राज और समाज पर खरी आवाज

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सोमवार, 25 जनवरी 2010

राशन 500 रुपए महंगा, जिम्मेदार पीएम

आजकल मैं भी बहुत बीजी हो गया हूं। हालांकि मेरा बीजीपन शरद जी के बीजी पांडेय से अलग है। फिर भी बीजी तो हूं ही। सुबह से शाम तक बीजी। सुबह उठा ही था कि घुमंतू भइया आ धमके। आज उनका बाना थोड़ा अलग था। कंधे में झोला और उसमें नाना प्रकार की किताबें। कुछ टैरो कार्ड, कुछ पचांग। आते ही रायता फैलाकर बैठ गए और लगे बोलने।
मैंने पूछा गुरु ये क्या नाटक शुरू कर दिया? बोले ज्योतिषी हो गया हूं। भविष्य बता रहा हूं। अभी तुम्हारा कल बताता हूं।
मैंने कहा ये क्या सूझी आपको? अच्छी भली नौकरी छोड़कर नाटक शुरू कर दिया? छूटते ही बोले आजकल इसी में फायदा है गुरु।
मैंने कहा चलो बताओ मेरे बारे में कुछ? तो पूछा अभी महीने में कितने का राशन लेते हो? मैंने कहा इससे क्या मतलब? बोले बताओ तो?
मुझे लगा शायद कुछ अंक ज्योतिष का मामला हो। सो कह दिया दो-तीन हजार। बोले दो या तीन? मैंने कहा ढाई मान लो। इस पर बोले अगले महीने तीन हजार लेकर जाना। मैंने कहा क्यों? तो बोले पांच सौ रुपए महंगाई बढ़ जाएगी। फिर लगे एक-एक चीज का दाम गिनाने।
मैं समझ गया कि घुमंतू भइया बाबा शक्कराचार्य उर्फ संत महंगाई बढ़ऊ उर्फ केंद्रीय कृषि और खाद्य मंत्री की राह पर चल रहे हैं। खैर संवाद इतना ही चला। इसके बाद वो कहीं और रायता ढोलने चले गए मैं इधर उनका गिराया रायता संभालने लगा।

अब बाबा ने खोला राज
अभी संभला ही था कि टीवी पर बाबा शक्कराचार्य प्रकट हो गए। बोल रहे थे कि महंगाई बढ़ाने में उनका अकेले का हाथ नहीं है। वैसे यह तो अपने को पहले भी पता था लेकिन जो उन्होंने नया बताया वह यह कि इसके लिए केंद्र सरकार की पीठ के मठाधीश उर्फ प्रधानमंत्री भी जिम्मेदार हैं। बाबा शक्कराचार्य ने कहा, इसके लिए केवल मैं ही कैसे जिम्मेदार हो सकता हूं? बात सही है। अब पता नहीं मठाधीश छोटो बाबा से कैसा सलूक करते हैं? यह तो अभी दोनों बाबाओं को भी नहीं पता।

अब इनका क्या होगा बाबा?
सलूक तो महिला बाल विकास मंत्रालय की मंत्री से भी पता नहीं क्या होगा? अब अपने सेना प्रमुख की जगह पड़ोसी देश के रिटायर सेना प्रमुख की फोटो दे मारी। अब इसमें मैडम की क्या गलती? उन्होंने कहा भी, फोटो छाप गई तो क्या संदेश तो सही है न? इस मामले में मैं कुछ नहीं कहूंगा बस इस पर बयानबाजी आपकी नजर कर रहा हूं-

डीएवीपी की नजर के नीचे से निकला
सबसे पहले मंत्री जी के बोल- 'फोटो सांकेतिक है, संदेश महत्वपूर्ण है। बच्चियों को बचाना चाहिए। गलती हुई है। मामले की जांच हो रही है। विज्ञापन डीएवीपी की नजर के नीचे से निकला है। विज्ञापन जारी करने से पहले डीएवीपी बारीक नजर डालता है। विज्ञापन बनने से जारी होने की प्रक्रिया में कई एजेंसियां शामिल रहती हैं। वैसे भी पूर्व सैन्य अधिकारी की फोटो के साथ कोई नाम है।'


