राज और समाज पर खरी आवाज

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शनिवार, 17 अप्रैल 2010

शहीदों के शव पर जश्न... यही है माओवाद?

त दिनों छत्तीसगढ़ में हुए देश के सबसे भीषण नक्सली हमले के बाद से देश भर में कई सवाल उठ रहे हैं? मेरे मन भी। क्या नक्सली सही कर रहे हैं या क्या नक्सलियों के साथ गलत हो रहा है? ऐसी नौबत ही क्यों आई कि सरकार को अपने ही नागरिकों पर बंदूक चलानी पड़ रही है? कहां चूक हुई है? नक्सलियों के मन में अपने ही देश और अपने ही संविधान के प्रति इतना रोष क्यों है? हमले के बाद खबर को लेकर मेरी कई लोगों से बात हुई। कुछ आला पुलिस अफसरों, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं, कुछ विद्यार्थियों, कुछ प्रोफेशन्लस, कुछ विद्रोहियों से भी जिन्होंने हथियार तो नहीं उठाए हैं लेकिन हथियार उठने को गलत नहीं मानते, ऐसे लोगों से भी जो नक्सलियों को सही मानते हैं लेकिन उनके तरीके गलत। सब के अपने तर्क थे। सब अपनी बात को सही ठहराना चाहते हैं। मैं कई दिन से कुछ कहने की कोशिश कर रहा था लेकिन कह नहीं पा रहा था। लेकिन आज मुझे एक खबर ने अंदर से झकझोर दिया। पहले वह बता दूं फिर कुछ और।
शहीदों के शव पर जश्न... यही है माओवाद?
मु
झे पता चला कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जिसे हम जेएनयू के नाम से जानते हैं वहां दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार वाली रात को जश्र मनाया गया। (http://timesofindia.indiatimes.com/india/Pitched-battle-over-peoples-war-at-JNU/articleshow/5783093.cms) (http://www.ndtv.com/news/india/dantewada-aftershocks-at-jnu-19754.php) जिन लोगों ने जश्र मनाया उन्हें जवानों के मारे जाने की खुशी थी। उस जश्र में शामिल कभी मेरे सहपाठी के जरिये मुझे पता चला कि जश्र में जमकर धूम मची। शहीदों के शव पर जश्न वाह रे देश के सबसे अच्छे विवि में पढऩे वाले देश के महान लोगों.............. यह वो पहली खबर थी जिसने मुझे झकझोर दिया। यह खबर मुझे दिल्ली में ही रहने वाले एक दूसरे सहपाठी से पता चली।  मुझे झटका लगा कि हम तो दुश्मन के घर पर भी मातम होने पर दुखी होते हैं पर ये...................कैसे लोग हैं जो हमारे ही जवानों की शहादत का जश्र मना रहे हैं।यह कम से कम भारतीय नहीं हो सकते।
पढ़ाई के पैसे से बंदूक, यही है दलित होना?
दू
सरी खबर हमारे एक सहपाठी की जो दिल्ली से पीएचडी कर रहा है। बीए से एमए फाइनल तक मैं उसे सिर्फ नाम से जानता था। एमम में पता चला कि वह अनुसूचित जाति का है। उसे सरकारी वजीफा मिलाता था। अभी उसे पीएचडी के लिए भी स्कॉलरशिप मिल रही है। और वो भाई साहब खुद को दलित बताकर वंचित होने का दावा करते हैं और कॉमरेड बनकर नक्सलियों को हर महीने पांच हजार रुपए चंदा देते हैं। यह वही पैसे है जो भारत सरकार जनता से कर वसूलकर उन्हें पीएचडी करने के लिए दे रही है।
क्या सरकार सिर्फ धमाकों से जागती है?
खै
र यह दो घटनाएं जो पूर्णत: सत्य हैं। उनके कारण मैं आज लिख रहा हूं और शुरुआत उन साथियों की बात से जिन्होंने नक्सलियों को सही ठहराया। उनका कहना था कि आदिवासियों के साथ गलत होता आया है। उनको उनके हक से वंचित रखा गया है। हम उनकी लड़ाई में उनके साथ हैं। उनका कहना था कि यह लड़ाई सिर्फ बंदूक से ही लड़ी जा सकती है। वे अपने आदर्श के रूप में भगत सिंह का नाम लेते हैं। पता नहीं भगत सिंह से क्या सीखा है इन लोगों ने? हिंसा से समस्या हल होगी या नहीं उन्हें इससे मतलब नहीं उन्हें तो बस संघर्ष करना है। उनका सपना है संघर्ष से सत्ता पलटने का। पर सत्ता पलटनी क्यों है इसका जवाब उनके पास नहीं। उनका कहना है कि गोली के बल पर हम वंचितों को उनका हक दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार सो रही है, उसको जगाने के लिए यह करना जरूरी है।
वो नहीं चाहते कि आदिवासियों हित
