राज और समाज पर खरी आवाज

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रविवार, 26 अप्रैल 2009

कांग्रेस; स्वांग का सच

आज राहुल गांधी कोलकाता में थे। उन्होंने कहा कि उनमें प्रधानमंत्री बनने योग्य अनुभव नहीं (अभी प्रधानमंत्री बनने का अनुभव नहीं : राहुल ) है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी आज रायबरेली में बोलीं कि आजकल सब लोग प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। पता नहीं कौन बनेगा? पहले सोनिया जी की बात कर लें फिर राहुल पर आएंगे। कांग्रेस ने सोनिया को यह कहकर महान बताती है कि उन्होंने 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया था और कुर्सी पर मनमोहन सिंह को बैठा दिया।

.... तब अंतरआत्मा न बोलती
एक समय की बात है सोनिया गांधी भी गई थीं राष्ट्रपति के पास यह दावा लेकर कि उनके पास 272 सांसद हैं। उन्हें सरकार बनाने का मौका दिया जाए। तब अगर मुलायम सिंह यादव ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा बनाकर समर्थन देने से इनकार किया होता होता तो सोनिया जी प्रधानमंत्री बन गर्ईं होतीं। अगर ऐसा हुआ होता तो क्या-क्या होता? होता क्या, 2004 की मई में सोनिया जी की अंतरआत्मा की आवाज बाहर आती और देश को दुनिया का सबसे मजबूत प्रधानमंत्री (डॉ. मनमोहन सिंह) मिल पाता। यही नहीं 2004 में जब प्रधानमंत्री का नाम तय करने के लिए कांग्रेस संसदीय दल की बैठक हो रही थी तब कांग्रेस के सभी नेताओं ने सोनिया जी से प्रधानमंत्री बनने को कहा था। कांग्रेस नेता सोनिया को पीएम बनाने के लिए दहाड़ मारते रहे, लेकिन मैडम जानती थीं कि विदेशी मूल का जिन्न फिर बाहर जाएगा। तब एक भी कांग्रेसी ने यह नहीं कहा कि मैडम नहीं मान रही हैं तो चलो मनमोहन, प्रणब या कोई और पीएम बन जाए। आखिर शरद पवार जो बाद में कांग्रेस के साथ आए उनसे भी तो जनता पूछती कि क्या फायदा विदेशी मूल के मुद्दे पर अलग पार्टी बनाने का? हो सकता है विश्वासमत के दौरान साथ देने वाले सपाई भी बिदक जाते।

कुर्सी नहीं तो क्या सत्ता तो है
मैडम ने देख लिया था कि कैसे कांग्रेसी उनके इशारे पर सबकुछ निवछावर करने को तैयार हैं। ऐसे में उनके लिए कुर्सी उतनी जरूरी नहीं रह गई, क्योंकि वे जानती थीं/हैं कि कोई भी कांग्रेसी पीएम की कुर्सी पर बैठे सत्ता की शक्तियां तो उन्हीं के पास रहेंगी। पांच साल से जनता यही तो देख रही है। पेट्रोल का दाम घटाने से लेकर कोई भी मुद्दा हो उसकी घोषणा मनमोहन जी नहीं सोनिया जी करती हैं। आज भी आखिर क्या हो रहा है, कांग्रेस के स्टार प्रचारक सोनिया, राहुल, प्रियंका (अमेठी-रायबरेली), कांग्रेस अध्यक्ष- सोनिया गांधी, यूपीए चेयरपर्सन- सोनिया गांधी, कांग्रेस के सबसे काबिल महासचिव- राहुल गांधी, प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार- राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी- प्रियंका गांधी (क्या मैं बुढिय़ा लगती हूं?), आदि-आदि..... तीन लोगों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है कांग्रेस, क्यों यह मजबूती है मजबूरी?

