राज और समाज पर खरी आवाज

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रविवार, 31 मई 2009

जब जरूरत तब उपयोग, फिर काहे सुधारें शिक्षा?

इधर बीच घुमंतू दो-तीन दिन की छुट्टी पर गए थे। आज आते ही उन्होंने मेरी ओर मिसाइल दाग दी-देखा कांग्रेस को देश को पहली महिला लोकसभा स्पीकर मिलने जा रही है। खैर बोले आज राजनीति पर बात नहीं करूंगा। दरअसल घुमंतू बनारस से लौटे हैं सो पूरे मस्त मूड में हैं। बोले यार आज तो भारतीय छात्रों ने ऑस्ट्रेलिया में गांधीगीरी की। विकसित देश का तगमा लगाए घूम रहे ऑस्ट्रेलिया में जैसा नस्लभेदी व्यवहार हो रहा है उससे तो लगता है मेरा भारत ही भला है। माना कि कुछ सिरफिरे मेरे देश में भी हैं लेकिन ऐसा तो नहीं ही होता। हम तो बाहर से आए लोगों को सिर पर बैठाते हैं। हमें तो उनसे बेहतर कोई लगता ही नहीं। बोले अपने देश का योग था लोग नाम तक नहीं लेते थे विदेशियों ने योगा कर दिया तो सब टीवी खोले शीर्षाशन कर रहे हैं।

इसी बीच, खबर आई कि मीरा कुमार को सोनिया से मिलने उनके घर पहुंचीं। सो उनके स्पीकर बनने की खबर पक्की। मैंने कहा तो यह अच्छी बात है, साथ में मैंने यह टुल्ला भी जोड़ दिया कि कांग्रेस चाहती तो ऐसे बहुत पहले ही हो गया होता। उनको मेरी बात से भड़कना था भड़के। बोले आज जरूरत है महिला को स्पीकर बनाने की तो आज ही न बनाएंगे। मुझे भी लगा भाई ठीक ही बोल रहे हैं। जब जिसकी जरूरत हो तब उसका उपयोग करो। सही है आज कांग्रेस को दलित चेहरे की जरूरत है जो यूपी बिहार में उसकी जमीन संभाले। खैर राजनीति पर बात नहीं तो नहीं...

बात ऑस्ट्रेलिया की चल रही थी। मैंने कहा यार घुमंतू ऑस्ट्रेलिया भी अंग्रेजों का गुलाम रह चुका है। यह अलग बात है कि उसको आजादी हमसे पहले मिली फिर वहां की सरकारों और व्यवस्था ने ऐसा क्या किया कि हमारे भारतीय छात्र विदेशों में पढऩे जाने को मजबूर हैं। घुमंतू बोले, यार अब सरकार क्या करे। इतने स्कूल खोले, इतने कॉलेज, इतने विवि अब सरकार कहती थोड़े है कि बाहर जाओ पढऩे के लिए जो जा रहे हैं जाएं। वैसे भी हमारे देश के लोगों को अपनी देश की चीजें हमेशा दोयम दर्जे की लगती हैं। मैं भी अपनी बात पर अड़ा था। मैंने कहा नेता तो अपने बच्चों को महंगे कॉन्वेंट स्कूलों में, विदेशी विवि में पढऩे भेजते हैं, फिर वो जब विदेश से पढ़कर आते हैं तो राजनीति में पिता की विरासत संभालते हैं और अपने बच्चों को भी विदेश भेजते हैं। उन्हें क्या जरूरत है देश में शिक्षा का स्तर सुधारने की। बड़ी कबाहत के बाद घुमंतू मुझसे सहमत हुए।

शुक्रवार, 29 मई 2009

ये हमारे देश का मंत्रिमंडल

मैंने कल (राहुल की नहीं चली,अगाथा ने जीता दिल) कुछ परिवारों के नाम गिनाए थे, लेकिन आज पूरी लिस्ट जारी है। हो सकता है इसके बावजूद कुछ नाम भूल गया हूं या मेरी जानकारी में न हों,अगर आपको पता है तो जरूर बताएं। यह लिस्ट खोजने का मकसद सिर्फ याद कराना है। ताकि सनद रहे और मैं शाम को घुमंतू के सवालों की मिसाइल झेल सकूं। खैर मैं यह लिस्ट घुमंतू को ईमेल कर रहा हूं और एक कॉपी आपको, देखिए शाम को मिलते हैं तो क्या होता है। खैर तबतक आप तो देख लीजिए।

फारुक अब्दुल्ला----- ----- ----शेख अब्दुल्ला के पुत्र (जम्मू-कश्मीर के पहले सीएम)
मीरा कुमार----- ----- --- -----बाबू जगजीवन राम की पुत्री (पूर्व उप प्रधानमंत्री)
एसएम कृष्णा----- ----- --- --एससी मैल्लैया के पुत्र (पूर्व एमएलए)
सलमान खुर्शीद ----- ----- --- खुर्शीद आलम खां के पुत्र (पूर्व सांसद और गवर्नर)
पृथ्वीराज चह्वाण----- ----- ---आनंद राव( कैबिनेट मंत्री)प्रोमिला (प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष) के पुत्र
अजय माकन----- ----- --- ---ललित माकन के भतीजे (पूर्व सांसद)
प्रफुल्ल पटेल----- ----- --- -- सेठ मनोहर भाई के पुत्र (पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष)
दयानिधि मारन----- ----- --- मुरासोली मारन के पुत्र (पूर्व कैबिनेट मंत्री, करुणानिधि के नाती)
अझगरी----- ----- --- ------- एम करुणानिधि के पुत्र (तमिलनाडु के सीएम)
पल्लमराजू ----- ----- --- --- संजीवा राव के पुत्र (इंदिरा कैबिनेट में मंत्री)
जीके वासन----- ----- --- -----जीके मूपनार के पुत्र (पूर्व मंत्री)
प्रतीक पाटिल----- ----- --- ---प्रकाश पाटिल (सांसद) के पुत्र, वसंत पाटिल (पूर्व सीएम) के प्रपौत्र
डी. पुरंदेश्वरी----- ----- --- -----एनटीआर की पुत्री (पूर्व सीएम)
मुकुल वासनिक----- --- ----- --कृष्ण वासनिक के पुत्र (पूर्व सांसद)
ज्योतिरादित्य सिंधिया ------ --माधवराव सिंधिया के पुत्र
सचिन पायलट----- ----- --- ---राजेश पायलट के पुत्र
जतिन प्रसाद----- ----- ----- - -जीतेंद्र प्रसाद के पुत्र
अगाथा संगमा----- ----- ----- -पीए संगमा की पुत्री
परनती कौर----- ----- ----- -- -अमरिंदर सिंह की पत्नी
भतर सोलंकी----- ----- ----- - -माधवसिंह सोलंकी के पुत्र (गुजरात के पूर्व सीएम)
अरुण यादव ----- ----- ----- - -सुभाष यादव के पुत्र (एमपी के पूर्व डिप्टी सीएम)
तुषार चौधरी ----- ----- ----- - अमरसिंह चौधरी के पुत्र (गुजरात के पूर्व सीएम)
आरपीएन सिंह----- ----- ----- सीपीएन सिंह के पुत्र (उप्र से पूर्व केंद्रीय मंत्री)
कुमारी शैलजा ----- ----- ------दलबीर सिंह की पुत्री (हरियाण के दलित नेता

राहुल की नहीं चली,अगाथा ने जीता दिल

दिन की शुरुआत घुमंतू के एसएमएस से हुई। स्वातंत्रवीर सावरकर को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी याद कराई थी। सच कहूं तो मैं भी भूल गया था। खैर याद आया तो उस महान स्वतंत्रता सेनानी को नमन किया। (इससे ज्यादा हम लोग करते ही क्या हैं।) आज तबीयत थोड़ी नासाज लग रही थी लेकिन समय तो अपनी गति से चल ही रहा था। तभी अचानक घुमंतू घर आ धमके। मैं भी टीवी चलाकर अखबार पढ़ रहा था। टीवी पर शपथ ग्रहण का कार्यक्रम चल रहा था। एक के बाद एक नेता आकर शपथ ले रहे थे।

विलासराव देशमुख का नाम आया तो घुमंतू बोले यार छह महीने पहले जिस आदमी को नकारेपन की वजह से हटाया उसे अब और बड़ी जिम्मेदारी दी जा रही है। यहां भी गुल खिलाएंगे। फारूख ने शपथ ली और करुणनिधि के परिजनों ने भी। बात स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्रियों तक पहुंची। आए कानपुर वाले श्रीप्रकाश जायसवाल। धुर हिंदी क्षेत्र के। महीने भर भी नहीं हुए जब कानपुर की सड़कों पर हिंदी में चिल्ला-चिल्लाकर वोट मांग रहे थे लेकिन शपथ लेने आए तो अंग्रेजी में ली। घुमंतू को गुस्सा आ गया। बोले- हो क्या गया है जायासवाल को? अब आएं कानपुर तो पूछता हूं।

अगाथा के नाम रहा दिन
शपथ ग्रहण के दौरान जब बड़े-बड़े दिग्गज जब अंग्रेजी बघारने में लगे थे तब अंग्रेजी महौल में पली बढ़ी पीए संगमा की बिटिया अगाथा ने हिंदी में शपथ लेकर श्रीप्रकाश जैसे लोगों के मुंहपर तमाचा जड़ा। घुमंतू ने तो कांग्रेस की जीत पर अगाथा की चंद हिंदी शब्दों को भारी बताया और समारोह अगाथा के नाम कर दिया। खैर बात तमाचे की तो घुमंतू जानते हैं कि ऐसे तमाचों की चोट अगर इनको लगती तो आज देश का यह हाल न होता।

इसमें सोनिया-राहुल का क्या कसूर?
उधर, नाम पुकारा जाता और इधर घुमंतू मुझे बताते कि फलां नेता किसके परिवार और किस राजनीतिक वंश की बेल हैं। मैंने फिर घुमंतू को छेड़ दिया या यहां तो किसी की बेटी, किसी का बेटा, किसी पत्नी, किसी का दामाद, किसी का भाई, किसी का पोता सब हैं मनमोहन की इस 'राहुल कैबिनेट' में। लेकिन वे गुस्साए नहीं। बोले राजनीति में यही तो होता आया है। मैंने कहा- पंडित नेहरू की विरासत (लालबहादुर शास्त्री की अकाल मौत के बाद।) इंदिरा ने संभाली। इंदिरा के बाद कांग्रेस में राजीव गांधी से ज्याद योग्य कोई नहीं था और राजीव के बाद अब सोनिया और राहुल ही सबसे योग्य हैं। मनमोहन को तो पीएम बनाना सोनिया और राहुल दोनों की मजबूरी है। पिछली सरकार में रिमोट सोनिया के पास था और इस बार राहुल के हाथ में होगा। घुमंतू भड़क गए बोले सोनिया गई थी कहने की उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बना दो? ये तो कांग्रेसी हैं जिन्हें पता है कि अगर सत्ता पानी है तो गांधी परिवार की परिक्रमा करनी ही होगी। सोनिया तो महान हैं, देखा नहीं पीएम की कुर्सी छोड़ दी और अब मनमोहन राहुल बाबा के पीछे पड़े हैं कि मंत्रालय ले लो लेकिन वे हैं कि पार्टी की सेवा करना चाहते हैं। इसे कहते हैं त्याग। बोले देखना राहुल भी पापा की तरह बिना मंत्री बने प्रधानमंत्री बनेंगे।

40 के नीचे सिर्फ 7
जब ज्योतिरादित्य ने शपथ ली तो घुमंतू बोले देख रहे हो युवा चेहरा? मैंने कहा गिन के देख ले कितने हैं 40 से नीचे वाले। और जब गिनती हुई तो 79 में केवल 7 निकले और महिलाओं की संख्या भी पिछली बार से एक कम। युवाओं ने कांग्रेस को वोट दिया और युवा जीतकर सदन में तो पहुंचे लेकिन मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। 9 मंत्री ऐसे हैं जो मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इनमें वीरभद्र सिंह, फारुख अब्दुल्ला, सुशील कुमार शिंदे, शरद पवार, एसएम कृष्णा, वीरप्पा मोइली, एके एंटनी, ग़ुलाम नबी आजाद और विलासराव देशमुख शामिल हैं।

राहुल की नहीं चली!
मैंने जब परिवारवाद की बात की तो घुमंतू ने सिर खुजाते हुए कहा शायद मंत्री बनाने के मामले में राहुल की नहीं चली, नहीं तो ऐसा न होता। मैंने कहा आप अपनी खीज नहीं छिपा सकते तो बोले मैं कांग्रेस का प्रवक्ता नहीं। खैर यह भी उन्होंने ही बताया कि कौन कैसे आया है। शपथ समारोह पूरा हुआ तो फारुख अब्दुल्ला ने राज्यमंत्री बने अपने दामाद सचिन और जे-के के मुख्यमंत्री, अपने बेटे और राहुल के दोस्त उमर अब्दुल्ला के साथ फोटो खिंचवाई। नाम उन्होंने बाबू जगजीवन राम की बेटी मीराकुमार और करुणनिधि के कुनबे के भी गिनाए। खैर जितना मैं जानता हूं-

