राज और समाज पर खरी आवाज

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गुरुवार, 25 मार्च 2010

मां को बाप की अंकशायिनी नहीं कहते

माननीय सुप्रीम कोर्र्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी आई है। हालांकि कोर्ट का टिप्पणी करना नया नहीं है लेकिन संभवत: विवाह पूर्व सहजीवन और विवाह पूर्व यौन संबंध को लेकर कोर्ट की पहली दो टूक टिप्पणी (Living together a part of right to life, not an offence: SC है। यद्यपि अभी इसे लेकर ज्यादा हो हल्ला नहीं हो रहा है। क्योंकि कोर्ट का फैसला आना बाकी है और दूसरा कोर्ट की नाफरमानी का खतरा भी कोई मोल नहीं लेना चाहता। उन्हीं में मैं भी हूं। बावजूद इसके क्या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर चर्चा नहीं होनी चाहिए। कम से कम मैं तो करना चाहूंगा।
सुप्रीम कोर्ट दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू के एक विवादित इंटरव्यू में को लेकर उनके खिलाफ दर्ज 22 आपराधिक मामले हटाने की अपील पर सुनवाई कर रही है। उसी दौरान कोर्ट ने सवाल किया कि किस धारा के तहत लिव इन रिलेशन अपराध है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार है। बात तो सही है। सुप्रीम कोर्ट की। संविधान के अनुसार तो लिव इन रिलेशन और विवाह पूर्व यौन संबंध अपराध नहीं हैं। खैर इस मामले में सुनवाई अभी बाकी है।
क्या यह सही है?
सुप्रीम कोर्ट ने इसी दौरान भगवान कृष्ण और राधा की नजीर देते हुए कहा, पौराणिक कथाओं के अनुसार कृष्ण और राधा भी ऐसे ही साथ ("लिव-इन रिलेशनशिप अपराध नहीं") रहते थे। इसमें अपराध जैसी क्या बात है। पर मैं माननीय कोर्ट की इस नजीर से असहमत हूं। मैं संविधान के मौलिक अधिकारों के खंड के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत इस नजीर से असहमति व्यक्त करता हूं।असहमति के कुछ कारण भी हैं।
हला तो यह कि इस जगह कृष्ण- और राधा की नजीर सही नहीं है। उनके बीच का रिश्ता शारीरिक या सांसारिक नहीं आत्मिक था। दूसरा यह कि अब तक हुई खोजों और उपलब्ध साहित्य के अनुसार कृष्ण किशोरावस्था तक ही वृंदावन में रहे। ऐसे में क्या कृष्ण और राधा के संबंध को लिव इन रिलेशन जैसे सांसरिक संबंध के मसले में नजीर बनाना सही है? कतई नहीं।
दूसरा जब कोर्ट कुछ मामलों में तो पौराणिकता को सही तक नहीं मानता जबकि यहां उन्हीं पुराणों की नजीर दी जा रही है। यह विरोधाभाश भी ठीक नहीं है। यदि पौराणिकता को ही आधार माना जाए तो अयोध्या में राम मंदिर विवाद कब का सुलझ गया होता। समलैंगिक सबंध को सही ठहराना, विवाह पूर्ण संबंध और बिना विवाह सह जीवन को सही ठहराना हो सकता है कानूनी लिहाज से ठीक हो लेकिन भारतीय परंपरा और भारतीय समाज की बुनावट में यह सही नहीं है।
मलैंगिंक संबंध जैसी बीमारी जो की जानवरों को भी नहीं लगती वह इंसानों को लग गई है। अब रही सही कसर थी सामाजिक डर की वह भी खत्म हो रही है। विकृतियां हर काल समय में रही थीं और रहेंगी भी लेकिन उन विकृतियों को कभी सामाजिक मान्यता नहीं मिली और न ही मिलेगी।

विवाह  पूर्व सह जीवन और विवाह पूर्व सबंध और समलैंगिक संबधों की शुरुआत किस घर से होगी क्या कोई आगे आकर यह कहने को तैयार है कि हां हम अपने घर से इसकी शुरुआत करेंगे? शायद कोई नहीं? दरअसल यह हमारे खून में ही नहीं है। कुछ गिने चुने प्रचार के भूखे लोग कुछ भी ऊटपटांग बोलकर सुर्खियों में आने की जुगत में हमेशा रहते हैं। लेकिन ऐसी विकृतियों को सामाजिक मान्यता तो नहीं दी जा सकती।

