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सोमवार, 10 मई 2010

आकाश सी छाई

अभी मैं छुटटी पर हूं। मेरे भाई ने एक छोटी सी कविता लिखी है उसे आपके जानिब पेश कर रहा हूं।
तुम्‍हीं तो मिलती हो

धरती से बिछी हो तुम।
जब जब याद करूं
सपनों में मिली हो
तुम तस्‍वीरों से निकलकर
तुम जब रुक रुककर बाहर आती
तस्‍वीरें तो अब भी हंसती पर
मेरी पलकें भर जातीं।
दीवरों पर लगी जो तस्‍वीरें
जब नजर पडे मालों पर
अब भी आंसू लुढककर आते
मेरे दोनों गालों पर
हो बारिश की बूंदों जैसी
आंगन में बिखरी तुम अब भी
जब मैं घर जाऊं तो हंसती दिखती तुम।
अब भी हैं बचपन की यादें याद हमारे संपनों की
अब भी मिलती है डांट तुम्‍हारी
जो कहीं गलत पथ पर जाऊं।
जब कहीं दूर तक चलता जाऊं तुम्‍हीं तो मिलती हो जब खुद को अकेला मैं पाऊं
तो तुम्‍हीं तो मिलती हो।।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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