राज और समाज पर खरी आवाज

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मंगलवार, 25 अगस्त 2009

ब्रेकिंग न्यूज... भाजपा में कलह

देश की सबसे बड़ी समस्या भाजपा की अंतर्कलह

आज कल हमारे ईमानदार, जिम्मेदार, गंभीर, राष्ट्रभक्त समाचार चैनल (लों) में दिनभर लगभग यही ब्रेकिंग न्यूज चल रही है। वह भी तब जब देश बहुत कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। सूखा, बाढ़, स्वाइन फ्लू और महंगाई ये बड़ी समस्याएं जो देश के सामने मुहं बाए खाड़ी हैं। देश का आम आदमी इसमें पिस रहा है। लेकिन हमारे चैनलों के प्राइम टाइम तो छोडि़ए किसी भी टाइम इन मुद्दों पर खबर दिखाने के लिए टाइम नहीं है। क्यों नहीं है यह तो वही जाने लेकिन हम जो देख रहे हैं वो यह कि भाजपा के किसी नेता ने कुछ बोला तो वह नेशनल लीड बनाया जा रहा है। जसवंत सिंह जो अक्सर बोलते रहे और जब बोला कुछ न कुछ विवाद जरूर हुआ। ऐतिहासिक तथ्यों का ज्यादा ज्ञान तो मुझे भी नहीं है लेकिन आम धारणा यही है कि जिन्ना देश के बंटवारे के सूत्रधार रहे। धारणा यह भी है कि गांधी जी चाहते या दूसरे शब्दों में कहें तो अड़ जाते तो शायद विभाजन न होता। यही चीज पंडित नेहरू के बारे में भी लागू होती है। (यह मैं आम लोगों में प्रचलित धारण की बात कर रहा हूं। न तो यह मेरे शोध का परिणाम है और न ही ज्ञान का।) लोगों का मानना है कि अगर पंडित नेहरू की जगह सरदार पटेल प्रधानमंत्री बने होते तो देश की दिशा-दशा दोनों अलग होती। खैर पंडित नेहरू प्रधानमंत्री क्यों बन गए ओर सरदार पटेल क्यों नहीं बने यह तो इतिहास के विद्वान बताएं। हम तो आज की बात करते हैं।

यह करो, फिर यह भी करो

जसवंत ने अपनी किताब में विभाजन का जिम्मेदार सरदार पटेल और नेहरू को ठहराया और जिन्ना को महान बताया (जैसा की खबरों में पढ़ा है) यह भाजपा क्या देश की आम जनता को भी स्वीकार नहीं होना था। अगर केवल पंडित नेहरू या गांधी जी को ठहराया होता तो भाजपा इतना सख्त कदम न उठाती। किताब के मार्केट में आने से पहले ही देश के कुछ 'गंभीर' समाचार चैनलों ने पटेल के बारे में कही बातें कोट कर यह कहना शुरू किया कि भाजपा के जसवंत के खिलाफ कार्रवाई करे (अपरोक्ष)। चैनलों के प्राइम टाइम में इस पर डिबेट हुई। एसएमएस मंगाए गए और फिर चैलन के जरिए कथित तौर पर जनता का फैसला भी सुनाया गया। जब भाजपा ने जसवंत को निकाल दिया तो भाजपा के पीछे पड़ गए कि अब लालकृष्ण आडवाणी को क्यों नहीं निकाला जा रहा? भाजपा से निकल चुके या निकाले जा चुके लोगों को टीवी पर घंटों जगह दी गई। देश के नामी पत्रकार ने अरुण शौरी का इंटरव्यू किया। उनका पूरा इंटरव्यू टीवी पर तो दिखाया नहीं इतना जरूर है जो दिखाया वह भाजपा के खिलाफ था। शौरी जी देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। जहां तक मुझे याद है- बोफोर्स मामले का खुलासा शौरी जी की ही कलम से हुआ था जिससे देश में कांग्रेस की जड़ें हिल गर्ईं थीं। वे पढऩे-लिखने वाले राजनेता हैं, जिनकी की देश को जरूरत है।