ज्योतिरादित्य सिंधिया ------ माधवराव सिंधिया के पुत्र
सचिन पायलट----- ----- --- राजेश पायलट के पुत्र
जतिन प्रसाद----- ----- ----- - जीतेंद्र प्रसाद के पुत्र
अगाथा संगमा----- ----- ----- पीए संगमा की पुत्री
डी पुंरदेश्वरी----- ----- ----- -- एनटी रामाराव की पुत्री
परनती कौर----- ----- ----- -- अमरिंदर सिंह की पत्नी
भतर सोलंकी----- ----- ----- - माधवसिंह सोलंकी के पुत्र (गुजरात के पूर्व सीएम)
अरुण यादव ----- ----- ----- - सुभाष यादव के पुत्र (एमपी के पूर्व डिप्टी सीएम)
तुषार चौधरी ----- ----- ----- - अमरसिंह चौधरी के पुत्र (गुजरात के पूर्व सीएम)
आरपीएन सिंह----- ----- ----- सीपीएन सिंह के पुत्र (उप्र से पूर्व केंद्रीय मंत्री)
प्रतीक पाटिल ----- ----- ----- - वसंतराव पाटिल के पौत्र (महाराष्ट्र के पूर्व सीएम)
कुमारी शैलजा ----- ----- ----- - दलबीर सिंह की पुत्री (हरियाण के दलित नेता)

इसमें गलत क्या है?
मैंने ये लिस्ट गिना ली तो, घुमंतू ने कहा अगर सरकारी नौकरी रहते किसी म़ृत्यु हो जाए तो उसके आश्रितों को नौकरी मिलती है कि नहीं? मैंने कहा हां। तो बोले इनमें से कई नाम ऐसे हैं जो अब नहीं रहे, उनके बच्चे या परिजन उनके काम को आगे बढ़ रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है? मैंने कहा जो हैं- तो बोले राजनीति के जरिए अगर पूरा घर देश की 'सेवा' करे तो गलत क्या है? मैं अनुत्तरित था। खैर शपथ खत्म हुई और घुमंतू निकल पड़े अपने काम पर।

चलते-चलते...... न्यूज फ्लैश
घुमंतू का अखबार छूट गया था। लेकिन दिनभर उनके मन में एक कसक थी, जो शाम होते-होते उन्होंने मेरे सामने रख दी। बोले यार मैं दिन भर टीवी देखता रहा, दर्जनों वेबसाइट्स देखीं लेकिन कहीं भी स्वातंत्रवीर सावरकर का जिक्र नहीं हुआ। कल पंडित नेहरू को श्रद्धांजलि देने के लिए शांतिवन पर दिनभर लाइन लगी रही लेकिन आज किसी को समय नहीं मिला कि संसद में जाकर सावरकर के चित्र पर दो फूल चढ़ा आए। कुछ भाज.. वाले गए थे रस्म आदयगी करने सो रस्मी खबर भी थी। घुमंतू गुस्से में थे। बोले कांग्रेसी और वामपंथी तो सावरकर के नाम से चिढ़ते हैं लेकिन इन चैनल वालों को क्या हुआ? एक बाइट तक नहीं। नई पीढ़ी को कैसे मालूम चलेगा कि सावरकर ने क्या किया था देश के लिए? खैर घुमंतू अपने आप को समझाने लगे, बोले देश में शहीद तो सिर्फ 'परिवार' के लोग हुए हैं.......... यही सोचते-सोचते वे अपने घर की ओर चल दिए और मैं अपने।

बुधवार, 27 मई 2009

आतंकी को सींक कबाब, शहीद की अर्थी का भी बिल

अरे अब तो शर्म करो, डूब मरो
सुबह सोकर उठा भी नहीं था कि फोन घनघनाने लगा। फोन करने और बनाने वाले दोनों को मन में कोसते हुए फोन की तरफ हाथ बढ़ा दिया। आंख मींजते हुए फोन उठाया तो देखा घुमंतू थे। उनके दुआ-सलाम के लहजे से ही लग गया कि उनका दिमाग घूमा हुआ है। फिर भी मैंने हालचाल पूछा तो पायजामे से बाहर हो गए। क्या यार, देश-दुनिया में आग लगी है और तुम हालचाल पूछ रहे हो। मैंने संभलते हुए पूछा क्या हुआ, तो बोले 'नई दुनिया' पढ़ा की नहीं? फिर बोले तुम तो अभी सोकर उठ रहे हो क्या पढ़ा होगा? मैंने फोन थामे-थामे ही अखबार के पन्ने पलटने शुरू कर दिए। अंदर के पन्ने पर खबर लगी थी कि मुंबई हमले में शहीद हेमंत करकरे की पत्नी को सरकार ने करकरे के अंतिम संस्कार में लगे खर्च का बिल दिया है। घुमंतू बोलते जा रहे थे, हो क्या गया है सरकार को? आतंकियों को सींक कबाब और मुर्ग मुसल्लम खिलाकर उनकी सुरक्षा में करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं और शहीद के अंतिम संस्कार का सरकार नहीं उठा सकती। मुझे तो पहले विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा हुआ होगा लेकिन प्रत्यक्षम किं प्रमाणम्? मामले में गलत खबर तो छपने से रही। घुमंतू ने भुनभुनाते हुए फोन काटा। मुझे उनकी आवाज समझ में आ गई थी वे बोल रहे थे सरकार अब तो शरम करो,शरम मर गई हो तो तुम डूब मरो।
मैं घुमंतू से जान छुड़ाई और आदतन टीवी खोलकर बैठा तो देखा लाहौर में आत्मघाती धमाका हुआ है। 50 के आस-पास मरे हैं और 250 से ज्यादा घायल। इधर मैं अपनी दिनचर्या में लग गया और घुमंतू अपनी....

जिस सांप को दूध पिलाया था वही.....
अंतरराष्ट्रीय संबंध बना चुके घुमंतू ने कुछ लाहौरी साथियों को फोन घुमाया तो पता चला हमला तालिबान ने किया है। घुमंतू ने खबर लिखनी शुरू की। तभी एक साथी ने पूछा, लाहौर में क्या करा दिया? घुमंतू बोल अब अगर धमाके न हों तो लगता ही नहीं पाकिस्तान है। खैर खबर लिखते-लिखते उनके मन में कहीं-कहीं न यह भी घूम रहा था कि इन तालिबानी सांपों को पाकिस्तान ने ही दूध पिला पिला कर पाला है। अब उन्हीं पर जहर दे रहे हैं। घुमंतू जानते हैं कि अगर छोटे भाई के घर में आग लगी है तो उसकी लपटें बड़े भाई के घर तक पहुंचेगी ही। खैर पाकिस्तान की खबर पूरी करके वे चाय-चुक्कड़ पर जुट गए।

बंद कर दो चुनावी नाटक
वैसे चुनाव के बाद घुमंतू ने राजनीति की खबरों की तरफ पीठ ही कर ली थी लेकिन मनमोहन का कुनबा बढऩे की खबर आई तो दनादन की बोर्ड चलाने लगे। पता चला तमिलनाडु और महाराष्ट्र से सबसे ज्यादा 9-9 मंत्री बने हैं। रही बात युवा नेतृत्व की तो नई कैबिनेट में शामिल लोग कहीं न कहीं से परिवार की परपंरा ही बढ़ा रहे थे। किसी ने वंशवाद की बात छेड़ी और लगे हाथ सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद, करुणानिधि परिवार, रनिदंर कौर, अगाथा संगमा से लेकर मध्यप्रदेश के अरुण यादव तक के नाम गिनाए तो तो घुमंतू फनफाना के खड़े हो गए। बोले राहुल बाबा ने चुनाव के समय कहा था कि वे वंशवाद के विरोधी हैं। अब अगर हर नेता चुनाव के समय कही बातों पर चलने लगे तो देश न सुधर जाए।
घुमंतू बोल तो गए लेकिन फिर सोचने लगे कि लोकसभा में सबसे कम उम्र के सांसद हमीदुल्ला मरहूम पीएम सईद के साहबजादे हैं तो सबसे कम उम्र की मंत्री अगाथ संगमा पीए संगमा की बिटिया। उन्होंने सोचा क्यों न चुनावी नाटक बंद करके पीढ़ी दर पीढ़ी वंशजों को विधानसभा और लोकसभा में बैठाया जाए। चुनाव का खर्च भी बचेगा और सब मिल बांटकर खाएंगे भी। आखिर चुनाव के बावजूद हो तो यही रहा है।

चलते-चलते....न्यूज फ्लैश
बड़ी खबरें हो ग्ईं तो घुमंतू ने पंजाब फोन घुमा लिया पता चला वहां शांति है। शांति क्या कफ्र्यू लगा है। दहशत है, लोग घरों में रहने को मजबूर हैं और सेना गश्त कर रही है। विरोध-प्रदर्शन के नाम पर तोडफ़ोड़ के सख्त विरोधी घुमंतू ने सोचा लोग गुस्से में आते हैं तो सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, बस फूंकते हैं, ट्रेन जलाते हैं, पटरियां उखाड़ते हैं और वह सब करते हैं जो कर सकते हैं लेकिन कभी खुश होते हैं तो ऐसा नहीं करते कि जाकर सरकारी बस साफ कर दें, स्टेशन या ट्रेन से कचरा साफ कर दें, सरकारी बस के पंचर टायर बनवा दें या ऐसा ही कुछ और जो देश को आगे बढ़ाए। घुमंतू घर पहुंचे और सपनों की दुनिया में खो गए, उन्होंने देखा कि रेलवे किराया सस्ता किया तो हजारों लोग स्टेशन पर सफाई करने लगे। खैर यह सपना है...........

सोमवार, 25 मई 2009

हंगामे तो मेरे देश की किस्मत सी बन गए

घुमंतू उवाच
भारत
के चुनाव का कवरेज करते-करते थक चुके घुमंतू अपनी थकान मिटा ही रहे थे कि उनके बेतार के तार झनझना उठे। कहीं से इमरजेंसी काल थी। एंटीना ठीक कर नेटवर्क में आए तो पता चला टॉवर पंजाब में कुछ गड़बड़ी बता रहा था। ताबड़तोड़ तैयार होकर निकल पड़े। अपने हवाई सूत्रों को घनघनाया तो पता चला ऑस्ट्रिया नामक देश में कुछ असामाजिक तत्वों ने एक भारतीय संत की हत्या कर दी। अब हत्या की बात भारत पहुंची तो संत के अनुयायी गुस्से में आ गए हैं। घुमंतू झट से पंजाब के बड़े शहर जालंधर पहुंच गए। देखा तो चारों तरफ मारधाड़ मची थी। बसें और ट्रेनें जलाई गईं थीं। पुसिल से मामला नहीं काबू हुआ तो सेना बुलानी पड़ी। कल संत की मौत की खबर पाकर आज पंजाब बंद का आह्वान किया गया था।

घुमंतू तो ठहरे घुटे पत्रकार सो उन्हें यह तो पता था कि संत जिनका स्वर्गवास हो गया वे शांति और सद्भाव की ही शिक्षा दिया करते थे। लपककर एक एक उपद्रवी को पकड़ा और उसकी ओर सवाल दागा कि आखिर हुड़दंग क्यों मचा रहे हो? अनुयायी बोला हमारे गुरु जी को मार डाला है.....ने। इस पर घुमंतू ने कहा तो इसमें पंजाब या भारत की सरकार का क्या कसूर है? आखिर यहां से कोई गया था मारने? इस पर अनुयायी भड़कते हुए बोला, मैंने आपसे सलाह नहीं मांगी? हमारे संत को मारा गया है तो हम भी यह सब कर रहे हैं, आपका क्या नुकसान है? घुमंतू थोड़ा सहमते हुए पीछे हट गए। आखिर सही ही कहा-आपका क्या नुकसान है?