तने दिन मैं माओवाद और नक्सलियों से जुड़े साहित्य की तलाश में रहा और कुछ पढ़ा जाना भी। उन लोगों से बात करके। जो थोड़ा बहुत जान पाया उसका लब्बोलुबाब यह है कि नक्सली संघर्ष करना चाहते हैं पर क्यों, किससे, कब तक पता नहीं। वो इस बारे में कोई बहस नहीं चाहते। वो बात करने को भी तैयार नहीं। उन्हें लगता है कि वे जो कर रहे हैं वही सही है। मैं भी उनकी कुछ बातों से सहमत हूं लेकिन पूरी तरह नहीं। वो हथियार छोडऩे को तैयार नहीं है। वे सत्ता पलटना चाहते हैं लेकिन जिम्मेदारी लेकर राजनीति में आने को तैयार नहीं है। अगर उन्हें जिम्मेदारी मिल भी जाती है तो भागते हैं। मैंने जब नेपाल के सत्ता पलट का उदाहरण दिया तो वे संघर्ष को सपना बताने लगे। जो व्यक्ति जिम्मेदारी नहीं ले सकता है वह तो कायर ही कहा जाएगा न। और मुझे नहीं लगता गरीब, अनपढ़, वंचितों को बंदूक थमाना किसी समस्या का हल है। कुछ करना ही था तो उन्हें कलम थमाते जिससे उनके जीवन में उजाला फैलता। लेकिन नहीं कलम थमानी तो दूर उनके स्कूलों को बम से उड़ाया जा रहा है। रही रोशनी की बात तो नक्सली तो चाहते हैं कि वे अंधेरे में रहें ताकि उनको मोहरा बनाकर आप अपनी बर्बर इच्छा को परवान चढ़ा सकें।
लालकिले पर लाल झंडा तो कभी नहीं फहरेगा
खै
र माओ को दिल्ली का मेयर बनाने का सपना देखने वाले और कर भी क्या सकते हैं? भगत सिंह को अपना आदर्श बताने वाले माओवादी जो लालकिले पर लाल झंडा लहराने का कभी न पूरा होने वाला सपना देख रहे हैं वे भूल गए कि शहीद ए आजम ने इसी तिरंगे के लिए खुद को कुर्बान कर दिया था। अपने कुत्सित कुकर्म को पूरा सही ठहराने के लिए कम से कम उस हुत्आत्म का नाम तो न लो। तुम्हारे पास तो माओ, प्रचंड जैसे महान नेता हैं न प्रेरणा देने के लिए? वो जान लें कि लालकिले पर सिर्फ तिरंगा ही फहरेगा।
देश के खिलाफ युद्ध है यह
दं
तेवाड़ा के बाद देश में नक्सलियों के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है। कुछ ऐसे प्रोफेशनल और किसान जिन्हें नक्सलवाद की एबीसीडी नहीं पाता और जो मेरे परिचित हैं उन्होंने बात- बात में मुझसे पूछा कि आखिर यह बला क्या है? कुछ को इतना पता था कि नक्सली आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन अपने ही जवानों को मारने वालों पर उनका विश्वास नहीं है। कुछ ने कहा कि नक्सलियों को सेना लगाकर साफ कर देना चाहिए और कुछ कहते हैं बातचीत करनी चाहिए। हालांकि इस बात से किसी को इनकार नहीं कि वाजिब हक तो सबको मिलना चाहिए, लेकिन नक्सलियों के तरीके को कोई सही नहीं मान रहा। मैं उन महान बुद्धिजीवियों की बात नहीं कर रहा जो भोलेभाले वनवासी वंधुओं को गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं। ऐसे करोड़पति बुद्धिजीवी बड़े बड़े पदों पर बैठकर हजारों रुपए नक्सलियों को हथियार खरीदकर आदिवासियों को देने के लिए तो देते हैं लेकिन उनका वास्तविक हित हो इसकी उन्हें चिंता नहीं।  मप्र के एक आला पुलिस अधिकारी ने कहा, नक्सली समस्या से निपटना है तो पहले इन कथित महान बुद्धिजीवियों और छद्म उदारवादियों पर लगाम लगाना होगी। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि जिन क्षेत्रों में विकास कार्य नहीं हुआ है वहीं यह समस्या है लेकिन उन्होंने साफ कहा कि नक्सली बात नहीं करेंगे। क्येांकि उनका कोई एजेंडा नहीं सिवाय देश के खिलाफ युद्ध के।
तो मैं भी नक्सली हूं.............
गर गरीबों, वंचितों की लड़ाई और उनको उनका हक दिलाना नक्सलिजम है तो मैं भी नक्सली हूं लेकिन अगर उनका आधा पेट खाना छीनकर उन्हें हथियार चलाने के बदले रोटी देना नक्सलवाद है तो मैं घृणा करता हूं ऐसे नक्सलियों से और लानत देता हूं उन लोगों पर।
गर 65 साल से हमारे हक पर कुंडली मारकर बैठे नेताओं और अफसरों के खिलाफ आवाज उठाना और लडऩा नक्सलवाद है तो मैं भी हूं नक्सली लेकिन अगर गरीबों, किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों और गांव के पिछड़े परिवारों से आए पुलिस, अद्धसैनिक बलों के जवाानों की हत्या करना और आधुनिक हथियारों से लैस पुलिस के जवानों के सामने निरीह भूखे आदिवासियों को मरने- मारने के लिए भेजना नक्सलवाद है तो मैं तो मैं घृणा करता हूं ऐसे नक्सलवाद से।