दुनिया जानती है कि मां और बाप का रिश्ता क्या होता है लेकिन आज भी हम नहीं कह सकते कि मां बाप की अंकशायिनी है। यह कानूनी रूप से गलत नहीं है और न ही इसको कहने से कोई अपराध होता है लेकिन यह हमारी संस्कृति नहीं है यह हमारी पंरपरा नहीं है। यदि कोई ऐसा कहता है तो उसे गलत ही कहा जाएगा भले ही कानून उसे सही ठहराये। इतिहास में हमेशा किताबों में दर्ज कानूनों के साथ ही प्रचलित मान्यताएं और परंपरायें रही हैं जो कई बार किताबी कानूनों से ज्यादा कारगर रहीं। भारतीय संविधान और उसके अंतर्गत गठित सभी प्रकार की व्यवस्थाओं के प्रति पूर्ण  आदर और सम्मान प्रकट करते हुए मैं आपसे इस मामले पर विचार का आग्रह करता हूं।

सोमवार, 22 मार्च 2010

नीति नहीं नीयत भी बने


प्रदीप पांडेय, अरविंद दुबे)

ज विश्व जल दिवस है। रस्मी तौर पर हमने भी खबर छापी। कुछ लोगों से बातचीत की। कुछ आंकड़े बताए और सरकार की कुछ कमियां भी। लेकिन जो संकट आने वाला है क्या वह इतने भर से थम जाएगा? यह सोचने का विषय है। मुझे लगता है कि सिर्फ सरकार ही नहीं आम आदमी को भी जागना होगा। सरकार की कोई भी योजना और नीति तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक कि आम आदमी उसमें शामिल न हो। ऐसी ही योजना कुछ पानी को लेकर भी बनानी होगी। अन्यथा पहले की तरह नीतियां तो बनेंगी लेकिन सिर्फ कागजी। अब जरूरत है नीयत बनाने की। क्योंकि जब नियत बनेगी तभी नीतियां कारगर होंगी और इसके लिए आज जल दिवस से बढिय़ा अवसर नहीं होगा। सो चलिए नीयत बनाएं, जल बचाएं, कल बचाएं।

सफल नहीं हो रही जल नीति
लोग पानी बचाने और जलसंकट की बात तो बहुत करते हैं, लेकिन इसे लेकर कोई गंभीर नहीं है। सच यह है कि एक बड़ा तबका अभी भी पानी का मोल नहीं समझ पाया है, वहीं सरकार शुरू से 'खानापूर्तिÓ वाला रवैया लेकर चली है। कागजों में बनी राष्ट्रीय जलनीति के परिणाम भी अब तक जमीन पर नहीं उतर पाए हैं। कागजों पर दौडऩे वाली नीति के लिए न तो साधन मुहैया कराए गए और न खर्च का आकलन किया गया। नतीजा सामने है। पानी के लिए अभी से खून बहने लगा है। 1987 में सरकार ने पहली जल-नीति घोषित की थी, लेकिन सालों बाद तक जल प्रबंधन की समस्याएं जस-की-तस हैं। इसके लिए सरकार के पास विस्तृत डेटा होना चाहिए था, लेकिन केवल मध्यप्रदेश और बिहार दो ही राज्य ऐसे रहे, जिन्होंने अपने यहां जल-नीति बनाकर कुछ काम किया। 1987 में जल-नीति की घोषणा की और एक साल बाद ही कमियां भांपते हुए 'जल-नीति प्रारूप 1998Ó बनाया। 2002 में नई जल-नीति बनाई, लेकिन यह आज तक सही तरीके से लागू नहीं हो सकी है। जल-नीति का प्रारूप देखकर लगता है कि सरकार ही अपने उद्देश्य को लेकर साफ नहीं है। प्रारूप में केवल बड़े निर्माण की ही बात कही गई है। कानून अड़चनों को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है। समाज के हितों की अनदेखी कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उद्योगों को बेरोकटोक जल मिल सके, ऐसी व्यवस्था इसमें की गई है। बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखकर कोई योजना नहीं।

सरकार ये क्या कर रहे हो...?