सकपकाए घुमंतू बचते-बचाते होशियारपुर, फगवाड़ा, लुधियाना भी घूम आए, हर तरफ वही आग फैली थी लेकिन मन में अभी भी वही सवाल घूम रहा था-आपका क्या नुकसान है? ट्रेनें फूंकी गई, बसें जलाई गई, पटरियां उखाड़ दी, थाने फूंक दिए, रोक जाम, रेल ट्रैक जाम, बाजार-बैंक-स्कूल-कार्यालय सब बंद.......... आखिर इनसे किसका नुकसान होता है? न तो ऑस्ट्रिया का और न ही उन अपराधियों का जिन्होंने संत की हत्या की। संत बेचारे जब तक जिए शांति-अहिंसा-परोपकार-सद्भावना का पाठ पढ़ाया और उन्हीं की मौत पर यह हंगामा और हंगामें की भेंट चढ़ी दो लोगों की जिंदगी, करोड़ों की राष्ट्रीय संपत्ति, अनमोल समय और इन सबसे ज्यादा मानवता। घुमंतू भारी मन से जा रहे थे खबरें लिखने, क्योंकि हो चाहे कुछ भी लेकिन खबर तो देनी ही है।

कोई इन हंगामेबाजों को तो बताए....
उधर, घुमंतू गए अपने धाम और इधर मैं सोचने लगा कि डेनमार्क में कोई कार्टून छपता तब भी देश में उपद्रव मचता है, किसी को आरक्षण चाहिए तब भी उपद्रव, कोई आरक्षण का विरोधी है तब भी उपद्रव, किसी ने पूज्य गुरु जैसे कपड़े पहन लिए तो हंगामा, किसी ने कुछ कह दिया तो हंगामा, किसी ने कुछ कर दिया तो हंगामा............ हंगामे तो मेरे देश की किस्मत सी बन गए हैं। और इन हंगामों में पिसता है आम आदमी और जलता है मेरा भारत। कोई इन हंगामेबाजों को समझाए कि ये अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।

शनिवार, 23 मई 2009

(आईपीएल-5) निषि्क्रियता, पुत्रमोह, जादू, पत्ता साफ, नुकसान, नाराजगी

मध्यप्रदेश: सांसदों की निष्क्रियता भारी
पड़ीभाजपा को बड़ा झटका उसके गढ़ मप्र में भी लगा है। 2004 में मध्यप्रदेश की 29 में से 25 सीटें जीतने वाली और लगातार दूसरी बार सरकार बनाने वाली भाजपा की जमीन खिसक गई है। मैं पिछले लगभग 3 साल से मध्यप्रदेश में हूं। शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली और कामकाज अच्छा रहा है। यही कारण है कि भाजपा की दूसरी बार वापसी हुई है। लेकिन 6 महीने पहले चुनाव जीतने के बाद आखिर ऐसा क्या हो गया कि पार्टी को हार का सामना करना पड़ा? दरअसल, इस हार के लिए मुख्यमंत्री से ज्यादा प्रत्याशी जिम्मेदार हैं। मंदसौर से सात बार जीत चुके लक्ष्मीनारायण पांडेय और उज्जैन से छह जीत दर्ज कर चुके सत्यनारायण जटिया चुनाव हार गए। खास बात यह है कि इनको चुनाव हराया नए चेहरों ने। लक्ष्मी नारायण पांडे को मिनाक्षी नटराजन और जटिया को प्रेम चंद्र गुड्डू ने धूल चटाई। गुड्डू हाल ही में विस चुनाव हारे थे। हाल इंदौर का भी ऐसा ही था लेकिन यहां सुमित्रा महाजन भाजपा के मजबूत नेटवर्क के चलते जीत गई लेकिन उनकी जीत का लाखों का अंतर घटकर 11 हजार रह गया। स्थानीय जनता की नाराजगी सांसदों पर भारी पड़ी। जनता कई बार से जीत रहे अपने सांसदों से उनके कामकाज का हिसाब मांगने लगी थी, जो नेता नहीं दे सके। थावर चंद्र गहलोत, लक्ष्मण सिंह, नंद कुमार सिंह चौहान को भी जनता ने नकार दिया। कांग्रेस के युवा प्रत्याशियों ने चौंकाते हुए बेहतरीन प्रदर्शन किया। मप्र में कांग्रेस की न केवल सीटें 4 से बढ़कर 12 हो गई हैं गई बल्कि उसके मत प्रतिशत में भी 6 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हो गई है। वहीं भाजपा का मतप्रतिशत 4 फीसदी से ज्यादा कम हुआ है।
* भाजपा की कुछ सीटों पर जमकर गुटबाजी, भितरघात हुआ।
* जनता पुराने नेताओं से ऊब चुकी थी, परिवर्तन।
* राहुल ने जमकर प्रचार किया, जीतने वाली सीटों पर ध्यान।
* कांग्रेस ने नए चेहरे उतारे, युवा वोटरों ने कांग्रेस का साथ दिया।
कांग्रेस में गुटबाजी कम हुई, जिसका फायदा साफ दिखा।

राजस्थान: महारानी को पुत्रमोह भारी पड़ गया
धृतराष्ट्र देख भले न सकते थे पर उनकी दृष्टि थी लेकिन पुत्रमोह में वे दृष्टिïहीन हो गए जो कौरवों के नाश का एक कारण बना। पांच साल के मुख्यमंत्रित्व काल में कई आंदोलनों से निपटने में नाकाम रहीं और अपने कामकाज के चलते पार्टी में विरोध झेल रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया हार का सिलसिला नहीं रोक सकीं। पिछले लोस चुनाव में भाजपा को राजस्थान से 21 सीटें मिलीं थीं जो अब केवल चार रह गईं। राजे पर भ्रष्टाचार और मनमानी करने जैसे कई आरोप उन्हीं के पार्टी के लोगों ने लगाया। राजस्थान में भाजपा की नींव जमाने वाले भैरोंसिंह शेखावत भी वसुंधरा की खुलेआम मुखालफत कर चुके हैं, लेकिन पार्टी ने वसुंधरा को नेता प्रतिपक्ष बनाकर और चुनाव की कमान उन्हीं के हाथों में सौंपकर जो गलती की उसका खामियाजा चुनाव में मिल गया। अपने बेटे दुष्यंत को झालावाड़ से चुनाव जिताने की चक्कर में वसुंधरा बाहर प्रचार कर ही नहीं सकीं। दुष्यंत तो जीत गए लेकिन भाजपा का बेड़ा गर्ग हो गया। लोग अब कह रहें हैं कि वसुंधरा के पुत्रमोह में राजस्थान चला गया।खैर यह केवल रानी की हार नहीं अशोक गहलोत की जीत भी है। राजस्थान में छह महीने पहले ही कांग्रेस का प्रदर्शन काबिल-ए-तारीफ रहा है। विस चुनाव में जनता की वसुंधरा राजे के प्रति नाराजगी शायद अभी खत्म हुई नहीं लगती। राज्य में भाजपा की भितरघात, कार्यकर्ताओं का असंतोष भाजपा के लिए भारी साबित हुआ है। भाजपा के कई पुराने किले ढह गए। यहां भी कांग्रेस के युवा उम्मीदवारों ने कांग्रेस का स्कोर बढ़ा दिया।

गुजरात: मोदी का असर दिखा, जादू नहीं
आडवाणी के बाद भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किए जा रहे नरेंद्र मोदी कुछ खास नहीं कर सके। गुजरात में उनका असर तो दिखा लेकिन जादू सिर चढ़कर नहीं बोल सका। यहां कांग्रेस और भाजपा दोनों को मतप्रतिशत का नुकसान भुगतना पड़ा है। भाजपा को दो सीटों का फायदा जरूर हुआ लेकिन कांग्रेस को एक सीट खोनी पड़ी है। 26 में से 14 सीटों पर भाजपा जीती है। पिछली बार यह आंकड़ा 14 सीटों का था। हालांकि मोदी ने दावा किया था और सर्वे ऐसा बता रहे थे कि भाजपा को 20 से ज्यादा सीटें मिलेंगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। आडवाणी भी गुजरात से चुनाव लड़ रहे थे, ऐसे में पीएम इन वेटिंग के राज्य से भाजपा को मिली निराशा के गहरे निहितार्थ हैं। कहा जा रहा है कि गुजरात को मोदी में दम लगता है, आडवाणी में नहीं। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि गुजरात के लोग नहीं चाहते कि मोदी दिल्ली जाएं, अब पता नहीं मतदाताओं के मन की बात क्या है। खैर मोदी को अब कम से कम पांच साल तो इंतजार करना ही पड़ेगा।

उत्तराखंड: भाजपा का पत्ता साफ
उत्तराखंड में भाजपा का पांचों सीटों से पत्ता साफ हो गया है। राज्य में भाजपा की सरकार है। मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी का प्रभाव चुनाव में नहीं दिखा। पार्टी में अंतर्विरोध, गुटबाजी और मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए छिड़ी लड़ाई का खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा है। कांग्रेस पिछले लोस चुनाव में सिर्फ एक सीट जीती थी। विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब कांग्रेस के लिए यह बड़ा कमबैक माना जा रहा है। चुनाव पूर्व ही उन्हें हटाने का दबाव बढ़ रहा था। 20 से ज्यादा विधायक दिल्ली जाकर राजनाथ से अपना विरोध जता भी आए थे लेकिन तब चुनाव के बाद का बहाना बनाकर उन्हें शांत करा दिया गया था। खंडूरी को हटाने के लिए चल रहा विरोध भाजपा के लिए भारी पड़ा। पिछले बार तीन सीटें जीतने वाली भाजपा का यहां से न केवल पत्ता साफ हुआ बल्कि कांग्रेस ने क्लीन स्वीप भी किया।

हिमाचल प्रदेश: कांग्रेस को नुकसान
हिमाचल
प्रदेश में भाजपा को फायदा मिला है। पिछले चुनाव में कांग्रेस को 4 में तीन और भाजपा को एक सीट मिली थी, जो इस बार उलट गया है। हिमाचल में भाजपा सरकार है। और राज्य की जनता ने उन पर विश्वास जताया है।

झारखंड: कांग्रेस पर भारी नाराजगी

झारखंड में इस बार एनडीए को फायदा हुआ है। विस चुनाव में भाजपा बड़ी पार्टी थी लेकिन बहुमत नहीं मिला। निर्दलीयों की मदद से बनी सरकार गिर गई। बाद में यूपीए की सरकार बनी और हमेशा गिरने के करीब रही। शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने तो खुद चुनाव हार गए। ऐसे में कांग्रेस, झामुझो को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा। इस बार 13 में से 7 सीटें भाजपा को मिल गर्ईं। जल्द ही यहां विधानसभा चुनाव हो सकते हैं ऐसे में देखना है कि अब ऊंट किस करवट बैठता है।

शुक्रवार, 22 मई 2009

(आईपीएल-4) उत्तरप्रदेश ने करवट ली

कहते हैं दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर गुजरता है। चुनाव परिणाम आने के पहले मेरे एक साथी ने कहा था, कांग्रेस और भाजपा में जिसे यूपी में लीड मिलेगी उसकी सरकार बनेगी। 16 मई को यह बात साबित भी हो गई। कांग्रेस को न केवल 80 सीटों वाले सबसे बड़े राज्य में लीड मिली, बल्कि वेंटीलेटर पर पड़ी पार्टी को जीवन मिल गया है। उप्र के जनादेश से न केवल कांग्रेस में नई ऊर्जा का संचार हुआ है बल्कि माया मैडम के प्रधानमंत्री बनने का सपना भी टूट गया है। माया को सीटें भले पिछली बार से ज्यादा मिल गई हों लेकिन उतनी सीटें नहीं मिल सकी हैं, जितने में वे पीएम बन सकें। यहां सबसे बड़ा झटका लगा है भाजपा और सपा को।

कांग्रेस का सुधार नहीं पुनर्जीवन हुआ
सपा अगर कांग्रेस को 25 सीटें तक दे देती तो कांग्रेस चुनाव पूर्व गठबंधन कर लेती लेकिन सपा कांग्रेस को 17 से ज्यादा सीटें देने से इनकार कर दिया। इसका फायदा कांग्रेस को मिला। हालांकि कांग्रेस ने पिछली बार से कम 4 कम (69) प्रत्याशी उतारे थे लेकिन उसे 11 ज्यादा सीटें मिलीं और वोट प्रतिशत में भी 6.21 फीसदी का इजाफा हुआ। इस जीत के पीछे कई कारण हैं। मेरे हिसाब से अकेले चुनाव लडऩा, राहुल का धुंआधार प्रचार, युवा प्रत्याशियों टिकट, मुस्लिमों वोट बैंक का कांग्रेस की तरफ लौटना कांग्रेस की जीत के बड़े कारणों में से रहा। मुलायम ने कल्याण का हाथ थामा तो मुस्लिम वोट उनके हाथ से छिटक गए। विस चुनाव में भारी बहुमत से जीतीं माया मैडम के मंत्रियों और उनके खुद के कुछ फैसलों ने उनकी बढ़त तोड़ दी। अल्पसंख्यक वोट माया को इसलिए नहीं मिले क्योंकि चुनाव बाद उनके भाजपा के साथ जाने की संभावना थी। मतों के ध्रुवीकरण की रही सही कसर वरुण के बयान और उसके बाद हुए ड्रामे ने पूरी कर दी। कांग्रेस के जो प्रत्याशी उप्र से जीते हैं उनमें से कुछ बड़े नाम थे तो कुछ के लिए जातिगत फैक्टर अच्छा रहा।

