राज और समाज पर खरी आवाज

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सोमवार, 29 जून 2009

प्रवीण भाई की शादी

आज बड़े दिन बाद ऑनलाइन हूं। दरअसल भाई की शादी के सिलसिले में इलहाबाद गया था। इतने दिनों राजकाज पर कुछ नया नहीं दे सका। इसके लिए क्षमा चाहता हूं। फिलहाल कुछ खास हो भी नहीं रहा है। बजट की तैयारी चल रही है। दिल्ली में ममता और प्रणब दा कर रहे हैं और दफ्तरों में हम जैसे पत्रकार।
बहुत दिनों बाद गांव की शादी में शामिल हुआ। जब से इलाहाबाद छूटा न तो किसी की बारात जा सका और न ही किसी शादी में गारी सुनी। लगभग 10 साल बाद गांव की शादी में शामिल हुआ। तिलक से लेकर चौथी छुड़ाने तक की सारी रस्में देखीं। बारात अपनी भी हुई थी लेकिन शहर की थी, सो गांव वाला मजा नहीं आ सका था। आपको बारात का न्यौता नहीं दिया, जानता था कि व्यस्तता के चलते आना हो नहीं सकेगा। सो, सोचता हूं आपको राजकाज के जरिए ही सही बारात करा दूं। मैं आपको एक-एक रस्म की तफसील से जानकारी देने की कोशिश करूंगा।
सुविधा का भूगोल
पहले परिचय दे दूं। बात परंपरा से शुरू करते हैं। इलाहाबाद और लगभग पूरे पूर्वी उप्र में परंपरा है कि बेटियां उत्तर और पश्चिम में ही ब्याही जाती हैं। उस पर भी कुल, गोत्र, रिश्तेदारी भी देखनी पड़ती है। इलाहाबाद वैसे तो बहुत बड़ा जिला है लेकिन शादी-ब्याह के लिए उसे तीन हिस्सों में बांट लिया गया है। पहला गंगापार बोले तो फाफामऊ के उत्तर प्रतापगढ़, जौनपुर की सीमा तक, दूसरा यमुनापार, जो मीरजापुर की सीमा तक फैला है। बाकी बचा बीच का शहर जिसमें अब नैनी, मुंडेरा भी जुड़ गया है, इसे शहर कहते हैं। तो हमारा घर गंगापार फूलपुर तहसील में पडि़ला महादेव के नजदीक कमलानगर बीरापुर और लड़की यमुनापार मेजा तहसील की अकबरशाहपुर गांव की। लंबे समय से बातचीत चल रही थी। इसी मार्च में होली के पहले लड़की देखने की आधुनिक रस्म के बाद रिश्ता तय हो गया। जून की 18 को तिलक, और 20-21 की शादी तय हुई। घर पर पिता जी और दीपू ने पूरी तैयारी की।
बदल गया इलाहाबाद
शादी प्रवीण भाई की थी, जो फिलहाल लखनऊ में एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रहे हैं। वो भी 15 को इलाहाबाद पहुंचे। कार्ड छपवाने से लेकर, टेंट हाउस, हलवाई, बैंड पार्टी, खरीददारी, बहिन-बिटिया को बुलाना, घर की साफ-सफाई सारे काम दीपू और पापा ने किए। हम इंदौर में थे। अखबार की नौकरी के चलते कई बार रिश्ते-नातेदार नाराज हो जाते हैं। दरअसल, एक तो उनको फोन नहीं करते और करते भी हैं तो रात 12 के बाद। अब इसके बाद फोन मतलब सामन्य परिस्थितियों में मन में ही सही गाली सुनना होगा। खैर 15 को चले और 16 को कामायनी से दोपहरबाद 3 बजे इलाहाबाद पहुंचे। घर से गाड़ी आई थी। कुछ खरीददारी अपने लिए और भाइयों के लिए करनी थी सो सिविल लाइंस पहुंचे। अब तो इलाहाबाद में भी बिग बाजार और मैक डॉनल्डस खुल गया है। सो आसानी हुई। नहीं तो पहले चौक, घंटाघर और कटरा की गलियों में चक्कर लगाने पड़ते थे। दो-तीन घंटे खरीद के बाद शाम ढले घर पहुंचे। तिलक में एक दिन टाइम था। घर में सबसे बड़ा हूं सो पहुंचते ही सारा कामकाज संभाल लिया। 17 का पूरा दिन तैयारी और रिश्तेदारों की स्वागत में बीता।
बाकी 18 को तिलक का, यज्ञोपवीत, सिलमायन की कहानी कल के लिए छोड़ते हैं।

