राज और समाज पर खरी आवाज

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मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

कहीं बिस्तर में, कहीं सड़क पर

आज सिर्फ तीन बयान दे रहा हूं। यह देश की दोनों बड़ी पार्टियों के हैं। एक जिसने अपनी 125वीं सालगिरह मनाई तो दूसरी जहां पीढ़ी परिवर्तन का दौर चल रहा है। एक के नेता ने बंद कमरे के अंदर बिस्तर पर जनता का विश्वास और संविधान की मर्यादा तार-तार की तो दूसरे पार्टी के नेताओं ने खुलेआम स्थिरता का तकाजा देकर जनता से धोखा किया। दोनों तरफ मामला ब्रीच ऑफ ट्रस्ट का है। मैं ज्यादा लिखूंगा नहीं क्योंकि उनके बयान ही उनकी पोल खोलने के लिए काफी हैं। खैर सोचना जनता को चाहिए कि आखिर ऐसे नेताओं को बार-बार क्यों चुना जाए?

एनडी तिवारी सेक्स स्कैंडल: कांग्रेस के बोल

तिवारी का कदम स्वागत योग्यकांग्रेस महासचिव और मीडिया सेल के प्रभारी जनार्दन द्विवेदी ने कहा, 'तिवारी ने सार्वजनिक जीवन के मापदंडों को स्वीकारते हुए सही निर्णय लिया है। हमें इस फैसले का स्वागत करना चाहिए। उन्होंने इस आधार पर इस्तीफा दिया है कि जब तक उन पर लगे आरोपों की सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक वह किसी पद पर नहीं रहना चाहेंगे। यह अच्छा और सराहनीय कदम है।

तिवारी ऐसा कर ही नहीं सकते: कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि ८६ वर्षीय बुजुर्ग नेता खान माफियाओं के षड्यंत्र के शिकार हुए हैं। उनके ऐसे मामले में लिप्त होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बकौल दिग्विजय, मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाना चाहिए। दिग्गी ने कहा, राज्यपाल ने कुछ खानों को पट्टे पर दिए जाने के राज्य सरकार के फैसले को मंजूरी नहीं दी थी और इसके बाद उन्हें इस मामले में फंसा दिया गया। यह मामला पूरी तरह गलत है।

शिबू सोरेन से हाथ मिलाने पर भाजपा के बोल


समझौते की राजनीति में दागी भी मंजूर: मनमोहन कैबिनेट में मंत्री बनाने पर शिबू सोरेन का इस्तीफा मांगने वाली भाजपा अब उन्हीं को सीमए की कुर्सी पर बिठाने पर जा रही है। भाजपा ने कहा है कि समझौते की राजनीति दागी का भी साथ दिया जा सकता है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने कहा कि शिबू सोरन के साथ जाना पार्टी का तात्कालिक निर्णय है। आज का राजनीतिक परिदृश्य ही ऐसा हो गया कि समझौते की स्थितियां बन जाती हैं। चुनाव के समय इन्हीं सोरेन को भ्रष्टाचार का मसीहा कहने वाली भाजपा अब सफाई की मुद्रा में आ गई है। सोरेन को क्लीन चिट देते हुए सुषमा ने कहा कि जो भी आरोप थे, वर्तमान में शिबू उससे बरी हैं। सुषमा ने कहा कि भाजपा के पास तीन विकल्प थे। उसने कांग्रेस गठबंधन और राष्ट्रपति शासन के विकल्पों से किनारा करते हुए सोरेन को सरकार बनाने में सहयोग को महत्व दिया। यह लिखा ताकि सनद रहे।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

न त्वहम् कामये राज्यम्.......


न त्वहम् कामये राज्यम्, न स्वर्गम् न पुनर्भवम्।

कामये दु:खतप्तानम्, प्राणिनाम् आर्तिनाशम्।।


न तो मुझे राज्य की कामना है और न ही स्वर्ग चाहिए, न ही पुनर्जन्म चाहिए। मुझे तो दु:ख में जलते हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश करने की शक्ति चाहिए।

