राज और समाज पर खरी आवाज

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गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

क्‍या हिंदू होना ही सांप्रदायिकता है?

जब से अयोध्‍या मसले पर हाइकोर्ट का फैसला आने की बात चली तब से हर प्रकार का मीडिया यही बात थी कि शांति बनाए रखें। मेरी जानकारी में हर मीडिया ने कमोवेश वही जिम्‍मेदारी दिखाई और उसका असर भी सामने दिख रहा है। इस पूरे लगभग एक महीने हर न्‍यूज चैनल से लेकर अखबार और वेबसाइटस से लेकर सोशल कम्‍यूनिटीज तक बस सफेद फाख्‍ते उड रहे थे।
आज ही मेरे फेसबुक वॉल पर मेरे एक मित्र ने कुछ लिखा। (http://www.facebook.com/photo.php?fbid=147455791963780&set=a.126071017435591.9610.100000980810798&il=0¬if_t=photo_reply#!/profile.php?id=1700751039) मेरे लिए उनके शब्‍द आश्‍चर्यजनक थे क्‍योंकि मैंने ऐसा कुछ नहीं लिखा था जिसका जवाब ऐसा हो…. पर मैं अपने मित्र की व्‍याकुलता समझता हूं! और यह भी समझता हूं यह सारी बातें क्‍यों ताजी हो रही हैं। खैर यह उनका निजी मामला है इसलिए टिप्‍पणी करना उचित नहीं है लेकिन उन्‍होंने मेंरे निजी मामले पर प्रश्‍न उठाए हैं सो उसका जवाब देना भी जरूरी है। यह जवाब सिर्फ इसलिए दिए जा रहे हैं क्‍योंकि इन्‍हें पूछा गया है। हो सकता है मेरे यह जवाब मुझे सांप्रदायिक की श्रेणी में ला खडा करें क्‍योंकि मैं हिंदू हूं लेकिन मुझे इस बात की चिंता नहीं है। मेरे लिखने का निहितार्थ सिर्फ इतना नहीं कि मैं अपनी बात रखूं वरन यह भी है मैं यह तो जानूं कि इस देश में क्‍या हिंदू होना ही सांप्रदायिकता है?

सवाल- राष्ट्रवाद बनाम हिंदूवाद
राष्‍ट्र माने सिर्फ देश नहीं। राष्‍ट्र मतलब राज्‍य नहीं, न ही नेशन, न स्‍टेट और न ही कंट्री। राष्‍ट्र की अवधारणा इससे कहीं व्‍यापक है, जिसका अभिप्राय भौगोलिक सीमाओं, राजनीतिक व्‍यवस्‍थाओं और वैश्‍विक मान्‍यताओं से आगे है। राष्‍ट्र इन सबके साथ सांस्कृतिक परंपराओं, धार्मिक मान्‍यताओं और वैचारिक भिन्‍नताओं और समरूपताओं का समग्र स्‍वरूप है। राष्‍ट्र वह है जिसकी भौगोलिक सीमाएं तो तय हो सकती हैं लेकिन उसका सांस्‍कृतिक और धार्मिक विस्‍तार असीम होता है। जैसे कि हमारा भारतवर्ष। मुझे स्‍पष्‍ट नहीं है कि इन सवालों में हिंदूवाद शब्‍द किस अर्थ में प्रयोग किया है। रही बात राष्ट्रवाद बनाम हिंदूवाद की तो यह तुलना निरर्थक है। इसका कोई मायने नहीं है।

अब आपने सवाल खडे किए हैं कि हिंदूवादी राष्‍ट्रवादी कैसे हो सकता है? हो सकता है आपको हिंदू या सनातन धर्म के बारे ज्ञान न हो क्‍योंकि ऐसा सवाल वही लोग खडा कर सकते हैं। वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिन:……सर्वे संतु निरामय: लेकर परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीडा सम नहिं अधमाई, अष्‍टादश पुराणेशु व्‍यासस्‍य वचनद्वयं, परोपकाराय पुण्‍याय, पापाय परपीडनम जैसे तमाम उदाहरण तो आपको हमारे धर्मग्रंथों में तो मिलेंगे ही साथ ही निरा निरक्षर भारतीय भी प्रकृति पूजा से लेकर चीटियों को आटा देने जैसे जो छोटे छोटे काम रोज करता है वही तो है हिंदुत्‍व की झलक। अन्‍य धर्मों में जो बातें पवित्र ग्रंथों में दर्ज हैं वह हमारे देश में बच्‍चे बच्‍चे की जुबान पर हैं। झूठ बोलना पाप है, जीव हत्‍या पाप है, गरीबों पर दया करो, दादी नानी की कहानियों में छिपे दर्शन को शायद आपने नहीं सुना है। यही नहीं सिर्फ इसी धर्म वाले ही हैं जो मजारों पर सजदे करके चादर पेश करते हैं और गुरुद्वारे में गुरुवाणी सुनने के बाद चर्च में जाकर ईश्‍वर के आगे पापों के लिए क्षमा मांगते हैं। यही तो है हिंदुत्‍व। अब इसमें बुराई क्‍या है। हो सकता है ऐसे सवाल पूछते हुए आपको यह सब याद नहीं आया हो लेकिन मेरा हिंदुत्‍व और हिंदू धर्म तो यही है। अब कानूनी बात करें तो जिस संविधान का आपने नीचे हवाला दिया है उसी संविधानिक उपबंधों के तहत बनी भारतीय न्‍यायपालिका ने यह कहा है कि हिंदुत्‍व जीवनशैली है, धर्म नहीं। इसलिए हिंदुत्‍व को व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में देखिए। अब शायद आप हिंदू समझ गए हों तो हिंदू होगा उसके लिए जननी जन्‍मभूमिश्‍च स्‍वर्गादापि गरीयसी।

1- हमारा राष्ट्र बहुल संस्कृति, बहुधर्मी एवं गंगा-जमुनी है।
भारत की 85 फीसदी आबादी हिंदुओं की है। 15 फीसदी में बाकी के मुस्‍लिम, जैन, बौदध, सिख, पारसी आदि आदि। दुनिया के अधिकांश देशों में बहुसंख्‍यक समाज का धर्म ही राष्‍ट्रीय धर्म है। बावजूद इसके भारत की संविधानसभा ने कोई धर्म विशेष अंगीकार नहीं किया, जबकि उस सभा के अधिकांश सदस्‍य हिंदू थे। यहां तक बाद में देश के संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्‍द जोडा गया वह भी एक हिंदू ने किया। यह हिंदुस्‍तान में भी संभव है साथी जहां एक साथ अजान, गुरुवाणी, आरती और चर्च की प्रे गूंजती है। दुनिया के किसी अन्‍य देश में ऐसा हो तो जरूर बताएं। आप बताइए अगर हिंदू के अलावा दूसरा कोई धर्म भारत में बहुसंख्‍यक होता तो क्‍या तब भी भारत धर्म निरपेक्ष राष्‍ट्र होता?

2- संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा को लक्ष्य माना गया है।
यह बेहद हर्ष की बात है। सबको उस लक्ष्‍य की पूर्ती में सहयोगी बनना चाहिए। एक धर्म निरपेक्ष देश में जन्‍माष्‍टमी, ईद-उल-फितर, गुरुनानक जयंती, बडे दिन जैसे धार्मिक पर्वों पर अवकाश होता है। धार्मिक यात्रा के लिए सरकारें अनुदान देती हैं, धर्मआधारित शिक्षण संस्‍थानों को सरकारी सहायता और स्‍वायत्‍ता दी जाती है, क्‍या यह सही है।

3- हिंदूवादी हिंदू को छोड़कर अन्य किसी धर्म का अस्तित्व नहीं मानते हैं।
ऊपर की बातों से आपको इतना तो स्‍पष्‍ट हो गया होगा कि आपकी तीसरी बात स्‍वत: खारिज हो जाती है। वैसे मैं यह भी नहीं समझ पाता हूं कि आप हिंदुत्‍व और राष्‍ट्रवाद की बात करते करते आडवाणी और कटियार आदि तक क्‍यों जाते है। अरे ये हिंदुत्‍व का झंडाबरदार नहीं हैं और न ही इनके पास ठेकेदारी है हिंदुत्‍व की। मैं हिंदू हूं सभी धर्मों का सम्‍मान करता हूं आप भी अगर नौकरी के फार्म में धर्म का कॉलम भरेंगे तो उसमें हिंदू ही टिक करेंगे आपभी सभी धर्मों का सम्‍मान करते हैं तो हिंदुत्‍व दूसरे धर्मों का विरोधी कहां हुआ। हिंदू धर्म ही है जहां पूजा करो तब भी, न करो तब भी, बुत पूजो तब भी न पूजो तब भी, साकार मानो तब भी निराकार मानो तब भी, वैष्‍णव हो तब भी शैव हो तब भी, द्वैत मानो तब भी अद्वैत मानो तब भी, व्रत रहो तब भी न रहो तब भी, तीरथ जाओ तब भी न जाओ तब भी, रहेंगे हिंदू ही। न हमें धर्म छोडना पडेगा और न ही ऐसा कोई नियम है। तो हिंदू दूसरे धर्मों के विरोधी कहां हुए?

4- तोड़-फोड़ की बात करने वाले राष्ट्रवादी नहीं हो सकते!
तोडफोड की बात करने वाला राष्‍ट्रवादी तो बहुत दूर की बात वह तो इनसान कहलाने लायक भी नहीं है। हिंदुत्‍व का मूल सृजन है, समाप्‍ति तो नियति है।

5- हिंदू मूलत: दलित, आदिवासी एवं मूल भारतीय विरोधी है। ये किस हिंदू की बात है। ऐसा कौन सा हिंदू है जो ऐसा है। और अगर कोई व्‍यक़ति ऐसा है तो हिंदू नहीं है। मैं जिस हिंदुत्‍व को मानता और जानता हूं वह ऐसी कोई सीख नहीं देता।

6- हिंदूवादियों के कृत्य मालेगांव एवं हैदराबाद के मक्का मस्जिद में बम धमाका कराने के मामले में आए हैं।
दरअसल अब आए हैं आप अपनी असली बात पर, इसके पहले तो आपने भूमिका बांधी थी। इन कृत्‍यों के बाद किस राष्‍ट्रवादी हिंदू ने कहा कि इन स्‍थानों पर जो हुआ वह बहुत अच्‍छा था। इसका जवाब देते समय आप राजनीतिक लोगों के नाम मत गिनाइएगा क्‍योंकि अगर ऐसा है तो मेरे पास भी कुछ नाम हैं।
वैसे क्‍या इन तीन धमाकों के अलावा देश में कभी धमाके नहीं हुए हैं। या आपको याद नहीं हैं। उनके बारे में भी सवाल उठाइए। या डर है कहीं सांप्रदायिक न हो जाएं? हर मसले के सभी पहलू देखेंगे तभी सच दिखेगा नहीं तो अर्धसत्‍य।

8- हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं ने अपने घर भरे
ऐसा करने वाले चोर हैं। उन्‍हें राजनीति में रहने का कोई हक नहीं है।

9- --------------------------------- यह टिप्‍पणी किसी व्‍यक़ति विशेष पर लगाया गया आरोप है, इसलिए इस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा। क्‍योंकि इससे मेरा कोई वास्‍ता नहीं है।

10- 1992 में अयोध्या में उत्पात मचाने वालों को राष्ट्रविरोधी ही मानना पड़ेगा
जरूर मानेंगे। आपकी बात से सहमत हूं। उसके बाद से देश बदला, लेकिन उसके पहले भी बहुत कुछ हुआ था। उसे भी तो मानिए। अयोध्‍या में जब यह सब हुआ उस दिन आपके प्रिय संगठनों के दर्जनभर ही नेता अयोध्‍या में थे। इसके अलावा हजारों लोगों की पहचान सिर्फ और सिर्फ एक भीड की थी जो धर्मिक भावनाओं के ज्‍वार में बहकर आए थे। कहिए सबको राष्‍ट्रविरोधी।
वैसे वे लोग तो राष्‍ट्रविरोधी नहीं होंगे न जो खाते भारत की हैं और गाते पडोसी की। राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो जो देश पर हमला होने पर खुशी मनाते हैं। राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो देश के एक हिस्‍से को देश से अलग करने की मांग करते हैं, राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो उनका समर्थन करते हैं जो देश के खिलाफ ही युद़ध छेडे बैठे हैं? कहिए मैं सही कह रहा हूं न।

11- अयोध्या में उत्पात मचाने वाले राष्ट्रविरोधियों के खिलाफ मुकदमा विचाराधीन है।
तो करने दिजिए कोर्ट को अपना काम। अच्‍छा ही तो है जितना जल्‍दी फैसला आ जाए और दोषियों को सजा मिले। लेकिन बाद में मुकरिएगा मत कोर्ट के फैसले से जैसा अभी लखनऊ बेंच के फैसले के बाद केंचुल उतार फेंकी है।

12- उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को इस मामले में एक दिन की सांकेतिक सजा हो चुकी है।
इसके लिए भारतीय न्‍यायपालिका की जय और यह याद दिलाने के लिए आपको धन्‍यवाद।

13- मालेगांव बम धमाके की आरोपी प्रज्ञा सिंह का पक्ष लेने वाले लोग संघ एवं हिंदूवादी संगठनों से जुड़े लोग हैं।
गलत है। नहीं लेना चाहिए आरोपी का पक्ष। मैं आपकी बात से सहमत हूं। लेकिन क्‍या आप मेरी बात से सहमत होने की हिम्‍मत रखते हैं- पक्ष उसका लेना चाहिए जो देश पर हमले के मामले में देश की उच्‍चतम अदालत द्वारा मौत की सजायाफ़ता है। पक्ष उसका लेना चाहिए जो आंतकियों के साथ शूटआउट में मारा जाता है और लोग उसे निर्दोष ठहराने में लगे रहते हैं। पक्ष उसका लेना चाहिए जो छद़म हो।

14- मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती जेल में आतंकी प्रज्ञा ठाकुर से मिलन के लिए गईं।
तत्‍काल प्रभाव से माननीय कोर्ट को इस मसले को संज्ञान में लेकर उमा को सजा देनी चाहिए। लेकिन आपका अयोध्‍या फैसले के बाद कोर्ट से भरोसा तो नहीं उठ गया। पर क्‍या जेल में किसी से मिलना गलत है। राजीव गांधी के हत्‍या के दोषियों से उन्‍हीं के परिवार के लोग मिले हैं। वैसे मिलने तो लोग आजमगढ भी जाते हैं आपको पता है कि नहीं यह बात।


15- देश में अशांति फैलाने एवं दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने वाले राष्ट्रवादी कैसे हो सकते हैं।
इसका जवाब पहले दे चुका हूं। ऐसे लोग राष्‍ट्रवादी तो दूर इसान कहलाने लायक भी नहीं हैं।

चलिए नवरात्रि की शुभकामनाएं।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

एक पाती रामजी के नाम

हे रामलला!
मुझ अकिंचन का प्रणाम स्‍वीकार करें।


लिखता तो नहीं, पर हालात ऐसे हैं कि मुझे आपको ही लिखना पड रहा है। आज मैं आपको अपनी कुछ चिंताओं से अवगत कराने के लिए पत्र लिख रहा हूं। रामजी इस समय आपकी अयोध्‍या और आपको लेकर पूरे भारतवर्ष में अजब सी बेचैनी का माहौल है। सब तरफ सांसें रुकी हैं। अजब सा सन्‍नाटा है। ऐसा पहले न था।
हे राघव, जिस अयोध्‍या के स्‍मरण मात्र से मोक्ष मिलने का विश्‍वास हजारों साल से बना हुआ है आज उस अयोध्‍या का स्‍मरण चित्‍त को बेचैन कर रहा है। लोग सप्‍तपुरियों में प्रथम अयोध्‍या और अयोध्‍यापति राम को याद तो कर रहे हैं पर उन्‍हें शांति नहीं मिल रही। अयोध्‍या का जिक्र होते ही एक आशंका जन्‍म ले रही है।
प्रभू! मैंने जब से होश संभाला तब से राम-राम सुनाता आया। और बडा हुआ तो राम को जाना। पर मैंने जितना जाना उतने में तो राम दीनबंधु, दयासागर, करुणानिधान, भक्‍तवत्‍सल ही हैं। फिर आपको लेकर ऐसा वातावरण क्‍यों बन गया?

