राज और समाज पर खरी आवाज

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शुक्रवार, 25 जून 2010

ये जो एवरेडी है न.....

भोपाल त्रासदी पर बहुत हो हल्ला है। रोज नए खुलासे, नए दावे, दावों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और इन सब के बीच सरकार का वही पुराना काम.... अरे भाई जख्म को कुरेद का मलहम लगाने का। सो असली मुद्दे से जनता को फिर भटका कर कुछ लाख के मुआवजे का नमक छिड़क दिया। पर एक मसला अभी नहीं सुलझ रहा कि आखिर यूनियन कार्बाइड 2-3 दिसंबर 1984 के बाद गई कहां? आसमान खा गया या जमींदोज हो गई। आज उसका नाम कोई लेना ही नहीं चाह रहा। मैं आपसे कुछ शेयर करता हूं अब तय आप करिए कि यूका गई कहां?

डाऊ ने तो सप्रमाण झाड़ा पल्ला

यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) का अधिग्रहण करने वाली अमेरिकी कंपनी डाउ केमिकल्स ने दावा किया है कि यूसीसी की भारतीय हिस्सेदारी यूनियन कार्बाइड इंडिया लि. (यूसीआईएल) से उसका लेना-देना नहीं। यूसीआईएल एवररेडी इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के नाम से भारत में काम कर रही है। यूका में यूसीसी के 50.9 फीसदी और 49 फीसदी शेयर भारत सरकार के थे। हादसे के बाद कंपनी भारत में बंद हो गई। डाऊ का कहना है कि यूसीसी भोपाल इकाई से हमारा लेना-देना नहीं। यूसीसी ने १९९४ में ही यूसीआईएल की ५०.९ फीसदी हिस्सेदारी मैक लियोड रसेल इंडिया को बेच दिया था जो विलियमसन मेगर समूह का हिस्सा था। स्कॉट के मुताबिक भारत सरकार ने 1984 की त्रासद औद्योगिक दुर्घटना के मामले में यूसीसी और उसकी सहायक भारतीय कंपनी को एक समझौते के तहत मुआवजे के दायित्व से पूरी तरह मुक्त कर दिया। यूनियन कार्बाइड के भोपाल संयंत्र का स्वामित्व डाऊ के हाथ में नहीं। यूसीसी अलग कंपनी है, जिसका अलग निदेशक मंडल और अलग खाते तथा कर्मचारी हैं।

अब यूसीसी की भी दलील सुनिए

हादसे के समय यूसीआईएल में 50.9 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली यूसीसी के मुताबिक उसने और यूसीआईएल के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एंडरसन ने पीडि़तों की सहायता पूरी जिम्मेदारी से की। मुआवजा सहित सभी देनदारियां 18 साल पहले ही पूरी हो चुकी हैं और सुप्रीम कोर्ट से मंजूर भी। यूसीआईएल का आधा हिस्सा भारतीय वित्तीय संस्थानों और निजी निवेशकों के थे। 1994 में यूसीसी ने यूसीआईएल की हिस्सेदारी मैकलियोड रसेल ग्रुप (विलियमसन मेगर) कोलकाता को बेच दी। बाद में यह कंपनी एवरेडी बनी। हादसे के बाद यूसीआईएल ने भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार प्लांट की सफाई शुरू की। 1994 के बाद इसे एवरेडी ने जारी रखा लेकिन 1998 में प्लांट साइट को राज्य सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया इससे वहां काम बंद हो गया।

