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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

एक पाती रामजी के नाम

हे रामलला!
मुझ अकिंचन का प्रणाम स्‍वीकार करें।


लिखता तो नहीं, पर हालात ऐसे हैं कि मुझे आपको ही लिखना पड रहा है। आज मैं आपको अपनी कुछ चिंताओं से अवगत कराने के लिए पत्र लिख रहा हूं। रामजी इस समय आपकी अयोध्‍या और आपको लेकर पूरे भारतवर्ष में अजब सी बेचैनी का माहौल है। सब तरफ सांसें रुकी हैं। अजब सा सन्‍नाटा है। ऐसा पहले न था।
हे राघव, जिस अयोध्‍या के स्‍मरण मात्र से मोक्ष मिलने का विश्‍वास हजारों साल से बना हुआ है आज उस अयोध्‍या का स्‍मरण चित्‍त को बेचैन कर रहा है। लोग सप्‍तपुरियों में प्रथम अयोध्‍या और अयोध्‍यापति राम को याद तो कर रहे हैं पर उन्‍हें शांति नहीं मिल रही। अयोध्‍या का जिक्र होते ही एक आशंका जन्‍म ले रही है।
प्रभू! मैंने जब से होश संभाला तब से राम-राम सुनाता आया। और बडा हुआ तो राम को जाना। पर मैंने जितना जाना उतने में तो राम दीनबंधु, दयासागर, करुणानिधान, भक्‍तवत्‍सल ही हैं। फिर आपको लेकर ऐसा वातावरण क्‍यों बन गया?

अन्‍याय और अत्‍याचार के अंत के लिए ही पृथ्‍वी पर अवतरित होने वाले हे राम, सुना है आपके मंदिर को लेकर कोई फैसला आने वाला है और यह सब बेचैनी उसी के लिए है। लोगों ने बताया, आज अयोध्‍या में जहां आप विराजमान हैं वहां, पहले आपका मंदिर था या कोई और इबादतगाह, इस पर किसी अदालत को फैसला सुनाना है। रामजी मैंने तो सुना था कि आप कण-कण में हैं। हर चल-अचल, जीव-निर्जीव, जड-चेतन, भूत-भविष्‍य-वर्तमान में आप ही का अंश है, फिर आपके मंदिर को लेकर यह सब… क्‍या यह आपकी लीला है या……..विधि का विधान?

मुझे नहीं पता कि गोपाल सिंह विशारद का दावा सही है, या सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड का? मैं नहीं जानता कि निर्मोही अखाडे और देवकी नंदन अग्रवाल की दलीलें खरी हैं या नहीं? मैं यह भी नहीं जानता कि अदालत ने किसके दावे को सही माना है, पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि आप इन दावों, वादों, दलीलों, वकीलों, अदालतों और मुगालतों से परे हैं। हे कौशलेश! अयोध्‍या की उस जमीन पर आपका मंदिर बने या नहीं, मुझे नहीं पता। मैं तो इतना जानता हूं, अयोध्‍या ही नहीं, पूरी दुनिया अवधेश की है। जब तक दुनिया है तब तक राम हैं और जब तक राम हैं तभी तक दुनिया।

हे राघवेंद्र! कुछ शताब्‍दी पहले आपके उस अवध में सरयू का रंग खून से लाल हो गया जिस अवध का अर्थ ही था जहां कभी वध न हुआ हो। सुना है कि तब किसी मीरबांकी ने आपके मंदिर को तोडकर वहां फरिश्‍तों के उतरने की जगह बनाई थी। सालों से यह विवाद चल रहा है। हे अयोध्‍यापति, कुछ साल पहले तो कभी युद्ध न देखने वाली आपकी अयोध्‍या रणभूमि भी बन गई थी।

अन्‍याय का अंत करने के लिए अवतार लेने वाले हे राघव! जब मीरबांकी ने वहां कहर ढाया या जब कुछ हजार की उत्‍तेजित भीड ने ढांचा ढहाया तो आप चुप क्‍यों रहे? क्‍या तब रघुकुल नायक की भुजाएं फडकी नहीं थीं? क्‍या जब मीरबांकी के कहर और ढांचा गिरने के बाद देश दुनिया में हजारों निर्दोंष निशाना बनाए जा रहे थे तो आपके करुणा का सागर सूख गया था? हे जनार्दन! आपने ही तो कहा था कि जब-जब पृथ्‍वी पर संकट आएगा तो आप आएंगे! क्‍या इससे बडा भी कोई संकट आएगा? हे प्रभू! जब आपके अस्‍तित्‍व पर ही सवाल उठा तब भी आप मौन रहे क्‍या यह भी आपकी लीला थी!