सपा-बसपा को न माया मिली न राम
सपा
में मची कलह और विस चुनाव के प्रदर्शन को देखते हुए लग रहा था कि मुलायम इस बार राजनीति के अखाड़े में चित्त हो जाएंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उनकी सीटें भले 39 से घटकर 23 पर आ गई हों लेकिन वे अपनी साख बचा गए। हालांकि इतने के बावजूद उन्हें सरकार में जगह नहीं मिल रही है। परमाणु करार मुद्दे पर मनमोहन सरकार को बचाने के बदले में उन्हें पर्दे के पीछे क्या मिला पता नहीं लेकिन पर्दे से बाहर कुछ नहीं मिला। पिछली बार बिना बुलाए यूपीए के डिनर में पहुंचे तो बेइज्जती हुई और इस बार बिना बुलाए यूपीए को समर्थन दिया तो बेइज्जती हुई।
माया मैडम अपनी लीड कायम नहीं रख सकीं। उनेक मंत्रियों, बसपा विधायकों की कथित चंदा वसूली और अन्य कार्र्यों को जनता ने नकार दिया। चाहे 18 हजार पुलिस जवानों की बर्खास्तगी हो या कथित तौर पर चंदे के लिए इंजीनियर की हत्या। सबका माया मैडम के लिए बुरा प्रभाव रहा। हालांकि जमीन से चलकर सत्ता के केंद्र में पहुंची माया इतनी जल्दी हार मानने वालों में नहीं हैं। यही कारण है कि परिणाम आने के बाद उन्होंने अपने भविष्य को देखते हुए यूपीए को बाहर से समर्थन देने की घोषणा कर दी। माया ने यह भी बताया कि मनमोहन ने उन्हें अपनी छोटी बहन कहा है।
समर्थन के निहितार्थ: मुलायम और माया दोनों ने यूपीए को बाहर से समर्थन दिया है। दरअसल, दोनों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई जांच चल रही है।

भाजपा ने पाया नहीं, खोया बहुत
एक जमाने में उप्र को भाजपा का गढ़ माना जाता था। दरअसल, भाजपा के राजनीतिक मुद्दों में शामिल अयोध्या, मथुरा, काशी इसी राज्य में हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी इसी राज्य के हैं और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी भी लखनऊ से ही चुनकर जाते थे। अटल जी की सीट भले भाजपा के लालजी टंडन बचा ले गए हों लेकिन भाजपा को राज्य में 4.67 फीसदी मतप्रतिशत का नुकसान हुआ है, जो बहुत बड़ा नुकसान है। पार्टी की सीटें पिछली बार की 10 की 10 रह गई हैं। यह भी तब जबकि पश्चिमी उप्र में बड़े जनाधार वाली अजित सिंह की पार्टी से भाजपा का गठजोड़ था। रामपुर से खड़े हुए भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी जमानत नहीं बचा सके। राम मंदिर आंदोलन वाले विनय कटियार भी चित्त हो गए। कुल मिलाकर हालत बहुत बुरी रही।

भाजपा की हार के बड़े कारण
*
उप्र को लेकर पार्टी में निचले स्तर से प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक गुटबाजी।
* प्रदेश और जिलों में बड़े नेताओं के जेबी संगठन और पदाधिकारी।
* राष्ट्रीय और प्रदेश अध्यक्ष का व्यक्तिगत जनाधार नहीं, चमत्कार नहीं कर सके।
* कल्याण के पार्टी छोडऩे से प्रदेश में सर्वमान्य नेता नहीं, पिछड़ा वोट खिसका।
* वरुण के बयान से ध्रुवीकरण, फायदा कांग्रेस को। वरुण अपनी सीट पर फंसे।
* प्रत्याशी चयन में घोर गुटबाजी, अपनों को टिकट दिलाया, उन्हीं को लड़ाया।
* ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शहरी-मध्यमवर्गीय जैसा परंपरागत वोटबैंक खिसका।
* अपनी सीट फंसने से डॉ. जोशी, योगी जैसे दिग्गज नहीं कर सके प्रचार।
* युवाओं को बहुत कम मौका, जिन्हें मिला उन्हें वंशवाद के चलते मिला।
* राहुल का युवा कार्ड भारी पड़ा, भाजपा नहीं पेश कर सकी कोई विकल्प।
* पार्टी प्रदेश स्तर पर कोई नेता या मुद्दा नहीं प्रोजेक्ट कर सकी।

बुधवार, 20 मई 2009

(आईपीएल-3) पश्चिम बंगाल: लेफ्ट की हार या ममता की जीत

बात कामरेडों के गढ से
राज्यों में सबसे पहले उत्तरप्रदेश से शुरू करना चाहता था, इसलिए नहीं कि मेरा गृहराज्य है बल्कि इसलिए कि सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें हैं और यहां का परिणाम भी सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा। हालांकि मैं बात पश्चिम बंगाल से शुरू कर रहा हूं, क्योंकि मेरे लिए इस बार सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रिजल्ट यहीं का है। 25 साल से ज्यादा समय से कामरेडों का गढ़ बने इस राज्य में की किलेबंदी टूट गई है। देशभर में कांग्रेस भले 206 सीटें लेकर सबसे बड़ी पार्टी बनी हो लेकिन पश्चिम बंगाल का रिजल्ट कुछ और ही कह रहा है। सीटों का फायदा कांग्रेस को यहां भी हुआ लेकिन मत प्रतिशत घटा है। मीडिया यहां के परिणाम को 'लालदुर्ग' में सेंध भर ही बता रहे हैं लेकिन हुआ इससे ज्यादा है। कुछ और भी है जिसको मीडिया ने ज्यादा तब्बजो नहीं दे रहा है। हांलांकि कांग्रेस ने ममता को अगले चुनाव में मुख्यमंत्री बनाने का बयान देकर इसके संकेत दे दिए हैं। पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की हार से बड़ा यहां ममता की जीत है।

माया से बड़ी हो गई ममता
परिणाम आने से पहले ममता को फायदा होने की बात तो की जा रही थी लेकिन जब बात किंगमेकर की चलती तो नाम माया और जयललिता का ही आता। मायावती को 80 सीटों वाले राज्य में 21 सीटें मिली हैं जो पिछले चुनाव से सिर्फ 2 ज्यादा हैं, जबकि ममता को 42 सीट वाले राज्य में 19 सीटें मिली हैं जो पिछली बार से 18 सीट ज्यादा है। ममता की जीत को तुक्का या लहर कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि 2004 लोकसभा चुनाव की अपेक्षा उनकी पार्टी का मतप्रतिशत 10.13 फीसदी बढ़ा है, जबकि तृणमूल का साथ पाने के बावजूद कांग्रेस का मतप्रतिशत 1.11 फीसदी घटा है। हालांकि कांग्रेस की सीटें बढ़ गई है। वहीं वाममोर्चे की न केवल सीटें घटीं हैं बल्कि मतप्रतिशत में भी जबरदस्त गिरावट आई है। कामरेडों को सिंगूर, नंदीग्राम भारी पड़ गया। वामपंथियों को परमाणु करार मुद्दे पर केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेना भी भारी पड़ा है। महंगाई, मंदी और एफडीआई को छूट जैसे आम आदमी से जुड़े और अपने सैद्धांतिक मुद्दों पर केवल धमकी देना और करार के मसले पर समर्थन वापस लेने की सजा लेफ्ट को भोगनी पड़ी है।

ममता की जीत के मायने
ममता ऐसे राज्य में विकल्प बनकर उभरी हैं जहां कैडरबेस पार्टी (लेफ्ट) लगभग तीन दशक से राज कर रही है। देश में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी है लेकिन पश्चिम बंगाल में मतदाताओं ने कांग्रेस की अपेक्षा तृणमूल पर ज्यादा विश्वास जताया है। चाहे मतप्रतिशत का मामला हो या सीटों का। यह ममता की लगन, जिद और मेहनत का ही परिणाम है कि उन्होंने कामरेडों की नींव हिला दी है। इस परिणाम का आगामी विस चुनाव पर भी असर पड़ेगा। अगर ममता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उनका भावी प्रदर्शन उनके मंत्रालय, प्रदर्शन और कार्यशैली पर निर्भर करता है। ममता ने देश दो अन्य बड़ी महिला नेताओं जयललिता और मायावती से ज्यादा जुझारूपन दिखाया है। जया के पास एक गॉडफादर और उनकी स्टार छवि थी, जबकि ममता के साथ बड़ा वोटबैंक, इसके बावजूद दोनों इस चुनाव में कुछ ज्यादा नहीं कर सकीं जबकि ममता ने अपनी जिद और जुझारूपन से परिणाम ही उलट दिया। अब देखना है कि ममता दीदी कोलकाता की कुर्सी से बुद्धदेव को हटाकर कब्जा जमा पाती हैं या फिर पांच साल कांग्रेस की उंगली पकड़ दिल्ली में ही बैठी रहेंगी।
चुनाव परिणाम
पार्टी सीटें मतप्रतिशत

वाममोर्चा 15 43.3
तृणमूल 19 31.17
कांग्रेस 06 13.45
भाजपा 01 6.04
अन्य 01 --

सोमवार, 18 मई 2009

(आईपीएल-2) किसके लिए क्या हैं जीत के मायने

पुरानी जमीन पाने की ओर कांग्रेस
2009 लोकसभा के परिणाम पूरी तरह से कांग्रेस के पक्ष में रहे। जीत कांग्रेस की और हार भाजपा की हुई है। यानी देश की जनता ने मनमोहन को स्वीकारा और आडवाणी को नकारा है। कांग्रेस के लिए व्यक्तिगत तौर पर सबसे अच्छा नतीजा उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश का है। जहां पार्टी की न सिर्फ सीटें बढ़ी हैं बल्कि वोट प्रतिशत भी बढ़ा है। उप्र में कांग्रेस अपनी पुरानी जमीन हासिल करने की ओर बढ़ी है।

क्या संन्यास लेंगे लालकृष्ण आडवाणी?
अपनी किताब 'माई लाइफ एंड माई कंट्री' में आडवाणी जी ने लिखा था कि वे राजनीति से संन्यास लेने की सोच रहे थे। चुनाव के दौरान भी उन्होंने कहा कि अगर प्रधानमंत्री नहीं बने तो सक्रिय राजनीति से संन्यास ले सकते हैं। पार्टी की करारी हार के बाद सबकी नजरें उनके अगले कदम पर है। शनिवार को विपक्ष में बैठने से इनकार करने के बाद हालांकि नेता प्रतिपक्ष बनने का फैसला किया है, लेकिन उनकी पारी ज्यादा लंबी नहीं लग रही। संघ ने पहले ही कह दिया है कि पार्टी को नया नेतृत्व चाहिए अब देखना है कि क्या होता है?

भाजपा को अटलजी का सदमा तो नहीं
यह पहली बार था जब भाजपा ने बिना अटलबिहारी वाजपेयी के चुनाव मैदान में उतरी। 1991 के बाद भाजपा का यह सबसे खराब प्रदर्शन रहा। कहीं भाजपा को कम सीटों की वजह वाजपेयी की अनुपस्थिति तो नहीं? आडवाणी, राजनाथ, जेटली सभी स्वीकार कर चुके हैं कि इस चुनाव में अटलजी की कमी खली।

जहां राहुल ने प्रचार किया
राहुल ने 106 सीटों पर प्रचार किया, इनमें से 57 कांग्रेस ने जीती। इनमें से अधिकतर ऐसी सीटें हैं जहां पहले कांग्रेस नहीं थी। पार्टी के दिग्गज कांग्रेस को मिली शानदार जीत का श्रेय राहुल को दे रहे हैं। अब देखना है कि राहुल मंत्रिमंडल में शामिल होते हैं या नहीं और आगामी पांच सालों में राष्ट्रीय राजनीति में उनकी क्या भूमिका होगी?

