राज और समाज पर खरी आवाज

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गुरुवार, 23 जुलाई 2009

आजाद तुम्हारी जय हो

सादर नमन
आज ही के दिन 1906 में पैदा हुए आजाद अंग्रेजों का सामना करते हुए 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के आजाद पार्क (तब अल्फे्रड पार्क) में शहीद हो गए। तब उनकी उम्र मात्र 25 साल थी। मैं स्वातंत्र समर के महान सेनानी को नमन करता हूं।
वाह रे नेता, बहुत खूब मीडिया
...और आजाद को भी भुला दिया। सरकार ने तो भुलाया ही हमारे देभभक्त चैनल वाले भी भूल गए। राखी का स्वयंवर का और सच का सामना जैसे भोथरे कार्यक्रमों की क्लिपिंग दिखाकर टीआरपी बढ़ाने वाले न्यूज चैनलों को लानत है। सरकार की क्या कहूं? आजाद के नाम पर वोट थोड़े लेना है जो उनको याद करें। अरे जिनकी वजह से आजाद हवा में सांस ले रहे हो उनको रस्म आदयगी के लिए ही सही याद करने का नाटक भर तो कर देते। खैर लिखा इसलिए नहीं कि तुम्हारे याद करने से कोई फर्क पड़ता है, ये लिखा इसलिए ताकि हमको तो सनद रहे....

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

अब आदमी का आदमी से प्यार करना जायज

देश में समलैंगिकता को वैध करने की ओर एक कदम और बढ़ गया। हाईकोर्ट के फैसले के बाद आदमी सरकार पहले से ही ऐसे लोगों के प्रति उदार रुख दर्शा रही थी। अब कोर्ट ने उसका रास्ता साफ कर दिया है। माननीय कोर्ट ने परिस्थतियों के आधार पर फैसला दिया होगा, लेकिन देश की संस्कृति की अनदेखी की गई है। कानून भले इसे मान्यता दे लेकिन समलैंगिक संबंध को सामाजिक मान्यता मिलना नामुमकिन है। क्योंकि प्रकृति विरुद्ध होने के साथ ही यह सभी धर्मों के विरुद्ध है। ऐसा हो तो कैसा होगामैं जो भी कह रहा हूं वह कोर्ट के फैसले पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर जो इस फैसले का समर्थन कर रहे हैं उनके लिए कह रहा हूं। अब पुरुष से पुरुष का (गे) और महिला से महिला (लेस्बियन) का संबंध अपराध नहीं माना जाएगा।

सोचिए जरा कैसा होगा
किसी का बेटा अपने मां-बाप से कहे कि वह एक लड़के से प्यार करता है और अगर उसकी शादी नहीं कराई तो वह जान दे देगा। कोई लड़की अपनी मां को बताए कि वह अपनी सहेली से शादी करना चाहती है।

प्रकृति की ऐसी की तैसी

स्त्री का पुरुष से संबंध प्रकृति ने बनाया है। प्रकृति ने दोनों की शारीरिक संरचनाएं एक दूसरे के अनुकूल बनाई हैं। समाज भले पुरुष प्रधान कहा-माना जाता हो लेकिन वंशवृद्धि और जनन की क्षमता सिर्फ स्त्रीयों में ही है। अब नए संबंध बनने के बाद यह कैसे होगा। पुरुष युगल है तो बच्चा गोद लेगा और स्त्री युगल कृत्रिम गर्भाधान कराएगा। जैसे सूरज पूरब से निकलकर पश्चिम में ही ढलता है, हर जीव का अस्तित्व बीज में होता है, जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है वैसे ही प्रकृति ने पुरुष और स्त्री के संबंध से संसार क्रम आगे बढऩे की व्यवस्था बनाई है। विज्ञान अपवाद स्वरूप इसमें कुछ बदलाव तो कर सकता है लेकिन कुल के बावजूद सूरज पश्चिम से नहीं निकलेगा, जो जन्मा है उसकी मृत्यु को नहीं टाल सकता। जब भी प्रकृति की व्यवस्था से छेड़छाड़ हुई है, तबाही आई है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग, अतिवर्ष, अकाल, सुनामी, आइला जैसी विपत्तियां प्रकृति से छेड़छाड़ का ही नतीजा है। ऐसे में मनोविकृयों के शिकार कुछ लोगों के कहने पर प्रकृति के शास्वत नियम से छेड़छाड़ कितनी भारी पड़ेगी? बात-बात में प्रकृति की दुहाई देने वाले प्रकृति कार्यकर्ता भी इस बात पर चुप हैं।

