राज और समाज पर खरी आवाज

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गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

चलो अब सब अच्छा होगा


तुलसीदास जी ने सालों पहले ही लिख दिया था- कोउ नृप होई हमइ का हानी, चेरि छोडि़ होबई ना रानी।
मेरे जैसे देश के करोड़ों आम आदमियों के लिए हालात आज भी वैसे ही हैं, जरा भी नहीं बदले। २६ साल की उम्र में मैंने केंद्र में सरकारें बदलती देखीं, राज्य में सरकारें बदलीं लेकिन हमारे गांव का सजीवन, मुख्तार, फकीरे, पप्पू और ऐसे ही करोड़ों लोगों के हालात जस के तस हैं। नाम बदल लें,जगह बदल लें तो ऐसे पात्र आपको आपके आसपास, आपके गांव-शहर में भी दिखेंगे। किसान चाहे विदर्भ को या बीरापुर का परेशान है। मजदूर चाहे मुंबई का हो या मेरठ का मजबूर है। अब हमें राज और राजा बदलने पर खुशी या गम नहीं होता। हम चुनावों का इंतजार नहीं करते। हम पढ़ते भले रोज हों कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं लेकिन मनाते यही हैं कि एक अब चुनाव पांच साल बाद ही हों। क्या होली क्या दीवाली? हम तो दाल-चावल-चीनी-चाय-पेट्रोल-गैस-सब्जियों के दाम बदलने का इंतजार करते हैं। दाम बढ़े तो फिर मायूसी और घटे तो होली-दीवाली। इनता जानने के बावजूद मैं चुनाव परिणामों अपनी चकल्लस सुनाने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं, क्योंकि एक बार फिर जनता जनार्दन ने अपना फैसला सुनाया है, किसी को जिताया और किसी को हराया है। तो हमें भी उम्मीद जगी है कि चलो अब सब अच्छा होगा।

अथ श्री तीन राज्य विधानसभा चुनाव माहात्म
कल घर से लौटा तो सोचा कि इलाहाबाद यात्रा और दीवाली का हाल बताऊंगा, लिखना भी शुरू किया लेकिन आज चुनाव परिणाम आने थे सो काम ज्यादा था, इसलिए प्रयाग प्रवास का विवरण भविष्य के लिए टाल दिया। कल संभावनाओं पर चर्चा के बाद आज सुबह टीवी खोली तो रुझान साफ थे। कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन जारी था। सभी चैनल राजनीतिक पंडितों के साथ परिणामों का महात्म बांच रहे थे। सबकी अपनी राय, सबके अपने तर्क, इसी बीच खबर आई कि भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने बोला है कि ईवीएम कांग्रेस के लिए विनिंग मशीन बन गई है। फिर क्या था, शुरू हो गई मुख्तार की खिंचाई। होनी भी थी। जीत के बाद बोलते तो ठीक था पर हारकर बोलना तो किसी को पचेगा। जनता को भी नहीं, जिसका हाजमा सबसे ठीक माना जाता है। खैर बाद में मुख्तार ने चैनल पर आकर अपना बयान वापस लिया तब जाकर चैनलों को राहत मिली।

अब दिल्ली से विदर्भ तक पहुंचेगा पूरा एक रुपया
दिल्ली में २४ अकबर रोड से ज्यादा खुशी १० जनपथ की डीह पर मन रही थी। बड़े नेता ढोक देने पहुंच रहे थे। पहुंचना भी था। आखिर कांग्रेसियों की दौड़ यहीं से शुरू होकर यहीं तक खत्म जो होती है। महाराष्ट्र में कांग्रेस-रांकपा की जीतपर कांग्रेसियों को दोबारा सत्ता पाने की खुशी थी तो मुझे इस बात की कि चलो अब दिल्ली से चलने वाला एक रुपया पूरा का पूरा विदर्भ तक पहुंच जाएगा। दरअसल, दिल्ली में देने वाले और विदर्भ में खर्चने वाले एक ही हैं, इसलिए मैं यह खुशफहमी पाल रहा हूं। हां फैशन के इस दौर में इस बात की गारंटी मैं नहीं लेता कि यह पैसा वास्तविक जरूरतमंदों तक ही पहुंचेगा। मुझे खुशी इस बात है कि अब विदर्भ के किसान भाईयों को आत्महत्या नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि आम आदमी की जो सरकार केंद्र में राज कर रही है वही राज्य में फिर आ गई है।