अन्‍याय और अत्‍याचार के अंत के लिए ही पृथ्‍वी पर अवतरित होने वाले हे राम, सुना है आपके मंदिर को लेकर कोई फैसला आने वाला है और यह सब बेचैनी उसी के लिए है। लोगों ने बताया, आज अयोध्‍या में जहां आप विराजमान हैं वहां, पहले आपका मंदिर था या कोई और इबादतगाह, इस पर किसी अदालत को फैसला सुनाना है। रामजी मैंने तो सुना था कि आप कण-कण में हैं। हर चल-अचल, जीव-निर्जीव, जड-चेतन, भूत-भविष्‍य-वर्तमान में आप ही का अंश है, फिर आपके मंदिर को लेकर यह सब… क्‍या यह आपकी लीला है या……..विधि का विधान?

मुझे नहीं पता कि गोपाल सिंह विशारद का दावा सही है, या सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड का? मैं नहीं जानता कि निर्मोही अखाडे और देवकी नंदन अग्रवाल की दलीलें खरी हैं या नहीं? मैं यह भी नहीं जानता कि अदालत ने किसके दावे को सही माना है, पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि आप इन दावों, वादों, दलीलों, वकीलों, अदालतों और मुगालतों से परे हैं। हे कौशलेश! अयोध्‍या की उस जमीन पर आपका मंदिर बने या नहीं, मुझे नहीं पता। मैं तो इतना जानता हूं, अयोध्‍या ही नहीं, पूरी दुनिया अवधेश की है। जब तक दुनिया है तब तक राम हैं और जब तक राम हैं तभी तक दुनिया।

हे राघवेंद्र! कुछ शताब्‍दी पहले आपके उस अवध में सरयू का रंग खून से लाल हो गया जिस अवध का अर्थ ही था जहां कभी वध न हुआ हो। सुना है कि तब किसी मीरबांकी ने आपके मंदिर को तोडकर वहां फरिश्‍तों के उतरने की जगह बनाई थी। सालों से यह विवाद चल रहा है। हे अयोध्‍यापति, कुछ साल पहले तो कभी युद्ध न देखने वाली आपकी अयोध्‍या रणभूमि भी बन गई थी।

अन्‍याय का अंत करने के लिए अवतार लेने वाले हे राघव! जब मीरबांकी ने वहां कहर ढाया या जब कुछ हजार की उत्‍तेजित भीड ने ढांचा ढहाया तो आप चुप क्‍यों रहे? क्‍या तब रघुकुल नायक की भुजाएं फडकी नहीं थीं? क्‍या जब मीरबांकी के कहर और ढांचा गिरने के बाद देश दुनिया में हजारों निर्दोंष निशाना बनाए जा रहे थे तो आपके करुणा का सागर सूख गया था? हे जनार्दन! आपने ही तो कहा था कि जब-जब पृथ्‍वी पर संकट आएगा तो आप आएंगे! क्‍या इससे बडा भी कोई संकट आएगा? हे प्रभू! जब आपके अस्‍तित्‍व पर ही सवाल उठा तब भी आप मौन रहे क्‍या यह भी आपकी लीला थी!

हे मर्यादा पुरुषोत्‍तम!
जिस देश में संस्‍कार, मर्यादा और राजधर्म का पालन करने के लिए आप ने 14 वर्ष का वनवास काटा, अपनी प्राणप्रिय पत्‍नी को त्‍याग दिया उसी देश के सत्‍ताधीश और राजनेता राजधर्म भूलकर सत्‍ता के मद में चूर पथभ्रष्‍ट हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं। तब आपने क्‍यों नहीं उन्‍हें राजधर्म की याद दिलाई? हे दशाननहंता! क्‍या आप ऐसे धर्मभ्रष्‍ट, पथभ्रष्‍ट, अमर्यादित, जनद्रोही सत्‍ताधीशों के वध के लिए अवतार नहीं लेंगे? जिस रामराज्‍य की कल्‍पना मात्र से लोग पुलकित होते हैं उसी देश में क्‍यों नहीं रामराज्‍य आ पाया? उल्‍टे अब राम को अदलातों में खुद को साबित करना पड रहा है। क्‍या यह भी आपकी लीला है?


हे राजेंद्र! आपने ही कहा था-जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । मैं भी अपनी उसी जन्‍मभूमि को बचाने के लिए आपसे आग्रह कर रहा हूं। हे प्रभू! फैसला मंदिर के पक्ष में आए या इबादतगाह के पर राम तो राम ही रहेंगे। आप उस विवादित जमीन पर आलीशान मंदिर बनवाकर उसमें रहें या अभी मौजूद टेंट के मंदिर में या फिर वहां भी नहीं, पर राम तो राम ही रहेंगे? क्‍योंकि मेरे राम किसी महल, अटटालिका, भवन, मंदिर, राजसिंहासन से नहीं मेरी आस्‍था से हैं, और मेरी आस्‍था जिस राम में है, वह अपने पिता का वचन पालन करने के लिए 14 साल जंगल में भटका था, उसने शबरी के जूठे बेर खाए थे, उसने केवट का अहसान लिया था, उसने अहिल्‍या का उद़धार किया था, उसने उस अधर्मी बालि का भी वध किया जो सीता को चुटकी में रावण के बंधन से आजाद का सकता था, उसने राजधर्म का आदर्श स्‍थापित किया और रामराज्‍य चलाया। मैं उस भरतवंशी राम से आग्रह करता हूं कि हे रघुवर! आपकी अयोध्‍या की केवल 67 एकड जमीन पर आने वाले फैसले का सीधा असर आपके और मेरे भारतवर्ष पर पडेगा। हे करुणानिधि! फैसला जो भी आए आपके देश की फिजा न बिगडने पाए।

हे प्रभू! समस्‍याएं और वेदनाएं तो बहुत हैं, लेकिन फिलहाल तो सबकी निगाहें अयोध्‍या की ओर हैं और मेरी आपकी ओर। आप सर्वज्ञ हैं, इसलिए ज्‍यादा कहने की जरूरत नहीं। मुझे पूरा विश्‍वास है कि मेरे राम पर मेरी आस्‍था और अटल होगी।

हे राघव मेरी प्रार्थना स्‍वीकार करें।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

प्‍यारी राधा को प्रियतम बुलाने तो दो

श्री कृष्‍णजन्‍मोत्‍सव की हार्दिक शुभकामनाएं


किसने यह कह दिया श्‍याम आते नहीं,
बनके राधा किसी को बुलाने तो दो।
रास रच जाएगा, बंशी बज जाएगी,
किसी गोपी को मधुवन में आने तो दो।।

चीर हरने यहां भी चला आएगा,
मस्‍त गोपी को यमुना नहाने तो दो।
छोडकर काम सब गोपियां आएंगी,
श्‍याम संइयां को बंशी बजाने तो दो।।

आज भी श्‍याम बंशी बजा सकते हैं,
प्रेम में मग्‍न मीरा को गाने तो दो।
बनके राधा किशन आज फिर नाचेंगे,
जरा राधा को नखरे दिखाने तो दो।।

कौन कहता कि राधा को भूले किशन,
अरे! मधुवन में सावन को आने तो दो।
छोडकर शेष शैया भी आ जाएंगे,
प्‍यारी राधा को प्रियतम बुलाने तो दो।।

सितंबर 2003 को बीएचयू के बिरला हॉस्‍टल के रूम नंबर 124 में बस ऐसे ही बन गया।)

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

धन्‍यवादनामा खबरों के थोक विक्रेताओं के नाम

नमस्‍कार। मैं एक पत्रकार हूं। सीखने की शास्वत परंपरा का पालन करते हुए स्‍याही की मोहक खुशबू के साथ इतिहास को रोज अखबार के पन्‍नों पर टांक रहा हूं। खबरें गढना, बुनना, रचना और बेचना यही काम है मेरा। गढना, बुनना और रचना इसलिए क्‍योंकि अंतत खबरों को बेचना भी तो है। इसी बेचने की कवायद में सुबह नींद खुलने से रात में नींद आने तक लगे रहते हैं। सच कहूं तो जब पत्रकारिता की पढाई का मन बनाया तब पता ही नहीं था कि खबरें बेची जाती हैं। वो तो इस पेशे में उतरा तब पता चला कि यहां भी कहावत चलती है कि जो दिखता है वही बिकता है। सब अलग अलग तरह के व्‍यापारी हैं। एक ही खबर को अलग अलग तरह से सजा संवार कर बेचने में लगे हैं। कई बार तो न्‍यूजरूमों में भी यह बात होती है कि ऐसे उठेगी तभी बिकेगी। खैर अब जब मैं भी व्‍यापारी हो गया हैं तो मुझे भी बेचने और खरीदने में कोई शर्म नहीं रही, बस इतना ध्‍यान रहता है कि हर पेशे की तरह इस पेशे की भी एक नैतिकता है। गनीमत है कि अभी भी कुछ अखबारों में नैतिकता बची है और मेरी खुशकिस्‍मती यह है कि मैं भी फिलहाल ऐसे ही अखबार जुडा हूं जहां बेचने और खरीदने में इनसानी जज्‍बातों की कदर होती है। जहां व्‍यावसायिक हित पर पेशेगत नैतिकता हमेशा हावी रहती है। वैसे मैंने अभी तक ऐसा कुछ नहीं बताया जो अलग हो या जो एक्‍सक्‍लूसिव हो। इसलिए यह नहीं बिकेगा। चलिए अब आप को बताता हूं कि हम पत्रकार बेचने के लिए माल खरीदते कहां से हैं। इससे पहले मैं यह भी बता दूं माल की जरूरत क्‍या है।
अखबारों में शाम चार बजते ही लीड स्‍टोरी तलाशी जाने लगती है। रिपोर्टर से लेकर डेस्‍क तक सब तलाशते हैं। माल ऐसा होना चाहिए जो पहली नजर में ग्राहक को जम जाए यूं कहिए कि बिकाऊ होना चाहिए। वो किसी नेता की नोट लेती तस्‍वीर, आतंकी हमले में मरा आम आदमी, नक्‍सली निशाना बने पुलिसवाले, करोडों के भ्रष्‍टाचार में फंसा कोई अफसर/नेता, भूख से दम तोड चुका कोई इंसान, किसी गोली का शिकार कोई शेर/बाघ या हिरण, रैंप पर कैटवाक करती मॉडल के फिसल चुके कपडे, कलावतियों के घर का मखौल उडाता कोई राजकुमार, क्रिकेट के मैदान पर छक्‍का जडते खिलाडी हों, बालीवुड की कोई मसालेदार चटपटी खबर आदि, आदि या ऐसा ही कुछ जो बिके। तो साहब ये हैं माल जिनकी हमें तलाश रहती है। मैं पत्रकारों को प्रवक्‍ता तो नहीं लेकिन उस बिरादरी के एक जिम्‍मेदार सदस्‍य के नाते मैंने सोचा उन लोगों को शुक्रिया अदा करूं जिनसे हमें ये माल मिलता है और आपको भी बताऊं कि जो आप तक पहुंचता है वो कौन देता है।

दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र होने के नाते सबसे पहले शुक्रिया हमारे विधायकों, सांसदों का। जो कभी नोट लेते कभी देते, कभी दिलवाते, कभी लहराते, कभी दिखाते हुए हमें खबरें देते हैं। शुक्रिया इसलिए की अगर ये लोग लोकतंत्र के मंदिरों को अखाडा न बनाएं तो हमें खबर न मिले। शुक्रिया इसलिए भी कि ये सदन में मां बहन करते हैं, सदन में कुर्सियां मेज चलाते हैं माइक फेंककर निशानेबाजी का नमूना दिखाते हैं। धन्‍य हैं हमारे जनप्रतिनिध जो इतनी मेहनत सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें वर्ना उन बेचारों का क्‍या। वे तो जनसेवक हैं।

फिर मैं शुक्रिया अदा करना चाहूंगा देश के प्रशासनिक और पुलिस अमले का। सुबह से शाम तक जन सेवा। कितना कैसे खाना है, किससे खाना है और किसको खिलाना है सब का ध्‍यान रखना पडता है। ऊपर से नीचे तक सब तय है। जेल में फाइव स्‍टार सुविधाएं मुहैया कराना और क्राइम कंट्रोल में और क्रिमिनल जहन्‍नमुम में यह दिखाने के लिए मुठभेड आदि कार्यक्रम की व्‍यवस्‍थाएं करना कितना कठिन काम है। फिर हमारे देश में होता है ताकि हमें खबरें मिल सकें। बाढ आई तो, सूखा पडा तो ये बेचारे तो हमेशा खबरों के लिए हरा ही हरा करते हैं। सो इनका भी शुक्रिया।
अब शुक्रिया दुनिया की सबसे बडी यातायात व्‍यवस्‍था यानि भारतीय रेल का जिसमें सबसे ज्‍यादा कर्मचारी सेवारत हैं। साहब है ऐसा किसी देश में। बीस साल में पांच हजार हदासे और चार हजार की मौत का आंकडा और किसी विकसित या विकासशील देश के देने की हिम्‍मत है। नहीं। यह सिर्फ सिर्फ हमारी भारतीय रेल में ही हो सकता है। साल में औसतन दो सौ की जान लेने वाला रेल महकमा क्‍या कम खबरें देता है। लगे हाथ वायु सेवा की भी बात करते चलें। कभी टायर फटा, कभी कुत्‍ता पहुंचा, कभी चिडिया फंसी, कभी हवा में भिडे, कभी जमीन से फिसले यानि नाना प्रकार के व्‍यवधान हमारी वायु कंपनियां सिर्फ इसीलिए तो लेती हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें। सो शुक्रिया।

शुक्रिया मैदान के धुरंधरों का। हां भाई सही समझे आप। मैं अपनी टीम इंडिया की ही बात कर रहा हूं। भले उन्‍हें देश के लिए पदक लाने का शौक नहीं लेकिन छक्‍के जडने में क्‍या कम मेहनत लगती है। शतक मारना क्‍या मामूली काम है। यही नहीं खेलने के बाद क्‍लबों में जाकर सिर्फ इसलिए मारपीट, मां बहन करना ताकि अखबारों को मसाला मिल सके क्‍या कोई पराया इतना करता है। हमें कौन सी कोल्‍डड्रिंक पीनी चाहिए, कौन सी गाडी चलानी चाहिए, यानि आप तो यूं समझों कि सुबह सोकर उठने से रात में सोने और उसके बाद तक हमें क्‍या यूज करना चाहिए सब ये बेचारे खिलाडी हमें बताते हैं। धन्‍य हैं ये तभी तो इनक शुक्रिया अदा किया।

अब बात पर्दे के सितारों की। आम इनसान की किस भावना को कैसे कैश कराया जा सकता है। कैसे लाखों खर्च करके लोगों से करोडों कमाए जाते हैं, कब किस फिल्‍म को हिट कराने के लिए किसके खिलाफ क्‍या और कितना बोलना है, किस फिल्‍म में क्‍या मसाला डालना है, सब तो करते हैं बेचारे हमारे हीरो, हिरोइन। इनका क्‍या इनके पास पैसे की कमी थोडे है यह तो सिर्फ इसलिए ताकि अखबार छप सकें।

अब बात आतंकियों, नक्‍सलियों अलगाववादियों की। अखबारों में इनका बहुत योगदान है। भले खबर बनाने के लिए इन्‍हें मजलूमों की जान लेनी हो लेकिन ये लेते हैं। भले उन्‍हीं लोगों को मारना पडे जिनके हक की लडाई का ये दावा करते हैं पर ये मारते हैं। ये लाशों पर जश्‍न मनाते हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें। अपने ही देश और अपने ही लोगों पर पत्‍थर, लाठी, गोली, बम बरसाते इन्‍हें कितना कुछ करना पडता होगा यह तो सिर्फ यही जान सकते हैं। मैं तो सिर्फ इनका शुक्रिया अदा करता हूं।
शुक्रिया ठेकेदारों का। मुंबई से मदुरई तक, कश्‍मीर से कटक तक। हर तरफ फैले हैं ये। अरे ठेकेदार मतलब भाषाई, जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय पंचों की बात कर रहा हूं। कब कहां कौन सी भाषा बोली जाए, कपडे पहने जाएं, कौन कहां आए कहां न जाए आदि आदि संविधान के खिलाफ जाकर अगर ये शूरवीर न तय करें तो क्‍या उस दिन अखबार छपेगा भला। कभी नहीं। धरने प्रदर्शन के नाम पर अपनी संपत़ति का नुकसान करना, सडके, रेल जाम करना, फूंकना। कब मंदिर के आगे गाय फिकवानी है कब मसि़जद के आगे वाराह, कब मंदिर के नाम पर आंदोलन शुरू करना है कब मसिजद के नाम पर जिहाद सब यही बेचारे तो करवाते हैं सिर्फ इसलिए ताकि हमें माल मिलता रहे। यह सब इसलिए ताकि हम पत्रकारों की रोजी रोटी चलती रहे। तो क्‍या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम इनका शुक्रिया अदा करें।