यूका है एवरेडी पर जिम्मेदारी नहीं

1994 में यूसीसी ने यूसीआईएल में अपनी ५०.९ फीसदी हिस्सेदारी भारतीय कंपनी विलियमसन मेगर गु्रप को बेच दी। बाद में यूसीआईएल का नाम बदलकर एवरेडी इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड (ईआईआईएल) हो गया, जो अब भी भारत में बैटरी, सीएफएल आदि का निर्माण और व्यापार कर रही है। हादसे के समय यूका यूसीसी के स्वामित्व की थी। एवरेडी का कहना है कि हम सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक बैटरियां और अन्य उपभोक्तापयोगी सामान बनाते हैं। हमारा कीटनाशकों के उत्पादन और विपणन से लेना देना नहीं जो यूका करती थी। भोपाल प्लांट पर भी मप्र सरकार का आधिपत्य है। एवरेडी खेतान परिवार के आधिपत्य में है।
तो आप समझे ये जो एवरेडी है........
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(courtesy Mayur Dubey ji)

http://en.wikipedia.org/wiki/Eveready_Industries
http://www.bhopal.com/ucs.htm
http://en.wikipedia.org/wiki/Bhopal_disaster
http://www.london.edu/assets/documents/facultyandresearch/Freek_Vermeulen_Union_Carbide_case.pdf
http://www.evereadyindustries.com/pressroom/information-bhopal.asp
http://www.ndtv.com/article/india/no-question-of-supporting-dow-kamal-nath-33058

मंगलवार, 15 जून 2010

राजनीतिक प्रलाप और घडियाली विलाप नहीं, कार्रवाई करो सरकार

1984 में मैं बहुत छोटा था इसलिए 2-3 दिसंबर की रात भोपाल में क्‍या हुआ उसे सिर्फ किताबों में पढकर और कुछ लोगों से सुनकर ही जान सका। नौकरी के सिलसिले में पिछले 4-5 साल से भोपाल और इंदौर में हूं। इस दौरान उस काली रात के बारे में जो कुछ भी सुना वह 7 जून को आए फैसले और उसके बाद नेताओं, अफसरों और जिम्‍मेदारों की काली करतूतों के आगे कुछ कम ही लगता है। अब जब कि परत दर परत खुल रही है, तब मेरे जैसे देश के करोडो लोग अवाक हैं। किसी को यह नहीं समझ आ रहा कि एक गैरजमानती आरोपी को देश से ससम्‍मान किसने और कैसे जाने दिया।
हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार वारे एंडरसन अगर आज कानून की पहुंच से बाहर है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? कौन है जिसने अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभाई और किन लोगों के कारण भोपाल के हजारों पीडि़तों को आज तक इंसाफ नहीं मिल सका है। मेरे जैसे आम आदमी की सरकार और सरकारों से गुजारिश है कि वह राजनीतिक प्रलाप और घडियाली विलाप बंद करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे।