सामाजिक ढांचा हो जाएगा चौपट
मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे के चलते परिवार तो पहले से ही खत्म हो रहा है अब समलैंगिक संबंधों से केवल मैं और तुम बचेंगे। आधुनिकता और प्रगतिशीलता के नाम पर देश पहले ही बहुत आगे हो चुका है, अब ये नया कदम तो देश को विकसित बना ही देगा। परिवार और समाज के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं रह जाएगा। मुस्लिम, ईसाई धर्मगुरुओं ने इसका विरोध किया है। हिंदू धर्म की तो पूरी व्यवस्था ही तार-तार हो जाएगी। 16 संस्कारों में से बहुतों को तो कथित आधुनिकता पहले ही निगल चुकी है अब बाकी बचे संस्कार भी समाप्त हो जाएंगे। न कोई बच्चों का नामकरण संस्कार करेगा न ही पितरों को पिंडदान होगा। वैश्विक मंदी के दौर में देश को बचाए रखने वाली परिवार व्यवस्था खत्म हो जाएगी।

घूस को भी दी जाए कानूनी मान्यता
अब तक ऐसा होता था लेकिन चोरी-छिपे पर अब होगा खुले आम। कुछ लोग इसे मानसिक समस्या तक मानते हैं। लेकिन इसके समर्थकों का तर्क है कि देश में लगभग 5 करोड़ लोग ऐसे संबंधों में लिप्त हैं। भारत से पहले 126 देशों में ऐसे संबधों को मान्यता प्राप्त है। यह लोग भी इंसान है, इनके भी मूल अधिकार हैं। इन्हें समान जीवन का पूरा हक है, लेकिन क्या इतने मात्र से समलैंगिकता को वैध ठहराया जा सकता है। अगर ऐसा है तो अवैध हथियार का लाइसेंस दिया जाए, घूस को कानूनी मान्यता दी जाए, क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में लोगों के पास अवैध हथियार मिलते रहते हैं और लगभग हर सरकारी दफ्तर में घूस चलता है। तब तो भ्रष्टाचार को भी जायज ठहराया जाना चाहिए। उम्मीद है कि आम आदमी की सरकार देश की सांस्कृतिक, धार्मिक भावना को समझते समलैंगिकता को कानूनी जामा पहनोन से बचेगी।
(प्रवीण भाई की शादी का किस्सा अभी जारी है। सिलमायन, बारात, शादी, चौथी का हाल बजट के बीच या उसके बाद जरूर दूंगा।)