कहते हैं कोई भी बात बिना पडोसी की चर्चा के खत्‍म नहीं होती। फिर इस मामले में तो हमारे मुल्‍क और हमारे मुल्‍क के अखबारों की किस्‍मत से तो दूसरी और पहली दुनिया के लोग भी खार खाते हैं। चीन, भूटान, अफागानिस्‍तान हो या धार्मिक सहोदर नेपाल या फिर हमारा ही अंश पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश क्‍या नहीं करते। कहां हमारी जमीन पर कब्‍जा करना है, कब, कैसे, कितने, कहां और किन आयुधों से सुसज्‍जित जिहादी भेजने है इसकी व्‍यवस्‍था करना। कब बातचीत और मुलाकात के आयोजन के साथ ही सीमा पर आतिशबाजी करनी है। कब कब और कहां कहां जिहादियों का मार्गदर्शन करना, उन्‍हें हिदायतें देते रहना कोई आसाना काम है। चोरी करना और फिर सीना जोरी करना, मेरा तो दावा है कि अगर कुछ पडोसी मुल्‍क अपनी जात से बाज आ जाएं तो कितने अखबारों को अपने पेज कम करने पडेंगे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

सच कहूं तो दोस्‍तों इन्‍हीं की वजह से हमारा पालन पोषण हो रहा है। आप यकीन नहीं मानेंगे पर यह सच है कि अगर कहीं कोई ट्रेन बेपटरी होती है, कहीं बम धमाका होता है, कहीं किसी पर जूते फेंके जाते हैं, कहीं करोडों किसी के बिस्‍तर तले निकलता है तो न्‍यूज रूम में जान जाती है, हलचल मच जाती है, लोग सक्रिय हो जाते हैं, कंप्‍यूटर और की बोर्ड की खटखट के अलावा टीवी वाले चीखते चिल्‍लाते एंकरों की आवाजे ही सुनाई पडती है। यूं समझिए की अजीब तरह का उत्‍सवी माहौल। भयंकर।

यह था एक पत्रकार का धन्‍यवाद पत्र तमाम शुभचिंतको के लिए। ऐसा नहीं है कि सब बिकाऊ माल ही देते हैं कुछ ऐसा भी हैं जिनके माल नहीं बिकते, उनकी भी चर्चा कभी जरूर करूंगा। भोर हुई जाती है और नींद चढी आती है। इन दिनों जैसा माल मिल रहा है भगवान करे कि वैसा आगे न मिले इसी उम्‍मीद के साथ शुभ रात्रि।

सोमवार, 5 जुलाई 2010

बंद हो, पर बंद न हो

आज भारत बंद है। मैंने हमेशा विरोध के नाम पर बंद का विरोध किया है। कुछ हद तक आज भी मैं उसी बात पर कायम हूं। कुछ हद तक इसलिए क्योंकि कभी-कभी जब कोई चारा नहीं रह जाता तो जनता को इसे ब्रह्मïस्त्र की तरह इस्तेमाल करना पड़ता है। विरोध-प्रदर्शन जनता का विशेषाधिकार है, जिसका मौलिक अधिकारों की तरह ही संरक्षण होना चाहिए। बंद करने/करवाने वालों को भी चाहिए कि उनका विरोध सृजनात्मक हो, विध्वंसक नहीं। क्योंकि आम आदमी जो सामान्यत: तटस्थ होता है वह विध्वंस का समर्थक नहीं होता। नुकसान चाहे उसका निजी हो या किसी अन्य का। वह भले कुछ न कर सके लेकिन मन ही मन इतना विध्वंसक फौज को कोसता जरूर है। बहरहाल इस मसले पर मत-मतान्तरों के मंथन से ही कुछ दिशा निकलेगी।

रविवार देर रात टीवी चैनल पर एक स्क्रोल चला- महाराष्टर सरकार ने अपने कर्मचारियों को सलाह दी कि वे रविवार देर रात तक या सोमवार तड़के ही ऑफिस पहुंच जाएं ताकि बंद के चलते कामकाज प्रभावित न हो। मेरी जानकारी में यह पहला वाकया है जब सरकार को ऐसी एडवायजरी जारी की है। अब आखिर सरकार को ऐसी क्या जरूरत पड़ गई? महाराष्टर के लिए ही सही इस खबर को देखने से पहले मैं बंद को लेकर लापरवाह था। पहले की तरह जैसे पहले आए दिन बंद होते आए हैं लेकिन इस खबर ने बता दिया कि इस बार मामला गंभीर है। वैसे भी भाजपा और संपूर्ण विपक्ष जिस तरह मूल्यवृद्धि के मसले पर एकजुट है उससे सरकार के पेट में मरोड़ होना लाजिमी है। इस साल के बजट के समय सरकार देख चुकी है एकजुट विपक्ष की ताकत। पता नहीं क्या हो गया है कांग्रेस के मैनेजरों को कि एक के बाद एक ऐसे कारण होते जा रहे हैं कि केंद्र सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है। महंगाई, आईपीएल विवाद, भोपाल गैस त्रासदी, कॉमनवेल्थ गेम्स आदि...आदि और अब पेट्रो मूल्य वृद्धि।

बहरहाल अपना विषय आज कांग्रेस की नहीं विपक्ष है। विपक्ष इसलिए क्योंकि लोकतंत्र में जितना जरूरी सत्ता पक्ष होता है उतना ही विपक्ष। बल्कि मेरा मानना है कि विपक्ष को सत्ता से ज्यादा मजबूत होना चाहिए। सत्ता के पास संख्या और सरकार की शक्ति होती लेकिन विपक्ष की ताकत उसकी एकजुटता और उसके साथ खड़ी जनता होती है। कमजोर विपक्ष से हमेशा लोकतंत्र कमजोर हुआ है। इतिहास गवाह है कि जब-जब विपक्ष कमजोर रहा तब-तब लोकतंत्र कमजोर हुआ है। और दुर्भाग्य से इस समय देश में यही हाल है। छह साल सत्ता का सुख ले चुकी भाजपा के नेता अलसा से गए हैं। ऐसे विरोध-प्रदर्शन के जरिए ही वो सक्रिय हो सकते हैं। खैर बंद विपक्ष की मजबूरी भी है। उसे खुद को साबित भी करना है।

खबर आई तो पता चला कि स्वास्थ्य सेवाएं और रोजमर्रा की चीजों को बंद से अलग रखा गया है। स्कूल-कॉलेज बंद रहेंगे लेकिन चैनलों ओर अखबारों के दफ्तर खुलेंगे। हो सकता है कि बंद के दौरान कुछ लोग स्वभावगत हरकतें करें तो ऐसे लोगों से बचे रहिए और शाम होने का इंतजार करिए। वैसे मनमोहन जी आप मैडम को बताइएगा कि हम इंतजार कर रहे हैं महंगाई थमने का। बंद समर्थकों से अपील है कि बंद सार्थक हो और सरकार से उम्मीद है कि यही बंद आखिरी हो।

शुक्रवार, 25 जून 2010

ये जो एवरेडी है न.....

भोपाल त्रासदी पर बहुत हो हल्ला है। रोज नए खुलासे, नए दावे, दावों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और इन सब के बीच सरकार का वही पुराना काम.... अरे भाई जख्म को कुरेद का मलहम लगाने का। सो असली मुद्दे से जनता को फिर भटका कर कुछ लाख के मुआवजे का नमक छिड़क दिया। पर एक मसला अभी नहीं सुलझ रहा कि आखिर यूनियन कार्बाइड 2-3 दिसंबर 1984 के बाद गई कहां? आसमान खा गया या जमींदोज हो गई। आज उसका नाम कोई लेना ही नहीं चाह रहा। मैं आपसे कुछ शेयर करता हूं अब तय आप करिए कि यूका गई कहां?

डाऊ ने तो सप्रमाण झाड़ा पल्ला

यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) का अधिग्रहण करने वाली अमेरिकी कंपनी डाउ केमिकल्स ने दावा किया है कि यूसीसी की भारतीय हिस्सेदारी यूनियन कार्बाइड इंडिया लि. (यूसीआईएल) से उसका लेना-देना नहीं। यूसीआईएल एवररेडी इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के नाम से भारत में काम कर रही है। यूका में यूसीसी के 50.9 फीसदी और 49 फीसदी शेयर भारत सरकार के थे। हादसे के बाद कंपनी भारत में बंद हो गई। डाऊ का कहना है कि यूसीसी भोपाल इकाई से हमारा लेना-देना नहीं। यूसीसी ने १९९४ में ही यूसीआईएल की ५०.९ फीसदी हिस्सेदारी मैक लियोड रसेल इंडिया को बेच दिया था जो विलियमसन मेगर समूह का हिस्सा था। स्कॉट के मुताबिक भारत सरकार ने 1984 की त्रासद औद्योगिक दुर्घटना के मामले में यूसीसी और उसकी सहायक भारतीय कंपनी को एक समझौते के तहत मुआवजे के दायित्व से पूरी तरह मुक्त कर दिया। यूनियन कार्बाइड के भोपाल संयंत्र का स्वामित्व डाऊ के हाथ में नहीं। यूसीसी अलग कंपनी है, जिसका अलग निदेशक मंडल और अलग खाते तथा कर्मचारी हैं।

अब यूसीसी की भी दलील सुनिए

हादसे के समय यूसीआईएल में 50.9 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली यूसीसी के मुताबिक उसने और यूसीआईएल के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एंडरसन ने पीडि़तों की सहायता पूरी जिम्मेदारी से की। मुआवजा सहित सभी देनदारियां 18 साल पहले ही पूरी हो चुकी हैं और सुप्रीम कोर्ट से मंजूर भी। यूसीआईएल का आधा हिस्सा भारतीय वित्तीय संस्थानों और निजी निवेशकों के थे। 1994 में यूसीसी ने यूसीआईएल की हिस्सेदारी मैकलियोड रसेल ग्रुप (विलियमसन मेगर) कोलकाता को बेच दी। बाद में यह कंपनी एवरेडी बनी। हादसे के बाद यूसीआईएल ने भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार प्लांट की सफाई शुरू की। 1994 के बाद इसे एवरेडी ने जारी रखा लेकिन 1998 में प्लांट साइट को राज्य सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया इससे वहां काम बंद हो गया।

यूका है एवरेडी पर जिम्मेदारी नहीं

1994 में यूसीसी ने यूसीआईएल में अपनी ५०.९ फीसदी हिस्सेदारी भारतीय कंपनी विलियमसन मेगर गु्रप को बेच दी। बाद में यूसीआईएल का नाम बदलकर एवरेडी इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड (ईआईआईएल) हो गया, जो अब भी भारत में बैटरी, सीएफएल आदि का निर्माण और व्यापार कर रही है। हादसे के समय यूका यूसीसी के स्वामित्व की थी। एवरेडी का कहना है कि हम सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक बैटरियां और अन्य उपभोक्तापयोगी सामान बनाते हैं। हमारा कीटनाशकों के उत्पादन और विपणन से लेना देना नहीं जो यूका करती थी। भोपाल प्लांट पर भी मप्र सरकार का आधिपत्य है। एवरेडी खेतान परिवार के आधिपत्य में है।
तो आप समझे ये जो एवरेडी है........
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(courtesy Mayur Dubey ji)

http://en.wikipedia.org/wiki/Eveready_Industries
http://www.bhopal.com/ucs.htm
http://en.wikipedia.org/wiki/Bhopal_disaster
http://www.london.edu/assets/documents/facultyandresearch/Freek_Vermeulen_Union_Carbide_case.pdf
http://www.evereadyindustries.com/pressroom/information-bhopal.asp
http://www.ndtv.com/article/india/no-question-of-supporting-dow-kamal-nath-33058

मंगलवार, 15 जून 2010

राजनीतिक प्रलाप और घडियाली विलाप नहीं, कार्रवाई करो सरकार

1984 में मैं बहुत छोटा था इसलिए 2-3 दिसंबर की रात भोपाल में क्‍या हुआ उसे सिर्फ किताबों में पढकर और कुछ लोगों से सुनकर ही जान सका। नौकरी के सिलसिले में पिछले 4-5 साल से भोपाल और इंदौर में हूं। इस दौरान उस काली रात के बारे में जो कुछ भी सुना वह 7 जून को आए फैसले और उसके बाद नेताओं, अफसरों और जिम्‍मेदारों की काली करतूतों के आगे कुछ कम ही लगता है। अब जब कि परत दर परत खुल रही है, तब मेरे जैसे देश के करोडो लोग अवाक हैं। किसी को यह नहीं समझ आ रहा कि एक गैरजमानती आरोपी को देश से ससम्‍मान किसने और कैसे जाने दिया।
हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार वारे एंडरसन अगर आज कानून की पहुंच से बाहर है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? कौन है जिसने अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभाई और किन लोगों के कारण भोपाल के हजारों पीडि़तों को आज तक इंसाफ नहीं मिल सका है। मेरे जैसे आम आदमी की सरकार और सरकारों से गुजारिश है कि वह राजनीतिक प्रलाप और घडियाली विलाप बंद करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे।

क्‍या ये सह आरोपी नहीं

मोती सिंह, तत्कालीन कलेक्टर
जिम्मेदारी: जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का नियंत्रण। कानून-व्यवस्था बनाए रखना। जिला पुलिस को निर्देशित और नियंत्रित करना। जिले में सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी। किसी असामान्य घटना घटित होने पर नागरिक प्रशासन की सहायतार्थ सशष्त्र बल बुलाना। कुछ मामलों में दंडाधिकारी।
तब किया क्या: बकौल सिंह, मुझे 7 दिसंबर 84 को अर्जुन सिंह ने सुबह बुलाकर कहा, एंडरसन एयरपोर्ट पर आने वाला है। मैं एयरपोर्ट पहुंचा विमान उतर चुका था। एंडरसन को गिरफ्तार कर श्यामला हिल गेस्ट हाउस ले जाया गया। बाद में उसे जमानत दी गई। शाम चार बजे मैं और एसपी पुरी उसे लेकर एयरपोर्ट रवाना हुए। वहां सरकारी विमान तैयार था, जिससे वह दिल्ली चला गया।
अब कहा क्या: 9 जून 2010 को कहा, वारेन को भगाने के पीछे सरकार का हाथ था। मुझे तत्कालीन मुख्य सचिव ब्रह्मस्वरूप ने उसे रिहा करने को कहा था। उन्हें ऊपर से आदेश मिला था।
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स्वराजपुरी, तत्कालीन एसपी
जिम्मेदारी: कानून-व्यवस्था में कलेक्टर की मदद करना और उनके निर्देशों का अनुपालन करना। जिले में पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी।
तब किया क्या: कलेक्टर मोती सिंह के साथ एंडरसन को गिरफ्तार किया और उसे जमानत दी। उसे हवाईअड्डे तक छोडऩे गए।
अब कहा क्या: स्वराजपुरी ने फैसला आने के बाद अब तक कोई बयान नहीं दिया है।
इसलिए कठघरे में
कर्तव्य पालन में लापरवाही। पद का दुरुपयोग, दबाव में आकर गलत और विधि विरुद्ध कार्य, अधीनस्थ को गलत कार्य के लिए निर्देशित करना, आरोपी की मदद।
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ब्रह्मस्वरूप, तत्कालीन चीफ सेके्रटरी
जिम्मेदारी: मुख्यमंत्री के सलाहकार, प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख। सरकार और प्रशासन के बीच प्रमुख समन्वयक। संकटकालीन स्थिति में प्रशासक। पूरे रा'य, सचिवालय को नियंत्रित कर रा'य का संचालन। अपनी सरकार और केंद्र के बीच संपर्क और संवाद का माध्यम। कानून-व्यवस्था तथा नियोजन से जुड़े मसलों में महत्वपूर्ण भूमिका।
तब किया क्या: बकौल मोती सिंह स्वरूप ने उन्हें और स्वराज पुरी को एंडरसन को गिरफ्तार करने फिर उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। सरकारी विमान की व्यवस्था कराई।
अब कहा क्या: ब्रह्मस्वरूप का निधन हो गया है।
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सुरेंद्रसिंह ठाकुर, तत्कालीन थाना प्रभारी हनुमानगंज