क्‍या ये सह आरोपी नहीं

मोती सिंह, तत्कालीन कलेक्टर
जिम्मेदारी: जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का नियंत्रण। कानून-व्यवस्था बनाए रखना। जिला पुलिस को निर्देशित और नियंत्रित करना। जिले में सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी। किसी असामान्य घटना घटित होने पर नागरिक प्रशासन की सहायतार्थ सशष्त्र बल बुलाना। कुछ मामलों में दंडाधिकारी।
तब किया क्या: बकौल सिंह, मुझे 7 दिसंबर 84 को अर्जुन सिंह ने सुबह बुलाकर कहा, एंडरसन एयरपोर्ट पर आने वाला है। मैं एयरपोर्ट पहुंचा विमान उतर चुका था। एंडरसन को गिरफ्तार कर श्यामला हिल गेस्ट हाउस ले जाया गया। बाद में उसे जमानत दी गई। शाम चार बजे मैं और एसपी पुरी उसे लेकर एयरपोर्ट रवाना हुए। वहां सरकारी विमान तैयार था, जिससे वह दिल्ली चला गया।
अब कहा क्या: 9 जून 2010 को कहा, वारेन को भगाने के पीछे सरकार का हाथ था। मुझे तत्कालीन मुख्य सचिव ब्रह्मस्वरूप ने उसे रिहा करने को कहा था। उन्हें ऊपर से आदेश मिला था।
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स्वराजपुरी, तत्कालीन एसपी
जिम्मेदारी: कानून-व्यवस्था में कलेक्टर की मदद करना और उनके निर्देशों का अनुपालन करना। जिले में पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी।
तब किया क्या: कलेक्टर मोती सिंह के साथ एंडरसन को गिरफ्तार किया और उसे जमानत दी। उसे हवाईअड्डे तक छोडऩे गए।
अब कहा क्या: स्वराजपुरी ने फैसला आने के बाद अब तक कोई बयान नहीं दिया है।
इसलिए कठघरे में
कर्तव्य पालन में लापरवाही। पद का दुरुपयोग, दबाव में आकर गलत और विधि विरुद्ध कार्य, अधीनस्थ को गलत कार्य के लिए निर्देशित करना, आरोपी की मदद।
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ब्रह्मस्वरूप, तत्कालीन चीफ सेके्रटरी
जिम्मेदारी: मुख्यमंत्री के सलाहकार, प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख। सरकार और प्रशासन के बीच प्रमुख समन्वयक। संकटकालीन स्थिति में प्रशासक। पूरे रा'य, सचिवालय को नियंत्रित कर रा'य का संचालन। अपनी सरकार और केंद्र के बीच संपर्क और संवाद का माध्यम। कानून-व्यवस्था तथा नियोजन से जुड़े मसलों में महत्वपूर्ण भूमिका।
तब किया क्या: बकौल मोती सिंह स्वरूप ने उन्हें और स्वराज पुरी को एंडरसन को गिरफ्तार करने फिर उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। सरकारी विमान की व्यवस्था कराई।
अब कहा क्या: ब्रह्मस्वरूप का निधन हो गया है।
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सुरेंद्रसिंह ठाकुर, तत्कालीन थाना प्रभारी हनुमानगंज

जिम्मेदारी: थाना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था का जिम्मेदार, अधिकार क्षेत्र के आपराधिक मामलों की जांच, उनकी चार्जशीट दायर करना, आरोपियों के खिलाफ सुबूत जुटाकर केस मजबूत करना।
तब किया क्या: एंडरसन को जमानत पर रिहा किया।
अब कहा क्या: ठाकुर फिलहाल सागर के अजाक में बतौर एएसपी पपदस्थ हैं लेकिन फैसला आने के बाद से ही वे अवकाश पर हैं और अब तक उनकी कोई जानकारी नहीं है।
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अर्जुन सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री

रा'य सरकार के मुखिया।
तब बोले: एंडरसन को वापस भेजने का फैसला पूरी तरह से मेरा है। केंद्र को कोई दबाव नहीं था। उसे भोपाल से बाहर इसलिए भेजा गया क्योंकि उसके रहने से हालात बिगड़ सकते थे।
अब बोले: मीडिया में आ रही खबरें गलत हैं। समय आने पर सच बोलूंगा।