बुधवार, 3 जून 2009

मुंबई जैसी ही है ऑस्ट्रेलियाई आग

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की पिटाई जारी है। रोज कोई न कोई नया मामला प्रकाश में आता है। हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी कि मामले बहुत ज्यादा होते हैं लेकिन अप्रवासी भारतीय वहां की नागरिकता के लालच में सारे जुल्म सहते हैं और चुप रहते हैं। लेकिन अब तो अति हो गई है। हाल तो देखिए लुधियाना नरदीप वहां पढ़ाई करने गया है। हाल ही में जब वह कॉलेज जा रहा था तो पांच लोगों ने उसे रोक लिया और सिगरेट देने को कहा, जब उसने कहा कि वह सिगरेट नहीं पीता तो उन लोगों ने पैसे मांगे। जब नरदीप ने पैसे देने से इनकार किया तो उन लोगों ने मारपीट शुरू कर दी। उसके पेट में चाकू मार दिया। हर आम आदमी की तरह मैं भी समझना चाहता हूं कि आखिर ऐसा क्या है कि वहां भारतीय के साथ इतने अत्याचार किए जा रह हैं। ऑस्ट्रेलिया में लगभग एक लाख भारतीय छात्र हैं जो करोड़ों रुपए कर चुकाते हैं, फिर भी उनके साथ ऐसा व्यवहार.........

कोई बताएगा 'बाहरी' कौन हैं?
ऑस्ट्रेलिया में जो रहा है वह पिछले साल (सालों) मुंबई में उत्तरभारतीयों के खिलाफ हुई हिंसा का ही एक स्वरूप है। यहां हमला करने वाले हमारे ही भाई थे बस बोली और राज्य अलग थे और ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों को मारने वालों की भी बोली अलग है। उन्हें भारतीय प्रतिभा से डर लगता है और इधर मुंबई के नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन खोने का। मुंबई में हो रहे अत्याचार पर तब तक कोई नेता नहीं बोला जब तक कि पानी सिर से ऊपर नहीं चला गया वही हाल ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है। हमारे नेता बयान दे रहे हैं बस। ऑस्ट्रेलिया में जो हो रहा है वह न तो सही है और न ही बर्दाश्त के काबिल लेकिन सरकार कोई कड़ा कदम उठाने से कतरा रही है। यही हाल महाराष्ट्र में भी था। हिंसा और विरोध की राजनीति करने वाले मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को प्रताडि़त कर रहे थे और नेता दिल्ली में बैठकर बयान दे रहे थे। वैसा ही हाल फिर होने वाला है। महाराष्ट्र की सरकारी संस्था ने किराए पर सरकारी घर देने की बात क्या कही शिवसेना वाले उद्धव ठाकरे फिर अपनी बिल निकल पड़े। कहा अगर 'बाहरियों' को घर दिया तो घर गिरा देंगे। इन तोडफ़ोड़ की राजनीति करने वालों से और उम्मीद ही क्या की जा सकती है। कोई इन नेताओं से पूछेगा कि बाहरी कौन है? कोई नहीं पूछेगा क्यों कि उनकी राजनीतिक रोटी इसी आग में तो सेंकी जाती है।

चलते-चलते
हाल पाकिस्तान का भी बुरा है। वहां अल्पसंख्यकों (हिंदू+सिखों) से जजिया वसूला जा रहा है। इसाईयों से नहीं क्यों कि ऐसा करने की न तो पाकिस्तान में हिम्मत है और न ही उनके पाले सांपों (तालिबानियों) में। मुझे लगता है यह खबर उन लोगों को जरूर पढऩी चाहिए जो भारत में अल्पसंख्यकों से भेदभाव का आरोप लगाते हैं।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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