जहां मोदी ने प्रचार किया
नरेंद्र मोदी ने देश की 86 सीटों पर प्रचार किया था, जहां 46 सीटों पर भाजपा की जीत हुई है। हालंकि मोदी ने अपने राज्य की सभी 26 सीटों पर प्रचार किया लेकिन जीत सिर्फ 16 पर ही मिल सकी। भाजपा गुजरात से सिर्फ दो सीटों का फायदा हुआ है जो अपेक्षा से काफी कम रहा।

देश: किसी एक राष्ट्रीय पार्टी का बड़े दल के रूप में उभरना देश और लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर है। अब नई सरकार बिना किसी दबाव बड़े मसलों पर फैसले कर सकेगी। बात-बात पर समर्थन वापसी की छोटी पार्टियों की धमकी के दिन लद गए। सरकार स्थिर होगी और सही दिशा में ढंग से काम कर सकेगी। राष्ट्रीय स्तर पर द्विदलीय प्रणाली की ओर बढ़ेंगे।

अर्थव्यवस्था: इसकी जोरदार बानगी सोमवार को देखने को मिल गई। वामदल पिछली सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे। आर्थिक नीतियों के मसले पर कांग्रेस और वामदलों की नीतियां काफी हद तक अलग थीं। ऐसे में तमाम योजनाएं और फैसले वामदलों के रोड़े के कारण नहीं हो सके। देश में उदारीकरण के अगुआ रहे मनमोहन सिंह वैश्विक मंदी के दौर में कुछ नए राहत देने वाले विकल्प आजमा सकते हैं। वैसे उनके सामने बेरोजगारी, मंदी जैसी तात्कालिक समस्याएं खड़ी हैं। वहीं सत्यम घोटाले के बाद अर्थव्यवस्था में पैदा हुआ भरोसे का संकट खत्म होने के आसार बढ़ेंगे। एटमी करार बिना किसी अवरोध आगे बढ़ेगा। शेयर बाजार में उछाल के कयास अभी से लगने लगे हैं। उद्योग जगत का मानना है कि सरकार अब अपने विनिवेश कार्यक्रम को तेजी से क्रियान्वित कर सकेगी, जिससे देश में औद्योगिकीकरण का नया दौर आएगा। श्रम कानून में सुधार की बड़ी कवायद चालू होगी।

राहुल गांधी: आम चुनाव के परिणाम राहुल गांधी के लिए व्यक्तिगत तौर पर बहुत मायने रखते हैं। वर्ष 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद से कांग्रेस का यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। उप्र में अकेले लडऩे का फैसला राहुल के दबाव पर हुआ और पार्टी के लिए यह वरदान बन गया। राहुल के यूथ ब्रिगेड के सैनिकों ने भी निर्णायक जीत दर्ज की है। अब यह तय है कि अगला चुनाव राहुल के नाम और कांग्रेस के काम पर ही लड़ा जाएगा। संगठन में महासचिव राहुल अब सरकार में कोई जिम्मेदारी ले सकते हैं।

नरेंद्र मोदी: अब लगभग यह तय हो गया है कि भाजपा अगला लोकसभा चुनाव नए नेतृत्व में लड़ेगी। फिलहाल पार्टी की जो स्थिति है, उसमें नरेंद्र मोदी ही आडवाणी के उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जा रहे हैं। गुजरात में लोकप्रिय मोदी को पार्टी की केंद्रीय राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। हालांकि गुजरात दंगे से जुड़ी मोदी की छवि, एनडीए के अन्य सहयोगियों में उनकी स्वीकार्यता पर संशय खड़ा करती है।

कांग्रेस: 1991 के बाद सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है। उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश समेत देश के अन्य हिस्सों में उसे अपना पुराना जनाधार वापस मिलता दिख रहा है। कार्यकर्ताओं में जोश बढ़ेगा और जिन प्रदेशों में कांग्रेस पिछड़ी है वहां भी पार्टी कार्यकर्ता अब संघर्ष के लिए सक्रिय होंगे। सोनिया के नेतृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं है लेकिन पार्टी पर गांधी परिवार का दबदबा और बढ़ जाएगा।

भाजपा: भाजपा के लिए अटलबिहारी वाजपेयी के बिना यह चुनाव भारी पड़ा। 18 साल में पार्टी की यह सबसे बड़ी हार है। पार्टी नेतृत्व में बड़े फेरबदल के आसार हैं। कुछ नए चेहरे राज्यों से केंद्र में लाए जा सकते हैं। संघ का दखल बढ़ेगा। संगठन में पहले, दूसरे और तीसरे स्थान के लिए गुटबाजी और कलह पैदा होने का खतरा है। नए नेतृत्व के सामने कड़ी चुनौतियां तय है।

छोटे दलों का भविष्य: सबसे बड़ी हार यह वाममोर्चे के लिए है। 2004 में वह 60 सीटें लेकर किंगमेकर बन गया था लेकिन इस बार उसकी ताकत आधी से भी कम रह गई। वामराज्यों पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी नया विकल्प बनकर उभरी हैं। यहां भाजपा ने भी अपना खाता खोलकर कॉमरेडों के सिर पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। लालूप्रसाद की राजद, रामविलास पासवान की लोजपा समेत तमाम छोटे दलों का भविष्य अब खतरे में नजर आ रहा है। इन पार्टियों के मजबूत नेता अन्य पार्टियों में जा सकते हैं। हालांकि विधानसभा चुनावों में छोटे दलों के अच्छे प्रदर्शन की संभावना को अब भी खारिज नहीं किया जा सकता। क्योंकि उड़ीसा, सिक्किम, बिहार, जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय दलों ने अच्छा प्रदर्शन किया है। वहीं, उप्र में अगर सपा-बसपा-रालोद की सीटें जोड़ दी जाएं तो 49 होती हैं। यह सीटें आधी से कहीं ज्यादा हैं। वहीं, शिवसेना, टीडीपी, एआईडीएमके, टीआरएस, डीएमके को भी जनता ने नकारा नहीं है। राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय दल और क्षेत्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दल बने रहेंगे।

रविवार, 17 मई 2009

(आईपीएल-1) इस परिणाम के निहितार्थ

भाजपा को एक और झटका लगेगा
परिणाम आ गए। देश को स्थिर लोकतंत्र और स्वतंत्र सरकार मिली है। कहीं जीत की खुशी है तो कहीं हार का गम। कहीं सरकार बनाने की कवायद है तो कहीं हार का ठीकरा फोडऩे की। कुल मिलाकर अब चर्चा जीत और हार के कारणों पर हो रही है। कांग्रेस जीती है और भाजपा हारी है, यह तो हो गया। लेकिन चुनाव यहीं खत्म नहीं होता। अभी भाजपा को एक और झटका लगना बाकी है। झटका लगेगा राजग से। अटल जी के प्रयासों से बने इस गठबंधन के अंतिम सहयोगी भी टूटने की कगार पर हैं। पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना को छोड़ दे तों बाकी दल मौका मिलते ही राजग से हाथ खींच सकते हैं। शुरुआत उप्र के चौधरी अजित सिंह कर रहे हैं। वे यूपीए में शामिल होने वाले हैं। क्यों इस पर बात बाद में करेंगे। यही हाल बिहार वाले नीतीश कुमार का है। शरद यादव ने अपना गुस्सा जाहिर भी कर दिया है। भाजपा में सिरफुट्टौव्वल शुरू हो गया है। मुरली मनोहर जोशी ने राजनाथ पर निशाना साध कर नेताप्रतिपक्ष का दायित्व संभालने की बात कही है तो संघ ने कहा है कि भाजपा को बदलना होगा और युवा नेतृत्व को मौका देना होगा।

मेरा भी पहला लोकसभा चुनाव: मीडियाकर्मी के तौर पर यह मेरा पहला लोकसभा चुनाव रहा। इसके पहले मैं पत्रकारिता के विद्यार्थी, और उसके पहले प्रचार वाहन के पीछे दौड़कर पर्चे मांगने वाले बच्चों में शामिल होकर चुनाव देखता रहा हूं। जैसे कांग्रेस की चुनावी थकान परिणाम सुनकर गायब हो गई वैसे मेरी थकान आज सुबह प्रतिद्वंद्वी अखबारों को देखकर मिट गई। हमारा प्रस्तुतिकरण अच्छा रहा और लोगों ने उसे सराहा। यह तो हुई मेरी बात अब आते जीत-हार पर। फिलहाल प्राथमिक रिपोर्ट पेश है। आगे राज्यवार रिपोर्ट विस्तार से देने की कोशिश रहेगी। एक प्रशिक्षु के नाते मैं इस पर आपकी राय और सुझावों की प्रतीक्षा करूंगा।

यूपीए के जीत की इबारत
राहुल गांधी :
देशव्यापी प्रचार कर, युवाओं को ज्यादा मौका देकर, सौम्य व्यवहार, अच्छी छवि।
सोनिया गांधी : अध्यक्ष की जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन, सहयोगियों से अच्छा तालमेल।
मनमोहन सिंह: बेदाग छवि, कम बोलना, पार्टी द्वारा निर्मित आभामंडल, फैसले।
उत्तरप्रदेश : कांग्रेस ने उप्र में अकेले चुनाव लड़कर 20 से ज्यादा सीटें जीतीं और खोई जमीन पाई।
आंध्रप्रदेश : सत्ता विरोधी लहर नहीं, लोस और विस दोनों में अजेय बढ़त।
तमिलनाडु : कांग्रेस को झटका लगा लेकिन सहयोगी डीएमके ने दिलाई बढ़त।
राजस्थान : अपेक्षा से अधिक सीटें, गहलोत और नए चेहरों ने दिलाई जीत।
भाजपाशासित राज्य : उत्तराखंड, मप्र में अच्छी बढ़त। 4 से 12 पर पहुंची।
वाम शासित राज्य : प बंगाल में ममता के साथ केरल में अकेले बड़ी ताकत।
मुस्लिम वोट : आंकड़ों के अनुसार मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस को वोट किया।
मुद्दे : कांग्रेस ने नरेगा व अन्य उपलब्धियों को अपने प्रचार अभियान में अच्छे से पेश किया, लाभ मिला।
सि्थरता : खंडित जनादेश का नुकसान देख चुकी जनता ने स्थाई सरकार के लिए वोट दिया।

एनडीए की हार के कारक
लालकृष्ण आडवाणी: मनमोहन की अपेक्षा खुदको मजबूत साबित न कर सके।
राजनाथ सिंह: पार्टी अध्यक्ष की भूमिका में नाकाम, गृहप्रदेश यूपी में भी फेल।
नरेंद्र मोदी: कट्टर छवि के कारण मतों का धु्रवीकरण हुआ, फायदा कांग्रेस को। भाजपा/राजग शासित राज्य: तय माने जा रहे मप्र, उत्तराखंड, पंजाब में प्रदर्शन बुरा, नए सहयोगी काम नहीं आए।
उत्तर भारत में जमीन खिसकी : बिहार को छोड़कर पार्टी की हिंदीभाषी राज्यों में जमीन खिसकी।
गठबंधन में खींचतान : जद-यू, शिवसेना जैसी पार्टियां ऐसे बयान देती रहीं जिससे गलत संदेश गया।
पार्टी में खींचतान: चुनाव के बीच मोदी का नाम पीएम के लिए आना, जेटली-राजनाथ विवाद से माहौल बिगड़ा।
मुद्दे नहीं उठा सके: भाजपा गरीबी, महंगाई, आतंकवाद, कालेधन के मुद्दे को लाई लेकिन भुना नहीं पाई।
नकारात्मक प्रचार: भय हो... जैसी पैरोडी, मनमोहन पर सीधा निशाना साधना भाजपा को भारी पड़ गया।
मैनेजर फेल: अटल जी की ही तरह आडवाणी के चुनावी प्रबंधक और सलाहकार फेल हो गए, बडबोलापन।

शनिवार, 16 मई 2009

(आईपीएल) जनादेश कांग्रेस को

जनता का फैसला आ गया। जनादेश भाजपा और आडवाणी के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में आया है। उत्तरप्रदेश, मप्र, तमिलनाडु, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र आदि ऐसे राज्य हैं जहां राहुल की मेहनत रंग लाई है। गांधी परिवार का जादू चला है। इस बार का जनादेश जो सबसे बड़ी राहत की बात लेकर आया है वह है स्थिरता। यानि इस बार की सरकार स्थिर होगी। छोटी-छोटी पार्टियां समर्थन वापस लेने की धमकी देकर ब्लैकमेलिंग नहीं कर सकेंगी। यह देश के लिए भी अच्छा होगा। जनता ने कांग्रेस को जनादेश देकर एक बड़ी जिम्मेदारी भी दी हैै। परिणाम पर चर्चा 1-2 दिन बाद शुरू होगी, तब हम जीत-हार के कारणों पर भी बात करेंगे।
फिलहाल देश में स्थाई लोकतंत्रिक सरकार के लिए देश को बधाई।

शुक्रवार, 15 मई 2009

सत्ता के संभावित समीकरण

जनादेश कल 16 को आएगा। उसके पहले हम ख्याली समीकण और अटकलें लगा सकते है। मैंने भी कुछ अटकलें लगाईं है, पता नहीं कितनी सही होंगी,फिर भी आपके हुजूर में पेश है।
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किसे अनुमान बहुमत से दूरी
यूपीए 191 81
एनडीए 185 87
थर्ड फंरट 101 171
अन्य 120 152
कांग्रेस 157 115
भाजपा 147 125
(विभिन्न चैनलों, पार्टियों द्वारा के एग्जिट पोल का औसत)
यूपीए: कांग्रेस, एनसीपी, डीएमके, जेएमएम, नेकां, एसडीएफ, मुस्लिम लीग
एनडीए: भाजपा, जेडी-यू, शिवसेना, शिअद, अगप, इनेलोद, रालोद, टीआरएस,
थर्ड फंरट: ममोर्चा, एआईडीएमके, टीडीप, जेडी-एस, बसपा
चौथा मोर्चा व अन्य: सपा, लोजपा, राजद, निर्दलीय