जिम्मेदारी: थाना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था का जिम्मेदार, अधिकार क्षेत्र के आपराधिक मामलों की जांच, उनकी चार्जशीट दायर करना, आरोपियों के खिलाफ सुबूत जुटाकर केस मजबूत करना।
तब किया क्या: एंडरसन को जमानत पर रिहा किया।
अब कहा क्या: ठाकुर फिलहाल सागर के अजाक में बतौर एएसपी पपदस्थ हैं लेकिन फैसला आने के बाद से ही वे अवकाश पर हैं और अब तक उनकी कोई जानकारी नहीं है।
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अर्जुन सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री

रा'य सरकार के मुखिया।
तब बोले: एंडरसन को वापस भेजने का फैसला पूरी तरह से मेरा है। केंद्र को कोई दबाव नहीं था। उसे भोपाल से बाहर इसलिए भेजा गया क्योंकि उसके रहने से हालात बिगड़ सकते थे।
अब बोले: मीडिया में आ रही खबरें गलत हैं। समय आने पर सच बोलूंगा।

इन सवालों का जवाब कौन देगा
- किसके आदेश से एंडरसन को जमानत?
- गलत जमानत देने वाले अफसरों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
- यह बयान क्यों दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एंडरसन को भोपाल से हटाया गया?
- क्या तत्कालीन केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री का दबाव था?
- एंडरसन को दिल्ली जाने के लिए सरकारी विमान किसके आदेश से दिया गया?
- एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए क्या प्रयास किए?
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बीआर लाल, तत्कालीन संयुक्त निदेशक, सीबीआई
अप्रैल 1994 से जुलाई 1995 तक जांच प्रभारी.
जिम्मेदारी थी: मामले की निष्पक्ष जांच करना और एंडरसन के खिलाफ मजबूत केस बनाना। पुख्ता सबूत जुटाना। कोर्ट के जरिए एंडरसन के प्रत्यपर्णण का प्रयास।
अब बोले: 9 जून 2010 को कहा- मामले की जांच के दौरान भारी दबाव था। हमें विदेश मंत्रालय से मजबूर किया गया था कि एंडरसन के प्रत्यर्पण के मामले को आगे न बढ़ाया जाए। जांच कुछ अधिकारियों के निर्देश पर चली।
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राजीव गांधी, तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं केंद्र सरकार
जिम्मेदारी: देश के मुखिया।
उठते सवाल
- क्या तत्कालीन केंद्र सरकार को भोपाल में हुए घटनाक्रम की जानकारी नहीं थी? अगर थी तो केंद्र ने क्या हस्तक्षेप किया? नहीं किया तो क्यों?
- क्या एंडरसन को देश से बाहर जाने देने के लिए केवल रा'य सरकार जिम्मेदार है?
- अगर रा'य सरकार जिम्मेदार है तो केंद्र ने उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की?
- क्या सुप्रीमकोर्ट द्वारा धारा कमजोर होने पर सीबीआई ने दोबारा याचिका दाखिल की?
- कांग्रेस और गांधी परिवार पर हमेशा विदेशी गुनहगारों और सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप क्‍यों लगते हैं। 1984 दंगा, क्‍वात्रोचची मामला, और अब ये भी।
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शिवराज सिंह चौहान, वर्तमान मुख्यमंत्री

- फैसला आने के बाद बयान दे रहे अधिकारियों को क्या सरकार कानूनी दायरे में लाकर सच सामने लाएगी और दोषियों को सजा दिलाएगी?
- अर्जुन सिंह के खिलाफ क्या मामला दर्ज कर क्या उन्हें एंडरसन की रिहाई के बारे में बताने के लिए कठघरे में खड़ा किया जाएगा?

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इसलिए कठघरे में
कर्तव्य पालन में लापरवाही। पद का दुरुपयोग, दबाव में आकर गलत और विधि विरुद्ध कार्य, अधीनस्थ को गलत कार्य के लिए निर्देशित करना, आरोपी की मदद।
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अभी तक के घटनाक्रम से यह तो स्पष्ट हो गया है कि एंडरसन के देश से निकल जाने में नेताओं के साथ ही नीचे से ऊपर तक के सभी अफसर भी जांच के घेरे में आते हैं।
इस मसले को लेकर मैंने अपने अखबार पत्रिका के लिए देश के वरिष्‍ठ कानूनविदों से यह जानने की कोशिश की कि क्‍या एंडरसन को भगाने और उसे बचाने के मामले में तत्‍कालीन अफसर और नेता कानून के घेरे में आते हैं, सब का एक स्‍वर में जवाब था जी हां। तत्कालीन थानाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक कानून के घेरे में आते हैं, क्योंकि उसके खिलाफ गैरजमानती धाराएं लगी थीं, जिसमें जमानत कोर्ट से ही दी जा सकती है लेकिन उसे श्यामला हिल गेस्ट हाउस से एयरपोर्ट तक गेस्‍ट की तरह ले जाया गया। अगर अधिकारियों ने दबाव में ऐसा किया है तो यह भी कानून विरुद्ध है और उन पर दबाव डाला गया तो यह भी गैरकानूनी है।

क्‍या कहते हैं विधि विशेषज्ञ
'जो भी हुआ गलत था। तत्कालीन अफसरों और सरकार दोनों ने गलत किया। अफसरों ने कानून विरुद्ध कार्य किया, अपनी ड्यूटी निभाने में लापरवाही की और दबाव में कार्य किया। दूसरी ओर अगर अफसरों के बयान सही हैं तो उन पर दबाव बनाने वाले भी उतने ही जिम्मेदार है। मुख्यमंत्री हो या प्रधानमंत्री सब कानून से बंधे हैं। राज्य सरकार जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कर सकती है।
- प्रशांत भूषण, वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
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'तत्कालीन सीएम अजुर्नसिंह, एसपी स्वराजपुरी और सभी जिम्मेदार अफसरों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान द्वारा बनाई गई जांच कमेटी मामले को लंबित करने का प्रयास है। गैस त्रासदी की जांच तो सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज से कराना चाहिए। वह भी समयसीमा तय करके। दोषी पाए जाने पर थाना प्रभारी से मुख्यमंत्री तक को सह आरोपी बनाना चाहिए। एक आरोपी को भगाना गंभीर मामला है, फिर यह काम चाहे मुख्यमंत्री ने ही क्यों न किया हो। आरोपी वे भी हैं। हत्या के साक्ष्य मिटाने के आरोप में विधायक कमल पटेल को गिरफ्तार किया जा सकता है, तो गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी को भगाने में सहयोग करने वालों को कैसे छोड़ा जा सकता है।
- जस्टिस पीडी मूल्ये, रिटायर्ड जज
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'जांच इस बात की जांच होना चाहिए कि यूनियन कार्बाइड से तत्कालीन सीएम अर्जुनसिंह के साथ अफसरों को क्या फायदा हुआ। जिस समय मामला चल रहा था, तब यूनियन कार्बाइड ने कहां-कहां पैसा बांटा। दोषी पाए जाने पर दोषियों के खिलाफ भ्रष्टïाचार का मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
- जस्टिस वीएस कोकजे, रिटायर्ड जज
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'सारे अफसर झूठ बोल रहे हैं। यह सब प्री प्लांड है। इनके झूठ का सच सामने आना चाहिए और राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि उनके खिलाफ कार्रवाई करे।
- केसी मित्तल, राष्‍ट्रीय सचिव लीगल सेल कांग्रेस
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'इसमें टीआई से मुख्यमंत्री सब दोषी दिखते हैं। सबके खिलाफ मामला दर्जकर कोर्ट में खड़ा करना चाहिए। नेता खुद केस कमजोर कर न्यायपालिका पर दोष मढ़ रहे हैं। कोर्ट सबूतों के आधार पर कार्रवाई करती है। मामला अदालत की अवमानना का भी है।
- पीके शुक्ल, अध्यक्ष हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, इंदौर
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'धारा गैरजमानती नहीं थी। ऊपर से अगर केस सीबीआई को दे दिया गया था तो थाने से जमानत का सवाल ही नहीं उठता। इस मामले में जांच अधिकारी से लेकर ऊपर तक सभी घेरे जा सकते हैं।
- अनिल खरे, अध्यक्ष हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जबलपुर
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'गैर जमानती मामले में जमानत देने पर जांच आधिकारी से लेकर उस पर दबाव बनाने वाले सब दोषी हैं। 26 साल बाद इन लोगों को क्यों याद आ रहा है? इन लोगों ने कोर्ट में यह सब सच क्यों नहीं बोला? इसके खिलाफ डयूटी सही तरीके से न करने, दबाव में काम करने, सबूत गायब करने और आरोपी की मदद करने का मामला बन सकता है।
- मनीष दत्त, एडवोकेट हाईकोर्ट, जबलपुर
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मामला पूरी तरह स्पष्ट है। जिस तरह के परिस्थितिजन्य साक्ष्य सामने आ रहे हैं, उसके बाद किसी भी तरह की जांच की जरूरत ही नहीं है। अब जिम्मेदारी राज्य सरकार की है कि वह तत्कालीन मुख्यमंत्री सहित सभी जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ एफआईआर करे। इसके बाद जांच में सारी स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी। मामला आईने की तरह साफ है। सरकार यदि कदम नहीं उठाती तो आम आदमी भी सीधे कोर्ट जा सकता है।
- मनोहर दलाल, वरिष्ठ अधिवक्ता, इंदौर
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मूल खबर के लिए पढें, पत्रिका इंदौर संस्‍करण का 15-06-2010 ई पेपर। http://epaper.patrika.com/final/flipbook.php?edition=Indore

(अगर कानून का कम ज्ञान होने से मैंने कुछ गलत लिख दिया हो तो कृपया मेरी गलती जरूर सुधारें।)

सोमवार, 10 मई 2010

आकाश सी छाई

अभी मैं छुटटी पर हूं। मेरे भाई ने एक छोटी सी कविता लिखी है उसे आपके जानिब पेश कर रहा हूं।
तुम्‍हीं तो मिलती हो

धरती से बिछी हो तुम।
जब जब याद करूं
सपनों में मिली हो
तुम तस्‍वीरों से निकलकर
तुम जब रुक रुककर बाहर आती
तस्‍वीरें तो अब भी हंसती पर
मेरी पलकें भर जातीं।
दीवरों पर लगी जो तस्‍वीरें
जब नजर पडे मालों पर
अब भी आंसू लुढककर आते
मेरे दोनों गालों पर
हो बारिश की बूंदों जैसी
आंगन में बिखरी तुम अब भी
जब मैं घर जाऊं तो हंसती दिखती तुम।
अब भी हैं बचपन की यादें याद हमारे संपनों की
अब भी मिलती है डांट तुम्‍हारी
जो कहीं गलत पथ पर जाऊं।
जब कहीं दूर तक चलता जाऊं तुम्‍हीं तो मिलती हो जब खुद को अकेला मैं पाऊं
तो तुम्‍हीं तो मिलती हो।।

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

शहीदों के शव पर जश्न... यही है माओवाद?