इन सवालों का जवाब कौन देगा
- किसके आदेश से एंडरसन को जमानत?
- गलत जमानत देने वाले अफसरों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
- यह बयान क्यों दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एंडरसन को भोपाल से हटाया गया?
- क्या तत्कालीन केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री का दबाव था?
- एंडरसन को दिल्ली जाने के लिए सरकारी विमान किसके आदेश से दिया गया?
- एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए क्या प्रयास किए?
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बीआर लाल, तत्कालीन संयुक्त निदेशक, सीबीआई
अप्रैल 1994 से जुलाई 1995 तक जांच प्रभारी.
जिम्मेदारी थी: मामले की निष्पक्ष जांच करना और एंडरसन के खिलाफ मजबूत केस बनाना। पुख्ता सबूत जुटाना। कोर्ट के जरिए एंडरसन के प्रत्यपर्णण का प्रयास।
अब बोले: 9 जून 2010 को कहा- मामले की जांच के दौरान भारी दबाव था। हमें विदेश मंत्रालय से मजबूर किया गया था कि एंडरसन के प्रत्यर्पण के मामले को आगे न बढ़ाया जाए। जांच कुछ अधिकारियों के निर्देश पर चली।
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राजीव गांधी, तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं केंद्र सरकार
जिम्मेदारी: देश के मुखिया।
उठते सवाल
- क्या तत्कालीन केंद्र सरकार को भोपाल में हुए घटनाक्रम की जानकारी नहीं थी? अगर थी तो केंद्र ने क्या हस्तक्षेप किया? नहीं किया तो क्यों?
- क्या एंडरसन को देश से बाहर जाने देने के लिए केवल रा'य सरकार जिम्मेदार है?
- अगर रा'य सरकार जिम्मेदार है तो केंद्र ने उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की?
- क्या सुप्रीमकोर्ट द्वारा धारा कमजोर होने पर सीबीआई ने दोबारा याचिका दाखिल की?
- कांग्रेस और गांधी परिवार पर हमेशा विदेशी गुनहगारों और सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप क्‍यों लगते हैं। 1984 दंगा, क्‍वात्रोचची मामला, और अब ये भी।
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शिवराज सिंह चौहान, वर्तमान मुख्यमंत्री

- फैसला आने के बाद बयान दे रहे अधिकारियों को क्या सरकार कानूनी दायरे में लाकर सच सामने लाएगी और दोषियों को सजा दिलाएगी?
- अर्जुन सिंह के खिलाफ क्या मामला दर्ज कर क्या उन्हें एंडरसन की रिहाई के बारे में बताने के लिए कठघरे में खड़ा किया जाएगा?

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इसलिए कठघरे में
कर्तव्य पालन में लापरवाही। पद का दुरुपयोग, दबाव में आकर गलत और विधि विरुद्ध कार्य, अधीनस्थ को गलत कार्य के लिए निर्देशित करना, आरोपी की मदद।
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अभी तक के घटनाक्रम से यह तो स्पष्ट हो गया है कि एंडरसन के देश से निकल जाने में नेताओं के साथ ही नीचे से ऊपर तक के सभी अफसर भी जांच के घेरे में आते हैं।
इस मसले को लेकर मैंने अपने अखबार पत्रिका के लिए देश के वरिष्‍ठ कानूनविदों से यह जानने की कोशिश की कि क्‍या एंडरसन को भगाने और उसे बचाने के मामले में तत्‍कालीन अफसर और नेता कानून के घेरे में आते हैं, सब का एक स्‍वर में जवाब था जी हां। तत्कालीन थानाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक कानून के घेरे में आते हैं, क्योंकि उसके खिलाफ गैरजमानती धाराएं लगी थीं, जिसमें जमानत कोर्ट से ही दी जा सकती है लेकिन उसे श्यामला हिल गेस्ट हाउस से एयरपोर्ट तक गेस्‍ट की तरह ले जाया गया। अगर अधिकारियों ने दबाव में ऐसा किया है तो यह भी कानून विरुद्ध है और उन पर दबाव डाला गया तो यह भी गैरकानूनी है।