आजीवन इसी ध्येय के प्रति समर्पित रहे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की आज जयंती है। भारत, भारतीय और भारतीयता के प्रबल समर्थक पंडित जी का जन्म 25 दिसंबर 1861 को प्रयाग (इलाहाबाद) में हुआा। शिक्षा पूरी करने के बाद कुछ दिन तक आपने अध्यापन कार्य किया, फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। पर उनकी क्षमता और प्रतिभा के लिए यह क्षेत्र बहुत सीमित था। मालवीयजी ने सार्वजनिक जीवन में भी प्रमुख रूप से भाग लेना आरंभ किया। वे 1886 में ही कांग्रेस में सम्मिलित हुए। 1885 और 1907 के बीच तीन पत्रों का संपादन किया। वे कालाकांकर प्रतापगढ़ से निकलने वाले हिंदी समाचार पत्र हिंदुस्थान के संपादक रहे। इसके अलावा इंडियन ओपीनियन, अभ्युदय, अंग्रेजी दैनिक लीडर और पाक्षिक मर्यादा का भी गुरुतर संपादन किया। आपने हिंदी पत्रारिता और हिंदी के प्रसार में ऐतिहासिक योगदान दिया। आपके ही प्रयास से अंग्रेज राज में संयुक्त प्रांत की कचहरियों में देवनागरी लिपि और हिंदी का प्रयोग शुरू हो सका। इसके लिए मानवीय जी ने 1890 में ही आंदोलन आरंभ कर दिया था और 1900 में सफलता मिली। मानवीय जी 1909 और 1918 में अखिल भारतीय कांग्रेस के और तीन बार हिंदू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। आपकी विश्व सभ्यता को सबसे बड़ी देन काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना भारतीय संस्कृति के परिवेश में विविध विषयों की उच्चतम शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आपने 1915 में की थी। इसके लिए आपने अथक प्रयास किया। देश भर में घूमे और इसके फलस्वरूप एशिया का सबसे बड़ा विवि गंगा के तट पर आकार ले सका। अपने जीवन के अंत तक मालवीयजी पूरी शक्ति के साथ इस विश्वविद्यालय को विकसित करने में लगे रहे। अपने स्वर्गवास से कुछ समय पूर्व उन्होंने कहा था कि अगर मेरा पुनर्जन्म होता है तो मैं भारत मां और काशी हिंदू विवि की सेवा करना चाहूंगा। आपके कर्मठ जीवन का अंत 12 नवंबर 1946 को वाराणसी में हुआ। भारत मां के महान सपूत को मेरा नमन।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

breaking news: महंगाई सीमा पार से आई

आज मेरी एक मित्र ने एक स्क्रिप्ट भेजी। भेजी तो पढऩे के लिए लेकिन मैं लिखने लगा। मामला ही ऐसा था। मैं इसके सिर्फ दो पैरा आपको पढऩे के लिए दे रहा हूं। उन्होंने संक्षेप खबरें भेजी थीं मैंने थोड़ा विस्तार दिया है। (इसे भेजा है उर्मिला पुरी जी ने जो दिल्ली स्थित एक समाचार चैनल में कार्यरत हैं।) उनकी दो खबरें- संक्षेप में

1- महंगाई बढऩे से झल्लाए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी से नाराज होकर गृहमंत्री पी चिदंबरम को महंगाई के हवाई सर्वेक्षण के निर्देश दिए हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय ने खुफिया सूचनाओं के आधार पर आशंका जताई है कि महंगाई पाकिस्तान से भारत में घुसपैठ कर रही है।

2- बचत बढ़ाने और फालतू खर्च रोकने की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मुहिम को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बार फिर कमर कस ली है। मंगलवार को राज्यसभा ने भी बिना चर्चा के वह विधेयक पास कर दिया गया जिसमें खर्च कम करने की कवायद है। इसके तहत अब मंत्री और सांसद सपरिवार और अपने सहयोगियों सहित मुफ्त हवाई यात्रा कर सकेंगे। सरकार ने परिवार और सहयोगियों की कोई संख्या निर्धारित नहीं की है। इससे माना जा रहा है कि ऐसे लोग विमान में खड़े होकर यात्रा करेंगे। माना जा रहा है कि सरकार को इससे हर साल पांच हजार करोड़ का फायदा होगा। अब इसका खबर का विस्तार पढि़ए मेरी कलम से-

