राज और समाज पर खरी आवाज

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गुरुवार, 22 जुलाई 2010

धन्‍यवादनामा खबरों के थोक विक्रेताओं के नाम

नमस्‍कार। मैं एक पत्रकार हूं। सीखने की शास्वत परंपरा का पालन करते हुए स्‍याही की मोहक खुशबू के साथ इतिहास को रोज अखबार के पन्‍नों पर टांक रहा हूं। खबरें गढना, बुनना, रचना और बेचना यही काम है मेरा। गढना, बुनना और रचना इसलिए क्‍योंकि अंतत खबरों को बेचना भी तो है। इसी बेचने की कवायद में सुबह नींद खुलने से रात में नींद आने तक लगे रहते हैं। सच कहूं तो जब पत्रकारिता की पढाई का मन बनाया तब पता ही नहीं था कि खबरें बेची जाती हैं। वो तो इस पेशे में उतरा तब पता चला कि यहां भी कहावत चलती है कि जो दिखता है वही बिकता है। सब अलग अलग तरह के व्‍यापारी हैं। एक ही खबर को अलग अलग तरह से सजा संवार कर बेचने में लगे हैं। कई बार तो न्‍यूजरूमों में भी यह बात होती है कि ऐसे उठेगी तभी बिकेगी। खैर अब जब मैं भी व्‍यापारी हो गया हैं तो मुझे भी बेचने और खरीदने में कोई शर्म नहीं रही, बस इतना ध्‍यान रहता है कि हर पेशे की तरह इस पेशे की भी एक नैतिकता है। गनीमत है कि अभी भी कुछ अखबारों में नैतिकता बची है और मेरी खुशकिस्‍मती यह है कि मैं भी फिलहाल ऐसे ही अखबार जुडा हूं जहां बेचने और खरीदने में इनसानी जज्‍बातों की कदर होती है। जहां व्‍यावसायिक हित पर पेशेगत नैतिकता हमेशा हावी रहती है। वैसे मैंने अभी तक ऐसा कुछ नहीं बताया जो अलग हो या जो एक्‍सक्‍लूसिव हो। इसलिए यह नहीं बिकेगा। चलिए अब आप को बताता हूं कि हम पत्रकार बेचने के लिए माल खरीदते कहां से हैं। इससे पहले मैं यह भी बता दूं माल की जरूरत क्‍या है।
अखबारों में शाम चार बजते ही लीड स्‍टोरी तलाशी जाने लगती है। रिपोर्टर से लेकर डेस्‍क तक सब तलाशते हैं। माल ऐसा होना चाहिए जो पहली नजर में ग्राहक को जम जाए यूं कहिए कि बिकाऊ होना चाहिए। वो किसी नेता की नोट लेती तस्‍वीर, आतंकी हमले में मरा आम आदमी, नक्‍सली निशाना बने पुलिसवाले, करोडों के भ्रष्‍टाचार में फंसा कोई अफसर/नेता, भूख से दम तोड चुका कोई इंसान, किसी गोली का शिकार कोई शेर/बाघ या हिरण, रैंप पर कैटवाक करती मॉडल के फिसल चुके कपडे, कलावतियों के घर का मखौल उडाता कोई राजकुमार, क्रिकेट के मैदान पर छक्‍का जडते खिलाडी हों, बालीवुड की कोई मसालेदार चटपटी खबर आदि, आदि या ऐसा ही कुछ जो बिके। तो साहब ये हैं माल जिनकी हमें तलाश रहती है। मैं पत्रकारों को प्रवक्‍ता तो नहीं लेकिन उस बिरादरी के एक जिम्‍मेदार सदस्‍य के नाते मैंने सोचा उन लोगों को शुक्रिया अदा करूं जिनसे हमें ये माल मिलता है और आपको भी बताऊं कि जो आप तक पहुंचता है वो कौन देता है।

दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र होने के नाते सबसे पहले शुक्रिया हमारे विधायकों, सांसदों का। जो कभी नोट लेते कभी देते, कभी दिलवाते, कभी लहराते, कभी दिखाते हुए हमें खबरें देते हैं। शुक्रिया इसलिए की अगर ये लोग लोकतंत्र के मंदिरों को अखाडा न बनाएं तो हमें खबर न मिले। शुक्रिया इसलिए भी कि ये सदन में मां बहन करते हैं, सदन में कुर्सियां मेज चलाते हैं माइक फेंककर निशानेबाजी का नमूना दिखाते हैं। धन्‍य हैं हमारे जनप्रतिनिध जो इतनी मेहनत सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें वर्ना उन बेचारों का क्‍या। वे तो जनसेवक हैं।