त दिनों छत्तीसगढ़ में हुए देश के सबसे भीषण नक्सली हमले के बाद से देश भर में कई सवाल उठ रहे हैं? मेरे मन भी। क्या नक्सली सही कर रहे हैं या क्या नक्सलियों के साथ गलत हो रहा है? ऐसी नौबत ही क्यों आई कि सरकार को अपने ही नागरिकों पर बंदूक चलानी पड़ रही है? कहां चूक हुई है? नक्सलियों के मन में अपने ही देश और अपने ही संविधान के प्रति इतना रोष क्यों है? हमले के बाद खबर को लेकर मेरी कई लोगों से बात हुई। कुछ आला पुलिस अफसरों, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं, कुछ विद्यार्थियों, कुछ प्रोफेशन्लस, कुछ विद्रोहियों से भी जिन्होंने हथियार तो नहीं उठाए हैं लेकिन हथियार उठने को गलत नहीं मानते, ऐसे लोगों से भी जो नक्सलियों को सही मानते हैं लेकिन उनके तरीके गलत। सब के अपने तर्क थे। सब अपनी बात को सही ठहराना चाहते हैं। मैं कई दिन से कुछ कहने की कोशिश कर रहा था लेकिन कह नहीं पा रहा था। लेकिन आज मुझे एक खबर ने अंदर से झकझोर दिया। पहले वह बता दूं फिर कुछ और।
शहीदों के शव पर जश्न... यही है माओवाद?
मु
झे पता चला कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जिसे हम जेएनयू के नाम से जानते हैं वहां दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार वाली रात को जश्र मनाया गया। (http://timesofindia.indiatimes.com/india/Pitched-battle-over-peoples-war-at-JNU/articleshow/5783093.cms) (http://www.ndtv.com/news/india/dantewada-aftershocks-at-jnu-19754.php) जिन लोगों ने जश्र मनाया उन्हें जवानों के मारे जाने की खुशी थी। उस जश्र में शामिल कभी मेरे सहपाठी के जरिये मुझे पता चला कि जश्र में जमकर धूम मची। शहीदों के शव पर जश्न वाह रे देश के सबसे अच्छे विवि में पढऩे वाले देश के महान लोगों.............. यह वो पहली खबर थी जिसने मुझे झकझोर दिया। यह खबर मुझे दिल्ली में ही रहने वाले एक दूसरे सहपाठी से पता चली।  मुझे झटका लगा कि हम तो दुश्मन के घर पर भी मातम होने पर दुखी होते हैं पर ये...................कैसे लोग हैं जो हमारे ही जवानों की शहादत का जश्र मना रहे हैं।यह कम से कम भारतीय नहीं हो सकते।
पढ़ाई के पैसे से बंदूक, यही है दलित होना?
दू
सरी खबर हमारे एक सहपाठी की जो दिल्ली से पीएचडी कर रहा है। बीए से एमए फाइनल तक मैं उसे सिर्फ नाम से जानता था। एमम में पता चला कि वह अनुसूचित जाति का है। उसे सरकारी वजीफा मिलाता था। अभी उसे पीएचडी के लिए भी स्कॉलरशिप मिल रही है। और वो भाई साहब खुद को दलित बताकर वंचित होने का दावा करते हैं और कॉमरेड बनकर नक्सलियों को हर महीने पांच हजार रुपए चंदा देते हैं। यह वही पैसे है जो भारत सरकार जनता से कर वसूलकर उन्हें पीएचडी करने के लिए दे रही है।
क्या सरकार सिर्फ धमाकों से जागती है?
खै
र यह दो घटनाएं जो पूर्णत: सत्य हैं। उनके कारण मैं आज लिख रहा हूं और शुरुआत उन साथियों की बात से जिन्होंने नक्सलियों को सही ठहराया। उनका कहना था कि आदिवासियों के साथ गलत होता आया है। उनको उनके हक से वंचित रखा गया है। हम उनकी लड़ाई में उनके साथ हैं। उनका कहना था कि यह लड़ाई सिर्फ बंदूक से ही लड़ी जा सकती है। वे अपने आदर्श के रूप में भगत सिंह का नाम लेते हैं। पता नहीं भगत सिंह से क्या सीखा है इन लोगों ने? हिंसा से समस्या हल होगी या नहीं उन्हें इससे मतलब नहीं उन्हें तो बस संघर्ष करना है। उनका सपना है संघर्ष से सत्ता पलटने का। पर सत्ता पलटनी क्यों है इसका जवाब उनके पास नहीं। उनका कहना है कि गोली के बल पर हम वंचितों को उनका हक दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार सो रही है, उसको जगाने के लिए यह करना जरूरी है।
वो नहीं चाहते कि आदिवासियों हित
तने दिन मैं माओवाद और नक्सलियों से जुड़े साहित्य की तलाश में रहा और कुछ पढ़ा जाना भी। उन लोगों से बात करके। जो थोड़ा बहुत जान पाया उसका लब्बोलुबाब यह है कि नक्सली संघर्ष करना चाहते हैं पर क्यों, किससे, कब तक पता नहीं। वो इस बारे में कोई बहस नहीं चाहते। वो बात करने को भी तैयार नहीं। उन्हें लगता है कि वे जो कर रहे हैं वही सही है। मैं भी उनकी कुछ बातों से सहमत हूं लेकिन पूरी तरह नहीं। वो हथियार छोडऩे को तैयार नहीं है। वे सत्ता पलटना चाहते हैं लेकिन जिम्मेदारी लेकर राजनीति में आने को तैयार नहीं है। अगर उन्हें जिम्मेदारी मिल भी जाती है तो भागते हैं। मैंने जब नेपाल के सत्ता पलट का उदाहरण दिया तो वे संघर्ष को सपना बताने लगे। जो व्यक्ति जिम्मेदारी नहीं ले सकता है वह तो कायर ही कहा जाएगा न। और मुझे नहीं लगता गरीब, अनपढ़, वंचितों को बंदूक थमाना किसी समस्या का हल है। कुछ करना ही था तो उन्हें कलम थमाते जिससे उनके जीवन में उजाला फैलता। लेकिन नहीं कलम थमानी तो दूर उनके स्कूलों को बम से उड़ाया जा रहा है। रही रोशनी की बात तो नक्सली तो चाहते हैं कि वे अंधेरे में रहें ताकि उनको मोहरा बनाकर आप अपनी बर्बर इच्छा को परवान चढ़ा सकें।
लालकिले पर लाल झंडा तो कभी नहीं फहरेगा
खै
र माओ को दिल्ली का मेयर बनाने का सपना देखने वाले और कर भी क्या सकते हैं? भगत सिंह को अपना आदर्श बताने वाले माओवादी जो लालकिले पर लाल झंडा लहराने का कभी न पूरा होने वाला सपना देख रहे हैं वे भूल गए कि शहीद ए आजम ने इसी तिरंगे के लिए खुद को कुर्बान कर दिया था। अपने कुत्सित कुकर्म को पूरा सही ठहराने के लिए कम से कम उस हुत्आत्म का नाम तो न लो। तुम्हारे पास तो माओ, प्रचंड जैसे महान नेता हैं न प्रेरणा देने के लिए? वो जान लें कि लालकिले पर सिर्फ तिरंगा ही फहरेगा।
देश के खिलाफ युद्ध है यह
दं
तेवाड़ा के बाद देश में नक्सलियों के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है। कुछ ऐसे प्रोफेशनल और किसान जिन्हें नक्सलवाद की एबीसीडी नहीं पाता और जो मेरे परिचित हैं उन्होंने बात- बात में मुझसे पूछा कि आखिर यह बला क्या है? कुछ को इतना पता था कि नक्सली आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन अपने ही जवानों को मारने वालों पर उनका विश्वास नहीं है। कुछ ने कहा कि नक्सलियों को सेना लगाकर साफ कर देना चाहिए और कुछ कहते हैं बातचीत करनी चाहिए। हालांकि इस बात से किसी को इनकार नहीं कि वाजिब हक तो सबको मिलना चाहिए, लेकिन नक्सलियों के तरीके को कोई सही नहीं मान रहा। मैं उन महान बुद्धिजीवियों की बात नहीं कर रहा जो भोलेभाले वनवासी वंधुओं को गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं। ऐसे करोड़पति बुद्धिजीवी बड़े बड़े पदों पर बैठकर हजारों रुपए नक्सलियों को हथियार खरीदकर आदिवासियों को देने के लिए तो देते हैं लेकिन उनका वास्तविक हित हो इसकी उन्हें चिंता नहीं।  मप्र के एक आला पुलिस अधिकारी ने कहा, नक्सली समस्या से निपटना है तो पहले इन कथित महान बुद्धिजीवियों और छद्म उदारवादियों पर लगाम लगाना होगी। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि जिन क्षेत्रों में विकास कार्य नहीं हुआ है वहीं यह समस्या है लेकिन उन्होंने साफ कहा कि नक्सली बात नहीं करेंगे। क्येांकि उनका कोई एजेंडा नहीं सिवाय देश के खिलाफ युद्ध के।
तो मैं भी नक्सली हूं.............
गर गरीबों, वंचितों की लड़ाई और उनको उनका हक दिलाना नक्सलिजम है तो मैं भी नक्सली हूं लेकिन अगर उनका आधा पेट खाना छीनकर उन्हें हथियार चलाने के बदले रोटी देना नक्सलवाद है तो मैं घृणा करता हूं ऐसे नक्सलियों से और लानत देता हूं उन लोगों पर।
गर 65 साल से हमारे हक पर कुंडली मारकर बैठे नेताओं और अफसरों के खिलाफ आवाज उठाना और लडऩा नक्सलवाद है तो मैं भी हूं नक्सली लेकिन अगर गरीबों, किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों और गांव के पिछड़े परिवारों से आए पुलिस, अद्धसैनिक बलों के जवाानों की हत्या करना और आधुनिक हथियारों से लैस पुलिस के जवानों के सामने निरीह भूखे आदिवासियों को मरने- मारने के लिए भेजना नक्सलवाद है तो मैं तो मैं घृणा करता हूं ऐसे नक्सलवाद से।

जरा सोचिए
मैं
मानता हूं जंगलों में रह रहे आदिवासियों या गावों में रह रहे गरीबों को आजादी के बाद भी उनका हक नहीं मिला। जो इसके लिए जिम्मेदार थे उनकी जेबें भरती गर्ई और आज भी जारी है? लेकिन हक हिंसा से नहीं मिलता। और देश गोली से नहीं चलता। हमारे पास बैलेट की ताकत है। देश और समाज को बदला जा सकता है। लेकिन उसके लिए जिम्मेदारी लेकर आगे आना होगा। जंगलों में छिपकर मजलूमों को आगे कर हिंसा नहीं करनी होगी।
देश की रक्षा के लिए सेना, पुलिस में भर्ती हुए गरीबों की हत्या करना और उनके सामने उन्हंीं के भाईयों को मरने के लिए भेजना किसके हक की लड़ाई है? गोली चाहे इधर से चले या उधर से मरता गरीब है, मरता वंचित है। अगर जंगल में रह रहे आदिवासी गरीब हैं तो यह जवान भी गरीब है।
र्ग भेद मिटाने की बात करने वाले नक्सली क्या एक और वर्ग संघर्ष की शुरुआत नहीं कर रहे हैं? हम भूले नहीं हैं बिहार के बाथे में हुआ नरसंहार नक्सलियों के जवाब में एक हिंसक दिमाग की उपज ने दर्जनों लोगों को खून बहाया। अगर ऐसा फिर शुरू हो गया तो?
मारी विचारधारा चाहे जो हो, धर्म चाहे जो, जाति चाहे जो लेकिन सबसे पहले हम भारतीय हैं। अगर भारत ही नहीं रहा तो विचार और विचारधारा का क्या होगा? हमने सनकी विचारधाराओं की बाढ़ में मुल्कों को बरबाद होते देखा है। हिंसा चाहे जैसी हो, जहां हो और जब भी हो गलत होती है। नक्सली हिंसा और आतंक 1984 और गुजारत के दंगे से कम कू्रर और अमानवीय है? अगर ऐसा चलता रहा तो हमपर बुरी नजर गड़ाए बैठे पड़ोसी मुल्कों को कुछ करने की जरूरत ही नहीं होगी। .......... जरा सोचिए।

चलते -चलते
 
मैं इसलिए लिख रहा हूं कि मैं चाहता हूं कि अगर मेरी सोच में मेरे विचारों में कोई खामी हो या नक्सली जो कर रहे हैं वह सही हो तो मैं जानूं। अगर ऐसा हुआ तो मैं खुद को बदलूंगा।
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यह एक बेनामी कमेंट जो मेरे लेख पर आया। पुराने लेख में कुछ गलतियां रह गईं थी उनमें सुधार कर इसे नए सिरे से दे रहा हूं। और यह उस बेनामी कमेंट भेजने वाले साथी को मेरा जवाब।
बेनामी ने कहा…बकवाद लिखने से पहले दिमाग का भी इस्तेमाल कर लिया करिए। नक्सलवाद और साम्प्रदायिकता, फासीवाद के अलग-अलग मायने हैं। जो शहर में इंटरनेट पर बैठकर नक्सलवाद के खिलाफ उह-आह करते हैं,उन्हें इतना तो सोच लेना चाहिए कि वहां न बिजली है, न पानी है इटरनेट और टीवी तो जाने किस दुनिया की बात। उनका हक मार कर भकोसने वाले इसी तरह की बातें बोलते हैं। शर्म आनी चाहिए कि पूंजीवादी पार्टियों के भीतर बैठे लोगों का एक धड़ा भी लड़ाई के इस पक्ष से मुतमइन है कि नक्सलवाद तभी मिटाया जा सकता है, जब अरबों की योजनाएं उन लोगों तक पहुंचें, जो लड़ने को मजबूर हैं। १७ अप्रैल २०१० ६:३७ AM  

pradeep ने कहा… मायने चाहे जो हों नतीजा आतंक है। अलगाव है। संघर्ष है। और हां हमने यह दिमाग से नहीं दिल से लिखा है। दिमाग तो आप लोगों के पास है। अगर आपके पास भी दिल होता तो कम से कम निर्दोषों के खून से अपने हाथ न रंगते और न ही शहीदों के शव पर जश्र मंनाते। रही बात शहर में बैठकर इंटरनेट पर आह- उह करने की तो साथी वही आप भी कर रहे हैं। फर्क इतना है हम जो कह रहे हैं वह खुलकर आप जो कह रहे हैं वह छिपकर। अगर आप सही हैं तो छिपकर क्यों कहा? सामने आते शायद हम भी आपसे कुछ सीखते? रही बात अरबों की योजनाएं वहां तक जाने की तो जनाब जब तक आप गोली में बारुद भरते रहेंगे ऐसा नहीं होने वाला। चेहरे से नकाब हटाकर सामने आइए और चलिए दिल्ली संघर्ष करने हम भी होंगे आपके साथ वादा रहा लेकिन चेहरा छिपाकर नहींं और बंदूक के निशाने पर नहीं। १७ अप्रैल २०१० १:५३ PM

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

जय-जय-जयराम- गुलामी के कलंकों को धो डालें

कुछ लिखने को मैं कई दिन से सोच रहा था। मुद्दे भी थे। मेरी रुचि के थे। अरे भाई रुचि बोले तो अमिताभ, मोदी, राहुल बाबा, सोनिया मैडम, हैदराबाद, माया मेमसाब, अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा कानून, लालू यादव को राहत आदि, आदि, अनादि....। पर दिक्कत यह थी कि सिर्फ सोच रहा था। कर अपने मध्यप्रदेश में एक वाकया हुआ जिसने में लिखने को उकसाया लेकिन फिर वही आज करे सो काल कर, कार करै सो परसो.... पर लगा रहा। सो नहीं हो पाया। अब दोपहर में इलाहाबाद वाले गिरिजेश भईया का फोन आया तो मुझे लगा चलो हम भी कुछ लिख लें। गिरिजेश भईया और उनके बारे में फिर कभी बताएंगे अभी तो आप यह सुनिए कि समय किसका आ गया है।

दरअसल हुआ यूं कि कल भोपाल में भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के दीक्षांत अवसर पर जयराम रमेश जी ने गजब ही कर दिया। खुद चीफ गेस्ट थे और जैसे ही दीक्षांत उद्बोधन देने पहुंचे अपना गाउन यह कहते हुए निकाल फेंका कि यह बर्बर है, सामंती है अब तो इससे मुक्त हो। उनक यह कदम साहसिक है और मौजूं भी। चिरकाल से संघी गिरिजेश भइया जब फोनकर के जय-जय जयराम करने लगे पहले तो मैं चौंका लेकिन फिर मुझे रात को बनाई खबर याद आ गई। सच में अब समय आ गया है कि इन सामंती प्रतीकों को उतार फेंका जाए। परंपरा के नाम चले आ रहे इन नियमों को ढोने की जरूरत अब नहीं रही। हम आजाद हैं यह हमारे संस्कारों, परंपराओं से भी दिखना चाहिए। देर से ही सही अगर इसकी शुरुआत हो रही है तो हमें इसका समर्थन करना चाहिए। न केवल दीक्षांत गाउन बल्कि अदालतों में वकीलों और जजों द्वारा धारण किए जाने वाला कोट भी। हो सकता है कि इससे शुरुआत में कुछ दिक्क्तें हों लेकिन ज्यादा दिन नहीं। कुछ ऐसा शुरू हो या बने जो अपना स लगे। जिसमें भारतीय संस्कृति और भारतीय परंपरा का बोध हो। अब वो क्या हो कैसा हो इसे हमारे समृद्ध इतिहास के पन्नों से निकालकर लाना चाहिए। न कि गुलामी के प्रतीकों से।

कल जब मैं यह खबर बना रहा था तो मेरे दिमाग में गोपाल राय (अगर नाम गलत हो क्षमा चाहूंगा) की भी स्मृति आई। वही गोपाल जी जो इंडिया गेट को भारतीय सैनिकों का सम्मान स्थल मानने के विरोधी हैंं। उनका तर्क सही भ्ीा है कि यह तो विश्वयुद्ध में अंग्रेजी सेना की ओर से लड़े लोगों की याद में बनाया गया है। उनकी बात सही भी है। अब कम से कम इतना तो जरूर करना चाहिए कि ऐसे गुलामी के प्रतीकों का विरोध हो, क्योंकि हम आजाद पैदा हुए हैं। आजाद मुल्क में सांस ले रहे हैं इसलिए हमें गुलामी के कलंकों को धो देना चाहिए।                                    
सो भइया प्रथम अध्याय समाप्त हुआ। चलिए आप भी मेरे साथ कहिए जय-जय-जयराम। शेष कथा अगले अंक में। वैसे भी बात जब निकली है तो दूर तलक जाएगी।`

गुरुवार, 25 मार्च 2010

मां को बाप की अंकशायिनी नहीं कहते

माननीय सुप्रीम कोर्र्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी आई है। हालांकि कोर्ट का टिप्पणी करना नया नहीं है लेकिन संभवत: विवाह पूर्व सहजीवन और विवाह पूर्व यौन संबंध को लेकर कोर्ट की पहली दो टूक टिप्पणी (Living together a part of right to life, not an offence: SC है। यद्यपि अभी इसे लेकर ज्यादा हो हल्ला नहीं हो रहा है। क्योंकि कोर्ट का फैसला आना बाकी है और दूसरा कोर्ट की नाफरमानी का खतरा भी कोई मोल नहीं लेना चाहता। उन्हीं में मैं भी हूं। बावजूद इसके क्या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर चर्चा नहीं होनी चाहिए। कम से कम मैं तो करना चाहूंगा।
सुप्रीम कोर्ट दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू के एक विवादित इंटरव्यू में को लेकर उनके खिलाफ दर्ज 22 आपराधिक मामले हटाने की अपील पर सुनवाई कर रही है। उसी दौरान कोर्ट ने सवाल किया कि किस धारा के तहत लिव इन रिलेशन अपराध है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार है। बात तो सही है। सुप्रीम कोर्ट की। संविधान के अनुसार तो लिव इन रिलेशन और विवाह पूर्व यौन संबंध अपराध नहीं हैं। खैर इस मामले में सुनवाई अभी बाकी है।
क्या यह सही है?
सुप्रीम कोर्ट ने इसी दौरान भगवान कृष्ण और राधा की नजीर देते हुए कहा, पौराणिक कथाओं के अनुसार कृष्ण और राधा भी ऐसे ही साथ ("लिव-इन रिलेशनशिप अपराध नहीं") रहते थे। इसमें अपराध जैसी क्या बात है। पर मैं माननीय कोर्ट की इस नजीर से असहमत हूं। मैं संविधान के मौलिक अधिकारों के खंड के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत इस नजीर से असहमति व्यक्त करता हूं।असहमति के कुछ कारण भी हैं।
हला तो यह कि इस जगह कृष्ण- और राधा की नजीर सही नहीं है। उनके बीच का रिश्ता शारीरिक या सांसारिक नहीं आत्मिक था। दूसरा यह कि अब तक हुई खोजों और उपलब्ध साहित्य के अनुसार कृष्ण किशोरावस्था तक ही वृंदावन में रहे। ऐसे में क्या कृष्ण और राधा के संबंध को लिव इन रिलेशन जैसे सांसरिक संबंध के मसले में नजीर बनाना सही है? कतई नहीं।
दूसरा जब कोर्ट कुछ मामलों में तो पौराणिकता को सही तक नहीं मानता जबकि यहां उन्हीं पुराणों की नजीर दी जा रही है। यह विरोधाभाश भी ठीक नहीं है। यदि पौराणिकता को ही आधार माना जाए तो अयोध्या में राम मंदिर विवाद कब का सुलझ गया होता। समलैंगिक सबंध को सही ठहराना, विवाह पूर्ण संबंध और बिना विवाह सह जीवन को सही ठहराना हो सकता है कानूनी लिहाज से ठीक हो लेकिन भारतीय परंपरा और भारतीय समाज की बुनावट में यह सही नहीं है।
मलैंगिंक संबंध जैसी बीमारी जो की जानवरों को भी नहीं लगती वह इंसानों को लग गई है। अब रही सही कसर थी सामाजिक डर की वह भी खत्म हो रही है। विकृतियां हर काल समय में रही थीं और रहेंगी भी लेकिन उन विकृतियों को कभी सामाजिक मान्यता नहीं मिली और न ही मिलेगी।