कांग्रेस की जीत का राज खुल गया
एक गंभीर चैनल पर एक सिद्धांतवादी अखबार के प्रधान संपादक से जब माहाराष्ट्र के चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने प्रसन्नता जाहित करते हुए कांग्रेस-रांकपा की जीत का राज खोला। कहा, मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि घृणा फैलाकर राजनीतिक करने वालों की हार हुई है। जिस रास्ते पर चलकर बाल ठाकरे ने सत्ता हासिल की थी उसी रास्ते पर उनके ही खून ने उन्हें जबरदस्त हार का सामना करने पर मजबूर किया है। जैसे को तैसा मिला है। मनसे भले महाराष्ट्र की राजनीति में अभी कोई सक्रिय भूमिका न अदा कर सके लेकिन राज ठाकरे ने अपनी ताकत का एहसास करा दिया है। यहां से बाल ठाकरे का पतन और राज का उदय शुरू हो गया है। यह टिप्पणी सुनकर मेरे कान खड़े हो गए। मुझे बीते साल हुएमनसे का आतंक याद आने लगा। क्या राजनीति में गलत को मिटाने के लिए गलत ही करना सही है? अगर ऐसा होता रहा तो राज ठाकरे जैसे लोग रक्तबीज जैसे पैदा होते रहेंगे। राज भले ही पैदाइश ठाकरे परिवार की हों लेकिन उन्हें पाल पोसकर बड़ा किया है कांग्रेस-रांकपा सरकार ने। हम भूले नहीं हैं कि राज के अत्याचार के सामने केंद्र से लेकर राज्य तक पूरी सरकार असहाय दिखी। कांग्रेस कुछ करना भी नहीं चाहती थी क्योंकि वह तो शिवसेना की काट ढूढ़ रही थी जो उसे बैठे बठाए मिल गई। वैसे भी फोटोग्राफर उद्धव में कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे जैसी मौलिक नेतृत्व क्षमता नहीं है और भाजपा के पास महाराष्ट्र में कोई बड़ा नेता, जिसका असर साफ दिखा है। मैं दिल और दिमाग दोनों से राज की जीत पर खुश नहीं हूं और न ही विद्वान संपादक जी की टिप्पणी से सहमत। राज जैसे लोगों को जनता को नकारना ही होगा, नहीं तो ऐसी विनाशक मानसिकता कभी खत्म नहीं होगी। जब मैं यह लाइनें लिख रहा हूं तो मेरे जेहन में भिंडरावाले की याद कौंध गई है। अब क्यों और कैसे यह फिर कभी चर्चा करेंगे।

चौटाला की चोट से चोटिल हो गए हुड्डा
हरियाणा में हुड्डा साहब ने छह महीने पहले चुनाव तो घोषित करवा दिए लेकिन इन्होंने भी वही गलती की जो अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। दोनों को अतिआत्मविश्वास ले डूबा। वैसे हरियाणा में कांग्रेस से कुर्सी से महज छह सीटें दूर है लेकिन यह छह सीटें पाना बहुत भारी है। हजकां के कुलदीप विश्रोई ने कह दिया है कि वे कांग्रेस को साथ नहीं देंगे। भाजपा की चार और शिवसेना की एक सीटे तो वैसे भी चौटाला को ही मिलेंगी। इसके अलावा बची बसपा की एक और अन्य की सात अब देखना है कि इसमें से कौन सेंध लगाता है। चौटाला भले परिणाम से खुश हो रहे हों, होना भी चाहिए क्योंकि इस बार उन्होंने पिछली बार की तुलना में २२ सीटें ज्यादा जीती हैं लेकिन मैं खुश नहीं हूं। दरअसल एक तो सरकार अस्थिर बनेगी दूसरा कांग्रेस की इतनी कामकाजी सरकार जिसके सीधे मुकाबले कोई था ही नहीं उसे मुंह की खानी पड़ी है। सरकार जो भी बने मैनेज होकर बनेगी और हमेशा पेंडुलम की तरह झूलती रहेगी। अगर कांग्रेस आंकड़ा जुटाने में कामयाब हो भी गई तो भी हो सकता है कि हुड्डा को आराम करने को कह दिया जाए। खैर जो भी होगा वह तो १० जनपथ को ही करना है, क्योंकि विधायक दल नेता का फैसला हमेशा कांग्रेस अध्यक्ष पर छोड़ता है।