अब राहुल बाबा की बात
बाबा आज कोलकाता में बोल के आए कि उनके पास अनुभव की कमी है और उनकी तुलना उनके वालिद (राजीव जी) से की जाए। आखिर उनको कांग्रेसी नेताओं के अलावा कौन कह रहा है प्रधानमंत्री बनने को? राहुल के इस बयान के पीछे सिर्फ यह नहीं है कि वे मनमोहन के लिए रास्ता साफ छोड़ रहे हैं, बल्कि कुछ और भी है। दरअसल, राहुल, सोनिया सहित कांग्रेसी रणनीतिकार जानते हैं कि इस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत तो दूर 150 सीटें जुटाने में भी परेशानी होगी। सरकार चाहे जो बनाए, बनेगी खिचड़ी। खिचड़ी में भी खींचतान। जाने कब कौन किस मुद्दे पर टांग खींच ले ऐसे में सोनिया राहुल को लंगड़ी घोड़ी पर नहीं बैठाना चाहती। और राहुल, सोनिया का करिश्मा कितना है यह दो आम चुनावों और कई विस चुनावों में साफ दिख चुका है। हालत यह है कि जीत तय होने के बाद भी प्रियंका केवल रायबरेली और अमेठी में प्रचार कर रही हैं वह भी अपने पति और बच्चों के साथ।

महात्वाकांक्षा क्यों नहीं ?
हम जिस पेशे या क्षेत्र में होते हैं उसमें आगे बढऩे और शीर्ष पर जाने की इच्छा रखते हैं। यह महात्वाकांक्षा है। सफल और सुखी जीवन के लिए महात्वाकांक्षी होना भी चाहिए। लेकिन कांग्रेस के किसी भी नेता में महात्वाकांक्षा नहीं दिखती। कम से कम उनके बयानों से तो यही लगता है। अगर महात्वाकांक्षा है तो सिर्फ यह कि मैडम के लिस्ट में उनका नाम सबसे ऊपर रहे। बात चाहे सालों केंद्रीय मंत्री रहे बंगाली बाबू की हो या 10 साल मुख्यमंत्री रहे राजा इस एक दो नाम नहीं सभी कांग्रेसी इसी सूची में शामिल हैं। जाहिर है ये राजनीति में हैं और रहेंगे भी लेकिन क्या इनका मन प्रधानमंत्री बनने का नहीं करता और अगर करता है तो कहते क्यों नहीं? जैसे दूसरी पार्टियों के नेता कहते हैं।

कांग्रेसी नेताओं से चंद सवाल

मेरे कांग्रेसी नेताओं से कुछ सवाल हैं आम जनता के तौर पर। सामने से कोई ऐसे सवाल पूछता नहीं और न ही कोई जवाब देता है लेकिन हो सकता है यह सवाल उन तक पहुंचे और जवाब मुझ तक। शायद ही कोई कांग्रेस नेता इनका जवाब दे या देना चाहे। मैं केवल 10 छोटे और बहुत आसान सवाल पूछ रहा हूं आशा है कि इनका जवाब देने के लिए 10 जनपथ जाने की जरूरत नहीं पडेगी।

1- राजनीति में क्यों हैं?
(समाज सेवा? यह बिना चुनाव लड़े भी हो सकती है, उदाहरण हैं।)
2- प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं?

3- अगर हां, तो कहते क्यों नहीं?

4- अगर नहीं, तो क्यों नहीं?

5- क्या नेतृत्व क्षमता नहीं है? खुद को इस योग्य नहीं पाते?

6- कहने से डरते हैं? शरमाते हैं? किसी ने रोका है?

7-
पीएम राहुल ही क्यों ? प्रणब, दिग्गी, चिदंबरम ....आदि क्यों नहीं?

8-राहुल में क्या है जो आप में नहीं?

9- क्या कांग्रेस के बाकी नेता राहुल से कमजोर हैं?

10- या राहुल उन सबसे ज्यादा मजबूत हैं? या फिर कुछ और?