डीएवीपी ने कहा- मंत्री की मंजूरी से जारी
दूसरी ओर डीएवीपी के अधिकारियों ने हाथ खड़े करते बताया कि प्रचार सामग्री तो मंत्रालय ने मंत्री की प्रत्यक्ष मंजूरी के बाद डीएवीपी से जारी करवाई है। विज्ञापन में शामिल लेख और फोटो मंत्री के स्टाफ ने तैयार किया है। तो जिम्मेदारी भी उनकी ही है। 

भारतीय वायुसेना ने कहा- बेहद शर्मिंदगी 
बात वायुसेना की चली तो अपनी वायुसेना के भी एक अधिकारी बोले, 'पता नहीं कैसे हुआ? यदि सरकार को भारतीय वायुसेना प्रमुख की तस्वीर चाहिए थी तो उन्हें सेना मुख्यालय से फोटो मांगनी चाहिए थी।'

कांग्रेस ने दी सफाई
पार्टी के सबसे मुखर प्रवक्ता मनीष तिवारी जी ने कहा, 'विज्ञापन में गलती हुई है। इसके लिए पीएमओ ने माफी मांगी है लेकिन कन्या भ्रूण हत्या की समस्या से पूरे एशियाई देश चिंतित हैं। जिम्मेदारी मंत्रालय की है।'

भाजपा ने की चढ़ाई
वहीं भाजपा के सबसे स्टाइलिश प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा, 'सरकार को देश को जवाब देना होगा। गंभीर मामला है। सरकारी विज्ञापन में पूर्व सैन्य अधिकारी का फोटो कैसे छप गया। इसकी गहराई से जांच होनी चाहिए।'

सोमवार, 18 जनवरी 2010

ज्योति दा नहीं रहे लेकिन मुझे स्यापा नहीं करना

ज्योति दा नहीं रहे। मुझे स्यापा नहीं करना और न ही स्मृति शेष सुनाना है और न ही मैं ज्योति दा का गुणगान करने जा रहा हूं। बस मैं कुछ कहना चाहता हूं ताकि उन लोगों को सनद रहे जो किसी महान नेता के जाने के बाद उनके नाम पर स्यापा करते हैं और जाने वाले को महान बताते हैं। आज दिनभर ज्योति बाबू के बारे में बहुत कुछ सुना और पढ़ा। इन सबमें बहुत सारी बातें ऐसी रहीं जो काबिल-ए-जिक्र हैं लेकिन मैं सिर्फ एक बात रेखांकित करना चाहता हूं।

आपको पता ही होगा कि 1996 में जब खंडित जनादेश के बाद संयुक्त मोर्चा की सरकार बनने की बारी आई तो सबसे पहले पीएम के रूप में ज्योति दा का ही नाम आया। ज्योति दा भी तैयार थे। बहुमत थाली में सजकर आया, पर ऐन टाइम पर पोलित ब्यूरो में शामिल कुछ सदस्यों ने टंगड़ी अड़ा दी। बस यही बात जो मैं कहना चाहता हूं। अगर ज्योति दा चाहते तो पीएम बनने पर अड़ जाते। अगर ऐसा होता तो टंगड़ी अड़ाने वालों को पीछे हटना पड़ता लेकिन बसु ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पार्टी का फैसला शिरोधार्य किया और सिद्धांतों का सम्मान करते हुए पीछे हट गए। हालांकि बाद में उन्होंने इसे ऐतिहासिक भूल माना। अब यह भूल थी या नहीं इस पर तो राजनीतिक पंडित राय देंगे ही।

अपना इस बारे में इतना लिखने का मकसद सिर्फ इतना था कि आज जब राजनीति में सिद्धांत पार्टी के रंग वाले गमछे की तरह हो गए हैं जिन्हें चुनाव दर चुनाव बदला जा रहा है। पार्षदी जैसा टिकट न मिलने पर विद्रोह और पार्टी छोडऩा तो आम घटनाएं हो गई हैं। कल तक जिनके चरण चूमते नहीं थकते थे पद और कद न मिलने पर उनको गरियाना शुरू कर देते हैं। ऐसे लोगों को ज्योति दा से सीखना चाहिए कि सिद्धांत कपड़ों की तरह बदले नहीं जाते। 

बस बहुत हुआ। समझदार के लिए इशारा काफी है और जिनकी चमड़ी मोटी हो उनके लिए जो कहना हो वह आप कहें......................