जरा सोचिए
मैं
मानता हूं जंगलों में रह रहे आदिवासियों या गावों में रह रहे गरीबों को आजादी के बाद भी उनका हक नहीं मिला। जो इसके लिए जिम्मेदार थे उनकी जेबें भरती गर्ई और आज भी जारी है? लेकिन हक हिंसा से नहीं मिलता। और देश गोली से नहीं चलता। हमारे पास बैलेट की ताकत है। देश और समाज को बदला जा सकता है। लेकिन उसके लिए जिम्मेदारी लेकर आगे आना होगा। जंगलों में छिपकर मजलूमों को आगे कर हिंसा नहीं करनी होगी।
देश की रक्षा के लिए सेना, पुलिस में भर्ती हुए गरीबों की हत्या करना और उनके सामने उन्हंीं के भाईयों को मरने के लिए भेजना किसके हक की लड़ाई है? गोली चाहे इधर से चले या उधर से मरता गरीब है, मरता वंचित है। अगर जंगल में रह रहे आदिवासी गरीब हैं तो यह जवान भी गरीब है।
र्ग भेद मिटाने की बात करने वाले नक्सली क्या एक और वर्ग संघर्ष की शुरुआत नहीं कर रहे हैं? हम भूले नहीं हैं बिहार के बाथे में हुआ नरसंहार नक्सलियों के जवाब में एक हिंसक दिमाग की उपज ने दर्जनों लोगों को खून बहाया। अगर ऐसा फिर शुरू हो गया तो?
मारी विचारधारा चाहे जो हो, धर्म चाहे जो, जाति चाहे जो लेकिन सबसे पहले हम भारतीय हैं। अगर भारत ही नहीं रहा तो विचार और विचारधारा का क्या होगा? हमने सनकी विचारधाराओं की बाढ़ में मुल्कों को बरबाद होते देखा है। हिंसा चाहे जैसी हो, जहां हो और जब भी हो गलत होती है। नक्सली हिंसा और आतंक 1984 और गुजारत के दंगे से कम कू्रर और अमानवीय है? अगर ऐसा चलता रहा तो हमपर बुरी नजर गड़ाए बैठे पड़ोसी मुल्कों को कुछ करने की जरूरत ही नहीं होगी। .......... जरा सोचिए।