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

बनारस की सैर

बनारस जहां की गलियों में आज भी संस्कृति और परंपरा का रस बरसता है। गंगा किनारे बसी बाबा विश्वनाथ की नगरी को घटों और गलियों का शहर कहा जाता है। जितने घर हैं उतने मंदिर। कहते हैं काशी के कंकड़-कंकड़ में शिव का वास है। वरुणा और असी नदी के बीच बसे इस शहर के बारे में इतिहासविद् मार्क ट्वेन ने लिखा है, 'इतिहास से पुराना, परंपराओं से पुराना...' यहां भारत की सभी संस्कृतियां, परंपराएं लघु-दीर्घ रूप में यहां जरूर मिलेंगे। और यही इसकी खासियत है। बनारस हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है तो सारनाथ बौद्धधर्मावलंबिंयों की देवभूमि। कला-संगीत और शिक्षा की भागीरथी भी यहां से निकलती है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि
वाराणसी में मृत्यु होने पर सीधे मोक्ष प्राप्ति होती है। यही कारण कि लोग अपना अंतिम समय शिवधाम में बिताना चाहते हैं। खैर यह सब तो आपने इतिहास में पढ़ा होगा आइए आपको सीधे ले चलते हैं बनारस और घूमने की शुरुआत करते हैं।
बनारस में हमारी गाइड हैं रूबी जी। जो बीएचयू से पढाई पूरी करने के बाद पत्रकारिता कर रही हैं।
कैसे आएं: बनारस आने के लिए देश के लगभग हर कोने से रेल यातायात सुलभ है। यहां का बाबतपुर हवाई अड्डा दिल्ली सहित सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। स्थानीय परिवहन के लिए ऑटो, किराए पर टैक्सी सुलभ है।
कब आएं: सभी मौसम यहां के लिए अनुकूल हैं। गर्मी के बावजूद बनारस की सुबह और शाम बहुत सुहानी होती है।
क्या खाएं: बनारस का अपना खानपान है। उत्तर भारत के प्रसिद्ध व्यंजनों के साथ ही यहां देश-दुनिया के प्रसिद्ध खाने सुलभ हैं। वैसे बनारस की खासियत है यहां की लस्सी और दूध। सुबह के समय कचौरी और जलेबी खाएं और दोपहर में सादा खाना। शाम को लौंगलता के साथ समोसा और गुलाब जामुन ले सकते हैं। इसके बाद बनारस की प्रसिद्ध ठंडाई पीना और पान खाना भूलें। बनारसी साडियां और सिल्क के कपडे तो दुनियाभर में अपनी अलग पहचान रखते है। इसलिए थोडी खरीददारी भी करें।
कहां-कहां जाएं
बाबा विश्वनाथ मंदिर
गंगा के तट पर स्थित शिवलिंग 12 ज्योतिर्र्लिंगों में से एक है। तंग गलियों के बीच से होकर मंदिर तक जाना पड़ता है। मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर यहां सुरक्षा काफी कड़ी कर दी गई है। गली में भगवान को चढ़ाने के लिए फूल-प्रसाद के अलावा कपड़ों, रत्नों की भी दुकानें हैं। आगे पुलिस की तलाशी के बाद आप अन्नपूर्ण मंदिर के आगे से होकर बाबा विश्वनाथ मंदिर में पहुंचेगे। पंजाब के महाराजा रणीजत सिंह द्वारा स्वर्णाच्छादित कराए गए गुंबद के नीचे चांदी के अर्घे में श्यामवर्ण का शिवलिंग स्थापित है। यहां पांच बार आरती और पूजन होता है। मंदिर की व्यवस्था सरकार करती है। मंदिर सुबह 4 बजे से 11 बजे तक और फिर दोपहर 12 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। रात 11 बजे भगवान की भव्य शयन आरती होती है। बाहर निकलकर मां अन्नपूर्णा मंदिर के दर्शन होते हैं।
ज्ञानवापी: विश्वनाथ मंदिर के बगल स्थित मस्जिद में श्रृंगारगौरी मां की मूर्ति है। मस्जिद के बाहर मंदिर परिसर में विशाल कुंआ है और उसके बाहर विशालकाय नंदी है जो मस्जिद की ओर देख रहा है। यहां कुएं का जल लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
काल भैरव: काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। बाबा विश्वनाथ से लगभग एक किमी दूरी पर यह मंदिर स्थित है।
दुर्गाकुंड: आदिशक्ति मां दुर्गा का यह मंदिर पवित्र सरोवर दुर्गाकुंड के किनारे है। मान्यता है कि यहां मां की मूर्ति को स्थापित नहीं किया गया था बल्कि स्वयं प्रकट हुई थी। नवरात्रि में यहां दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।
तुलसी मानस मंदिर: दुर्गाकुंड के नजदीक ही सफेद संगमरमर से बना विशाल तुलसी मानस मंदिर है। भगवान राम को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 1964 में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहां पर बैठकर तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी। मानस मंदिर की दीवारों पर रामचरित मानस की चैपाइयां लिखी है।
संकटमोचन मंदिर: मानस मंदिर से आधा किमी की दूरी पर स्थित संकटमोचन मंदिर हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है। यहां साल में एक बार संगीत समारोह आयोजित होता जिसमें विख्यात कलाकार प्रस्तुति देते हैं।
भारतमाता मंदिर: कैंट स्टेशन से लगभग दो किमी दूर भारत माता को समर्पित यह एक अनोखा मंदिर है। 1936 में इस मंदिर का निर्माण बाबू शिव प्रसाद गुप्त ने करवाया था। मंदिर में अविभाजित भारत का नक्शा बना है। संगमरमर से बने इस नक्शे में, मैदान, नदियों, पहाड़ों और समुद्र को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है। इसके अलावा काशी कई छोटे-बड़े अन्य मंदिर भी हैं।
बनारस के घाट
बनारस शहर को चंद्राकार घेर हुए गांगा के छोटे-बड़े 84 घाट हैं। अस्सी घाट से लेकर राजघाट तक पैदल घूमने का अपना ही मजा है। अस्सी घाट के नजदीक ही महारानी लक्ष्मीबाई का जन्मस्थल है। आगे दसाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट और भी.....। सुबह-शाम इन घाटों पर घूमने का अपना ही आनंद है। बनारस के घाट पर बैठकर सूर्योदय देखना अपने आप में अद्भुद अनुभव है। फिर शाम को गंगा आरती। आध्यात्म और संगीत का अनुपम संगम। सूर्याेदय और गंगा आरती देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग आते हैं। यहां नाव से भी आरती का आनंद लिया जा सकता है। यहीं बीच में है मणिकर्णिका घाट। जहां से गुजरते हुए बरबस संसार के सबसे बड़े सच से साक्षात्कार होता है। कहते हैं इस महाश्मशान में जिसका अंतिम संस्कार होता है उसे स्वर्ग में जगह मिलती है।
बनारस में चर्च और कई प्रसिद्ध मसि्जद भी हैं। हां, बनारस आएं है तो कबीर की जन्मस्थली, लहरतारा और रविदास मंदिर देखकर ही जाएं।