इस खबर से किसका फायदा होगा?
चुनाव और चुनावी मौसम बीतने के बाद मैं राजनीति पर लिख नहीं रहा था लेकिन आज रहा नहीं गया। मैं यह समझना चाहता था कि आखिर हमारे गंभीर और जिम्मेदार समाचार चैनलों की इस कवायद से फायदा किसका होगा? क्या जनता का होगा? क्या देश का होगा? या किसी और का होगा? बड़ी माथापच्ची के बाद भी मुझे इसमें आम आदमी या देश का कोई फायदा नहीं नजर आया। हां! आम आदमी की धारणा है कि इससे कांग्रेस का फायदा जरूर होगा। दअसल, अगले कुछ महीनों में तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र। तीनों राज्यों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है। हरियाणा को छोड़ दें तो महाराष्ट्र कांग्रेस की हालत ठीक नहीं है और झारखंड में भी उसकी हालत पतली मानी जा रही है। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि चैनल कांग्रेस के कहने पर चलते हैं लेकिन जो दिखा रहा है उससे तो यही लगता है कि चैनल कांग्रेस की आवाज बोल रहे हैं। मनमोहन ने 100 दिन में आम आदमी को राहत देने का वादा किया था लेकिन इन 100 दिनों में आम आदमी का खून चूस लिया। चैनलों पर महंगाई की खबर नहीं है। जनता पिस गई है। लगभग आधा देश सूखे से और आधा देश बाढ़ से त्राहि-त्राहि कर रहा है लेकिन हमारे चैनलों को इसकी चिंता नहीं है। उन्हें चिंता है कि भाजपा की कुनबा बिखर रहा है। पता नहीं चैनल कुनबा सुधारने में जुटे हैं या फिर और बिखराकर कांग्रेस का रास्ता साफ करने में यह तो समय बताएगा।

आम आदमी की धारणा
मेरी एक आम आदमी से बात हुई उसने कहा, मेरी भाजपा से सहानुभूति है लेकिन मैं यह नहीं चाहता कि चैनल उसकी खबरें न दिखाएं। हां इतना जरूर चाहता हूं कि चैनल यह भी दिखाएं-

* हरियाणा में जाति पंचायत ने एक युवक की जान ले लीं। वहां की पंचायतें आए दिन ऐसे आदेश दे रही हैं। हरियाणा में कांगे्रस की सरकार है क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं। क्या किसी चैनल ने हरियाणा के मुख्यमंत्री को कठघरे में खड़ा किया? नहीं किया लेकिन क्यों नहीं?

* पिछले पांच साल में विदर्भ सैकड़ों किसानों ने आत्महत्या कर ली। पांच साल से केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार है। इन मौतों का जिम्मेदार कौन होगा? क्या किसी चैनल ने प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष, कांग्रेस के वरिष्ठ महासचिव राहुल गांधी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, केंद्रीय कृषि मंत्री से यह सवाल पूछा? राहुल बाबा यूपी और एमपी सहित संसद में जिस कलावती का जिक्र करते हैं वह महाराष्टï्र की ही है।

* देश बाढ़ और सूखे की दोहरी मार से जूझ रहा है। क्या किसी चैनल से केंद्र या राज्य सरकार से जानने की कोशिश की कि हर साल आने वाली इस विभीषिका से निपटने के लिए क्या दूरगामी कदम उठाए जा रहे हैं? किसी राज्य को करोड़ों का अनुदान और किसी को ठेंगा। बुंदेलखंड जैसे इलाके जहां की राहत की जरूरत है, उसपर निरा राजनीति क्यों? जैसा बुंदेलखंड के लिए प्राधिकरण बनाया जा रहा है वैसा ही विदर्भ के लिए क्यों नहीं? नदी जोड़ो परियोजना का क्या हुआ?

* महंगाई आसमान छू रही है। गरीबों के मुंह का निवाला छीना जा रहा है। दाल 100 किलो तक बिकी। चीनी 40 तक पहुंची। चावल, गेहूं, दूध सब में आग लगी है। सरकार क्या कर रही है। नारा दिया 'कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ' और चुनाव के 100 दिन नहीं बीते कि वही हाथ सीधे आम आदमी के मुंह पर दे मारा। पेट्रोल पांच रुपए महंगा, डीजल तीन रुपए महंगा... एक बार की बात है जब प्यास 80 रुपए किलो बिकी। मीडिया और चैनलों ने हाहाकार मचा दी। दिल्ली की सत्ता पलट गई। पर आज महंगाई पर कोई चैनल कुछ नहीं बोल रहा क्योंï? आखिर दिल्ली में आज दाल 100 रुपए किलो बिक रही है? यह भी सनद रहे कि एक केंद्रीय मंत्री की महाराष्ट्र में दर्जनों चीनी मिले हैं।

