तो करने दिजिए कोर्ट को अपना काम। अच्‍छा ही तो है जितना जल्‍दी फैसला आ जाए और दोषियों को सजा मिले। लेकिन बाद में मुकरिएगा मत कोर्ट के फैसले से जैसा अभी लखनऊ बेंच के फैसले के बाद केंचुल उतार फेंकी है।

12- उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को इस मामले में एक दिन की सांकेतिक सजा हो चुकी है।
इसके लिए भारतीय न्‍यायपालिका की जय और यह याद दिलाने के लिए आपको धन्‍यवाद।

13- मालेगांव बम धमाके की आरोपी प्रज्ञा सिंह का पक्ष लेने वाले लोग संघ एवं हिंदूवादी संगठनों से जुड़े लोग हैं।
गलत है। नहीं लेना चाहिए आरोपी का पक्ष। मैं आपकी बात से सहमत हूं। लेकिन क्‍या आप मेरी बात से सहमत होने की हिम्‍मत रखते हैं- पक्ष उसका लेना चाहिए जो देश पर हमले के मामले में देश की उच्‍चतम अदालत द्वारा मौत की सजायाफ़ता है। पक्ष उसका लेना चाहिए जो आंतकियों के साथ शूटआउट में मारा जाता है और लोग उसे निर्दोष ठहराने में लगे रहते हैं। पक्ष उसका लेना चाहिए जो छद़म हो।

14- मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती जेल में आतंकी प्रज्ञा ठाकुर से मिलन के लिए गईं।
तत्‍काल प्रभाव से माननीय कोर्ट को इस मसले को संज्ञान में लेकर उमा को सजा देनी चाहिए। लेकिन आपका अयोध्‍या फैसले के बाद कोर्ट से भरोसा तो नहीं उठ गया। पर क्‍या जेल में किसी से मिलना गलत है। राजीव गांधी के हत्‍या के दोषियों से उन्‍हीं के परिवार के लोग मिले हैं। वैसे मिलने तो लोग आजमगढ भी जाते हैं आपको पता है कि नहीं यह बात।


15- देश में अशांति फैलाने एवं दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने वाले राष्ट्रवादी कैसे हो सकते हैं।
इसका जवाब पहले दे चुका हूं। ऐसे लोग राष्‍ट्रवादी तो दूर इसान कहलाने लायक भी नहीं हैं।

चलिए नवरात्रि की शुभकामनाएं।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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