देव दीपावली : कार्तिक पूर्णिमा के दिन वाराणसी में देव दीपावली मनाई जाती है। यह उत्सव बहुत ही अद्भुत और दुर्लभ है। इस दिन शहर के सभी घाटों को मिट्टी के दीये जलाकर सजाया जाता है। इस दृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि मानों आकाश के सारे तारे बनारस के घाट पर उतरकर भगवान शिव की महाआरती कर रहे हैं।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय
वाराणसी को 'सर्वविद्या की राजधनी' कहा जाता है। महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। 1300 एकड़ में फैला विश्वविद्यालय एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विवि है। इसके परिसर में स्थित नया विश्वनाथ मंदिर भी अच्छा दर्शनीय स्थल है। यह भव्य मंदिर परिसर की शान है। बनारस जाएं तो यहां जरूर जाएं। दुनिया भर में बीचएयू नाम से प्रसिद्ध इस विवि में देश सहित दुनिया के कई देशों के विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। बनारस में काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विवि और सारनाथ में तिब्बत उच्च शिक्षण संस्थान भी है।

भारत कला भवन: काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित यह कला और शिल्प संग्रहालय विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां 15वीं और 16वीं शताब्दी की कई शिल्पकारियां रखी हैं। इसके साथ ही मुगलकाल तथा अन्य राजाओं के शासन काल की पेंटिंगों का विशाल संग्रह है। इस संग्रहालय में पुराने सिक्कों का भी बहुत अच्छा संग्रह है।