ज्योति दा को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि

सोमवार, 11 जनवरी 2010

क से कंडोम....


आइए पहले आपको दिखाता हूं इंदौर में छाए इन होर्डिंग्स को। यह मां अहिल्या की नगरी इंदौर के चौराहे पर लगी होर्डिंग है। इंदौर जहां से कुछ मील दूर संदीपनी आश्रम में भगवान कृष्ण ने सुदामा के साथ शिक्षा ग्रहण की। शहर के हर प्रमुख जगह पर यह होर्डिंग लगाया गया है। मेरी नजर में जो होर्डिंग सबसे पहले आई वह इंदौर देवी अहिल्या विवि के नजदीक एक चौराहे पर लगी है। पहले तो मैं झटके से निकल गया लेकिन जब एक साथी ने बताया तो मैंने देखा।आप भी देखिए। इसे देखने के बाद मैंने सोचा कुछ हो न हो लेकिन विरोध तो जता ही दें। यह होर्डिंग नेशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी (नाको) द्वारा जनहित में लगवाई गई हैं। बताया तो गया है कि यह एड्स से बचाव के लिए है लेकिन इसके पीछे का निहितार्थ कुछ और ही इशारा कर रहा है। कम से कम मुझे तो दूसरा पहलू भी दिख रहा है।

अब मैं अगर कहूंगा कि यह हमारी संस्कृति के खिलाफ है तो कुछ लोग कहेंगे कि मैं रूढि़वादी हूं। या मेरी मानसिकता पिछड़ी हुई है। खैर आपको जो कहना है कहें मैं तो अपनी कहूंगा। क्यों नहीं ऐसे प्रचार का विरोध होता है। क्या यह नैतिकता के खिलाफ नहीं है? या फिर हम विरोध करने की हिम्मत नहीं रखते? चैनलों पर फैशन और आधुनिकता के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। सरकार किताबों से नैतिकता का पाठ निकालकर सुरक्षित शारीरिक संबंध बनाने का ज्ञान देना चाहती है। सूर्य नमस्कार का विरोध होता है और ऐसी होर्डिंग्स का स्वागत। क्या हम यही संस्कार देना चाह रहे हैं आने वाली पीढ़ी को? कल को आप अपने बच्चे को से कलम पढ़ाएं ओर वो से कंडोम बोलने लगे तो चौंकिएगा मत। क्योंकि हम सिखा ही यही रहे हैं।

कुछ सवाल जिनका जवाब चाहिए

* क्या यही जनहित है और इससे क्या जनहित होगा?
* क्या एड्स जैसी बीमारी के खिलाफ हम संयम का पाठ नहीं पढ़ा सकते?
* क्या युवा पीढ़ी को ब्रह्मचर्य पालन करने के बारे में नहीं कह सकते?
* यह अच्छा नहीं होता कि हम कहते- विवाह के पूर्व शारीरिक संबंध न बनाएं और विवाह के बाद साथी के प्रति वफादार रहें?
* क्या ऐसे सरकारी विज्ञापन सामाजिक व्यवस्था को तोडऩे के जिम्मेदार नहीं हैं?
* क्या ऐसे विज्ञापन देह व्यापार जैसी अमानवीय परंपरा को बढ़ावा नहीं देते?
* स्कूलों-कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में कंडोम वेंडिंग मशीन लगाने से एड्स रुकेगा?
* क्या हम आने वाली पीढ़ी को यही भारत देकर जाना चाहते हैं?

जवाब तो देना ही होगा
आप गलत को रोकें अगर रोक नहीं सकते तो कम से कम विरोध जरूर करें, गलत के विरोध की आग हमेशा जलती रहनी चाहिए। इसलिए जवाब तो आपको देना ही होगा, आज मेरे सवालों का दीजिए या कल आने वाली पीढ़ी के सवालों का? चलिए जवाब नहीं देना चाहते तो कम से कम सवाल जरूर उठाइए।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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