विवाह  पूर्व सह जीवन और विवाह पूर्व सबंध और समलैंगिक संबधों की शुरुआत किस घर से होगी क्या कोई आगे आकर यह कहने को तैयार है कि हां हम अपने घर से इसकी शुरुआत करेंगे? शायद कोई नहीं? दरअसल यह हमारे खून में ही नहीं है। कुछ गिने चुने प्रचार के भूखे लोग कुछ भी ऊटपटांग बोलकर सुर्खियों में आने की जुगत में हमेशा रहते हैं। लेकिन ऐसी विकृतियों को सामाजिक मान्यता तो नहीं दी जा सकती।

दुनिया जानती है कि मां और बाप का रिश्ता क्या होता है लेकिन आज भी हम नहीं कह सकते कि मां बाप की अंकशायिनी है। यह कानूनी रूप से गलत नहीं है और न ही इसको कहने से कोई अपराध होता है लेकिन यह हमारी संस्कृति नहीं है यह हमारी पंरपरा नहीं है। यदि कोई ऐसा कहता है तो उसे गलत ही कहा जाएगा भले ही कानून उसे सही ठहराये। इतिहास में हमेशा किताबों में दर्ज कानूनों के साथ ही प्रचलित मान्यताएं और परंपरायें रही हैं जो कई बार किताबी कानूनों से ज्यादा कारगर रहीं। भारतीय संविधान और उसके अंतर्गत गठित सभी प्रकार की व्यवस्थाओं के प्रति पूर्ण  आदर और सम्मान प्रकट करते हुए मैं आपसे इस मामले पर विचार का आग्रह करता हूं।

सोमवार, 22 मार्च 2010

नीति नहीं नीयत भी बने


प्रदीप पांडेय, अरविंद दुबे)

ज विश्व जल दिवस है। रस्मी तौर पर हमने भी खबर छापी। कुछ लोगों से बातचीत की। कुछ आंकड़े बताए और सरकार की कुछ कमियां भी। लेकिन जो संकट आने वाला है क्या वह इतने भर से थम जाएगा? यह सोचने का विषय है। मुझे लगता है कि सिर्फ सरकार ही नहीं आम आदमी को भी जागना होगा। सरकार की कोई भी योजना और नीति तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक कि आम आदमी उसमें शामिल न हो। ऐसी ही योजना कुछ पानी को लेकर भी बनानी होगी। अन्यथा पहले की तरह नीतियां तो बनेंगी लेकिन सिर्फ कागजी। अब जरूरत है नीयत बनाने की। क्योंकि जब नियत बनेगी तभी नीतियां कारगर होंगी और इसके लिए आज जल दिवस से बढिय़ा अवसर नहीं होगा। सो चलिए नीयत बनाएं, जल बचाएं, कल बचाएं।

सफल नहीं हो रही जल नीति
लोग पानी बचाने और जलसंकट की बात तो बहुत करते हैं, लेकिन इसे लेकर कोई गंभीर नहीं है। सच यह है कि एक बड़ा तबका अभी भी पानी का मोल नहीं समझ पाया है, वहीं सरकार शुरू से 'खानापूर्तिÓ वाला रवैया लेकर चली है। कागजों में बनी राष्ट्रीय जलनीति के परिणाम भी अब तक जमीन पर नहीं उतर पाए हैं। कागजों पर दौडऩे वाली नीति के लिए न तो साधन मुहैया कराए गए और न खर्च का आकलन किया गया। नतीजा सामने है। पानी के लिए अभी से खून बहने लगा है। 1987 में सरकार ने पहली जल-नीति घोषित की थी, लेकिन सालों बाद तक जल प्रबंधन की समस्याएं जस-की-तस हैं। इसके लिए सरकार के पास विस्तृत डेटा होना चाहिए था, लेकिन केवल मध्यप्रदेश और बिहार दो ही राज्य ऐसे रहे, जिन्होंने अपने यहां जल-नीति बनाकर कुछ काम किया। 1987 में जल-नीति की घोषणा की और एक साल बाद ही कमियां भांपते हुए 'जल-नीति प्रारूप 1998Ó बनाया। 2002 में नई जल-नीति बनाई, लेकिन यह आज तक सही तरीके से लागू नहीं हो सकी है। जल-नीति का प्रारूप देखकर लगता है कि सरकार ही अपने उद्देश्य को लेकर साफ नहीं है। प्रारूप में केवल बड़े निर्माण की ही बात कही गई है। कानून अड़चनों को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है। समाज के हितों की अनदेखी कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उद्योगों को बेरोकटोक जल मिल सके, ऐसी व्यवस्था इसमें की गई है। बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखकर कोई योजना नहीं।

सरकार ये क्या कर रहे हो...?

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड पीपुल्स के हिमांशु ठक्कर के मुताबिक जल समस्या निवारण के लिए जरूरी है भूजल स्तर बनाए रखा जाए, लेकिन जल नीति में सरकार ने इस पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। जो कुछ किया गया है, उससे उल्टा नुकसान ही हुआ है। यह बात सरकार के आंकड़ों से ही साबित होती है। मसलन, सरकार ने 70 फीसदी पैसा बड़ी सिंचाई योजनाओं के लिए बड़े बांध बनाने पर खर्च किया। 1992 से 2007 तक एक लाख 12 हजार करोड़ रुपए खर्च किए। सरकार के मुताबिक इस दौरान 400 योजनाएं पूरी हुर्ईं, लेकिन परिणाम शून्य है। खुद कृषि मंत्रालय के मुताबिक, उन 15 सालों में इस तरह की योजनाओं से सिंचित होने वाली भूमि में 3.15 मिलियन हेक्टेयर की कमी आई है। सरकार को चाहिए कि वह छोटी-छोटी योजनाओं पर काम करे। भूजल संरक्षण के लिए काम किए जाएं। बारिश के पानी के नदियों, तालाबों, चैकडेम या अन्य साधनों से संरक्षित किए जाने पर काम हो, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है। यह मुद्दा आम आदमी से जुड़ा है, उसकी भागीदारी सुनिश्चित की जाना चाहिए, लेकिन इसका जिक्र तक नहीं है। समयावधि तय होना चाहिए, जो नहीं है। सरकार खुद सोचे कि वह क्या कर रही है। ऐसी कई योजनाएं और नीतियां बना ली जाए तो भी नतीजा कुछ नहीं निकलेगा।


दुनिया में जल संसाधन

2,94,000,000 क्यूबिक मीटर पानी कुल
71 फीसदी भाग पृथ्वी का जलाच्छादित
3 फीसदी पानी ही है इसका पीने योग्य

देश में जल संसाधन

690
घन किमी सतही जल
433 घन किमी भू-जल
5100 बांध देश में कुल
4710 निर्माण पूर्ण (2009)
0.5 प्रतिशत खर्च होता है जीडीपी का जल और सफाई पर
4.50 लाख व्यक्ति प्रतिवर्ष मरते हैं अतिसार (दस्त) से 
2.45
फीसदी है भारत विश्व भूभाग का
4 प्रतिशत जलसंसाधन भारत में दुनिया के
16 फीसदी आबादी दुनिया की भारत में
4000 घन किमी जल हर साल मिलता है वर्षा से
10,360 देश में कुल नदियां और उनकी सहायक नदियां हैं
1,869 घन किमी नदियों के बेसिन में वार्षिक प्रवाह का
89 प्रतिशत धरातलीय और 92 प्रतिशत भूजल का उपयोग कृषि में
2 फीसदी सतही जल का व 5 फीसदी भूजल का उद्योग में


आप यह नहीं जानते होंगेदेश के कुछ हिस्सों में भूजल स्तर एक मीटर प्रतिवर्ष की दर से गिर रहा है
जल संचय से 160 अरब घन मीटर अतिरिक्त जल उपलब्ध होगा
100 वर्ग मीटर आकार के छत पर 65000 लीटर वर्षा जल प्राप्त कर पुनर्भरण करते हैं और चार सदस्यों वाले एक परिवार की पेय और घरेलू जल आवश्यकताएं 160 दिनों तक पूरी कर सकते हैं
देश में 50 सालों में सिंचाई कुओं, बोरवेल व ट्यूबवेल में पांच गुना वृद्धि हो गई है
195 लाख हो गई है देश में कुओं, बोरवेल की तादाद
25 से 30 लाख कुएं, बोरवेल पेयजल, घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए

पानी की जबरदस्त कमी
सामान्य तौर पर भारत में एक व्यक्ति को प्रतिदिन 140 लीटर जल उपलब्ध है। किंतु संयुक्त राष्ट्र विकास संघ (यूएनडीओ) की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार जल वितरण में क्षेत्रों के बीच, विभिन्न समूहों के बीच, निर्धन और धनवान के बीच, गांवों और नगरों के लोगों के बीच काफी विषमता है। लाखों लोगों को प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति की दर से 20 लीटर साफ पानी भी उपलब्ध नहीं। ब्रिटेन में भी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन जल की उपलब्धता 150 लीटर है। प्रत्येक बांग्लादेशी के लिए प्रतिदिन की जल उपलब्धता मात्र 50 लीटर ही है।


खतरे में है नदियों का जीवन
रिद्वार में गगा के प्रवाह को लेकर हुए अध्ययन के मुताबिक सर्वाधिक आबादी वाले कुछ क्षेत्रों में नदियां प्रवाह खोती जा रही हैं। अमेरिका के नेशलन सेंटर फॉर एटमॉस्फीयरिक रिसर्च के अध्ययन के अनुसार इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। 1948 से 2004 के बीच धाराओं के प्रवाह की जांच में पता चला कि दुनिया की एक तिहाई बड़ी नदियों के जल प्रवाह में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। इस दौरान अगर किसी एक नदी का प्रवाह बढ़ा है तो उसके अनुपात में 2.5 नदियों के प्रवाह में कमी आई है। उत्तरी चीन की पीली नदी, भारत की गंगा, पश्चिम अफ्रीका की नाइजर और अमेरिका की क्लोराडो बड़ी आबादी वाले इलाकों की प्रमुख नदियां हैं जिनके प्रवाह में गिरावट आई है। बांध और कृषि व उद्योग के लिए पानी को मोड़ा जाना नदी के प्रवाह को प्रभावित करता है। 1948 से 2004 के बीच प्रशांत महासागर में गिरने वाली नदियों के जल की वार्षिक मात्रा में 6 फीसदी गिरावट दर्ज की गई। यानी 526 क्यूबिक किमी जो मिसीसिपी नदी में हर साल मिलने वाली पानी के बराबर है। हिंद महासागर के वार्षिक निपेक्ष में 3 फीसदी या 140 क्यूबिक किमी की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि ब्रह्मपुत्र में प्रवाह में स्थितरता बनी रही, लेकिन हिमालय के ग्लेशियर गायब होने से इनके प्रवाह में कमी आ सकती है।


मध्यप्रदेश में पेयजल* रायसेन में 8455 हैंडपंप हैं। यहां 105 नल योजनाओं में से 27 बिजली, स्रोत के अभाव और अन्य कारणों से बंद हैं। वहीं 54 सतही जल योजनाएं बंद हैं। भूजल गिरने से 109 हैंडपंप बंद हो गए।
* केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 22 जिलों में भूजल स्तर दो से चार मीटर तक गिर चुका है। जबकि 14 जिलों में यह गिरावट चार मीटर से ज्यादा दर्ज की गई।
* प्रदेश के 22 जिलों में पानी में फ्लोरोसिस की मात्रा बढ़ी है। सिवनी में 16 हजार बच्चे और गुना में 120 गांव में फ्लोरोसिस की अधिकता से प्रभावित हैं।
* मप्र के 30,118 स्कूलों में आज भी पीने का साफ पानी नहीं है।
* राज्य सरकार के अनुसार प्रदेश की 8192 नल और सतही जल प्रदान करने वाली योजनाओं में से 1507 बंद हैं। वहीं 9988 हैंडपंप जलस्तर कम होने से बंद हो चुके हैं।
* प्रदेश में 24517 बसाहटें ऐसी हैं, जहां सरकार पानी की न्यूनतम जरूरत भी पूरा नहीं कर पाई है।

मध्यप्रदेश के वे जिले जहां भूजल स्तर दो से चार मीटर नीचे गया 1. बालाघाट 6. सागर 11. टीकमगढ़ 17. ग्वालियर
2. भिण्ड 7. शाजापुर 12. कटनी 18. शिवपुरी
3. मुरैना 8. रीवा 13. सीधी 19. छतरपुर
4. गुना 9. सतना 14. छिंदवाड़ा 20. डिण्डोरी
5. राजगढ़ 10. पन्ना 15. दमोह 21. मण्डला
16. श्योपुर 22. होशंगाबाद
(भिंड, ग्वालियर, श्योपपुर, मुरैना, शिवपुरी, दतिया, छतरपुर, राजगढ़, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, सतना, सागर और छिंदवाड़ा के कई इलाकों में भूजल स्तर चार मीटर से भी नीचे जा चुका है।)


हैंडपंप की स्थिति374288 हैंडपंप कुल प्रदेश में
351185 हैंडपंप चालू हालत में
13115 हैंडपंप खराब पड़े हैं
9988 जलस्तर कम होने से खराब


140 लीटर पानी में एक कप कॉफी
प शायद ही जानते हों हमारी एक कप कॉफी बनने में 140 लीटर पानी लगता है। यह बात अलग है कि दिखता एक ही कप है। यह पानी कॉफी के बीज से पौधा बनने से लेकर हमारी प्याली तक पहुंचने में लगता है। यही नहीं, हम जो कपड़े पहनते हैं या जो वाहन चलाते हैं उनके निर्माण में भी हजारों लीटर पानी लगता है। लंदन स्थित किंग्स कॉलेज के प्रोफेसर जॉन एंथोनी के अनुसार अदृश्य पानी का सिद्धांत पानी प्रबंधन को नई दिशा देगा। हर वस्तु के निर्माण या उत्पादन में इसकी छाप होती है। विज्ञान इसे वर्चुअल वाटर कहता है। जैसे एक टन गेहूं उगाने में करीब एक हजार टन पानी लगता है। कभी-कभी इससे ज्यादा लगता है।

किसमें कितने लीटर पानी1 कप कॉफी 140
1 किग्रा चावल 3,000
1 लीटर दूध 1,000
1 किग्रा मांस 15,500
1 किलो अंडा 3,300
1 टन की कार 4,00000