अरुणाचल में अचल रहा कांग्रेस का अहिवात
पूर्वोत्तर के विकसित राज्य में कांग्रेस ने फिर वापसी की है। वैसे पूर्वोत्तर राज्यों में राजनीति से लोगों का उतना राफ्ता नहीं जिनता बाकी भारत में है। अभी आंध्र में रेड्डी साहब के निधन के बाद तो आप को याद ही होगा कि क्या हुआ था? खैर मुझे खुशी इस बात की है कि चीन जो आए दिन हमारे अरुणाचल में चहलकदमी करने चला आता है अब शायद उस पर लगाम लगे। हमारी जमीन भले ही उसपर घास का एक तिनका न उगता हो लेकिन वह हमारी रहे, क्योंकि मां कितनी भी असहाय और नि:शक्त क्यों न हो जाए मां ही रहती है और उसका प्यार वैसा ही अचल रहता है। मुझे खुशी है कि अरुणाचल में कांग्र्रेस का अहिवात अचल रहा और अब हमारी जमीन पर हमारा हक अटल रहेगा। दलों की जीत-हार स्वीकार पर देश की न हो हार
विजयरथ पर सवार कांग्रेस और हार-हारकर घुटनों के बल आ गई भाजपा को अब अगले चुनाव का इंतजार है। भाजपा को हार का सिलसिला तोडऩे के लिए तो कांग्रेस को जीत की सीढिय़ां मजबूत करने के लिए। लोकसभा चुनाव के बाद लग रहा है कि भाजपा अंदर से टूट चुकी है। नेतृत्व का सर्वथा अभाव है। आडवाणी पर्दे के पीछे चले गए हैं तो अध्यक्ष जी नदारद हैं। दूसरी तरफ राहुल बाबा दलितों की बस्ती में घूम-घूमकर लीड लिए जा रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों को मेरी शुभकामनाएं। चाहे जो जीते चाहे जो जो हारे बस देश और देश के लोगों की हार न हो पाए।

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

बरकू भइया को नोबेल मिला कैसे?

आज बड़े दिनों बाद घुमंतू का फोन आ गया। दरअसल वे भारत भ्रमण पर निकले थे आज सुबह लौटते ही फोन घनघना दिया। क्या हाल है मियां? मैं उनींदा सा पूछने ही जा रहा था कि कहिए? लेकिन वो कहां रुकने वाले थे, छूटते ही बोले- क्या गुरु सोते ही रहोगे? लगे हाथ- उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोवत है। जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है- सुना डाला। मैंने पूछा क्या बात है भारत खोज लिया क्या? पर वे मेरी कहां सुनने वाले थे, बोले टीवी खोलो, बरकू भइया को नोबेल मिल गया। अब मेरे जैसे व्यक्ति को क्या घुमंतू भइया के संबंधों का क्या पता। सो मैंने पूछ लिया कि कौन बरकू? दूसरा कोई दिन होता तो उखड़ जाते पर आज बोले अरे अपने बराक ओबामा। मुझे लगा घुमंतू मजाकिया मूड में है। लेकिन तब तक टीवी खोल चुका था। अचानक मुझे लगा कहीं, एक अप्रैल तो नहीं? लेकिन ऐसा था नहीं।