जबरा के मुंह पर किसी का जोर नहीं 
यह है उनकी दो बातें। शब्दों के पैमाने में आंके तो बहुत छोटा लेकिन असलियत में बात बहुत बड़ी है। महंगाई सातवें आसमान को पार कर गई है। दाल और रोटी का रिश्ता कबका टूट चुका है पता नहीं। अब तो चाय के घूंट भी इतने कड़वे हो गए हैं कि हलक से नहीं उतरते। तिसपर सरकार बहादुर कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से महंगाई बढ़ रही है। धन्य है गुरू। उधर, आपके साथी जयराम रमेश जी कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के नाम पर रायता गिराकर आए हैं तो इधर आप दिल्ली में बैठकर वही राग अलाप रहे हैं। खैर जबरा के मुंह पर किसी का जोर नहीं चलता।

अब जोर जुलुम पर मौन ही रहते हैं

एक जमाना था, दाल दो रुपए महंगी हुई तो हल्ला मचती थी। हमारे देपालपुर से लेकर दिल्ली के अंत:पुर तक नारे लगते थे- जोर जुलुम के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। पर अब तो बात नहीं रही। अब जनता के पास समय नहीं है। वह दाल-चावल जुटाने में इतना बिजी हो गई है कि उसके मुंह से नहीं निकलता- जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है। तभी तो घुमंतू भईया कहते हैं भाड़ में जाए सरकार-वरकार, हमारा तो बस 10 फीसदी इन्क्रीमेंट लग जाए। सब की अपनी-अपनी भूख है। सरकार बहादुरों का पेट है कि सुरसा का मुंह जो भरता ही नहीं और बेचारी जनता है कि पेट की आग बुझाने के चक्कर में मुंह से कुछ निकलता ही नहीं।

साजिश की बू आ रही है
अगर किसी दिन आप टीवी खोलें और हेडलाइन चलती रहे कि केंद्र सरकार ने मंहगाई का पता लगा लिया है। सरकार ने खुफिया सूचनओं के आधार पर बताया है कि मंहगाई पाकिस्तान से सीमा पार करके आ रही है। इसके पीछे आईएसआई भी है। यह देखकर आप चौंकिएगा मत। आप तब भी मत चौंकिएगा जब प्रधानमंत्री कहें कि वे विदेशमंत्री को मंहगाई की घुसपैठ के पुख्ता सुबूत देकर अमेरिका दिखाने के लिए भेज रहे हैँं। आप तब भी मत चौंकिएगा जब विदेशमंत्री हिलेरी के हाथ में हाथ डालकर कहें कि अमेरिका पाकिस्तान पर दबाव डालने के लिए तैयार हो गया है। और तब भी नहीं जब पाकिस्तान कहे कि हमें और सबूत चाहिए। हां तब जरूर चौंकिएगा जब विमान में आपको सीट न मिले। वहां पर मंत्री या सांसद जी सपरिवार, समर्थक कब्जा जमाए बैठे हों। संसद ने इसपर मोहर लगा ही दी है।


चलते-चलते दीपू का एसएमएस
हमारा शरीर 75 फीसदी पानी से बना है लेकिन अगर चोट लगती है तो खून निकलता है। जबकि हमारे दिल में रक्त होता है लेकिन दिल में चोट लगती है तो पानी निकता है।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

कोपेनहेगेन, आडवाणी, तेलंगाना आगे क्या होगा?

आज की तीन बड़ी खबरें। दो भारत से और तीसरी कोपेनहेगेन से। कई दिन से मैं अखबारों में कोपेनहेगेन के बारे में पढ़ रहा था। लेकिन हुआ कुछ नहीं। 10 दिन के नाटक, करोड़ों के खर्च और बेहिसाब कॉर्बनडाइक्साइड उत्सजर्न करने के बाद नतीजा कुछ नहीं निकला। निकले भी कैसे? सबके अपने स्वार्थ हैं। बड़ा कार्बन उत्सर्जन तो दूर हम जितना कर सकते हैं उतना भी नहीं कर सकते। ऐसे में औधोगीकरण की नींव पर टिकी देश की अर्थव्यवस्थाओं का क्या होगा? खैर नाटक था सो पटाक्षेप होना ही था। हो गया। बरकू भइया गुस्सा के सम्मेलन छोड़कर चले गए तो अपने प्रधानमंत्री को डेनिश पीएम ने हवाईअड्डे से फोन कर लौटा लिया। धन्य हैं हमारे मन्नू भाई कि लौट भी गए। खैर होना कुछ भी नहीं है। कोई भी देश अपना हित छोड़ नहीं सकता, ऐसे में हम अपने स्तर पर जो कर सकते हैं वही करें तो बहुत हैं। एक नया शब्द आया है लोकल वार्मिंग असल समस्या वही है। भारत लौट आइए।