मंगलवार, 16 मार्च 2010

कोई बच रहा कोई बचा रहा

हिला आरक्षण का मामला कुछ ठंडा जरूर हुआ है लेकिन इस ठंड की आड़ में आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में जमीन तैयार हो रही है। सरकार अपनी औकात समझकर इसे लोकसभा में लाने से बच रही है वहीं विधेयक पर सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी और मुख्य विपक्षी दल भाजपा को अपने सांसदों को संभालना भारी पड़ रहा है। पड़ेगा भी। दरअसल जैसे-जैसे सांसदों और लोगों को महिला आरक्षण विधेयक का आगा पीछा समझ में आ रहा है वे इसकी मुखालफत कर रहे हैं। कुछ भाजपाई तो आडवाणी की चाय पीने के बाद भी बिल के पक्ष में नहीं आ रहे हैं। उनकी चिंता भी सही है। यद्यपि लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में परिवारवाद और सामंतवाद जैसे दोष सहनयोग्य नहीं हैं लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी सीट पर सालों से अपनी मेहनत और काम के बल पर जीतता आ रहा है तो यह व्यवस्था कि पांच साल के लिए उसकी सीट किसी महिला की हो जाएगी फिर उसके बाद सामान्य, ठीक नहीं है। खैर अभी तो विधेयक पहले चरण को ही पार कर सका है अभी इसे कानून बनने और लागू होने में कई और कठिन मुकाम पार करने होंगे। फिलहाल जो लक्षण दिख रहे हैं उनके मुताबिक तो इसकी राह और कठिन होती जा रही है।
हिला आरक्षण का समर्थन कर और विरोध कर रहे दोनों पक्षों को पहले अपने गिरेहबान में झांककर आत्मचिंतन करने की जरूरत है। मौजूदा लोकसभा के चुनाव में किस पार्टी ने कितनी महिलाओं को टिकट दिया किसी से छिपा नहंी है। इस समय लोकसभा में 59 महिला सांसद हैं। इनमें से अभी गिनने बैठ जाएं तो कोई किसी बड़े राजनेता की पत्नी, कोई बेटी, कोई बहू होगी। उंगलियों पर गिनने लायक संख्या नहीं होगी जो कि महिला कार्यकर्ताओं को जिताकर सांसद बनाया हो, लेकिन आरक्षण की बात चली तो सब के्रडिट लेने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। यही हाल पार्टी संगठनों का भी है। दोनों बड़े राजनीतिक दल ही नहीं सपा, राजद जैसे आरक्षण विरोधियों का भी यही हाल है। उनको भ्ी मौका मिलात है तो कोई अपनी पत्नी को सीएम बनाते हैं तो कोई अपनी बहू को संसद पहुंचाने की जुगत लगाते हैं। इसका समर्थन कर रहे लोग भी कम नहीं है। कई समर्थकों को जब अपनी सीट से किसी को खड़ा करना हुआ तो अपनी पत्नी अपनी बेटी को खड़ा किया और कुछ उन्हें जिताकर भी लाए। अगर यही चला तो संसद में तो इन्हीं 543 लोगों की पत्नी, बेटी, बहन, बहू ही पहुंचेगी। इससे आम महिला का क्या फायदा होगा? पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में प्रधानपति, पार्षद पति जैसे शब्द तो बाकायदा चल रहे हैं। फिर राष्ट्रीय स्तर पर सांसद पति, सांसद बंधु, सांसद ससुर जैसे जुमले चल निकलेंगे। अगर ऐसा ही होना है तो नहंी चाहिए ऐसा आरक्षण।
ब इसका दूसरा पहलू भी देख लें। अगर सरकार यादव तिकड़ी की बात मानकर आरक्षण में आरक्षण पर सहमति बनाने की कोशिश करती है तो अव्वल वह विधेकय पास नहंी होगा और अगर ऐसा गलती से हो गया तो देश एक नए विभाजन की ओर बढ़ेगा जो कि मंडल कमीशन के बाद से ही शुरू हो गया है। आरक्षण का लाभ अक्सर वास्तविक जरूरतमंद को नहीं मिला रहा। इसका फायदा बड़े लोग ही उठा रहे हैं। वहीं इस आरक्षण के साथ भी होगा। खैर महिलाओं को आरक्षण मिले न मिले लेकिन इसके बहाने मुलायम लालू ने एक तो अपनी खोयी जमीन वापस पा ली वहीं, सरकार को भी बैकफुट पर ला दिया। दोनों अल्पसंख्यकों के बीच कम होते जनाधार को भी बचाने में सफल दिख रहे हैं। उनकी लड़ाई में यही सबसे अहम है। पिछड़े पूरे देश में जहां संख्या बल में सबसे आगे हैं वहीं अल्पसंख्यकों का राजनीतिक महत्व पिछले चुनावों में दिख चुका है। अब उनकी तो चल निकली। लेकिन हम तो देश को चलते देखने चाहते हैं। इसलिए चाहते हैं कि सरकार सहित सभी दल इस बारे में एक बार नहंी सौ बार सोचकर कोई फैसला करें।

A Patriot's History of the United States: From Columbus's Great Discovery to the War on Terror

सोमवार, 8 मार्च 2010

लक्ष्मण रेखा भी पार

लक्ष्मण रेखा भी पार हो गई। सोमवार को हम दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन में लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार होते देखते रहे। हमने क्या-क्या देखा यह बताने की जरूरत नहीं है। जरूरत यह सोचने की है कि यह सब हंगाम बरपा क्यों और यह आग अब देश को कहां ले जाएगी? एक खास परिवार की परिक्रमा करने वाली कांग्रेस, खास संगठन से गाइड होने वाली भाजपा, सैद्धांतिक तौर पर मजलूमों की पार्टी होने का दावा करने वाले वामपंथी, मौका मिलने पर अपनी पत्नी को सीएम बनाने वाले लालू या अपनी पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने वाले मुलायम सिंह सब हमाम में नंगे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि महिलाओं को आरक्षण देने की जरूरत क्यों पड़ी और क्या आरक्षण भर दे देने से महिला सशक्तिकरण हो जाएगा? या फिर पहले की ही तरह कुछ खास परिवारों और खास लोगों की परिक्रमा करने वाली महिलाएं ही लोकतंत्र की पंचायतों में पहुंचती रहेंगी? अभी संसद और विधानसभाओं को देखें तो हाल कुछ यही है। सवाल एक पार्टी का नहीं सब का है। आखिर इन पार्टियों ने खुद अपने 33 फीसदी टिकट महिलाओं को क्यों नहीं दिए? आखिर क्यों आज भी आधी आबादी संसद में अल्पसंख्यक है? खैर इन सब बातों पर बहुत बहस हो चुकी है, बड़े-बड़े दिग्गज इस पर मुंह भांजते रहते हैं सो अपनी यहीं तक। अब आते हैं असल मुद्दे पर। असल मुद्दा यह कि कांगे्रस के मैनेजरों के लिए महिला विधेयक भारी मुसीबत बन गया है।
मुसीबत नंबर-1अगर सरकार भाजपा, वामदलों के भरोसे विधेयक पारित कराती है तो शरद-लालू-मुलायम की तिकड़ी सड़क पर हंगामा करेगी। हंगामा कैसा होगा यह यह सोमवार को संसद में दिख गया है। इसके अलावा कानूनी दिक्कतें भी सकती हैं।
मुसीबत नंबर-2अभी बजट पर चर्चा होनी है। प्रणब बाबू ने पेट्रो उत्पादों पर कर बढ़ाकर पहले ही मुसीबत मोल ली है। बंगाल वाली दीदी और तमिलनाडु वाले दादा विरोध जता ही चुके हैं वहीं महंगाई के मसले पर तो मुलायम, बसपा, वामदल पहले ही सरकार के खिलाफ हैं। ऐसे में अगर भाजपा कटौती प्रस्ताव लाती है तो सरकार के लिए बहुमत बचाए रखना चुनौती होगी।
मुसीबत नंबर-3
सरकार की तीसरी मुसीबत के संकेत मिलने शुरू हुए सोमवार शाम से। कांग्रेस कोर गु्रप की बैठक या यूं कहें सोनिया मैडम की क्लास के बाद प्रधानमंत्री ने लालू-मुलायम-शरद को मंगलवार को बातचीत के लिए बुलाया है। अब अगर कहीं सरकार ने इनकी बात मानने की गलती कर दी तो भाजपा-वामदल बिदक जाएंगे। यह सांप की पूंछ पर सिर रखने जैसा होगा।
मुसीबत नंबर-4मुसीबत लालू-मुलायम-शरद के लिए भी है। तीनों इस मसले पर इतना आगे निकल चुके हैं कि पीछे लौटना शायद मुमकिन नहीं। संसद में पास हुआ तो सड़क पर संघर्ष करेंगे। वैसे भी मुलायम और लालू को अपनी खोई जमीन वापस पानी है। ऐसा हुआ तो कम से कम यूपी और बिहार में आम आदमी के लिए मुश्किल तय है।
चलते-चलते
वो क्या कहते है कि दिल बहलाने के लिए गालिब खयाल अच्छा है। वही है अपना भी। भारतीय राजनीति पर पक्का-पक्का कुछ कहना उतना ही मुश्किल है जिनता स्वर्ग तक सीढ़ीयां बनाने की सोचना। सोचने और लिखने में तो अच्छा है पर कल क्या होगा यह नहीं पता। अरे भइया याद नहीं है, नरसिंहराव जी ने कैसे पांच साल अल्पमत की सरकार चलाई, अलटजी की सरकार कैसे एक वोट से गिर गई और भारत-अमेरिका परमाणु करार पर कैसे यूपीए सरकार जाते-जाते बच गई। अब यह तो कल ही पता चलेगा।

SMS from my inbox आज मुझे बीएचयू वाले कमल भइया का एसएमएस मिला। जो अविकल प्रस्तुत है-
आपको महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। (पर मार्र्दों की भी सोचो)
अगर मर्द औरत पर हाथ उठाए तो जुल्मी
अगर पिट जाए तो बुजदिल।
गर्लफ्रैंड को किसी दूसरे से बात करने पर लड़े तो ईष्यालु
और अगर चुप रह जाए तो बेगैरत।
घर से बाहर रहे तो आवारा
घर में ही रहे तो नाकारा।
बच्चों को डांटे तो जालिम बाप
न डांटे तो लापरवाह बाप।
पत्नी को नौकरी करने से रोके तो शक्की मिजाज
नौकरी करने दे तो पत्नी की कमाई खाने वाला।
आखिर बेचारा जाए तो कहां............................?

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

महाराष्ट्र की महाभारत का यथार्थ-निहितार्थ-स्वार्थ

इस समय देश के सभी बड़े-छोटे, पतले-मोटे, खरे-खोटे चैनलों पर एक ही खबर चल रही है। अरे वही खबर अपने महाराष्ट्र की महाभारत। हर मिनट नई बे्रकिंग न्यूज फ्लैश होती है, कि ठाकरे से सोनिया को यह कहा, कांग्रेस ने यह जवाब दिया। बॉलीवुड भी कूदा मैदान में, शिवसेना के गुंडों ने फलानी जगह पर उत्पात मचाया, फलां सिनेमाघर में तोडफ़ोड़ की.... आदि-आदि। मुंबई में छिड़ी महाभारत देशव्यापी होती जा रही है। कुछ सिरफिरे लोगों की सनक का खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है। एक क्षुब्ध मानसिकता को लेकर राजनीति करने वाला दल और दल के लोग अपने मुखपत्र में कुछ भी लिखते हैं उसे हमारे जिम्मेदार लोग घंटों दिखाते हैं। फिर होता है पलटवार और यह क्रम निरंतर चलता है। यह सबसे बड़ी खबर है। मैं इस सवाल पर नहीं जाना चाह रहा कि शाहरुख ने क्या कहा और न ही इस पचड़े में फसूंगा कि ठाकरे एंड सन्स क्या उगल रहे हैं। मेरा वास्ता इस बात से भी नहीं कि भाजपा-शिवसेना-संघ किस मसले पर मुंहभंजन कर रहा है। मेरे सवाल मीडिया और सरकार से हैं।

जिम्मेदारों की जिम्मेदारी
जहां आग न लग रही हो वहां कुछ जिम्मेदार लोग आग लगा सकते हैं और जहां सचमुच आग लगी हो उसकी आंच तक बाहर नहीं दिखने देंगे। पहले तो शाहरुख के मुंह से पाक खिलाडिय़ों के पक्ष में बुलवाया फिर उसे बे्रकिंग न्यूज बना कर चलाया। चलाया तो चलाया उस पर शिवसेना की प्रतिक्रिया मांगी। अब अपना जनाधार खोकर पांच साल के लिए खाली बैठी और जमीन तलाश रही शिवसेना को तो बैठे बैठाए मुद्द मिल गया। खोल दिया मोर्चा। मैं शाहरुख के विचार व्यक्त करने की आजादी का समर्थन करता हूं। लेकिन जिम्मेदार लोग यहीं नहीं बैठने वाले थे। सामना रोज क्या लिख रहा है वह तो महाराष्ट्र में ही रहता है फिर उसे प्राइम टाइम की लीड क्यों बनाया जाता है? राजनीति के नाम पर गुंडई कभी बर्दाश्त नहीं की जा सकती, यह जानने के बावजूद क्या जरूरत है शिवसेना के नेताओं को घंटों डिबेट में शामिल करने का और बार-बार उनसे बयान लेने का? दरअसल इसके पीछे यथार्थ-निहितार्थ-स्वार्थ कुछ और भी है।

इतिहास से न सीखने वाले को समय कभी माफ नहीं करता
आखिर सामना में रोज लिखकर धमकी दी जा रही है। दिन दहाड़े तोडफ़ोड़ प्रदर्शन हो रहा है तो क्यों नहीं सरकार कोई कार्रवाई करती। महाराष्ट्र और केंद्र सरकार आखिर दर्शकों जैसे व्यवहार क्यों कर रही है? पहले इसी कांग्रेस सरकार ने राज ठाकरे को पाला-पोसा बड़ा किया। यह शाश्वत सत्य है कि जो इतिहास से नहीं सीखते इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता। आजादी के समय भारत-पाक बंटवारे के फैसले को छोड़ भी दें तो उसके बाद नोआखली से लेकर गुजरात और कंधमाल दंगों तक सरकार गलतियां करती आई है। ज्यादा पुरानी बातें छोड़ भी दें तो अगर 1984 के दंगाईयों को सख्त सजा हुई होती तो कोई धर्र्मांध कभी गुजरात में तलवार लहराने की जुर्रत न करता। भारतीय लोकतंत्र पर आपातकाल का सबसे बड़ा कलंक लगाने वालों को सजा हुई होती तो कोई भी जनप्रतिनिधि, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद या विधायक अपने पद और शक्ति का दुरुपयोग करने की जुर्रत न करता। भिंडरावाले को पैदा किया, पाला-पोसा फिर उसकी देश को क्या कीमत चुकानी पड़ी इतिहास गवाह है। बड़ा पेड़ गिरने पर आस-पास की जमीन कांपी तो उससे बना जख्म आज तक देश को साल रहा है। वही गलती महाराष्ट्र सरकार ने राज ठाकरे को शह देकर की। अब फिर वही दोहराया जा रहा है। जब साफ-साफ दिख रहा है कि कानून तोड़ा जा रहा है तो उन लोगों को बंद करो जेल में। देश में कानून का राज है कि नहीं? कम से कम महाराष्ट्र में तो यह नहीं दिख रहा। कम से कम अब तो सरकार कार्रवाई करे।

अपना गणित यह कहता है
- महंगाई आसमान छू रही है। इतने से आम आदमी की सरकार को सुकून नहीं हुआ तो अब पेट्रोल-डीजल, एलपीजी और केरोसिन का दाम बढ़ाने की कवायद शुरू कर दी है। जनता महंगाई को भूल जाए इसलिए जिम्मेदारा लोगों द्वारा प्रायोजित महाराष्ट्र का महाभारत अनवरत जारी है।
- बिहार विधानसभा चुनाव हैं। झारखंड में मिली मायूसी और नीतीश कुमार के विकास कार्र्यों को देखें तो नहीं लगता कि कांग्रेस या लालू-पासवान बिहार में सरकार बना पाएंगे, लेकिन जिम्मेदार लोग बिहार के विकास का स्क्रोल तक नहीं चलाते और राहुल बाबा की यात्रा को सफल बताते हैं।
- सरकार ने एक पूर्व (सेवा निवृत्त) आतंकी को पद्मश्री दे दिया है। बताया गया है कि उन महानुभाव ने हथियार छोड़कर समाजसेवा शुरू कर दी है। पर जिम्मेदार लोगों को यह खबर नहीं दिखी। (अब मुझे इंतजार है कब अफजल गुरु, कसाब और अबू सलेम को पद्मश्री मिलेगा।)
- सरकार के मंत्री प्रधानमंत्री के खिलाफ बोल रहे हैं। सहयोगी पार्टियों के नेता राज्यसभा से प्रधानमंत्री बनने को गलत ठहरा रहे हैं। सरकार बचाने के लिए एक ही राज्य में चार मुख्यमंत्री बनाए जा रहे हैं पर जिम्मेदार लोग नहीं चाहते कि देश इसे भी जाने। देश तो बस यह जाने की राहुल बाबा जहां जाते हैं वहां लड़कियां उनकी दीवानी हुई जा रही हैं। लोग उन्हें देखने के लिए बेताब हो जा रहे हैं, आदि, आदि....
- राहुल बाबा पूरे देश में घूमकर पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देने का वादा कर रहे हैं। और रात में एक विधायक को पार्टी की यूथ विंग का राष्टï्रीय अध्यक्ष बना देते हैं। कोई जिम्मेदार राहुल से पूछेगा कि ऐसा क्यों किया?