* मायावती यूपी में हाथी की मूर्तियां लगवा रही हैं। गलत हैं। मैं माया का पक्षधर नहीं। पर देश में मूर्तियां लगवाने की परंपरा शुरू किसने की? बांद्र-वर्ली पुल का नाम वीर सावरकर के नाम से बदलकर राजीव गांधी सेतु कर दिया गया। पर किसी चैनल ने सवाल नहीं उठाया। क्या पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के अलावा देश में महान विभूतियां नहीं हैं। क्या किसी चैनल ने कभी यह सवाल पूछा किया देश में कितने नामकरण गांधी-नेहरू परिवार के लोगों के नाम पर किए गए हैं? अगर किसी ने कांग्रेस को ऐसा करने से रोका होता तो आज मायावती की हिम्मत न होती हाथियां लगवाने की या अपनी मूर्तियां सजवान की।

* सोमनाथ चटर्जी को माकपा ने निकाल दिया। तब माकपा का कुनबा टूटता नहीं दिखा। विजयन और अच्युतानंदन विवाद सड़कों पर आया लेकिन माकपा का कुनबा टूटता नहीं दिखा। पश्चिम बंगाल में एबी बर्धन माकपा पर बरसे तब भी वाममोर्चा टूटता नहीं दिखा। आखिर क्यों? जितनी बड़ी हार भाजपा की हुई उससे ज्याद बड़ी माकपा की लेकिन.....

* अब बात स्वाइन फ्लू की। बीमारी दुनिया में फैली लेकिन हमारी सरकार नहीं चेती। पुणे में पहली मौत हुई तो स्वास्थ्य मंत्री ने कहा गलती मरीज के परिजनों की थी। किसी चैनल ने उनकी जुबान नहीं पकड़ी। यही कारण है कि आज देश में इससे 75 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। स्वाइन फ्लू के सबसे ज्यादा शिकार महाराष्ट्र में बने जहां कांग्रेस की सरकार है। क्या इन मौतों की जिम्मेदार कांग्रेस नहीं? अगर है तो क्यों नहीं कांग्रेस से सवाल होता? यह मामला प्राइम टाइम की खबर क्यों नहीं बनता? क्यों नहीं इस सवाल एसएमएस मंगाए जाते- स्वाइन फ्लू से महाराष्ट्र में हुई मौतें केंद्र की लापरवाही से हुईं या राज्य सरकार की लापरवाही से?

और चलते-चलते....
मुझे पूरी उम्मीद है कि इस बारे में चर्चा होगी। उम्मीद तो यह भी है कि सवालों का जवाब मिलेगा। लेकिन मेरा मकसद यह नहीं। मकसद यह है कि महंगाई कम हो, बाढ़ और सूखे से हमेशा के लिए निजात मिले, स्वाइन फ्लू और ऐसी ही अन्य महामरियां आम आदमी को अपना शिकार न बनाएं, समाचार चैनलों के प्राइम टाइम में और अखबारों के फं्रट पेज पर महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या, पंचायतों की तानाशाही की खबरें हों और इसे लिए जिम्मेदार सरकारों से भी सवाल किए जाएं।
आमीन....सुम्मामीन

बुधवार, 5 अगस्त 2009

मेरी दी

जेठ की दुपहर में फुहार बनके आई,
मेरे सूखे जीवन में बहार बनके आई।
रेशम की डोर से बांधकर मुझको,
मेरे लिए बहन का प्यार बनके आई।।

दी को समर्पित यह पंक्तियां 2004 में मुझसे अनायास ही बन गई थीं। लोग कहते थे कि वो मेरी मुंहबोली बहन थी पर मुझे ऐसा कभी नहीं लगा। वो तो सिर्फ बहन थी मेरी, जिसे प्यार से मैं दी कहता था। दी मुझे बहुत प्यार करती थी/है। इसे संयोग कहें या विधि का विधान? मेरे और दी के जन्मदिन में साल को छोड़ दें तो पांच दिन का फर्क था और मेरी उसकी शादी भी एक ही महीने में हुई। यहां भी तारीखों का फर्क सिर्फ पांच ही दिनों का था। मेरे उसके विचार-व्यवहार और कार्य में भी ढेरों समानताएं थीं। मेरा दर्द उसकी आंखों में झलकता था तो उसकी तकलीफ मेरे आंसू बनकर निकलती थी। ऐसा था हमारा प्यार।