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड पीपुल्स के हिमांशु ठक्कर के मुताबिक जल समस्या निवारण के लिए जरूरी है भूजल स्तर बनाए रखा जाए, लेकिन जल नीति में सरकार ने इस पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। जो कुछ किया गया है, उससे उल्टा नुकसान ही हुआ है। यह बात सरकार के आंकड़ों से ही साबित होती है। मसलन, सरकार ने 70 फीसदी पैसा बड़ी सिंचाई योजनाओं के लिए बड़े बांध बनाने पर खर्च किया। 1992 से 2007 तक एक लाख 12 हजार करोड़ रुपए खर्च किए। सरकार के मुताबिक इस दौरान 400 योजनाएं पूरी हुर्ईं, लेकिन परिणाम शून्य है। खुद कृषि मंत्रालय के मुताबिक, उन 15 सालों में इस तरह की योजनाओं से सिंचित होने वाली भूमि में 3.15 मिलियन हेक्टेयर की कमी आई है। सरकार को चाहिए कि वह छोटी-छोटी योजनाओं पर काम करे। भूजल संरक्षण के लिए काम किए जाएं। बारिश के पानी के नदियों, तालाबों, चैकडेम या अन्य साधनों से संरक्षित किए जाने पर काम हो, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है। यह मुद्दा आम आदमी से जुड़ा है, उसकी भागीदारी सुनिश्चित की जाना चाहिए, लेकिन इसका जिक्र तक नहीं है। समयावधि तय होना चाहिए, जो नहीं है। सरकार खुद सोचे कि वह क्या कर रही है। ऐसी कई योजनाएं और नीतियां बना ली जाए तो भी नतीजा कुछ नहीं निकलेगा।


दुनिया में जल संसाधन

2,94,000,000 क्यूबिक मीटर पानी कुल
71 फीसदी भाग पृथ्वी का जलाच्छादित
3 फीसदी पानी ही है इसका पीने योग्य

देश में जल संसाधन

690
घन किमी सतही जल
433 घन किमी भू-जल
5100 बांध देश में कुल
4710 निर्माण पूर्ण (2009)
0.5 प्रतिशत खर्च होता है जीडीपी का जल और सफाई पर
4.50 लाख व्यक्ति प्रतिवर्ष मरते हैं अतिसार (दस्त) से 
2.45
फीसदी है भारत विश्व भूभाग का
4 प्रतिशत जलसंसाधन भारत में दुनिया के
16 फीसदी आबादी दुनिया की भारत में
4000 घन किमी जल हर साल मिलता है वर्षा से
10,360 देश में कुल नदियां और उनकी सहायक नदियां हैं
1,869 घन किमी नदियों के बेसिन में वार्षिक प्रवाह का
89 प्रतिशत धरातलीय और 92 प्रतिशत भूजल का उपयोग कृषि में
2 फीसदी सतही जल का व 5 फीसदी भूजल का उद्योग में


आप यह नहीं जानते होंगेदेश के कुछ हिस्सों में भूजल स्तर एक मीटर प्रतिवर्ष की दर से गिर रहा है
जल संचय से 160 अरब घन मीटर अतिरिक्त जल उपलब्ध होगा
100 वर्ग मीटर आकार के छत पर 65000 लीटर वर्षा जल प्राप्त कर पुनर्भरण करते हैं और चार सदस्यों वाले एक परिवार की पेय और घरेलू जल आवश्यकताएं 160 दिनों तक पूरी कर सकते हैं
देश में 50 सालों में सिंचाई कुओं, बोरवेल व ट्यूबवेल में पांच गुना वृद्धि हो गई है
195 लाख हो गई है देश में कुओं, बोरवेल की तादाद
25 से 30 लाख कुएं, बोरवेल पेयजल, घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए

पानी की जबरदस्त कमी
सामान्य तौर पर भारत में एक व्यक्ति को प्रतिदिन 140 लीटर जल उपलब्ध है। किंतु संयुक्त राष्ट्र विकास संघ (यूएनडीओ) की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार जल वितरण में क्षेत्रों के बीच, विभिन्न समूहों के बीच, निर्धन और धनवान के बीच, गांवों और नगरों के लोगों के बीच काफी विषमता है। लाखों लोगों को प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति की दर से 20 लीटर साफ पानी भी उपलब्ध नहीं। ब्रिटेन में भी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन जल की उपलब्धता 150 लीटर है। प्रत्येक बांग्लादेशी के लिए प्रतिदिन की जल उपलब्धता मात्र 50 लीटर ही है।


खतरे में है नदियों का जीवन
रिद्वार में गगा के प्रवाह को लेकर हुए अध्ययन के मुताबिक सर्वाधिक आबादी वाले कुछ क्षेत्रों में नदियां प्रवाह खोती जा रही हैं। अमेरिका के नेशलन सेंटर फॉर एटमॉस्फीयरिक रिसर्च के अध्ययन के अनुसार इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। 1948 से 2004 के बीच धाराओं के प्रवाह की जांच में पता चला कि दुनिया की एक तिहाई बड़ी नदियों के जल प्रवाह में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। इस दौरान अगर किसी एक नदी का प्रवाह बढ़ा है तो उसके अनुपात में 2.5 नदियों के प्रवाह में कमी आई है। उत्तरी चीन की पीली नदी, भारत की गंगा, पश्चिम अफ्रीका की नाइजर और अमेरिका की क्लोराडो बड़ी आबादी वाले इलाकों की प्रमुख नदियां हैं जिनके प्रवाह में गिरावट आई है। बांध और कृषि व उद्योग के लिए पानी को मोड़ा जाना नदी के प्रवाह को प्रभावित करता है। 1948 से 2004 के बीच प्रशांत महासागर में गिरने वाली नदियों के जल की वार्षिक मात्रा में 6 फीसदी गिरावट दर्ज की गई। यानी 526 क्यूबिक किमी जो मिसीसिपी नदी में हर साल मिलने वाली पानी के बराबर है। हिंद महासागर के वार्षिक निपेक्ष में 3 फीसदी या 140 क्यूबिक किमी की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि ब्रह्मपुत्र में प्रवाह में स्थितरता बनी रही, लेकिन हिमालय के ग्लेशियर गायब होने से इनके प्रवाह में कमी आ सकती है।


मध्यप्रदेश में पेयजल* रायसेन में 8455 हैंडपंप हैं। यहां 105 नल योजनाओं में से 27 बिजली, स्रोत के अभाव और अन्य कारणों से बंद हैं। वहीं 54 सतही जल योजनाएं बंद हैं। भूजल गिरने से 109 हैंडपंप बंद हो गए।
* केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 22 जिलों में भूजल स्तर दो से चार मीटर तक गिर चुका है। जबकि 14 जिलों में यह गिरावट चार मीटर से ज्यादा दर्ज की गई।
* प्रदेश के 22 जिलों में पानी में फ्लोरोसिस की मात्रा बढ़ी है। सिवनी में 16 हजार बच्चे और गुना में 120 गांव में फ्लोरोसिस की अधिकता से प्रभावित हैं।
* मप्र के 30,118 स्कूलों में आज भी पीने का साफ पानी नहीं है।
* राज्य सरकार के अनुसार प्रदेश की 8192 नल और सतही जल प्रदान करने वाली योजनाओं में से 1507 बंद हैं। वहीं 9988 हैंडपंप जलस्तर कम होने से बंद हो चुके हैं।
* प्रदेश में 24517 बसाहटें ऐसी हैं, जहां सरकार पानी की न्यूनतम जरूरत भी पूरा नहीं कर पाई है।

मध्यप्रदेश के वे जिले जहां भूजल स्तर दो से चार मीटर नीचे गया 1. बालाघाट 6. सागर 11. टीकमगढ़ 17. ग्वालियर
2. भिण्ड 7. शाजापुर 12. कटनी 18. शिवपुरी
3. मुरैना 8. रीवा 13. सीधी 19. छतरपुर
4. गुना 9. सतना 14. छिंदवाड़ा 20. डिण्डोरी
5. राजगढ़ 10. पन्ना 15. दमोह 21. मण्डला
16. श्योपुर 22. होशंगाबाद
(भिंड, ग्वालियर, श्योपपुर, मुरैना, शिवपुरी, दतिया, छतरपुर, राजगढ़, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, सतना, सागर और छिंदवाड़ा के कई इलाकों में भूजल स्तर चार मीटर से भी नीचे जा चुका है।)