फिर मैं शुक्रिया अदा करना चाहूंगा देश के प्रशासनिक और पुलिस अमले का। सुबह से शाम तक जन सेवा। कितना कैसे खाना है, किससे खाना है और किसको खिलाना है सब का ध्‍यान रखना पडता है। ऊपर से नीचे तक सब तय है। जेल में फाइव स्‍टार सुविधाएं मुहैया कराना और क्राइम कंट्रोल में और क्रिमिनल जहन्‍नमुम में यह दिखाने के लिए मुठभेड आदि कार्यक्रम की व्‍यवस्‍थाएं करना कितना कठिन काम है। फिर हमारे देश में होता है ताकि हमें खबरें मिल सकें। बाढ आई तो, सूखा पडा तो ये बेचारे तो हमेशा खबरों के लिए हरा ही हरा करते हैं। सो इनका भी शुक्रिया।
अब शुक्रिया दुनिया की सबसे बडी यातायात व्‍यवस्‍था यानि भारतीय रेल का जिसमें सबसे ज्‍यादा कर्मचारी सेवारत हैं। साहब है ऐसा किसी देश में। बीस साल में पांच हजार हदासे और चार हजार की मौत का आंकडा और किसी विकसित या विकासशील देश के देने की हिम्‍मत है। नहीं। यह सिर्फ सिर्फ हमारी भारतीय रेल में ही हो सकता है। साल में औसतन दो सौ की जान लेने वाला रेल महकमा क्‍या कम खबरें देता है। लगे हाथ वायु सेवा की भी बात करते चलें। कभी टायर फटा, कभी कुत्‍ता पहुंचा, कभी चिडिया फंसी, कभी हवा में भिडे, कभी जमीन से फिसले यानि नाना प्रकार के व्‍यवधान हमारी वायु कंपनियां सिर्फ इसीलिए तो लेती हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें। सो शुक्रिया।

शुक्रिया मैदान के धुरंधरों का। हां भाई सही समझे आप। मैं अपनी टीम इंडिया की ही बात कर रहा हूं। भले उन्‍हें देश के लिए पदक लाने का शौक नहीं लेकिन छक्‍के जडने में क्‍या कम मेहनत लगती है। शतक मारना क्‍या मामूली काम है। यही नहीं खेलने के बाद क्‍लबों में जाकर सिर्फ इसलिए मारपीट, मां बहन करना ताकि अखबारों को मसाला मिल सके क्‍या कोई पराया इतना करता है। हमें कौन सी कोल्‍डड्रिंक पीनी चाहिए, कौन सी गाडी चलानी चाहिए, यानि आप तो यूं समझों कि सुबह सोकर उठने से रात में सोने और उसके बाद तक हमें क्‍या यूज करना चाहिए सब ये बेचारे खिलाडी हमें बताते हैं। धन्‍य हैं ये तभी तो इनक शुक्रिया अदा किया।

अब बात पर्दे के सितारों की। आम इनसान की किस भावना को कैसे कैश कराया जा सकता है। कैसे लाखों खर्च करके लोगों से करोडों कमाए जाते हैं, कब किस फिल्‍म को हिट कराने के लिए किसके खिलाफ क्‍या और कितना बोलना है, किस फिल्‍म में क्‍या मसाला डालना है, सब तो करते हैं बेचारे हमारे हीरो, हिरोइन। इनका क्‍या इनके पास पैसे की कमी थोडे है यह तो सिर्फ इसलिए ताकि अखबार छप सकें।