अब
सुनिए कि दी कैसी थी। गिलहरी जैसा छोटा सा मुंह, वैसी ही चंचलता। खाने की इतनी शौकीन की पूछिए मत। जैसी गिलहरी मस्ती से दीन-दुनिया से बेखबर हाथ लगे फल को खाती है वैसी ही वो थी। राह चलते मूंगफली खाना, भूजा खाना, समोसा खाना उसकी पसंदीदा आदतें थीं। उसे यह भले न पता रहे कि कल किस विषय का एग्जाम है लेकिन किस हलवाई की दूकान का समोसा अच्छा है, कहां की लस्सी, किसका लौंग लता और किसके गुलाब जामुन उसे जरूर पता रहता था। सिर्फ पता ही नहीं, उसके खाने का तरीका भी बहुत अच्छा था। समोसे का एक कौर काटने के बाद अपनी आंखें पूरी फैलाकर मेरी ओर देखती थी। बोलती नहीं थी, यूं कहूं मुंह में इतना भरा रहता था कि बोल नहीं पाती थी। पता नहीं वह समोसे का स्वाद महसूस करती थी या आखों के जरिए सबको बताती थी? उसका खाना भी उसकी ही तरह अद्भुत और अद्वितीय था।

खाने की आदत पर जब मैं कहता तुम्हारी शादी हलवाई से करवा दूं तो खुश हो जाती और कहती तुम जब आओगे तो तुम्हें भी खिलाऊंगी। सड़क पर चलते-चलते पता नहीं किस गाने पर थिरकने लगे? एक बार की बात है, हम बहुत व्यस्त बाजार से गुजर रहे थे। तभी कहीं गाना बज रहा था- मुझसे शादी करोगी..... बस फिर क्या लबे रोड थिरकने लगी तो उसे रोकना पड़ा। एक बार हमलोग विंध्याचल गए थे। बस से लौटने लगे तो बोर हो रहे थे। मैंने कहा तुम्हारी शादी में मैं आऊंगा तो क्या करना पड़ेगा? बस फिर क्या शुरू हो गई। सब के काम बंट गए। कोई नाई बना, कोई हलवाई, किसी के जिम्मे सफाई का काम आया और किसी के बधाई गाने का। मेरे जिम्मे आया उसको खिलाने का।
तब तक मैंने एक मोबाइल ले लिया था। यूनिवर्सिटी में दो दिन की छुट्टी थी सो मैं घर आया था। उधर दी हॉस्टल में अपनी प्रिय सहेली के साथ घूम रही थी। तभी उन लोगों ने हॉस्टल के गार्डन में किसी लड़की को रोते और फोन पर बात करते सुना। संयोग से वह लड़की जिससे बात कर रही थी उसका और मेरा नाम एक था। इतना सुनते ही उनके कान खड़े हो गए। दी ने मुझे फोन मिलाया। अब दुर्योग देखिए उस समय मेरा भी फोन व्यस्त था। फिर क्या हुआ पूछिए मत? मेरे बारे में सारी भड़ास निकाल ली। बिगड़ गया है, आने दो बताती हूं आदि, आदि.....। थोड़ी देर बाद मेरा फोन मिल गया। छूटते ही पूछा किससे बात कर रहे थे? मैंने बताया तो बोली मेरी कसम झूठ मत बोलना और जब मैंने उसकी कसम लेकर वही बात कही तो वह मान गई। उसे पता था कि मैं उसकी झूठी कसम नहीं ले सकता। उसके गुस्से की बात मुझे आने के बाद उसकी सहेली से पता चली।

समोसे या खाने पीने की चीजों की छीना झपटी और बस में खिड़की के बगल बैठने की बात छोड़ दें तो मेरी उससे कभी लड़ाई नहीं हुई। हां हमारा प्यार और विश्वास रिश्ते की उम्र के साथ बढ़ता गया। वो क्या-क्या करती थी बताने बैठूं तो उम्र गुजर जाए। 2005 में वह वह अपने घर चली गई और मैं अपने घर। उससे बात किए चार साल भले बीत गए हों लेकिन वो आज भी मेरे मन में है। मेरे दिल में है। वैसे तो साल के 365 दिन वह मुझे याद आती है लेकिन आज के दिन मैं उसे भूलता ही नहीं। चार साल पहले उसने मुझे राखी बांधी थी। मुझे घर जाना था। सुबह मैं उससे मंदिर में मिला। राखी और मिठाई लेकर राखी बांधकर एक मिठाई मेरे मुंह में डाली और एक अपने। वो सुबह आज भी मुझे याद है। उससे मिलने के बाद मुझे आज तक यह कभी नहीं लगा कि मेरी कोई बहन नहीं। लगे भी कैसे मिल जो गई थी। ये कहानी मेरे दिन के बहुत करीब है। उतनी है जितनी दी। दी जहां भी हो खुश रहे, क्योंकि उसके चेहरे पर सिर्फ खुशी अच्छी लगती है।
आप सबको रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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