हैंडपंप की स्थिति374288 हैंडपंप कुल प्रदेश में
351185 हैंडपंप चालू हालत में
13115 हैंडपंप खराब पड़े हैं
9988 जलस्तर कम होने से खराब


140 लीटर पानी में एक कप कॉफी
प शायद ही जानते हों हमारी एक कप कॉफी बनने में 140 लीटर पानी लगता है। यह बात अलग है कि दिखता एक ही कप है। यह पानी कॉफी के बीज से पौधा बनने से लेकर हमारी प्याली तक पहुंचने में लगता है। यही नहीं, हम जो कपड़े पहनते हैं या जो वाहन चलाते हैं उनके निर्माण में भी हजारों लीटर पानी लगता है। लंदन स्थित किंग्स कॉलेज के प्रोफेसर जॉन एंथोनी के अनुसार अदृश्य पानी का सिद्धांत पानी प्रबंधन को नई दिशा देगा। हर वस्तु के निर्माण या उत्पादन में इसकी छाप होती है। विज्ञान इसे वर्चुअल वाटर कहता है। जैसे एक टन गेहूं उगाने में करीब एक हजार टन पानी लगता है। कभी-कभी इससे ज्यादा लगता है।

किसमें कितने लीटर पानी1 कप कॉफी 140
1 किग्रा चावल 3,000
1 लीटर दूध 1,000
1 किग्रा मांस 15,500
1 किलो अंडा 3,300
1 टन की कार 4,00000