संभावित समीकरण
1- कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार
क्यों: कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बने और यूपीए को पूर्ण बहुमत प्राप्त हो।
क्यों नहीं: अगर यूपीए को बहुमत नहीं मिला या कांग्रेस को कम सीटें मिली। ऐसे में उसे समर्थन की दरकार होगी। संभावित सहयोगी -
चौथा मोर्चा
क्यों:
मुलायम-पासवान-लालू कहते रहे हैं कि वे यूपीए के साथ हैं।
क्यों नहीं: यूपीए ने बसपा का साथ लिया तो सपा जाएगी, जेडी-यू को मनाया तो लालू-पासवान अलग होंगे।
तीसरा मोर्चा
क्यों:
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर तीसरा मोर्चा बाहर से समर्थन दे सकता है।
क्यों नहीं: मनमोहन को बदलने की वाममोर्चे की जिद कांग्रेस इनकार कर सकती है। तीसरे मोर्चे के घटक अलग हो सकते हैं।
दिक्कतें: वाममोर्चे का साथ लेने पर तृणमूल कांग्रेस साथ छोड़ सकती है। जयललिता का साथ लिया तो करुणनिधि अलग हो सकते हैं। बसपा को जोड़ा तो मुलायम टूटेंगे यही हाल बिहार के साथियों का भी है।
मनमोहन की जगह कोई और
क्यों:
महमोहन की जगह कोई दूसरा प्रधानमंत्री, क्योंकि वामदलों की दिक्कत मनमोहन से है।
क्यों नहीं: कांग्रेस में एकराय मुश्किल, यूपीए के साथी रोड़ा अटका सकते हैं।
2- तीसरे मोर्चे की सरकार
तीसरे मोर्चे की अकेले दम पर सरकार बनना मुश्किल है। उसे यूपीए या राजग का समर्थन चाहिए ही होगा। संभावित सहयोगी-
यूपीए
क्यों:
राजग को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस तीसरे मोर्चे को बाहर से समर्थन दे सकती है। ऐसे में उसे अगले चुनाव के लिए अपनी जमीन तैयार करने का मौका भी मिल जाएगा।
क्यों नहीं: यूपीए की सीटें ज्यादा होने पर कांग्रेस ऐसा नहीं करेगी। क्योंकि वह सरकार में होगी लेकिन सत्ता में नहीं।
राजग
क्यों
: कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए और सहयोगियों का भाजपा पर दबाव।
क्यों नहीं: भाजपा तीसरे मोर्चे को बाहर से समर्थन देने की जगह विपक्ष में बैठना पसंद
3- भाजपानीत सरकार
क्यों: भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बने और राजग को पूर्ण बहुमत प्राप्त हो।
क्यों नहीं: राजग को बहुमत नहीं मिला या भाजपा को कम सीटें मिली तो उसे नए साथी तलाशने होंगे। संभावित सहयोगी-
चौथा मोर्चा
क्यों:
मुलायम माया के विरोध के नाम पर राजग को बाहर से समर्थन कर सकते हैं।
क्यों नहीं: मुलायम की उप्र में राजनीति भाजपा विरोध पर आधारित है। वोट बैंक बिखर जाएगा।
तीसरा मोर्चा
क्यों: कांग्रेस विरोध के नाम पर बाहर से समर्थन दे सकता है।
क्यों नहीं: संभावना न के बराबर। वामदलों को भाजपा मंजूर नहीं।

कहां जा सकते हैं किंगमेकर!
जयललिता
से यूपीए और एनडीए दोनों संपर्क में हैं। जया वहीं जाएंगी जहां करुणानिधि न हों। राज्य में एक-दूसरे के विरोध पर ही राजनीति। करुणा यूपीए के साथ हैं। विचार धारा भाजपा के करीब, राजग में रह चुकी हैं।
मायावती से भी यूपीए और एनडीए संपर्क में हैं। माया भाजपा के सहयोग से तीन बार सीएम बनीं तो राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस का साथ दिया। माया उस गठबंधन में नहीं शामिल हो सकती जहां मुलायम हों। मुलायम फिलहाल यूपीए के करीब हैं, लेकिन यूपीए मुलायम की कीमत पर माया का साथ ले सकता है।
चंद्रबाबू नायडू आंध्रप्रदेश में विधानसभा चुनाव भी हुए हैं। नायडू की राज्य में विरोधी कांगे्रस है। राज्य में जिसकी मदद से उनकी सरकार बनेगी सके साथ जा सकते हैं। टीआरएस साथ चुनाव लड़े, टीआरए एनडीए के साथ है। नायडू का फैसला 16 के बाद आएगा। राजग के साथ रहे हैं।
और कौन टूट सकता है
नवीन पटनायक:
11 साल भाजपा के साथ रहकर अलग हुए। तीसरे मोर्चे में हैं। विस चुनाव परिणाम के बाद पाला बदल सकते हैं।
ममता बनर्जी: कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ीं लेकिन वाममोर्चे का साथ लेने पर यूपीए से छिटक सकती हैं।
शिवसेना: मराठी प्रधानमंत्री के नाम पर राजग छोड़ सकती है। राष्ट्रपति चुनाव के समय भी ऐसा ही हुआ था।
नीतीश कुमार: अगर तीसरा मोर्चा पीएम पद की पेशकश करे और नीतीश को कुर्सी मिलती दिखे या यूपीए में कुछ सीटें कम हों और लालू-पासवान को छोड़कर यूपीए नीतीश से हाथ मिलाएं।
अटकलें लग रही हैं
कांग्रेस की अल्पमत सरकार!
ऐसे संकेत मिले हैं कि वामदल भाजपा को आने से रोकने के लिए कांग्रेस की अल्पमत सरकार बनने देंगे। खासबात यह कि वे बिना कांग्रेस का समर्थन किए राजग को सत्ता में आने से रोक लेंगे। यह तभी हो सकता है जब कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी और यूपीए सबसे बड़ा गठबंधन बने। वामदल सदन में मत विभाजन के दौरान अनुपस्थित रहकर अल्पमत सरकार को चलने देंगे।
मनमोहन के विकल्प: एंटनी-शिंदे
वामदल भले ही गैरकांग्रेसी, गैरभाजपाई सरकार की ताल ठोक रहे हो, लेकिन कांग्रेस कुछ मुद्दों पर समझौता करे तो दोनों फिर एक हो सकते हैं। खबर है कि वामदलों ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में रक्षा मंत्री एके एंटनी का नाम उछाला है। जानाकार भी मान रहे हैं कि अगर कोई दल बहुमत नहीं जुटा पाता है तो सरकार गठन की एक संभावना यह भी बन सकती है। उधर, एक बेवसाइट के अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कुछ दिनों पहले वामपंथी संगठन दिल्ली साइंस फोरम से कहा था, वामदलों का साथ पाने के लिए पार्टी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बदल सकती है। इस सिलसिले में सुशील कुमार शिंदे का नाम लिया जा रहा है। शिंदे दलित जाति से हैं। ऐसे में उनके नाम पर तीसरे मोर्चे के कुछ घटक साथ दे सकते हैं।
नाम नीतीश का भी
तीसरा मोर्चा नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद की पेशकश कर राजग से तोड़ सकता है। ऐसे में वह कांग्र्रेस का भी समर्थन जुटाने की कोशिश करेगा। नीतीश अगर राजग का साथ छोड़ते हैं तो कांग्र्रेस को भी उनके नाम पर कोई आपत्ति नहीं होगी।
नाम शरद पवार नीतीश का भी
खबर है कि यूपीए को बहुमत न मिलने पर शरद पवार को प्रधानमंत्री बनाए जाने की संभावना पर भी विचार शुरू हो गया है। पवार ने बुधवार को सोनिया से मुलाकात कर समर्थन का भरोसा जताया, लेकिन उनकी पार्टी की बीजद, प्रजाराज्यम, एआईएडीएके और सपा से बाचतीत कर रही है। हाल ही में शिवसेना नेता मनोहर जोशी ने कहा था कि राजग को बहुमत नहीं मिलता तो उनकी पार्टी पवार का समर्थन कर सकती है।

मंगलवार, 12 मई 2009

एक देश-दो खबरें- दो चेहरे

खबर चाहे जो हो ध्यान खींचती ही है, लेकिन आज संयोग से दो ऐसी खबरें आईं जो 1 देश के दो चेहरे दिखाने वाली हैं। पहली खबर स्विटजरलैंड से। स्विस बैंकों में जमा भारतीय धन की खबर पढ़ते समय मैं सोच रहा था कि भारत को गरीब देश या गरीबों का देश नहीं कहना चाहिए। इसका कारण भी है। दरअसल, स्विस बैंक संघ की ओर से 2008 में जारी आंकड़ों के मुताबिक वहां की बैंकों में भारत का 1891 अरब डॉलर जमा है। जो रूस, चीन, ब्रिटेन सहित बाकी दुनिया के यहां जमा धन से कहीं ज्यादा है। स्विस बैंकों में रूस के 610 अरब डॉलर, चीन के 213 अरब डॉलर, ब्रिटेन 210 अरब डॉलर, उके्रन के 140 अरब डॉलर, और बाकी दुनिया के 300 अरब डॉलर जमा हैं। अगर हमारा धन वापस आ जाए तो देश की सूरत बदल सकती है। लेकिन पैसा लाएगा कौन?
एक स्विस अधिकारी ने खुलासा किया है कि भारत सरकार ने वहां की बैंकों में जमा धन लाने के लिए जो कागजात दिए थे वह फर्जी थे। अब फर्जी कागजात क्यों दिए गए यह तो पता नहीं लेकिन इतना जरूर पता है कि सरकार की नीयत में कहीं न कहीं खोट जरूर है।

एक
-तिहाई आबादी होगी गरीब
अब बात दूसरी खबर की जो सोचने पर मजबूर करती है कि ऐसा क्यों? विश्व बैंक ने भारत में गरीबी के ताजा आंकड़े पेश किए हैं। इसमें कहा गया है कि भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की स्थिति केवल अफ्रीका के सब सहारा देशों से ही कुछ बेहतर है। जब मैं गरीबी रेखा के नीचे की बात कर रहा हूं तो यह बात हर उस व्यक्ति की नहीं है जिसे बीपीएल कार्ड (सफेद कार्ड) हासिल है, क्योंकि इसमें बहुत बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कार्ड पैसे से खरीदा है। खैर, बैंक की ग्लोबल इकॉनमिक प्रॉस्पेक्टस फॉर 2009 नामक रिपोर्ट में 'इंडिया शायनिंग' और 'भारत के बढ़ते कदम' की हकीकत तार-तार होती है।
* 2015 तक भातर की एक तिहाई आबादी बेहद गरीबी में गुजारा करने को मजबूर होगी। यानि प्रतिदिन 60 रुपए से भी कम आय में। वहीं चीन में ऐसे लोगों की आबादी 6.1 फीसदी और सब सहारा देशों में 37.1 फीसदी होगी।
* 1990 में गरीबी के मामले भारत के हालात चीन से बेहतर थे। तब चीन में बीपीएल लोगों की संख्या 60.2 फीसदी और भारत में 51.3 फीसदी ही थी लेकिन 15 साल बाद 2005 में चीन में ऐसे लोगों की आबादी घटकर 15.9 फीसदी रह गई और भारत में बढ़कर 41.6 फीसदी हो गई।
* भारत में अत्यंत गरीबी में जीवन यापन करने वाले लोगों की तादाद 1990 में 43.6 करोड़ (51.3 फीसदी), 2005 में 45.6 करोड़ (41.6 फीसदी) थी, जो 2015 में 31.3 करोड़ (25.4 फीसदी) रहने का अनुमान है।

मेरे गांव में भी हैं दो भारत
पिछले महीनों पुणे के एक उद्योगपति के बारे में खुलासा हुआ था कि उसके अरबों रुपए स्विस बैंकों में जमा हैं। पूरे देश का तो नहीं पता लेकिन मैं अपने छोटे से गांव के बारे में जरूर जानता हूं। जबसे मैं जानने-समझने लायक हुआ हूं मेरे गांव की दशा वैसी ही है। कुछेक लोगों को छोड़ दें तो बाकी आज भी वैसे हैं जैसे 20-25 साल पहले थे। खासकर पिछड़े और अनुसूचित जाति के लोगों की स्थिति और भी बुरी है। जो लोग पहले मजदूरी करके जीवन चलाते थे अब उनके बच्चे भी वही कर रहे हैं। सरकार लाख दावे करती है कि तमाम योजनाएं चलाई, कानून लाए लेकिन हालात जस के तस। जो पहले लखपति थे अब करोड़पति हो गए हैं। जिनके पास हजार थे वे लखपति हो गए लेकिन जो गरीब थे और गरीब हो गए। आर्थिक विशेषज्ञों को कहते सुनता हूं कि गरीब और अमीर में खार्ईं बढ़ी है लेकिन मैं तो कहता हूं कि फासला इतना बढ़ गया है और बढ़ता जा रहा है कि उसे पाटना मुश्किल होगा। एक देश में दो देश जी रहे हैं। एक भारत जो 60 साल में इंडिया बन कर एंज्वाय कर रहा है और दूसरा भारत जहां लोगों को दो जून पेट भरने का खाना नहीं मिलता।

रविवार, 10 मई 2009

मेरी मां

आज भी जब मुझे नींद आती नहीं, गिन के तारे कटती हैं रातें मेरी।
दर्द मेरा जब कोई समझता नहीं, याद आती है मां बस तेरी-बस तेरी।