11 दिन में इतना बड़ा सम्मान
टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग खबर थी कि ओबामा को शांति का नोबेल। मुझे आश्यर्च हुआ। होना भी था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ओबामा ने आखिर नौ महीनों में ऐसा क्या किया कि उन्हें इस सम्मान के लायक चुना गया। मेरी मूढ़मति को ऐसा कोई काम नहीं दिखा। वैसे भी ओबामा को राष्ट्रपति के रूप में मात्र 11 दिन के काम के बदले यह अवार्ड मिल रहा है। दरअसल, नोबेल पुरस्कारों के लिए नामांकन की अंतिम तारीख एक फरवरी होती है। यानी इस वर्ष एक फरवरी तक ओबामा ने बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति जो कार्य किए, उनके लिए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया। ओबामा ने 20 जनवरी 2009 को राष्ट्रपति पद ग्रहण किया था। इसका मतलब सिर्फ 11 दिनों के कार्यकाल के आधार पर उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुन लिया गया। यह आश्यर्चजनक है।

सवाल तो उठने ही थे
पुरस्कार कोई भी हो कभी न कभी उनके चयन और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठता ही है। नोबेल के चयन पर भी यह पहली बार नहीं है जब सवाल उठा हो। पहले भी ऐसे मौके आए हैं। अब यह किन कारणों से किया गया, पता नहीं। लेकिन इस सम्मान से ओबामा की प्रतिष्ठा बढऩे के स्थान पर कम ही होगी। क्योंकि दुनिया में ऐसा मानने वाले बहुत लोग हैं कि इसके पीछे 'सेटिंग' है। इस फैसले को सही ठहराने का तर्क दिया जा रहा है कि ओबामा की विश्वशांति को लेकर जो योजनाएं हैं इससे वे सफल होंगी। खैर यह तो भाविष्य के गर्भ में है। यह तो वही बात हुई कि फलां छात्र रोज क्लास करता है तो इसे गोल्ड मैडल दे दो। अब वो क्लास में कितना पढ़ता है उसकी समझ कितनी है, इससे मतलब नहीं। खैर ओबामा ने भी नम्रता दिखाते हुए कहा है कि वे खुद को इस सम्मान के काबिल नहीं मानते, फिर क्यों................ अपनी ओबामा से कोई जातीय दुश्मनी नहीं है, क्योंकि हो भी नहीं सकती है। न ही मेरा उनसे कोई सैद्धांतिक विरोध है लेकिन मैं नोबेल चयन समित के इस फैसले का विरोध करता हूं।

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

हृदयघात से 'बालि' की मौत

जी हां, यह घटना सच है। 27 सितंबर को इलाहाबाद के यमुनापार इलाके के लालापुर गांव में यह घटना हुई। मैं वानरराज सुग्रीव के भाई बालि की ही बात कर रहा हूं, जिसे आमने-सामने के युद्ध में काल भी नहीं हरा सकता था। भगवान विष्णु की आठ कलाओं के अवतार भगवान राम ने भी उसे छिपकर मारा। जी हां मैं उसी बालि की बात कर रहा हूं जिसने छह महीने रावण को अपनी कांख में दबा कर रखा। मैं अश्वतथामा मरो, नरो या कुंजरों की तरह आधी बात को हवा में नहीं उड़ाऊंगा और न ही ऐसा होने दूंगा। हो सकता है यह मात्र संयोग हो लेकिन यह सच है। मैं उस बालि को जानता था। बचपन से लेकर आज तक उसे देखता आया था। हालांकि इधर कुछेक सालों से गिनी-चुनी मुलाकातें ही थीं संबंध वैसे ही अच्छे थे। खैर पहले उनके निधन की  घटना के बारे में बता दूं उसके बाद उनके बारे में।