चलते -चलते
 
मैं इसलिए लिख रहा हूं कि मैं चाहता हूं कि अगर मेरी सोच में मेरे विचारों में कोई खामी हो या नक्सली जो कर रहे हैं वह सही हो तो मैं जानूं। अगर ऐसा हुआ तो मैं खुद को बदलूंगा।
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यह एक बेनामी कमेंट जो मेरे लेख पर आया। पुराने लेख में कुछ गलतियां रह गईं थी उनमें सुधार कर इसे नए सिरे से दे रहा हूं। और यह उस बेनामी कमेंट भेजने वाले साथी को मेरा जवाब।
बेनामी ने कहा…बकवाद लिखने से पहले दिमाग का भी इस्तेमाल कर लिया करिए। नक्सलवाद और साम्प्रदायिकता, फासीवाद के अलग-अलग मायने हैं। जो शहर में इंटरनेट पर बैठकर नक्सलवाद के खिलाफ उह-आह करते हैं,उन्हें इतना तो सोच लेना चाहिए कि वहां न बिजली है, न पानी है इटरनेट और टीवी तो जाने किस दुनिया की बात। उनका हक मार कर भकोसने वाले इसी तरह की बातें बोलते हैं। शर्म आनी चाहिए कि पूंजीवादी पार्टियों के भीतर बैठे लोगों का एक धड़ा भी लड़ाई के इस पक्ष से मुतमइन है कि नक्सलवाद तभी मिटाया जा सकता है, जब अरबों की योजनाएं उन लोगों तक पहुंचें, जो लड़ने को मजबूर हैं। १७ अप्रैल २०१० ६:३७ AM  

pradeep ने कहा… मायने चाहे जो हों नतीजा आतंक है। अलगाव है। संघर्ष है। और हां हमने यह दिमाग से नहीं दिल से लिखा है। दिमाग तो आप लोगों के पास है। अगर आपके पास भी दिल होता तो कम से कम निर्दोषों के खून से अपने हाथ न रंगते और न ही शहीदों के शव पर जश्र मंनाते। रही बात शहर में बैठकर इंटरनेट पर आह- उह करने की तो साथी वही आप भी कर रहे हैं। फर्क इतना है हम जो कह रहे हैं वह खुलकर आप जो कह रहे हैं वह छिपकर। अगर आप सही हैं तो छिपकर क्यों कहा? सामने आते शायद हम भी आपसे कुछ सीखते? रही बात अरबों की योजनाएं वहां तक जाने की तो जनाब जब तक आप गोली में बारुद भरते रहेंगे ऐसा नहीं होने वाला। चेहरे से नकाब हटाकर सामने आइए और चलिए दिल्ली संघर्ष करने हम भी होंगे आपके साथ वादा रहा लेकिन चेहरा छिपाकर नहींं और बंदूक के निशाने पर नहीं। १७ अप्रैल २०१० १:५३ PM