मंगलवार, 16 मार्च 2010

कोई बच रहा कोई बचा रहा

हिला आरक्षण का मामला कुछ ठंडा जरूर हुआ है लेकिन इस ठंड की आड़ में आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में जमीन तैयार हो रही है। सरकार अपनी औकात समझकर इसे लोकसभा में लाने से बच रही है वहीं विधेयक पर सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी और मुख्य विपक्षी दल भाजपा को अपने सांसदों को संभालना भारी पड़ रहा है। पड़ेगा भी। दरअसल जैसे-जैसे सांसदों और लोगों को महिला आरक्षण विधेयक का आगा पीछा समझ में आ रहा है वे इसकी मुखालफत कर रहे हैं। कुछ भाजपाई तो आडवाणी की चाय पीने के बाद भी बिल के पक्ष में नहीं आ रहे हैं। उनकी चिंता भी सही है। यद्यपि लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में परिवारवाद और सामंतवाद जैसे दोष सहनयोग्य नहीं हैं लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी सीट पर सालों से अपनी मेहनत और काम के बल पर जीतता आ रहा है तो यह व्यवस्था कि पांच साल के लिए उसकी सीट किसी महिला की हो जाएगी फिर उसके बाद सामान्य, ठीक नहीं है। खैर अभी तो विधेयक पहले चरण को ही पार कर सका है अभी इसे कानून बनने और लागू होने में कई और कठिन मुकाम पार करने होंगे। फिलहाल जो लक्षण दिख रहे हैं उनके मुताबिक तो इसकी राह और कठिन होती जा रही है।
हिला आरक्षण का समर्थन कर और विरोध कर रहे दोनों पक्षों को पहले अपने गिरेहबान में झांककर आत्मचिंतन करने की जरूरत है। मौजूदा लोकसभा के चुनाव में किस पार्टी ने कितनी महिलाओं को टिकट दिया किसी से छिपा नहंी है। इस समय लोकसभा में 59 महिला सांसद हैं। इनमें से अभी गिनने बैठ जाएं तो कोई किसी बड़े राजनेता की पत्नी, कोई बेटी, कोई बहू होगी। उंगलियों पर गिनने लायक संख्या नहीं होगी जो कि महिला कार्यकर्ताओं को जिताकर सांसद बनाया हो, लेकिन आरक्षण की बात चली तो सब के्रडिट लेने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। यही हाल पार्टी संगठनों का भी है। दोनों बड़े राजनीतिक दल ही नहीं सपा, राजद जैसे आरक्षण विरोधियों का भी यही हाल है। उनको भ्ी मौका मिलात है तो कोई अपनी पत्नी को सीएम बनाते हैं तो कोई अपनी बहू को संसद पहुंचाने की जुगत लगाते हैं। इसका समर्थन कर रहे लोग भी कम नहीं है। कई समर्थकों को जब अपनी सीट से किसी को खड़ा करना हुआ तो अपनी पत्नी अपनी बेटी को खड़ा किया और कुछ उन्हें जिताकर भी लाए। अगर यही चला तो संसद में तो इन्हीं 543 लोगों की पत्नी, बेटी, बहन, बहू ही पहुंचेगी। इससे आम महिला का क्या फायदा होगा? पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में प्रधानपति, पार्षद पति जैसे शब्द तो बाकायदा चल रहे हैं। फिर राष्ट्रीय स्तर पर सांसद पति, सांसद बंधु, सांसद ससुर जैसे जुमले चल निकलेंगे। अगर ऐसा ही होना है तो नहंी चाहिए ऐसा आरक्षण।
ब इसका दूसरा पहलू भी देख लें। अगर सरकार यादव तिकड़ी की बात मानकर आरक्षण में आरक्षण पर सहमति बनाने की कोशिश करती है तो अव्वल वह विधेकय पास नहंी होगा और अगर ऐसा गलती से हो गया तो देश एक नए विभाजन की ओर बढ़ेगा जो कि मंडल कमीशन के बाद से ही शुरू हो गया है। आरक्षण का लाभ अक्सर वास्तविक जरूरतमंद को नहीं मिला रहा। इसका फायदा बड़े लोग ही उठा रहे हैं। वहीं इस आरक्षण के साथ भी होगा। खैर महिलाओं को आरक्षण मिले न मिले लेकिन इसके बहाने मुलायम लालू ने एक तो अपनी खोयी जमीन वापस पा ली वहीं, सरकार को भी बैकफुट पर ला दिया। दोनों अल्पसंख्यकों के बीच कम होते जनाधार को भी बचाने में सफल दिख रहे हैं। उनकी लड़ाई में यही सबसे अहम है। पिछड़े पूरे देश में जहां संख्या बल में सबसे आगे हैं वहीं अल्पसंख्यकों का राजनीतिक महत्व पिछले चुनावों में दिख चुका है। अब उनकी तो चल निकली। लेकिन हम तो देश को चलते देखने चाहते हैं। इसलिए चाहते हैं कि सरकार सहित सभी दल इस बारे में एक बार नहंी सौ बार सोचकर कोई फैसला करें।

A Patriot's History of the United States: From Columbus's Great Discovery to the War on Terror