हे मर्यादा पुरुषोत्‍तम!
जिस देश में संस्‍कार, मर्यादा और राजधर्म का पालन करने के लिए आप ने 14 वर्ष का वनवास काटा, अपनी प्राणप्रिय पत्‍नी को त्‍याग दिया उसी देश के सत्‍ताधीश और राजनेता राजधर्म भूलकर सत्‍ता के मद में चूर पथभ्रष्‍ट हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं। तब आपने क्‍यों नहीं उन्‍हें राजधर्म की याद दिलाई? हे दशाननहंता! क्‍या आप ऐसे धर्मभ्रष्‍ट, पथभ्रष्‍ट, अमर्यादित, जनद्रोही सत्‍ताधीशों के वध के लिए अवतार नहीं लेंगे? जिस रामराज्‍य की कल्‍पना मात्र से लोग पुलकित होते हैं उसी देश में क्‍यों नहीं रामराज्‍य आ पाया? उल्‍टे अब राम को अदलातों में खुद को साबित करना पड रहा है। क्‍या यह भी आपकी लीला है?


हे राजेंद्र! आपने ही कहा था-जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । मैं भी अपनी उसी जन्‍मभूमि को बचाने के लिए आपसे आग्रह कर रहा हूं। हे प्रभू! फैसला मंदिर के पक्ष में आए या इबादतगाह के पर राम तो राम ही रहेंगे। आप उस विवादित जमीन पर आलीशान मंदिर बनवाकर उसमें रहें या अभी मौजूद टेंट के मंदिर में या फिर वहां भी नहीं, पर राम तो राम ही रहेंगे? क्‍योंकि मेरे राम किसी महल, अटटालिका, भवन, मंदिर, राजसिंहासन से नहीं मेरी आस्‍था से हैं, और मेरी आस्‍था जिस राम में है, वह अपने पिता का वचन पालन करने के लिए 14 साल जंगल में भटका था, उसने शबरी के जूठे बेर खाए थे, उसने केवट का अहसान लिया था, उसने अहिल्‍या का उद़धार किया था, उसने उस अधर्मी बालि का भी वध किया जो सीता को चुटकी में रावण के बंधन से आजाद का सकता था, उसने राजधर्म का आदर्श स्‍थापित किया और रामराज्‍य चलाया। मैं उस भरतवंशी राम से आग्रह करता हूं कि हे रघुवर! आपकी अयोध्‍या की केवल 67 एकड जमीन पर आने वाले फैसले का सीधा असर आपके और मेरे भारतवर्ष पर पडेगा। हे करुणानिधि! फैसला जो भी आए आपके देश की फिजा न बिगडने पाए।

हे प्रभू! समस्‍याएं और वेदनाएं तो बहुत हैं, लेकिन फिलहाल तो सबकी निगाहें अयोध्‍या की ओर हैं और मेरी आपकी ओर। आप सर्वज्ञ हैं, इसलिए ज्‍यादा कहने की जरूरत नहीं। मुझे पूरा विश्‍वास है कि मेरे राम पर मेरी आस्‍था और अटल होगी।

हे राघव मेरी प्रार्थना स्‍वीकार करें।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

प्‍यारी राधा को प्रियतम बुलाने तो दो

श्री कृष्‍णजन्‍मोत्‍सव की हार्दिक शुभकामनाएं


किसने यह कह दिया श्‍याम आते नहीं,
बनके राधा किसी को बुलाने तो दो।
रास रच जाएगा, बंशी बज जाएगी,
किसी गोपी को मधुवन में आने तो दो।।

चीर हरने यहां भी चला आएगा,
मस्‍त गोपी को यमुना नहाने तो दो।
छोडकर काम सब गोपियां आएंगी,
श्‍याम संइयां को बंशी बजाने तो दो।।

आज भी श्‍याम बंशी बजा सकते हैं,
प्रेम में मग्‍न मीरा को गाने तो दो।
बनके राधा किशन आज फिर नाचेंगे,
जरा राधा को नखरे दिखाने तो दो।।

कौन कहता कि राधा को भूले किशन,
अरे! मधुवन में सावन को आने तो दो।
छोडकर शेष शैया भी आ जाएंगे,
प्‍यारी राधा को प्रियतम बुलाने तो दो।।

सितंबर 2003 को बीएचयू के बिरला हॉस्‍टल के रूम नंबर 124 में बस ऐसे ही बन गया।)

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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