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

जय-जय-जयराम- गुलामी के कलंकों को धो डालें

कुछ लिखने को मैं कई दिन से सोच रहा था। मुद्दे भी थे। मेरी रुचि के थे। अरे भाई रुचि बोले तो अमिताभ, मोदी, राहुल बाबा, सोनिया मैडम, हैदराबाद, माया मेमसाब, अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा कानून, लालू यादव को राहत आदि, आदि, अनादि....। पर दिक्कत यह थी कि सिर्फ सोच रहा था। कर अपने मध्यप्रदेश में एक वाकया हुआ जिसने में लिखने को उकसाया लेकिन फिर वही आज करे सो काल कर, कार करै सो परसो.... पर लगा रहा। सो नहीं हो पाया। अब दोपहर में इलाहाबाद वाले गिरिजेश भईया का फोन आया तो मुझे लगा चलो हम भी कुछ लिख लें। गिरिजेश भईया और उनके बारे में फिर कभी बताएंगे अभी तो आप यह सुनिए कि समय किसका आ गया है।

दरअसल हुआ यूं कि कल भोपाल में भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के दीक्षांत अवसर पर जयराम रमेश जी ने गजब ही कर दिया। खुद चीफ गेस्ट थे और जैसे ही दीक्षांत उद्बोधन देने पहुंचे अपना गाउन यह कहते हुए निकाल फेंका कि यह बर्बर है, सामंती है अब तो इससे मुक्त हो। उनक यह कदम साहसिक है और मौजूं भी। चिरकाल से संघी गिरिजेश भइया जब फोनकर के जय-जय जयराम करने लगे पहले तो मैं चौंका लेकिन फिर मुझे रात को बनाई खबर याद आ गई। सच में अब समय आ गया है कि इन सामंती प्रतीकों को उतार फेंका जाए। परंपरा के नाम चले आ रहे इन नियमों को ढोने की जरूरत अब नहीं रही। हम आजाद हैं यह हमारे संस्कारों, परंपराओं से भी दिखना चाहिए। देर से ही सही अगर इसकी शुरुआत हो रही है तो हमें इसका समर्थन करना चाहिए। न केवल दीक्षांत गाउन बल्कि अदालतों में वकीलों और जजों द्वारा धारण किए जाने वाला कोट भी। हो सकता है कि इससे शुरुआत में कुछ दिक्क्तें हों लेकिन ज्यादा दिन नहीं। कुछ ऐसा शुरू हो या बने जो अपना स लगे। जिसमें भारतीय संस्कृति और भारतीय परंपरा का बोध हो। अब वो क्या हो कैसा हो इसे हमारे समृद्ध इतिहास के पन्नों से निकालकर लाना चाहिए। न कि गुलामी के प्रतीकों से।

कल जब मैं यह खबर बना रहा था तो मेरे दिमाग में गोपाल राय (अगर नाम गलत हो क्षमा चाहूंगा) की भी स्मृति आई। वही गोपाल जी जो इंडिया गेट को भारतीय सैनिकों का सम्मान स्थल मानने के विरोधी हैंं। उनका तर्क सही भ्ीा है कि यह तो विश्वयुद्ध में अंग्रेजी सेना की ओर से लड़े लोगों की याद में बनाया गया है। उनकी बात सही भी है। अब कम से कम इतना तो जरूर करना चाहिए कि ऐसे गुलामी के प्रतीकों का विरोध हो, क्योंकि हम आजाद पैदा हुए हैं। आजाद मुल्क में सांस ले रहे हैं इसलिए हमें गुलामी के कलंकों को धो देना चाहिए।                                    
सो भइया प्रथम अध्याय समाप्त हुआ। चलिए आप भी मेरे साथ कहिए जय-जय-जयराम। शेष कथा अगले अंक में। वैसे भी बात जब निकली है तो दूर तलक जाएगी।`

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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