सोमवार, 8 मार्च 2010

लक्ष्मण रेखा भी पार

लक्ष्मण रेखा भी पार हो गई। सोमवार को हम दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन में लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार होते देखते रहे। हमने क्या-क्या देखा यह बताने की जरूरत नहीं है। जरूरत यह सोचने की है कि यह सब हंगाम बरपा क्यों और यह आग अब देश को कहां ले जाएगी? एक खास परिवार की परिक्रमा करने वाली कांग्रेस, खास संगठन से गाइड होने वाली भाजपा, सैद्धांतिक तौर पर मजलूमों की पार्टी होने का दावा करने वाले वामपंथी, मौका मिलने पर अपनी पत्नी को सीएम बनाने वाले लालू या अपनी पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने वाले मुलायम सिंह सब हमाम में नंगे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि महिलाओं को आरक्षण देने की जरूरत क्यों पड़ी और क्या आरक्षण भर दे देने से महिला सशक्तिकरण हो जाएगा? या फिर पहले की ही तरह कुछ खास परिवारों और खास लोगों की परिक्रमा करने वाली महिलाएं ही लोकतंत्र की पंचायतों में पहुंचती रहेंगी? अभी संसद और विधानसभाओं को देखें तो हाल कुछ यही है। सवाल एक पार्टी का नहीं सब का है। आखिर इन पार्टियों ने खुद अपने 33 फीसदी टिकट महिलाओं को क्यों नहीं दिए? आखिर क्यों आज भी आधी आबादी संसद में अल्पसंख्यक है? खैर इन सब बातों पर बहुत बहस हो चुकी है, बड़े-बड़े दिग्गज इस पर मुंह भांजते रहते हैं सो अपनी यहीं तक। अब आते हैं असल मुद्दे पर। असल मुद्दा यह कि कांगे्रस के मैनेजरों के लिए महिला विधेयक भारी मुसीबत बन गया है।
मुसीबत नंबर-1अगर सरकार भाजपा, वामदलों के भरोसे विधेयक पारित कराती है तो शरद-लालू-मुलायम की तिकड़ी सड़क पर हंगामा करेगी। हंगामा कैसा होगा यह यह सोमवार को संसद में दिख गया है। इसके अलावा कानूनी दिक्कतें भी सकती हैं।
मुसीबत नंबर-2अभी बजट पर चर्चा होनी है। प्रणब बाबू ने पेट्रो उत्पादों पर कर बढ़ाकर पहले ही मुसीबत मोल ली है। बंगाल वाली दीदी और तमिलनाडु वाले दादा विरोध जता ही चुके हैं वहीं महंगाई के मसले पर तो मुलायम, बसपा, वामदल पहले ही सरकार के खिलाफ हैं। ऐसे में अगर भाजपा कटौती प्रस्ताव लाती है तो सरकार के लिए बहुमत बचाए रखना चुनौती होगी।
मुसीबत नंबर-3
सरकार की तीसरी मुसीबत के संकेत मिलने शुरू हुए सोमवार शाम से। कांग्रेस कोर गु्रप की बैठक या यूं कहें सोनिया मैडम की क्लास के बाद प्रधानमंत्री ने लालू-मुलायम-शरद को मंगलवार को बातचीत के लिए बुलाया है। अब अगर कहीं सरकार ने इनकी बात मानने की गलती कर दी तो भाजपा-वामदल बिदक जाएंगे। यह सांप की पूंछ पर सिर रखने जैसा होगा।
मुसीबत नंबर-4मुसीबत लालू-मुलायम-शरद के लिए भी है। तीनों इस मसले पर इतना आगे निकल चुके हैं कि पीछे लौटना शायद मुमकिन नहीं। संसद में पास हुआ तो सड़क पर संघर्ष करेंगे। वैसे भी मुलायम और लालू को अपनी खोई जमीन वापस पानी है। ऐसा हुआ तो कम से कम यूपी और बिहार में आम आदमी के लिए मुश्किल तय है।
चलते-चलते
वो क्या कहते है कि दिल बहलाने के लिए गालिब खयाल अच्छा है। वही है अपना भी। भारतीय राजनीति पर पक्का-पक्का कुछ कहना उतना ही मुश्किल है जिनता स्वर्ग तक सीढ़ीयां बनाने की सोचना। सोचने और लिखने में तो अच्छा है पर कल क्या होगा यह नहीं पता। अरे भइया याद नहीं है, नरसिंहराव जी ने कैसे पांच साल अल्पमत की सरकार चलाई, अलटजी की सरकार कैसे एक वोट से गिर गई और भारत-अमेरिका परमाणु करार पर कैसे यूपीए सरकार जाते-जाते बच गई। अब यह तो कल ही पता चलेगा।

SMS from my inbox आज मुझे बीएचयू वाले कमल भइया का एसएमएस मिला। जो अविकल प्रस्तुत है-
आपको महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। (पर मार्र्दों की भी सोचो)
अगर मर्द औरत पर हाथ उठाए तो जुल्मी
अगर पिट जाए तो बुजदिल।
गर्लफ्रैंड को किसी दूसरे से बात करने पर लड़े तो ईष्यालु
और अगर चुप रह जाए तो बेगैरत।
घर से बाहर रहे तो आवारा
घर में ही रहे तो नाकारा।
बच्चों को डांटे तो जालिम बाप
न डांटे तो लापरवाह बाप।
पत्नी को नौकरी करने से रोके तो शक्की मिजाज
नौकरी करने दे तो पत्नी की कमाई खाने वाला।
आखिर बेचारा जाए तो कहां............................?

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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