अब बात आतंकियों, नक्‍सलियों अलगाववादियों की। अखबारों में इनका बहुत योगदान है। भले खबर बनाने के लिए इन्‍हें मजलूमों की जान लेनी हो लेकिन ये लेते हैं। भले उन्‍हीं लोगों को मारना पडे जिनके हक की लडाई का ये दावा करते हैं पर ये मारते हैं। ये लाशों पर जश्‍न मनाते हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें। अपने ही देश और अपने ही लोगों पर पत्‍थर, लाठी, गोली, बम बरसाते इन्‍हें कितना कुछ करना पडता होगा यह तो सिर्फ यही जान सकते हैं। मैं तो सिर्फ इनका शुक्रिया अदा करता हूं।
शुक्रिया ठेकेदारों का। मुंबई से मदुरई तक, कश्‍मीर से कटक तक। हर तरफ फैले हैं ये। अरे ठेकेदार मतलब भाषाई, जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय पंचों की बात कर रहा हूं। कब कहां कौन सी भाषा बोली जाए, कपडे पहने जाएं, कौन कहां आए कहां न जाए आदि आदि संविधान के खिलाफ जाकर अगर ये शूरवीर न तय करें तो क्‍या उस दिन अखबार छपेगा भला। कभी नहीं। धरने प्रदर्शन के नाम पर अपनी संपत़ति का नुकसान करना, सडके, रेल जाम करना, फूंकना। कब मंदिर के आगे गाय फिकवानी है कब मसि़जद के आगे वाराह, कब मंदिर के नाम पर आंदोलन शुरू करना है कब मसिजद के नाम पर जिहाद सब यही बेचारे तो करवाते हैं सिर्फ इसलिए ताकि हमें माल मिलता रहे। यह सब इसलिए ताकि हम पत्रकारों की रोजी रोटी चलती रहे। तो क्‍या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम इनका शुक्रिया अदा करें।

कहते हैं कोई भी बात बिना पडोसी की चर्चा के खत्‍म नहीं होती। फिर इस मामले में तो हमारे मुल्‍क और हमारे मुल्‍क के अखबारों की किस्‍मत से तो दूसरी और पहली दुनिया के लोग भी खार खाते हैं। चीन, भूटान, अफागानिस्‍तान हो या धार्मिक सहोदर नेपाल या फिर हमारा ही अंश पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश क्‍या नहीं करते। कहां हमारी जमीन पर कब्‍जा करना है, कब, कैसे, कितने, कहां और किन आयुधों से सुसज्‍जित जिहादी भेजने है इसकी व्‍यवस्‍था करना। कब बातचीत और मुलाकात के आयोजन के साथ ही सीमा पर आतिशबाजी करनी है। कब कब और कहां कहां जिहादियों का मार्गदर्शन करना, उन्‍हें हिदायतें देते रहना कोई आसाना काम है। चोरी करना और फिर सीना जोरी करना, मेरा तो दावा है कि अगर कुछ पडोसी मुल्‍क अपनी जात से बाज आ जाएं तो कितने अखबारों को अपने पेज कम करने पडेंगे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

सच कहूं तो दोस्‍तों इन्‍हीं की वजह से हमारा पालन पोषण हो रहा है। आप यकीन नहीं मानेंगे पर यह सच है कि अगर कहीं कोई ट्रेन बेपटरी होती है, कहीं बम धमाका होता है, कहीं किसी पर जूते फेंके जाते हैं, कहीं करोडों किसी के बिस्‍तर तले निकलता है तो न्‍यूज रूम में जान जाती है, हलचल मच जाती है, लोग सक्रिय हो जाते हैं, कंप्‍यूटर और की बोर्ड की खटखट के अलावा टीवी वाले चीखते चिल्‍लाते एंकरों की आवाजे ही सुनाई पडती है। यूं समझिए की अजीब तरह का उत्‍सवी माहौल। भयंकर।

यह था एक पत्रकार का धन्‍यवाद पत्र तमाम शुभचिंतको के लिए। ऐसा नहीं है कि सब बिकाऊ माल ही देते हैं कुछ ऐसा भी हैं जिनके माल नहीं बिकते, उनकी भी चर्चा कभी जरूर करूंगा। भोर हुई जाती है और नींद चढी आती है। इन दिनों जैसा माल मिल रहा है भगवान करे कि वैसा आगे न मिले इसी उम्‍मीद के साथ शुभ रात्रि।