अभिताभ को भी लपेट लिया है
अमिताभ की नई फिल्म आई है रण। अभी मैंने देखी तो नहीं लेकिन चर्चा उसकी बहुत है। जिम्मेदार लोगों ने महाभारत में बिग बी को भी खीच लिया। कारण यह बताया कि बिग बी बाल ठाकरे को अपनी फिल्म रण दिखाने उनके घर जा रहे हैं। फिल्म, क्रिकेट, उद्योग सहित विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गज लोगों को मैंने ठाकरे से मिलते देखा है। दरअसल मसला फिल्म दिखाने का नहीं मसला बिग बी के गुजरात का ब्रांड अंबेसडर बनने का है। जिम्मेदार लोगों और उनके प्रायोजकों यह नहीं पच रहा है कि अमिताभ मोदी के राज का में रहें। अमिताभ गुजरात के ब्रांड अंबेसडर बने तो गलत किया उन्हें महाराष्ट्र  का बनना चाहिए था जहां हजारों किसानों ने आत्महत्या की, मेघायल का बनना चाहिए था जहां चार-चार सीएम, गोवा का बनना था जहां विदेश-स्वदेशी कोई भी सुरक्षित नहीं, हरियाणा का बनना था जहां पंचायतें राज करती हैं, कश्मीर का बनना था जहां की सरकार पूर्व आतंकी को पद्श्री दिलाती है। है न जिम्मेदार लोगों? मोदी के जीवन से अगर गोधरा दंगे को निकाल दिया जाए तो उनमें बुराई क्या है। अगर आपातकाल लगाने वाले को, बड़ा पेड़ गिरने पर मची हलचल को सही ठहराने वाले  'भारत रत्न' हैं तो उनके अनुयायी मोदी को कब तक दोषी ठहराएंगे? जनता ने उन्हें माफ किया था तो मोदी को माफ किया है। उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति बनाया और देश में सूचना क्रांति की तो मोदी ने भी गुजरात को नया कलेवर, नया तेवर दिया है।

चलते-चलते
मोदी को छोड़ कर अगर हम कुछ देर के लिए बिहार की बात करें। पांच साल में नीतीश कुमार ने बिहार को आर्थिक विकास के मामले में देश में दूसरे नंबर पर खड़ा कर दिया। आज बिहार में सड़कें हैं। लोग निर्भय होकर चल सकते हैं। अब बिहार जाने से डर नहीं लगता है। और नीतीश ही हैं जिन्होंने ऐसा कानून बनाने की हिम्मत दिखाई जिसमें भ्रष्टचारियों के घर स्कूल बनाने की बात हो। ऐसे नीतीश के कामों को जिम्मेदार लोग क्यों अनदेखा कर रहे हैं? यह मेरा सवाल है? उनसे भी और आपसे भी। गुजरात, गोधरा, कंधमाल जैसी घटनाएं हमारे देश और हमारी एकता पर कलंक हैं। एक गहरा जख्म हैं, जिन्हें कुरेद कर हरा करना हमारे लिए ही नुकसानदेह है। एक निवेदन है जिम्मेदार लोगों से कि वे देश को तोडऩे वाले लोगों का प्रचार-प्रसार करना बंद करें नहीं तो नुकसान देश का होगा।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

राशन 500 रुपए महंगा, जिम्मेदार पीएम

आजकल मैं भी बहुत बीजी हो गया हूं। हालांकि मेरा बीजीपन शरद जी के बीजी पांडेय से अलग है। फिर भी बीजी तो हूं ही। सुबह से शाम तक बीजी। सुबह उठा ही था कि घुमंतू भइया आ धमके। आज उनका बाना थोड़ा अलग था। कंधे में झोला और उसमें नाना प्रकार की किताबें। कुछ टैरो कार्ड, कुछ पचांग। आते ही रायता फैलाकर बैठ गए और लगे बोलने।
मैंने पूछा गुरु ये क्या नाटक शुरू कर दिया? बोले ज्योतिषी हो गया हूं। भविष्य बता रहा हूं। अभी तुम्हारा कल बताता हूं।
मैंने कहा ये क्या सूझी आपको? अच्छी भली नौकरी छोड़कर नाटक शुरू कर दिया? छूटते ही बोले आजकल इसी में फायदा है गुरु।
मैंने कहा चलो बताओ मेरे बारे में कुछ? तो पूछा अभी महीने में कितने का राशन लेते हो? मैंने कहा इससे क्या मतलब? बोले बताओ तो?
मुझे लगा शायद कुछ अंक ज्योतिष का मामला हो। सो कह दिया दो-तीन हजार। बोले दो या तीन? मैंने कहा ढाई मान लो। इस पर बोले अगले महीने तीन हजार लेकर जाना। मैंने कहा क्यों? तो बोले पांच सौ रुपए महंगाई बढ़ जाएगी। फिर लगे एक-एक चीज का दाम गिनाने।
मैं समझ गया कि घुमंतू भइया बाबा शक्कराचार्य उर्फ संत महंगाई बढ़ऊ उर्फ केंद्रीय कृषि और खाद्य मंत्री की राह पर चल रहे हैं। खैर संवाद इतना ही चला। इसके बाद वो कहीं और रायता ढोलने चले गए मैं इधर उनका गिराया रायता संभालने लगा।

अब बाबा ने खोला राज
अभी संभला ही था कि टीवी पर बाबा शक्कराचार्य प्रकट हो गए। बोल रहे थे कि महंगाई बढ़ाने में उनका अकेले का हाथ नहीं है। वैसे यह तो अपने को पहले भी पता था लेकिन जो उन्होंने नया बताया वह यह कि इसके लिए केंद्र सरकार की पीठ के मठाधीश उर्फ प्रधानमंत्री भी जिम्मेदार हैं। बाबा शक्कराचार्य ने कहा, इसके लिए केवल मैं ही कैसे जिम्मेदार हो सकता हूं? बात सही है। अब पता नहीं मठाधीश छोटो बाबा से कैसा सलूक करते हैं? यह तो अभी दोनों बाबाओं को भी नहीं पता।

अब इनका क्या होगा बाबा?
सलूक तो महिला बाल विकास मंत्रालय की मंत्री से भी पता नहीं क्या होगा? अब अपने सेना प्रमुख की जगह पड़ोसी देश के रिटायर सेना प्रमुख की फोटो दे मारी। अब इसमें मैडम की क्या गलती? उन्होंने कहा भी, फोटो छाप गई तो क्या संदेश तो सही है न? इस मामले में मैं कुछ नहीं कहूंगा बस इस पर बयानबाजी आपकी नजर कर रहा हूं-

डीएवीपी की नजर के नीचे से निकला
सबसे पहले मंत्री जी के बोल- 'फोटो सांकेतिक है, संदेश महत्वपूर्ण है। बच्चियों को बचाना चाहिए। गलती हुई है। मामले की जांच हो रही है। विज्ञापन डीएवीपी की नजर के नीचे से निकला है। विज्ञापन जारी करने से पहले डीएवीपी बारीक नजर डालता है। विज्ञापन बनने से जारी होने की प्रक्रिया में कई एजेंसियां शामिल रहती हैं। वैसे भी पूर्व सैन्य अधिकारी की फोटो के साथ कोई नाम है।'


डीएवीपी ने कहा- मंत्री की मंजूरी से जारी
दूसरी ओर डीएवीपी के अधिकारियों ने हाथ खड़े करते बताया कि प्रचार सामग्री तो मंत्रालय ने मंत्री की प्रत्यक्ष मंजूरी के बाद डीएवीपी से जारी करवाई है। विज्ञापन में शामिल लेख और फोटो मंत्री के स्टाफ ने तैयार किया है। तो जिम्मेदारी भी उनकी ही है। 

भारतीय वायुसेना ने कहा- बेहद शर्मिंदगी 
बात वायुसेना की चली तो अपनी वायुसेना के भी एक अधिकारी बोले, 'पता नहीं कैसे हुआ? यदि सरकार को भारतीय वायुसेना प्रमुख की तस्वीर चाहिए थी तो उन्हें सेना मुख्यालय से फोटो मांगनी चाहिए थी।'

कांग्रेस ने दी सफाई
पार्टी के सबसे मुखर प्रवक्ता मनीष तिवारी जी ने कहा, 'विज्ञापन में गलती हुई है। इसके लिए पीएमओ ने माफी मांगी है लेकिन कन्या भ्रूण हत्या की समस्या से पूरे एशियाई देश चिंतित हैं। जिम्मेदारी मंत्रालय की है।'

भाजपा ने की चढ़ाई
वहीं भाजपा के सबसे स्टाइलिश प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा, 'सरकार को देश को जवाब देना होगा। गंभीर मामला है। सरकारी विज्ञापन में पूर्व सैन्य अधिकारी का फोटो कैसे छप गया। इसकी गहराई से जांच होनी चाहिए।'

सोमवार, 18 जनवरी 2010

ज्योति दा नहीं रहे लेकिन मुझे स्यापा नहीं करना

ज्योति दा नहीं रहे। मुझे स्यापा नहीं करना और न ही स्मृति शेष सुनाना है और न ही मैं ज्योति दा का गुणगान करने जा रहा हूं। बस मैं कुछ कहना चाहता हूं ताकि उन लोगों को सनद रहे जो किसी महान नेता के जाने के बाद उनके नाम पर स्यापा करते हैं और जाने वाले को महान बताते हैं। आज दिनभर ज्योति बाबू के बारे में बहुत कुछ सुना और पढ़ा। इन सबमें बहुत सारी बातें ऐसी रहीं जो काबिल-ए-जिक्र हैं लेकिन मैं सिर्फ एक बात रेखांकित करना चाहता हूं।

आपको पता ही होगा कि 1996 में जब खंडित जनादेश के बाद संयुक्त मोर्चा की सरकार बनने की बारी आई तो सबसे पहले पीएम के रूप में ज्योति दा का ही नाम आया। ज्योति दा भी तैयार थे। बहुमत थाली में सजकर आया, पर ऐन टाइम पर पोलित ब्यूरो में शामिल कुछ सदस्यों ने टंगड़ी अड़ा दी। बस यही बात जो मैं कहना चाहता हूं। अगर ज्योति दा चाहते तो पीएम बनने पर अड़ जाते। अगर ऐसा होता तो टंगड़ी अड़ाने वालों को पीछे हटना पड़ता लेकिन बसु ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पार्टी का फैसला शिरोधार्य किया और सिद्धांतों का सम्मान करते हुए पीछे हट गए। हालांकि बाद में उन्होंने इसे ऐतिहासिक भूल माना। अब यह भूल थी या नहीं इस पर तो राजनीतिक पंडित राय देंगे ही।

अपना इस बारे में इतना लिखने का मकसद सिर्फ इतना था कि आज जब राजनीति में सिद्धांत पार्टी के रंग वाले गमछे की तरह हो गए हैं जिन्हें चुनाव दर चुनाव बदला जा रहा है। पार्षदी जैसा टिकट न मिलने पर विद्रोह और पार्टी छोडऩा तो आम घटनाएं हो गई हैं। कल तक जिनके चरण चूमते नहीं थकते थे पद और कद न मिलने पर उनको गरियाना शुरू कर देते हैं। ऐसे लोगों को ज्योति दा से सीखना चाहिए कि सिद्धांत कपड़ों की तरह बदले नहीं जाते। 

बस बहुत हुआ। समझदार के लिए इशारा काफी है और जिनकी चमड़ी मोटी हो उनके लिए जो कहना हो वह आप कहें......................

ज्योति दा को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि

सोमवार, 11 जनवरी 2010

क से कंडोम....


आइए पहले आपको दिखाता हूं इंदौर में छाए इन होर्डिंग्स को। यह मां अहिल्या की नगरी इंदौर के चौराहे पर लगी होर्डिंग है। इंदौर जहां से कुछ मील दूर संदीपनी आश्रम में भगवान कृष्ण ने सुदामा के साथ शिक्षा ग्रहण की। शहर के हर प्रमुख जगह पर यह होर्डिंग लगाया गया है। मेरी नजर में जो होर्डिंग सबसे पहले आई वह इंदौर देवी अहिल्या विवि के नजदीक एक चौराहे पर लगी है। पहले तो मैं झटके से निकल गया लेकिन जब एक साथी ने बताया तो मैंने देखा।आप भी देखिए। इसे देखने के बाद मैंने सोचा कुछ हो न हो लेकिन विरोध तो जता ही दें। यह होर्डिंग नेशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी (नाको) द्वारा जनहित में लगवाई गई हैं। बताया तो गया है कि यह एड्स से बचाव के लिए है लेकिन इसके पीछे का निहितार्थ कुछ और ही इशारा कर रहा है। कम से कम मुझे तो दूसरा पहलू भी दिख रहा है।

अब मैं अगर कहूंगा कि यह हमारी संस्कृति के खिलाफ है तो कुछ लोग कहेंगे कि मैं रूढि़वादी हूं। या मेरी मानसिकता पिछड़ी हुई है। खैर आपको जो कहना है कहें मैं तो अपनी कहूंगा। क्यों नहीं ऐसे प्रचार का विरोध होता है। क्या यह नैतिकता के खिलाफ नहीं है? या फिर हम विरोध करने की हिम्मत नहीं रखते? चैनलों पर फैशन और आधुनिकता के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। सरकार किताबों से नैतिकता का पाठ निकालकर सुरक्षित शारीरिक संबंध बनाने का ज्ञान देना चाहती है। सूर्य नमस्कार का विरोध होता है और ऐसी होर्डिंग्स का स्वागत। क्या हम यही संस्कार देना चाह रहे हैं आने वाली पीढ़ी को? कल को आप अपने बच्चे को से कलम पढ़ाएं ओर वो से कंडोम बोलने लगे तो चौंकिएगा मत। क्योंकि हम सिखा ही यही रहे हैं।

कुछ सवाल जिनका जवाब चाहिए

* क्या यही जनहित है और इससे क्या जनहित होगा?
* क्या एड्स जैसी बीमारी के खिलाफ हम संयम का पाठ नहीं पढ़ा सकते?
* क्या युवा पीढ़ी को ब्रह्मचर्य पालन करने के बारे में नहीं कह सकते?
* यह अच्छा नहीं होता कि हम कहते- विवाह के पूर्व शारीरिक संबंध न बनाएं और विवाह के बाद साथी के प्रति वफादार रहें?
* क्या ऐसे सरकारी विज्ञापन सामाजिक व्यवस्था को तोडऩे के जिम्मेदार नहीं हैं?
* क्या ऐसे विज्ञापन देह व्यापार जैसी अमानवीय परंपरा को बढ़ावा नहीं देते?
* स्कूलों-कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में कंडोम वेंडिंग मशीन लगाने से एड्स रुकेगा?
* क्या हम आने वाली पीढ़ी को यही भारत देकर जाना चाहते हैं?

जवाब तो देना ही होगा
आप गलत को रोकें अगर रोक नहीं सकते तो कम से कम विरोध जरूर करें, गलत के विरोध की आग हमेशा जलती रहनी चाहिए। इसलिए जवाब तो आपको देना ही होगा, आज मेरे सवालों का दीजिए या कल आने वाली पीढ़ी के सवालों का? चलिए जवाब नहीं देना चाहते तो कम से कम सवाल जरूर उठाइए।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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