बुधवार, 1 जुलाई 2009

प्रवीण भाई की शादी-2

18 को तिलक और यज्ञोपवीत
18 को बहुत व्यस्त कार्यक्रम था। सुबह से यज्ञोपवीत शुरू हो गया था। वल्कल वस्त्र में प्रवीण भाई कुश के मंडप में बैठकर आचार्य के निर्देशों का पालन कर रहे थे। यह संस्कार पहले शिक्षा ग्रहण के लिए बच्चे को भेजे जाते समय किया जाता था। जिसमें बच्चे को सूत की जनेऊ पहनाई जाती थी और ब्रह्मचर्य का पालन करने का संकल्प दिलाया जाता था। इसके बाद गुरुकुल का कठिन जीवन। बच्चे को यज्ञोपवीत संस्कार के बाद गुरुकुल जीवन यापन के लिए पहले घर से भिक्षा मांगनी पड़ती थी। प्रवीण भाई भी प्रतीकात्मक झोली लेकर खड़े हुए। उनके हाथ में एक तख्ती, एक दंड भी था। अब के लोग तख्ती क्या जाने? आचार्य जी ने कहा- कहो माम् भिक्षाम् देहि, इसके लिए बाद मां, चाची, दादी, मामी, और अन्य रिश्तेदारों ने उन्हें भिक्षा देनी शुरू की। था सबकुछ प्रतीकात्मक लेकिन अपने आप में अद्भुत अनुभव था। सबसे भिक्षा मांगने के बाद परंपरानुसार प्रवीण भाई पूरव की ओर चल पड़े। यह प्रतीक था शिक्षा ग्रहण के लिए काशी जाने के। अब बारी आती है मामा की। मामा जी पहले से ही तैयार थे। बुलाए गए। उनका काम था अपने भांजे को काशी जाने से रोकना। डर था कहीं वहीं पढ़ते-पढ़ते संन्यासी न हो जाए। सो मनाना शुरू किया। तमाम वास्ते दिए, कारण बताए पर नहीं। सो आधुनिक परंपरा के तहत जेब से सोने की अंगूठी निकालकर प्रवीण भाई की अंगुली में डाली और लौटा लाए। यह सब प्रतीकात्मक था। खैर लौटने के बाद आचार्य ने उन्हें गृहस्थ जीवन के नियम बताए और इसके साथ उन्हें वल्कल वस्त्र की जगह सामन्य कपड़े पहनाकर यज्ञोपवीत कार्यक्रम संमन्न हुआ।

पांच सितारा बनाम पंचमेल
अब बारी आई तिलक की। सुबह से तैयारियां शुरू हो चुकी थी। दरवाजे से थोड़ा से दूर तिलकहारों के रुकने के लिए शामियाना और टेंट आदि लगवाया गया था। उम्मीद थी कि 12 बजे तक तिलकहार आना शुरू करेंगे। लेकिन आने लगे 11 बजे से ही। तैयारियां पूरी थी, इसलिए कोई दिक्कत नहीं हुई। काम-धाम संभालने वाले दीपू के साथी थे। सुबह से ही आ गए थे। दरअसल हमारे बगल के गांव में एक तिवारी जी गुजर गए थे सो उस गांव वाले लोग सूदक मानकर नहीं आए। सबकुछ इलाहाबादी छात्रों को ही करना पड़ा। खैर मेनू बता दूं। गर्मी का मौसम था सो आते ही शरबत की व्यवस्था थी। पहले बेल, नींबू, दही, गुड़ का शरबत था लेकिन अब मिश्रांबु, रूह आफजा, रसना जैसे नाम आ गए हैं। पहले तो कुंओं का पानी ही कलेजा तर कर देता था पर अब न तो कुएं बचे हैं और जो हैं भी उनमें पानी नहीं रहा। वैसे भी गांव-गांव तक पानी का पाउच पहुंच गया है। सो पानी ठंडा करने के लिए बरफ मंगाई गई थी। तिलकहार आने शुरू हुए तो लगभग 12:30 तक किश्तों में आते ही रहे। शरबत पीने के गरमी से राहत मिली तो पंचमेल मिठाई की व्यवस्था थी। शहरों में भले ही पांच सितारा होटलों का जलवा हो लेकिन गांवों में आज भी पंचमेल मिठाई (पांच तरह की मिठाई) ही स्तर बताती है। गुलाब जामुन, छेना, कलाकंद, लड्डू के साथ काजूकतली थी। अब पंचमेल की प्लेट में कहीं-कहीं समोसा तो कहीं-कहीं कटलेट ने भी जगह ले ली है। खैर ये भी परोसा गया। इस बीच स्टोर रूम में जहां मिठाई रखी थी वहां बच्चों और कुछ मनचले बड़ों की भीड़ बराबर पाई जाती रही। क्या डायबिटीज क्या सुगर सबने हाथ डुबाकर खाया।पता पहले से भी था लेकिन जब बड़ों ने कहा, तो देखना पड़।

