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सोमवार, 30 नवंबर 2009

कोड़ा'ओं के मानस पिताओं चुप क्यों हो

आज महीनेभर से ज्यादा हो गया ब्लॉग पर कुछ लिखे। मन तो बहुत किया लेकिन कुछ समय और कुछ और दिक्कतें लिखना नहीं हो पाया। इस दौरान जो सबसे जिस बात से सबसे ज्यादा परेशान रहा वह पीएचडी में रजिस्ट्रेशन था। इंदौर विवि में हिंदी विभाग में करवाना था। आरडीसी के एक दिन पहले अंतिम समय पर फॉर्म जमा हो सका। फॉर्म जमा करने गया तो पता चला पात्रता प्रमाण पत्र बनवाना होगा....... खैर लंबी  कहानी  है। इसकी तफसील में जाने का मन नहीं है। इस एक महीने में देश-विदेश में बहुत कुछ घट गया। सब पर नहीं बोलूंगा लेकिन लिब्रहान पर बिना बोले रह नहीं सकता।

17 साल बाद करोड़ों रुपए खर्च करके एक कमीशन ने यह बताया कि बाबरी विध्वंश के जिम्मेदार कौन थे। नाम वही जो पहले सुनते, पढ़ते देखते आए हैं। इतना तो ठीक था लेकिन संसद का सत्र चलते हुए किसी आयोग की रिपोर्ट लीक होना....कुछ समझ में नहीं आया। खैर दिमाग पर जोर डाला तो पता चला कि कोड़ा, स्पेक्ट्रम, महंगाई, झारखंड चुनाव के बीच कुछ तो चाहिए था जो कांग्रेस को बचा सके। मनमोहन भाई को अमेरिका रवाना करके रिपोर्ट लीक कर दी। ऐसा होने से न केवल कांग्रेस ने सालों पुराना मुर्दा खोद दिया बल्कि गन्ना किसानों की समस्या पर एकजुट हुए विपक्ष को भी अलग करने की कोशिश की। खैर कांग्रेस की चाल उलटी पड़ी या सीधी यह तो समय बताएगा लेकिन कांग्रेस ने अपनी रीति-नीति के अनुकूल ही सरकारी तंत्र का फायदा उठाया है। अभी रिपोर्ट मैं भी पढ़ रहा हूं आखिर जानूं तो हुआ क्या था? आप भी बताइएगा।

दूसरी खबर आई कल्याण सिंह की, यह तो होना ही था। दोस्त दोस्त न रहा, रहता भी कैसे? पूरब पश्चिम एक नहीं हो सकते। मुलायम को फायदा नहीं दिखा तो अलग हो लिए। कल्याण अब न घर के रहे न घाट के। अब वे फिर राम-राम कर रहे हैं। वैसे भी उन्हें राम ने राजा बनाया अब राम ही उनके मालिक हैं।

खुलासा कोड़ा के खेल का भी हुआ। पर असली खिलाड़ी पकड़े नहीं गए और न ही पकड़े जाएंगे। ठेका मजदूर से सीएम की कुर्सी तक पहुंचने वाले कोड़ा ने इतना कैसे जोड़ा कोई बताने को तैयार नहीं। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए कोड़ा को सीएम बनाने के लिए दिल्ली से लेकर रांची तक दौडऩे वाले कोड़ाओं के कांग्रेसी मानस पिताओं चुप क्यों हो? क्यों चुप हैं राहुल बाबाï? क्यों चुप हैं सोनिया मैडम? आप ने मधु कोड़ा को जमीन से उठाकर सीएम बनाया जब वो सांसद बना तो उसे अपने साथ मिलाया अब उसके कर्मों में क्या आप सहभागी नहीं? हो सके तो जवाब दें। पता मिलेगा नहीं लेकिन फिर भी मांगना मेरा हक है।

अभी 26/11 बीता है। मेरे सुझाव पर हमारे अखबार ने मध्यप्रदेश में आओ एक दीया जलाएं अभियान शुरू किया। हमारी बात पाठकों तक पहुंची। पाठकों ने इस कार्यक्रम में जोश से सहभाग किया और हमारा अभियान पूरी तरह सफल रहा। इसके लिए प्रबंधन ने मुझे शाबाशी भी दी। खास बात यह कि हमने 26/11 का स्यापा नहीं किया बल्कि एकजुट होकर आंतक के खिलाफ लडऩे का संकल्प लिया। एड़ी का पसीना सिर तक बहने के बाद मेरा पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन भी हो गया। अब बस आपकी दुआएं चाहिए ताकि जल्दी काम पूरा कर सकूं।

चलते-चलते


पिछले कुछ दिनों में छोटे भाई दीपू ने कुछ एसएमएस किए जिन्हें आपको भेज रहा हूं-

1- 
जब छोटे थे तब बड़े होने की बड़ी तमन्ना थी।
मगर अब पता चला....
अधूरे एहसास और टूटे सपनों से अच्छा तो अधूरा होमवर्क और टूटे खिलौने थे।

2- 
कहते हैं अच्छा दोस्त 0 की तरह होता है।
उसकी खुद तो कोई कीमत नहीं होती
लेकिन जिसके साथ जुड़ जाए उसकी कीमत 10 गुना बढ़ जाती है।

3- 
एक बार मोमबत्ती में जलते धागे ने मोम से पूछा जलता मैं हूं पर तू क्यों रोती है और तू पिघलती क्यों है।
मोम ने कहा- जिसे दिल में बसाया हो अगर उसे तकलीफ हो अगर वह जले तो आंसू तो आएंगे ही।

4- 
we live in a funny nation where-
1- Pizza reaches home faster than ambulance or police.
2- U’ll get car loan @ 8% but education loan @ 12%.
3- U must have many qualified degrees to manage a small job but u don’t need any degree to mannage the entire country.

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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