आज मुझे भूख लगी, नहीं मिला खाना जो तो
मुझको जमाना वो पुराना याद आ गया।
बाबू, अम्मा और चाचा-चाची की भी याद आई,
पापा वाला गोदी ले खिलाना याद आ गया।
क्षुधा पीर बार-बार आई जो रुलाई जात
माई काम काज छोड आना याद आ गया।
भइया, राजाबाबू, सुग्गू कह के बहलाना मुझे,
आंचल की गोद में पिलाना याद आ गया।
पूरब प्रभात धोई-पोछि मुख काजर लाई
माथे पे ढिठौने का लगाना याद आ गया।
दिन के मध्यान भानु धूल, धरि, धाई, धोई
धीरज धराई धमकाना याद आ गया।
रात-रात जागकर खुद भीषण गर्मी में
आंचल की हवा दे सुलाना याद आ गया।
बीच रात आंख मेरी खुली जो अगर कभी
थपकी दे के माई का सुलाना याद आ गया।
आज जब रातें सारी कट जाएं तारे गिन
माई गाइ लोरी लाड लाना याद आ गया।
छोटे-छोटे पांवों पर दौड़कर भागा मैं तो
मम्मी वाला पीछे-पीछे आना याद आ गया।
यहाँ-वहाँ दौड़ते जो भुंइयां पे गिरा मैं तो
गिरकर रोना और चिल्लाना याद आ गया।
लाड लो लगाई, लचकाई लो उठाई गोद,
माई मन मोद का मनाना याद आ गया।
गोदी में उठाके फिर छाती से लगा के मुझे,
आंसुओं का मरहम लगाना याद आ गया।
बीए की पढ़ाई पास, पढ़ा जो पुराना पाठ,
पापा धर लेखनी लिखाना याद आ गया।
आज बात चली जो 'प्रदीप' घर बसाने की तो
मिट्टी का घरौंदा वो बनाना याद आ गया।।

(हिंदयुग्म में प्रकाशित माई गाइ लोरी लाड लाना याद आ गया )

शनिवार, 9 मई 2009

चौपट वर्तमान, अंधेरे में भविष्य

कई इम्तहान चल रहे हैं। कुछ का रिजल्ट आ, कुछ का आना बाकी है। फिलहाल आज मध्यप्रदेश शिक्षण बोर्ड के दसवीं कक्षा का रिजल्ट आया। बमुश्किल 35 फीसदी बच्चे पास हो पाए। बोर्ड की सचिव ने कहा कि चुनावों के चलते रिजल्ट इतना बुरा आया है। मप्र में छह महीने के भीतर दो बार चुनाव हो चुके हैं। पहले विधानसभा फिर लोकसभा।

आखिर करे क्या बेचारा अध्यापक
अब सवाल यह है कि चुनाव से बच्चों का क्या लेना देनाï? लेकिन सवाल है तो जवाब भी चाहिए। तो सुनिए साहब, हमारे देश में सरकारी स्कूलों के अध्यापकों का पहला काम पढ़ाना नहीं है। उनके जिम्मे है, चुनाव कराना, वोटर आईडी बनवाना, जनगणना, पोलियो ड्रॉप पिलाना, मध्यान भोजन की व्यवस्था, जरूरत पड़े तो मतगणना में सहयोग, परीक्षा की तैयारी, घर के नजदीक ट्रांसफर कराने के लिए अधिकारियों से लेकर नेताओं तक के चक्कर लगाना और इन सबके बाद समय मिले तो बच्चों को पढऩा। बात समय की है तो हफ्ते भर जिससे आप धूप में जनगणना और सर्वे करवाएंगे अगले हफ्ते भर तो वह उसी की थकान मिटाएगा।

कोई दूसरा तरीका निकालो साहब
तो सरकार सवाल यह है कि सरकारी स्कूल के मास्टर के जिम्मे अगर इतने काम हैं तो वह पढ़ाएगा कैसे? पिछले दिनों स्कूलों की बढ़ी हुई फीस का मामला चला तो एक जिम्मेदार नेता ने कहा कि अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों से निकालकर सरकारी स्कूलों में पढ़ाइए। मुझे नहीं पता कि आजकल किसी नेता, अधिकारी के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। खैर, अपनी बात इसपर नहीं होगी। बात यह है कि देश के वर्तमान और भविष्य का क्या होगा? बेचारे अध्यापक पढ़ाएं कैसे? सारा समय तो ऊट-पटांग कामों में लगा है। काम तो वह भी जरूरी हैं जो अध्यापक करते हैं, फिर उनका क्या होगा? चिंता लाजिमी है। लेकिन साहब देश में करोड़ों बेरोजगार लोग हैं उनकी मदद ली जा सकती है, कोई और तरीका निकाला जा सकता है लेकिन कम से कम बच्चों के भविष्य से तो खिलवाड़ बंद करिए, नहीं वर्तमान तो चौपट होगा ही, भविष्य भी अंधकारमय होगा।

ताकि बच्चे पढ़ सकें, बढ़ सकें
चुनावी मौसम में राजनीति की बात न करूं तो पानी नहीं पचेगा। आज आंध्र वाले चंद्रशेखर राव आडवाणी जी को प्रधानमंत्री बनाते दिखे तो कांग्रेस ने अपने प्रवक्ता वीरप्पा मोइली और अश्विनी कुमार की छुट्टी कर दी। दरअसल दोनों की गलती सिर्फ यह थी कि राहुल बाबा के बयान के उलट बयान दे दिया। खैर जब हमने पार्टी तो प्राइवेट कंपनी बता दिया तो बाकी कुछ नहीं बचा। मनमोहन जी आज चेन्नई पहुंचे और करुणानिधि के सामने कांग्रेस का रुख साफ किया। कहा कि हम आपके साथ हैं। उधर, मुलायम रामपुर जाकर आजम को हडका आए। इधर, शरद यादव मीडिया के सामने बोलते देखे गए कि हम राजग में हैं। कौन किसके साथ है और रहेगा यह तो 16 और उसके बाद मालूम चलेगा, अभी तो अंतिम 86 की लड़ाई है। तो साहब नेताओं को लडऩे के लिए छोडि़ए और आप अपने हक के लिए लडि़ए, ताकि आपके बच्चे पढ़ सकें, बढ़ सकें।

शुक्रवार, 8 मई 2009

रामू की रण, राहुल की नीति और आडवाणी का प्रमोशन

चार चरण के चुनाव खत्म होने के बाद अब सारा ध्यान बाकी की 86 सीटों और 16 मई के बाद होने वाले चुनाव पर केंद्रित हो गया है। कांग्रेस-भाजपा सहित सभी दल रणनीति बनाने में जुटे हैं दोनों बड़ी पार्टियों का दावा है कि सबसे ज्यादा सीटें उन्हें ही मिलेंगी अब ईवीएम के गर्भ में क्या छिपा है यह तो 16 मई को ही पता चलेगा लेकिन पार्टियों की बेचैनी बढऩे लगी है। तभी तो राहुल बाबा लालू-पासवान को छोड़कर नीतीश कुमार, करुणनिधि की अनदेखी कर जयललिता और ममता से नजरें चुराकर वामदलों को दाना डाल चुके हैं। यह बात अलग है कि नीतीश ने अपना रुख साफ कर दिया है तो ममता के आंख तरेरेने के बाद कांग्रेस डैमेज कंट्रोल में लग गई है। वहीं बेटे के बयान से उठे संकट के कम करने के लिए सोनिया को तमिलनाडु जाना पड़ रहा है। हाल ये है, आया नहीं छोरा, बजने लगा ढिंढोरा।

पांच साल क्यों नहीं
पिछले दिनों राहुल बाबा ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बाकी सब बातों के अलावा दो ऐसी बातें कहीं जो मुझे खटकीं। पहला तो यह कि सीबीआई को दुरुपयोग हो रहा है और दूसरा यह कि वे वंशवाद के विरोधी हैं, लेकिन क्या करें जो गांधी हुए? देश में सबसे ज्यादा सत्ता कांग्रेस के पास रही और सबसे अधिक समय तक गांधी परिवार ने राज किया। सीबीआई या संविधानिक संस्थाओं का जितना दुरुपयोग गांधी परिवार और कांग्रेस ने किया उतना कोई दूसरी पार्टी या नेता नहीं कर पाया, क्योंकि सत्ता में नहीं रहा। पिछले पांच साल से कांग्रेस की सरकार है। राहुल बाबा और सोनिया जी के आदेश के बिना सरकार का पत्ता भी नहीं डोलता। ऐसे में सीबीआई के एक के बाद एक कई मामलों में दुरुपयोग होता रहा और राहुल बाबा चुप रहे, क्यों? अगर तब चुप रहे तो अभी क्यों बोला? दरअसल यह उनकी छवि को बेदाग और उनको बेबाक बनाने का प्रयास है। उनके इस बयान का राजनीतिक अर्थ तो राजनीतिक पंडित जाने लेकिन मेरे हिसाब से इससे उनके मजबूत प्रधानमंत्री की कार्यक्षमता पर जरूर उंगली उठ गई है। खैर..........

तोड़ दें मजबूरी का बंधन
बात उन्होंने कही वंशवाद वाली। राहुल बाबा ने कहा, वे इसके विरोधी हैं। लेकिन यह बात कहीं से भी विश्वास करने और मानने लायक नहीं है। आखिर जब राहुल को महासचिव बनाया गया तब उन्होंने इसका विरोध क्यों नहीं किया। वे आम कार्यकर्ता बनकर भी पार्टी की सेवा कर सकते थे। कांग्रेस संगठन का चुनाव कब हुआ था किसी को याद नहीं। जतिन के पापा और यूपी वाले जीतेंद्र प्रसाद ने सोनिया के खिलाफ चुनाव लड़ा था, उसके बाद तो मैडम सर्वसम्मति से अध्यक्ष बन जाती हैं। जितने राजाओं-नवाबों को कांग्रेस चुनाव लड़ा रही है उतने किसी और पार्टी से नहीं हैं। पिता की सीट से बेटा, बेटे की सीट से बहू और भी......... क्या राहुल बाबा आम पार्टी कार्यकर्ता को चुनाव नहीं लड़ा सकते? खैर यह पार्टियां तो नेताओं की प्राइवेट कंपनी बन गई हैं। क्या कांग्रेस, क्या भाजपा? क्षेत्रीय दलों की हालत तो और बुरी है। हां वामपंथी दल अभी इस संक्रमण से कुछ हद तक बचे हैं।

तो आप कर करते रहे पांच साल?
राहुल बाबा राजग और भाजपा शासित राज्यों में अपने स्वर्गीय पिता (राजीव जी) का एक जुमला दोहराते हैं। राजीव जी ने कहा था कि केंद्र 1 रुपया भेजता है तो आम आदमी तक 10 पैसे पहुंचते हैं। यानि बाकी 90 पैसे भ्रष्टचार की भेंट चढ़ जाते हैं। यही बात अब राहुल कह रहे हैं। पिछले पांच सालों में आखिर उनकी केंद्र सरकार ने क्या किया? आज भी कांग्रेस और उसके समर्थित मुख्यमंत्रियों की संख्या सबसे ज्यादा है, फिर भी जनता को 10 पैसे मिल रहे हैं, क्यों? कब तक इन जुबानी जुगलबंदी से जनता की गरीबी हटाने का सपना दिखाते रहेंगे? राहुल से लोगों को वैसी ही उम्मीद थी जैसी राजीव जी से। पर राहुल तो खुद कहते फिर रहे हैं कि वे अपने वालिद जैसे

राष्ट्रगान का अपमान बर्दाश्त नहीं
इधर राहुल बाबा अपने बयानों से कांग्रेस को फंसा बैठे हैं तो रामगोपाल वर्मा एक गाने से अपनी फिल्म 'रण' को। आरोप है कि इस रामू ने रण में राष्ट्रगान का गलत उपयोग किया है। मैंने भी गाना सुना, बात सही थी पर राष्ट्रगान से किसी को छेड़छाड़ करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। दूसरे तरीके भी हैं सही बात कहने के। यहां गीत के बोल दिए जा रहे हैं इसे राष्ट्रगान की धुन पर गाया और फिल्माया गया है। जिस गाने को सेंसर बोर्ड ने बैन कर दिया हमारी जिम्मेदार मीडिया उसे बार-बार चला रही है।
क्या होगा आडवाणी का प्रमोशन?
बात रण की चली तो आडवाणी जी की भी चर्चा जरूर उठेगी। मजबूत-कमजोर, मुंबई-कांधार के घालमेल में उलछे आडवाणी जी राजनीति में सबसे बड़े प्रमोशन के लिए पूरे जी जान से जुटे हैं। अब आडवाणी अटल तो हैं नहीं कि लोग खिंचे चले आएं सो अपना घर दुरुस्त करने में ही पसीने आ रहे हैं। एक तो एनडीए सिकुड़कर छोटा हो गया है उसपर कभी राहुल बाबा नीतीश पर डोरे डाल रहे हैं तो कभी वाममोर्चा। अब तो भारतीय राजनीति के इस महारथी का राम ही मालिक है।