सोमवार, 5 जुलाई 2010

बंद हो, पर बंद न हो

आज भारत बंद है। मैंने हमेशा विरोध के नाम पर बंद का विरोध किया है। कुछ हद तक आज भी मैं उसी बात पर कायम हूं। कुछ हद तक इसलिए क्योंकि कभी-कभी जब कोई चारा नहीं रह जाता तो जनता को इसे ब्रह्मïस्त्र की तरह इस्तेमाल करना पड़ता है। विरोध-प्रदर्शन जनता का विशेषाधिकार है, जिसका मौलिक अधिकारों की तरह ही संरक्षण होना चाहिए। बंद करने/करवाने वालों को भी चाहिए कि उनका विरोध सृजनात्मक हो, विध्वंसक नहीं। क्योंकि आम आदमी जो सामान्यत: तटस्थ होता है वह विध्वंस का समर्थक नहीं होता। नुकसान चाहे उसका निजी हो या किसी अन्य का। वह भले कुछ न कर सके लेकिन मन ही मन इतना विध्वंसक फौज को कोसता जरूर है। बहरहाल इस मसले पर मत-मतान्तरों के मंथन से ही कुछ दिशा निकलेगी।

रविवार देर रात टीवी चैनल पर एक स्क्रोल चला- महाराष्टर सरकार ने अपने कर्मचारियों को सलाह दी कि वे रविवार देर रात तक या सोमवार तड़के ही ऑफिस पहुंच जाएं ताकि बंद के चलते कामकाज प्रभावित न हो। मेरी जानकारी में यह पहला वाकया है जब सरकार को ऐसी एडवायजरी जारी की है। अब आखिर सरकार को ऐसी क्या जरूरत पड़ गई? महाराष्टर के लिए ही सही इस खबर को देखने से पहले मैं बंद को लेकर लापरवाह था। पहले की तरह जैसे पहले आए दिन बंद होते आए हैं लेकिन इस खबर ने बता दिया कि इस बार मामला गंभीर है। वैसे भी भाजपा और संपूर्ण विपक्ष जिस तरह मूल्यवृद्धि के मसले पर एकजुट है उससे सरकार के पेट में मरोड़ होना लाजिमी है। इस साल के बजट के समय सरकार देख चुकी है एकजुट विपक्ष की ताकत। पता नहीं क्या हो गया है कांग्रेस के मैनेजरों को कि एक के बाद एक ऐसे कारण होते जा रहे हैं कि केंद्र सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है। महंगाई, आईपीएल विवाद, भोपाल गैस त्रासदी, कॉमनवेल्थ गेम्स आदि...आदि और अब पेट्रो मूल्य वृद्धि।

बहरहाल अपना विषय आज कांग्रेस की नहीं विपक्ष है। विपक्ष इसलिए क्योंकि लोकतंत्र में जितना जरूरी सत्ता पक्ष होता है उतना ही विपक्ष। बल्कि मेरा मानना है कि विपक्ष को सत्ता से ज्यादा मजबूत होना चाहिए। सत्ता के पास संख्या और सरकार की शक्ति होती लेकिन विपक्ष की ताकत उसकी एकजुटता और उसके साथ खड़ी जनता होती है। कमजोर विपक्ष से हमेशा लोकतंत्र कमजोर हुआ है। इतिहास गवाह है कि जब-जब विपक्ष कमजोर रहा तब-तब लोकतंत्र कमजोर हुआ है। और दुर्भाग्य से इस समय देश में यही हाल है। छह साल सत्ता का सुख ले चुकी भाजपा के नेता अलसा से गए हैं। ऐसे विरोध-प्रदर्शन के जरिए ही वो सक्रिय हो सकते हैं। खैर बंद विपक्ष की मजबूरी भी है। उसे खुद को साबित भी करना है।

खबर आई तो पता चला कि स्वास्थ्य सेवाएं और रोजमर्रा की चीजों को बंद से अलग रखा गया है। स्कूल-कॉलेज बंद रहेंगे लेकिन चैनलों ओर अखबारों के दफ्तर खुलेंगे। हो सकता है कि बंद के दौरान कुछ लोग स्वभावगत हरकतें करें तो ऐसे लोगों से बचे रहिए और शाम होने का इंतजार करिए। वैसे मनमोहन जी आप मैडम को बताइएगा कि हम इंतजार कर रहे हैं महंगाई थमने का। बंद समर्थकों से अपील है कि बंद सार्थक हो और सरकार से उम्मीद है कि यही बंद आखिरी हो।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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