एक यात्री का एक और पड़ाव

भारत में आज दो खबरें रही। लोकसभा चुनाव के बाद बदलाव की अटकलों पर विराम लगाते हुए आज से भाजपा में बदलाव की शुरुआत हो गई। भारतीय राजनीति के धुरंधर और भाजपा के महारथी लालकृष्ण आडवाणी अब योद्ध से सारथी की भूमिका में आ गए हैं। उनके हटने के पीछे कम से कम मैं उम्र को कारण नहीं मानूंगा क्योंकि उनकी उम्र के नेताओं में सबसे ज्यादा सक्रिय और स्वस्थ्य हैं वो। फिर भी बदलाव तो प्रकृति का नियम है, सो हो गया। अब आज राजनाथ जी की बारी है। उनकी जगह नितिन गडकरी आ रहे हैं। और आडवाणी की जगह सुषमा स्वराज का आना तो पहले से ही तय था। अटल और आडवाणी ने आरएसएस से जन्मे जनसंघ और फिर उसके आगे की पीढ़ी भाजपा को राजनीति के फर्श से अर्श तक पहुंचाया। दो सीटों से 180 सीटें। यह कमाल इसी जोड़ी का था। कांग्रेस के जमे-जमाए एकछत्र राज्य के बीच अपना अस्तित्व बनाए और बढ़ाए रखना चुनौती से कम नहीं था। वर्ना और भी कई पार्टियां पैदा हुईं और कुछ समय में ही खत्म भी हो गईं। वामपंथी इसका अपवाद भले हों लेकिन उनका भी इतनी बार विखंडन हो चुका है कि वे अपने ही अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं। चलिए मुद्दे पर लौटते हैं। राजनीति के महारथी ने आज जब नेता प्रतिपक्ष पद छोडऩे की घोषणा की तो यह भी कहा कि यहां से उनकी नई पारी शुरू होती है। बकौल आडवाणी 14 साल की उम्र में संघ के स्वयंसेवक के रूप में शुरू उनकी यात्रा जीवन पर्यंत जारी रहेगी। मुझे तो लगता है कि होगा भी यही। भारतीय राजनीति में आडवाणी उन नेताओं में शुमार हैं जिनपर भ्रष्टाचार जैसा आरोप नहीं लगा। कमल भले कीचड़ में रहा हो लेकिन उस पर दाग नहीं लगा। जैन हवाला कांड के समय नाम आया तो आडवाणी ने इस्तीफा दिया। राम रथ यात्रा ने आडवाणी ही नहीं भाजपा को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाया तो पाकिस्तान की यात्रा उनके जीवन का सबसे बुरा दौर भी रहा। खैर यात्रा में है तो ऊंच-नीच होगी ही। हमेशा समताल रास्ते नहीं मिलते। खैर आडवाणी ने आज ने नई पारी शुरू कर दी है अब देखते हैं क्या होता है। देखना तो सुषमा, जेटली और गडकरी को भी है। अब भाजपा आडवाणी और अटल के छत्र से निकलने जैसी लगी है, आगे की यात्रा अब दूसरी पीढ़ी के हवाले है।

जिम्मेदार कौन?

दूसरी बड़ी खबर देश से संसद की है। आज लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। कारण कांग्रेस। आखिर जल्दी क्या थी बिना तैयारी के तेलंगाना के घोषणा करने की। अब रायत गिराया है तो नुकसान देश को उठाना पड़ रहा है। राहुल जी, सोनिया जी कुछ समझाइये अपने सांसदों को या फिर अपने मंत्रियों को। इस नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?

चलते-चलते
आज इंदौर आईआईएम की एक महिला प्रोफेसर की हत्या कर दी गई। हमारे एक साथी रिपोर्टर मौके पर गए। बगल के ही एक मकान के बाहर खड़ी महिला से उन्होंने पूछा कि आपको पता है क्या हुआ तो उस महिला ने जवाब दिया मेरे पति खान खा रहे हैं मैं अंदर जा रही हूं। दोनों घरों कुछ ही दूरी पर हैं। और इन घरों में वो प्रोफेसर रहते हैं जो भावी प्रबंधक बना रहे हैं। आगे आप खुद समझदार हैं।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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