लालापुर गांव में हर साल की तरह रामलीला चल रही थी। चौथा-पांचवां दिन था। सुग्रीव-राम की मित्रता होती है। आगे की कहानी क्या है इसे बताने की जरूरत नहीं। मुद्दे की बात यह कि बालि का चरित्र निभा रहे थे प्रभाशंकर शुक्ल। जिन्हें हम प्यार से परभा मामा कहते थे। बालि-सुग्रीव के बीच युद्ध हुआ। राम ने ओट लेकर तीर छोड़ा जो बालि बने परभा मामा के सीने पर लगा। तीन कागज के बनाए गए थे ताकि चोट न लगे। रोल की मांग के अनुसार बालि विलाप करता हुआ जमीन पर गिर गया। राम आए, बालि ने अपनी बात कही, राम ने उनका जवाब दिया और पर्दा गिर गया। इसके बाद परभा मामा के सीने में दर्द शुरू हुआ। मंच से नीचे आते-आते वे बेहोश हो गए। अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने बताया कि वे आधा घंटे पहले ही गुजर चुके हैं। इसके बाद क्या था नाना प्रकार की बातें शुरू हो गईं। जितने मुंह उतनी बातें। किसी ने कहा मोक्ष मिला, किसी ने कहा स्वर्ग हुआ, कोई बोला बैकुठ मिला, राम मिले और भी बहुत कुछ। खैर हम इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहेंगे। बस इतना ही कहना है कि परभा मामा आदमी बहुत नेक थे। मैंने भी उनके साथ रामलीला में रोल किया था। मैं लक्ष्मण बना  था मामा ने जनक और बालि का किरदार निभाया था। बात लगभग 16 साल पहले की है। गजब के कलाकार थे। बहुत अच्छी आवाज और बहुत ही अच्छा अभियन। किरदार को जीते थे मामा मंच पर।

एक बार की बात है, मुझे हनुमान का रोल मिला, मेरी तबीयत खराब हो गई थी। उस दिन राम-सुग्रीव मित्रता होनी थी। हनुमान को राम-लक्ष्मण को कंधे पर उठाकर सुग्रीव के पास तक ले जाना था। राम-लक्ष्मण दोनों मेरे हम उम्र थे। मैंने मंच के नीचे उन्हें उठाने की कोशिश की तो नाकाम रहा। मैंने मामा से कहा जैसे ही उनको कंधे पर उठाने लगूं आप पर्दा गिरवा देना। मामा ने कहा तुम उठा लोगे। मैंने कहा अगर गिर गया तो बहुत बदनामी होगी। उन्होंने कहा, भगवान पर भरोसा रखो, फिर भी अगर दिक्क्त हुई तो मैं पर्दा गिरा दूंगा। मैं मंच पर गया राम से हनुमान का संवाद हुआ। मैंने नीचे झुककर दोनों भाइयों को कंधे पर उठाया और जयश्रीराम का उदघोष कर मंच से उतरा और उनको लेकर चल दिया गंतव्य की ओर। यह यह मेरे लिए अविश्वसनीय था। रोल खत्म कर मंच से उतरा तो मामा ने आकर पैर छुआ बोले वाह? भांजे मुझे पता था कि मंच पर भगवान शक्ति देते हैं।
प्रभाशंकर मेरे सगे मामा नहीं थे लेकिन मुझे मानते बहुत थे।

आज उनके जाने की खबर सुनकर आंखें भर आईं। मैंने जो भी लिखा है वह न तो कहानी है, न गल्प, न मिथक, न अंधविश्वास, न किसी का महिमामंडन और न ही काल्पनिक कथा। यह सच है, उनके निधन की खबर सुनकर मैं लिखता चला गया और अब आप के साथ इसे साझा कर रहा हूं। भगवान उनकी आत्मा को शांति दें और उनके परिवार को इस दु:ख से लडऩे की शक्ति।
 इस घटना को इलाहाबाद के लगभग सभी समाचार पत्रों में अच्छी जगह मिली। यह फोटो दैनिक जागरण में प्रकाशित समाचार की कटिंग है।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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