तिलकहारों में लड़की के पिता, चाचा, फूमा, मामा, नाना और ऐसे ही रिश्ते वाले लड़के के घर का पानी तक नहीं पीते। उनके लिए अलग व्यवस्था करानी थी। हमारे बगल के इंटर कॉलेज के अध्यापक आए थे। उन्होंने अपने पैसे से शरबत की व्यवस्था कराई तो इन लोगों ने भी पानी पिया। खैर मिठाई के बाद खस्ता और दमालू गया। इसके बाद पेट को राहत देने के लिए दही बड़ा। इस बीच दिन ढल गया था, दरवाजे पर छाया आ गई थी। तिलक चढ़ाने की व्यवस्था की जाने लगी। हमारे आसपास जिसे जेंवार कहा जाता है, रिश्तेदार और शुभचिंतक आने शुरू हो गए थे। और हमलोगों ने फल काटने शुरू कर दिए। कहते हैं कि तिलकहारों को फल खिलाकर फलदान लो तो फल ज्यादा मिलता है। खैर.... फल दिया गया और मैं अपने कार्यकर्ताओं के साथ दरवाजे की व्यवस्था देखने लगा। हमारे पुरोहित आसन पर बैठे। लड़की वाले आकर जमे। मंत्रोच्चार शुरू हुआ। लड़के को बुआ, भाभी, चाची, बहन दरवाजे तक पहुंचाने आईं। इसके बाद साथ दिया दोस्तों ने। क्रीम कलर की शेरवानी में प्रवीण भाई बहुत अच्छे लग रहे थे। आर्चायगणों ने पृथ्वी सहित सभी ग्रहों को शांत कराते हुए वैदिक रीति रिवाज से कर्मकांड आगे बढ़ाया। लड़की के भाई ने तिलक चढ़ाई। वर की पूजा की गई उसे फलदान दिया गया। परिवार के लिए उपहार था, आदि, आदि... वर ने फलदान लेने के बाद अपने पूज्य जनों का वरण किया। चरण धोकर उन्हें यथा सामथ्र्य दक्षिणा दी। इधर, अंदर से महिलाओं ने- हमार भइया बीए पास, तिलक कम काहे चढ़ाई जैसे लोकगीत गाने शुरू किए। ये लोकगीत उससे भी पहले के हैं जब बीए करना बहुत बड़ी बात होती थी। वर और लड़की के भाई के बीच पान बीड़ा की रस्म हुई। दोनों ने एक दूसरे को पान खिलाया। इसके बाद आचार्यगणों ने स्वातिवाचन कर दोनों पक्षों को आशीर्वाद दिया। नाऊ-आचार्य को दक्षिणा के साथ तिलक पूरी हुई।

लड़के को मय फलदान के सामान कोहबर में ले जाया गया। कोहबर लोक परंपरा है। जिसमें घर की उस दिशा में जिस ओर सूर्य होते हैं, की दीवार पर वर और वधु का प्रतीकात्मक चित्र बनाकर पूजा की जाती है, वहां ले जाया गया। लगभग 60 तिलकहार आए थे। पहले की बात होती तो 10 गुना बराती जाने चाहिए थे लेकिन अब किसके पास समय है। अब तिलकहारों के खाने की व्यवस्था करनी थी। गांवों में अब पनीर का बहुत के्रज है। सो तीन सब्जियां, कोफ्ता, कलौंजी, रायता, चटनी, अचार, सलाद, कचौरी, पूड़ी, दही, पुलाव, आइसक्रीम के साथ रसमलाई की व्यवस्था थी। तिलकहारों को खाना खाते समय तमाम प्रकार की गालियां (महिलाओं ने) सुनाई गई। अब जेंवार के खाने की बारी थी। आज भी हमारे गांव में जमीन में पंगत लगाकर खाने का चलन है। इसका अपना अलग मजा है। थोड़ बदलाव जरूर आया है पहले लोटा लेकर जाते थे लेकिन अब नहीं। खैर पांत पर पांत खिलाई जाती रही और यह क्रम चला रात 11 बजे तक। सबसे बाद में लगभग 12 बजे मैंने, दीपू और मनू के साथ खाना खाया। हम थक चुके थे। 17 को सिलमायन था और 20 को बारात। सो बिस्तर पर पड़े और सो गए।
खैर तिलक अच्छी बीती अब आगे का हाल कल।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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