क्‍या कहते हैं विधि विशेषज्ञ
'जो भी हुआ गलत था। तत्कालीन अफसरों और सरकार दोनों ने गलत किया। अफसरों ने कानून विरुद्ध कार्य किया, अपनी ड्यूटी निभाने में लापरवाही की और दबाव में कार्य किया। दूसरी ओर अगर अफसरों के बयान सही हैं तो उन पर दबाव बनाने वाले भी उतने ही जिम्मेदार है। मुख्यमंत्री हो या प्रधानमंत्री सब कानून से बंधे हैं। राज्य सरकार जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कर सकती है।
- प्रशांत भूषण, वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
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'तत्कालीन सीएम अजुर्नसिंह, एसपी स्वराजपुरी और सभी जिम्मेदार अफसरों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान द्वारा बनाई गई जांच कमेटी मामले को लंबित करने का प्रयास है। गैस त्रासदी की जांच तो सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज से कराना चाहिए। वह भी समयसीमा तय करके। दोषी पाए जाने पर थाना प्रभारी से मुख्यमंत्री तक को सह आरोपी बनाना चाहिए। एक आरोपी को भगाना गंभीर मामला है, फिर यह काम चाहे मुख्यमंत्री ने ही क्यों न किया हो। आरोपी वे भी हैं। हत्या के साक्ष्य मिटाने के आरोप में विधायक कमल पटेल को गिरफ्तार किया जा सकता है, तो गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी को भगाने में सहयोग करने वालों को कैसे छोड़ा जा सकता है।
- जस्टिस पीडी मूल्ये, रिटायर्ड जज
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'जांच इस बात की जांच होना चाहिए कि यूनियन कार्बाइड से तत्कालीन सीएम अर्जुनसिंह के साथ अफसरों को क्या फायदा हुआ। जिस समय मामला चल रहा था, तब यूनियन कार्बाइड ने कहां-कहां पैसा बांटा। दोषी पाए जाने पर दोषियों के खिलाफ भ्रष्टïाचार का मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
- जस्टिस वीएस कोकजे, रिटायर्ड जज
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'सारे अफसर झूठ बोल रहे हैं। यह सब प्री प्लांड है। इनके झूठ का सच सामने आना चाहिए और राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि उनके खिलाफ कार्रवाई करे।
- केसी मित्तल, राष्‍ट्रीय सचिव लीगल सेल कांग्रेस
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'इसमें टीआई से मुख्यमंत्री सब दोषी दिखते हैं। सबके खिलाफ मामला दर्जकर कोर्ट में खड़ा करना चाहिए। नेता खुद केस कमजोर कर न्यायपालिका पर दोष मढ़ रहे हैं। कोर्ट सबूतों के आधार पर कार्रवाई करती है। मामला अदालत की अवमानना का भी है।
- पीके शुक्ल, अध्यक्ष हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, इंदौर
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'धारा गैरजमानती नहीं थी। ऊपर से अगर केस सीबीआई को दे दिया गया था तो थाने से जमानत का सवाल ही नहीं उठता। इस मामले में जांच अधिकारी से लेकर ऊपर तक सभी घेरे जा सकते हैं।
- अनिल खरे, अध्यक्ष हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जबलपुर
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'गैर जमानती मामले में जमानत देने पर जांच आधिकारी से लेकर उस पर दबाव बनाने वाले सब दोषी हैं। 26 साल बाद इन लोगों को क्यों याद आ रहा है? इन लोगों ने कोर्ट में यह सब सच क्यों नहीं बोला? इसके खिलाफ डयूटी सही तरीके से न करने, दबाव में काम करने, सबूत गायब करने और आरोपी की मदद करने का मामला बन सकता है।
- मनीष दत्त, एडवोकेट हाईकोर्ट, जबलपुर
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मामला पूरी तरह स्पष्ट है। जिस तरह के परिस्थितिजन्य साक्ष्य सामने आ रहे हैं, उसके बाद किसी भी तरह की जांच की जरूरत ही नहीं है। अब जिम्मेदारी राज्य सरकार की है कि वह तत्कालीन मुख्यमंत्री सहित सभी जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ एफआईआर करे। इसके बाद जांच में सारी स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी। मामला आईने की तरह साफ है। सरकार यदि कदम नहीं उठाती तो आम आदमी भी सीधे कोर्ट जा सकता है।
- मनोहर दलाल, वरिष्ठ अधिवक्ता, इंदौर
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मूल खबर के लिए पढें, पत्रिका इंदौर संस्‍करण का 15-06-2010 ई पेपर। http://epaper.patrika.com/final/flipbook.php?edition=Indore

(अगर कानून का कम ज्ञान होने से मैंने कुछ गलत लिख दिया हो तो कृपया मेरी गलती जरूर सुधारें।)

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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