चलते-चलते रामपुर की दंगल
चलते-चलते रामपुर की चुनावी दंगल की भी चर्चा हो जाए। उप्र में लखनऊ के अलावा एक और नबाबी शहर रामपुर में इन दिनों राजनीतिक दंगल लगी हुई है। खैर यहां रामपुरी चाकू तो नहीं लेकिन तीखे शब्दवाण जरूर चल रहे हैं। मुकाबला है अमर सिंह, और आजमखान के बीच। सात बार से रामपुर से विधानसभा में नुमाइंदगी कर रहे आजम कल्याण की ओट लेकर जयाप्रदा और अमर सिंह पर निशाना साध रहे हैं। आजम रामपुर से चुनाव लडऩा चाहते थे लेकिन अमर सिंह ने अपनी करीबी दोस्त और यहां सिटिंग सांसद जयाप्रदा को टिकट दिलवा दिया। जयाप्रदा की आंख में भाई के विरोध से आंसू आ गए तो आजम भाई ने कहा यह तो फिल्मी ड्रामा है। आजम खान सपा के संस्थापकों में से एक और मुलायम सिंह के बेहद करीबी रहे हैं। अब आजम मुलायम की भी नहीं सुन रहे। अमर, आजम और मुलामय तीनों 13 के बाद फैसला लेने की बात कह रहे हैं। फैसला क्या होगा पता नहीं लेकिन यह तो पता चल ही गया कि अमर सिंह ने एक और रिश्ता (बचकर रहना) तोड़ दिया। खैर राजनीतिक रिश्तों का कौन भरोसा कब बने-कब बिगड़े। ऐसा न होता तो कल्याण आज मुलायम से गलबहियां न कर रहे होते। चलिए आज इतना ही।

शुक्रवार, 1 मई 2009

यह भी विश्वासघात (ब्रीच ऑफ ट्रस्ट) है

मुझे नहीं पता कि जन प्रतिनिधित्व कानून और भारतीय दंड संहिता में क्या संबंध है? दरअसल मैं कानून का जानकार नहीं हूं, लेकिन एक आम मतदाता और नागरिक के कारण मैं जानना चाहता हूँ कि चुनावी घोषण पत्रों में किए गए वायदों और प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों, वायदों और टिप्पणियों से मुकरना क्या फिर न हो जनता से धोखा ब्रीच ऑफ ट्रस्ट (विश्वासघात/धोखा) नहीं है? माना कि इन वायदों को पूरा करने के लिए जनता से पार्टियों या नेताओं का कोई लिखित करार नहीं होता लेकिन क्या कानूनी फंदा न होने पर नेता और पार्टियों जनता को बार-बार धोखा देती रहेंगी? क्या उनकी कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है और अगर है तो फिर क्यों नहीं जनता के लिए नेता और पार्टियां अपने जवाबदेही पर खरे उतरते हैं? क्रिमिनल ब्रीच आफ ट्रस्ट के दोषी को सजा का प्रावधान है तो जनता के विश्वास तोडने वालों के लिए क्यों नहीं। अगर किसी को बहुमत नहीं मिला तो जो भी सि्थति बनेगी वह ब्रीच आफ ट्रस्ट जैसी ही होगी।
दल बदल गैरकानूनी तो यह क्यों नहीं?
देश में दल-बदल गैरकानूनी है। इसके लिए कुछ निश्चित संख्या है। उससे कम लोग पार्टी छोड़ेंगे तो उनकी सदन से सदस्यता खत्म। संसद या विस में पार्टी की स्थिति मजबूत करने के लिए व्हिप की व्यवस्था है। उसका उल्लंघन करने पर भी सदस्यता खतरे में। क्या यह लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए है या सिर्फ इसलिए कि पार्टी को प्राइवेट कंपनी को तरह चलाने वाले दल समर्थन लेने देने के लिए मोलभाव कर सकें और उसकी कीमत वसूल सकें। अगर नहीं तो चुनाव पूर्व जनता के से किए गए वायदों पर भी उन्हें खरा उतरना चाहिए। अगर कहा है कि कांग्रेस-भाजपा को सत्ता से दूर रखना है तो उसपर खरे उतरें। नहीं तो व्हिप और दल-बदल कानून भी खत्म करें और सांसदों को 'अंतर्आत्मा की आवाज पर' वोट करने दें।

संगठित उद्योग बन गई है राजनीति
दल बदल कानून का सभी दलों ने समर्थन किया था। दरअसल व्यापक पैमाने पर दल बदल जैसी सि्थित क्षेत्रीय और छोटे दलों में ही होता था। ऐसे में पार्टियों को प्राइवेट कंपनी की तरह चलाने वाले एमडी और सीईओ जैसे पार्टी अध्यक्ष कमाई से चूक जाते थे। जब दल बदल गैरकानूनी हो गया तो उनकी कमाई खूब होने लगी। कमाई पहले भी होती थी। नरसिंहाराव सरकार के समय झामुझो का कारनामा याद है न। वैसे यह बहुत पुराना केस हो गया। साढे चार साल कांग्रेस और यूपीए को गरियाती रही सपा ने विश्वासमत के दौरान कांग्रेस का साथ दिया,क्यों, क्या डील हुई किसी को नहीं पता चला। पता चला तो यह कि संसद के अंदर नोट लहराए गए। राजस्थान में दो महीने पहले कांग्रेस के विरोध में चुनाव जीतने वाले बसपा के 6 विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए,क्यों? यही हाल कर्नाटक में भी हुआ। चुनाव बाद मोलभाव कर बनीं सरकारें न तो अच्छा काम कर सकती है और न ही लोकतंत्र को स्थायित्व दे सकती है। प्रधानममंत्री मनमोहन जी ने खुद कहा कि लेफ्ट ने सरकार को साढे चार साल बंधुआ बनाकर रखा। फिर जब मन किया समर्थन वापस।
जितना हम जानते हैं
* चुनाव बाद पार्टियों द्वारा अपनी निष्ठा बदलना सीधे तौर पर जनता से किया गया मौखिक करार तोडना है।
* ऐसे में वे धन,मंत्रीपद,सीबीआई के दुरुपयोग जैसे लाभ लेती है।
* सरकार को दबाव में रखती है,जिससे सरकार कई बार जनता के हित के फैसले नहीं ले पाती।
* क्षेत्रीय दबाब में राष्ट्रीय मुद्दे और हित गौण हो जाते है।
* राजनीतिक अस्थतिरता बनी रहती है। मध्यावधि चुनाव की आशंका।
* नेता और पार्टियां अपने सारे वायदे लिखित तौर पर आयोग और जनता को दें। ताकि वे भारतीय दंड संहिता के ब्रीच आफ ट्रस्ट के दायरे में आ सकें।

अगर इसपर रोक लग जाए
* यह अनिवार्य हो कि दल चुनाव पूर्व जनता से किए गए वायदों को पूरा करें।
* जिनके विरोध के नाम पर वोट मांगा हैं उनके साथ न जाएं।
* क्षेत्रीय पार्टियां पूर्व ही राष्ट्रीय दलों से समझौता करें। अगर ऐसा होगा तो खंडित जनादेश नहीं आएगा।
* चुनाव पूर्व समझौता नहीं है तो को बाहर से ही समर्थन दें। सरकार में शामिल होने पर प्रतिबंध।
* होगा तो जनता चुनाव के लिए उन विकल्पों को ही चुनेंगी जो स्थाई सरकार दे सके।
* मध्यवधि चुनाव की आशंका खत्म होगी।
* चुनाव बाद दल जुमले उछालकर जनता के विश्वास की कीमत नहीं वसूल सकेंगी।

ताकि लोकतंत्र पर विश्वास बना रहे
इस मसले जनता की तरफ से नेताओं और पार्टियों की ओर सवाल उछलने चाहिए ताकि राजनीतिक दल चुनाव बाद सीटों के बदले खरीद फरोख्त न कर सकें, ताकि संसद में नोट लहराने जैसी शर्मनाक घटनाएं न हों, ताकि हमारा लोकतंत्र मजबूत रहे, नेता और पार्टियां कपडो की तरह ईमान न बदल सकें, जनता को बार-बार छला न जाए, के विश्वास के बदले मिली संसद की सीटों को नीलाम न किया जा सके।

फिर न हो जनता से धोखा:

तीसरे चरण का मतदान पूरा हो गया। इस चरण में गर्मी ने ऐसा रंग दिखाया कि लोकतंत्र सेकेंड डिवीजन ही पास हो सका। खैर दूसरे चरण के मुकाबले मतदान अ'छा रहा यह राहत की बात है। धीरे-धीरे राजनीतिक दलों की असलियत का एहसास होता जा रहा है। हालांकि इसके बावजूद यह साफ नहीं हो सका है कि किसकी जय होगी और किसकी पराजय? अभी दो चरण बाकी हैं जिनमें 171 सीटों पर चुनाव होने हैं। सभी पार्टियां पूरी ताकत से जुट गई हैं। लेकिन चुनावों की घोषणा के साथ ही यह भी कहा जाने लगा था कि असली लड़ाई तो 16 मई के बाद शुरू होगी। इतना तो तय है कि यूपीए-एनडीए-थर्ड फंरट या फोर्थ फंरट किसी को 272 का जादुई आंकड़ा नहीं मिल सकेगा। ऐसे में होगा क्या? यह देखने वाली बात है। देखना यह भी है कि एक-दूसरे पार्टी को गरिया कर जनता से जनादेश मांगने वाली पार्टियां चुनाव बाद भी अपने रुख पर कायम रहती हैं या कथित तौर पर 'सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने', 'गैर कांग्रेस सरकार', 'राष्ट्रहित', 'न्यूनतम साझा कार्यक्रम' आदि जुमलों के नाम पर संख्या की सौदेबाजी कर सरकार में शामिल होती हैं?

पूत के पांव पालने में ही दिखे: बात देखने की चली तो याद आया कि यह तो अभी से दिखाई पडऩे लगा है। उप्र और बिहार में यूपीए से अलग होकर चुनाव लड़ रही सपा, राजद और लोजपा कांग्रेस को कोस भी रही है और यह भी कह रही है कि सरकार यूपीए की बनेगी। यही हाल तमिलनाडु में पीएमके का है जो यूपीए और डीएमके से अलग होकर एआईडीएमके के साथ चुनाव लड़ रही है। दूसरी ओर उड़ीसा में बीजद का रुख भी कुछ ऐसा ही है। 10 साल से भाजपा और बीजद के गठबंधन सरकार की अगुवाई कर रहे नवीन पटनायक भाजपा से अलग होकर तीसरे मोर्चे के साथ चुनाव लड़ रहे हैं। उनका दावा है कि वे केंद्र में गैरकांग्रेसी और गैर भाजपाई सरकार बनाएंगे। पश्चिम बंगाल के कामरेड साथी एक साल पहले ही यूपीए से अलग हो गए हैं।

16 के बाद संभावित समीकरण
1- यूपीए को पूर्ण बहुमत मिले। (संभावना कम)
2- एनडीए को पूर्ण बहुमत मिले। (संभावना कम)
3- थर्ड फंरट को पूर्ण बहुमत मिले। (संभावना कम)
4- यूपीए की कुछ सीटें कम होने पर सपा, राजद, लोजपा, पीएमके, लेफ्ट फिर आएंगे साथ।
5- एनडीए की कुछ सीटें कम होने पर माया, जयललिता, चंद्रबाबू, पटनायक फिर आएंगे साथ।
6- भाजपा या कांगे्रस में से कोई एक थर्ड फंरट को बाहर से समर्थन दे। (संभावना कम)
7- भाजपा या कांग्रेस में कोई एक विपक्ष में बैठेगी।

यूपीए या एनडीए या थर्ड फंरट को बहुमत मिला तो कोई बात नहीं लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो विपक्ष में बैठने के आलावा जो भी स्थिति बनेगी वह ब्रीच ऑफ ट्रस्ट ही होगा। यूपी में मुलायम ने कांग्रेस, भाजपा और बसपा के खिलाफ वोट मांगा है तो माया ने भाजपा, कांग्रेस और सपा के। सपा अगर कांग्रेस से मिली या माया भाजपा से तो क्या यह जनता से विश्वासघात नहीं होगा? बिहार में लालू-पासवान ने राज्य की राजग सरकार और कांग्रेस के विरोध में वोट मांगा है अगर वे फिर यूपीए में गए तो क्या यह विश्वासघात नहीं होगा? यही हाल लेफ्ट का भी है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि लेफ्ट ने हमेशा इतिहास में गलत किया, लेकिन दो दिन बाद ही वे कहते हैं कि लेफ्ट का साथ ले सकते हैं अब पश्चिम बंगाल में मामता बहन और कांग्रेस की पूरी राजनीति लेफ्ट के विरोध पर ही टिकी है इसी आधार पर जनता मतदान कर रही है। एक चुनने का मतलब है दूसरे के विरोध में चुनाना। ऐसे में अगर चुनाव बाद अगर लेफ्ट यूपीए के साथ या पटनायक राजग के साथ जाते हैं तो क्या यह ब्रीच ऑफ ट्रस्ट नहीं होगा?......जारी है

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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