आसपास
रामनगर किला: शहर से 14 किलोमीटर दूर गंगा के पूर्वी किनारे पर महाराजा काशी का किला है। इसका निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने करवाया था। लाल पत्थरों से निर्मित इस किले को संग्रहालय में बदलकर आम जनों के लिए खोल दिया गया है। इस संग्रहालय में राजसी ठाठबाट की तमाम चीजें गाडिय़ां, गहने, कपड़े आदि के अलावा अस्त्र-शस्त्र का विशाल संग्रह है। अपनी तरह का यह एशिया का सबसे बड़ा संग्रहालय है।
सारनाथ
बौद्धध्र्मावलम्बियों के लिए विशेष महत्व रखने वाला यह स्थल कई मायनों में महत्वपूर्ण है। भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश यहीं दिया था।
धमेक स्तूप: यह स्तूप सारनाथ की पहचान है। 43.6 मीटर लम्बा यह स्तूप ईंट और पत्थरों से बना हुआ है। इसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष रखे गए हैं।
मूलगंध कुटी विहार: महात्मा बुद्ध का यह आधुनिक मंदिर महाबोधि सोसाइटी द्वारा बनवाया गया है। जिसमें भगवान बुद्ध की मनमोहक मूर्ति स्थापित है। कुछ पुराने मंदिर यहां जर्जर भी हो चुके हैं जिनका पुनरोद्धार कराया जा रहा है। यहां एक छोटा सा चिडिय़ा घर और पुराने अवशेष हैं।
सारनाथ संग्रहालय: इस संग्रहालय में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अशोक स्तंभ संरक्षित है। इसके अलावा यहां बुद्ध और बोध्सित्व की मूर्तिकला का विशाल और दुर्लभ संग्रह है।
आज की यात्र बस यहीं तक। रूबी को धन्यवाद और अब आगे की तैयारी।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

लोकतंत्र दूसरे चरण में सेकेंड डिवीजन पास

15वीं लोकसभा चुनाव का दूसरा चरण बीत गया। हालंकि पहले चरण में फस्र्ट डिवीजन (62 फीसदी मतदान) से पास हुआ लोकतंत्र दूसरे चरण में सेकेंड डिवीजन (55 फीसदी मतदान) आया है। परीक्षा तो सूर्यदेव ने भी अपने प्रचंड रूप के साथ ली लेकिन यह तो बहादुरी है देश के आम जनता की, जिसके चलते लोकतंत्र इम्तहान में पास हो गया। हाल ही में किसी पत्रिका में छपा था कि एक महीने की मेहनत (प्रचार) और पांच साल (अगर सरकार चली) का आराम। नेता तो आराम करेंगे लेकिन जनता जो 40 डिग्री की तपती धूप में मतदान करने आई थी वह कल से फिर खेतों में काम करने में जुट जाएगी। उसे इन नेताओं का पेट भी तो भरना है। नेताओं का पेट भरेगा लेकिन जनता पहले की ही तरह खाली पेट और खाली हाथ सोएगी। खैर इन बातों का क्या.........?

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

आखिर चुनें किसे?

कोलकाता से लेकर कश्मीर तक इलेक्शन की धूम है तो तो उधर कोलकाता से केपटाउन तक क्रिकेट की धूम है। इंडियन पॉलिटिकल लीग के पांच दिवसीय खेल का कल (23 अप्रैल) दूसरा दिन है। 12 राज्यों की 140 सीटों पर वोट डाले जाने हैं। 2000 से ज्यादा प्रत्याशी हैं। कुछ बड़े नाम तो कुछ नाम कमाने की कोशिश में लगे हुए। यह चरण यूपीए और एनडीए दोनों के लिए खासा महत्वपूर्ण है। असली लड़ाई तो दो धु्रवीय ही है। चुनाव के पहले या बाद में इन्हीं में से एक की ओर धु्रवीकरण होना है। लेकिन अपना सवाल यह नहीं है कि सरकार किसकी बननी है। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री कमजोर बनेगा या गुलाम? सब में खोट है तो चुनें किसको?
सच्चे को चुनिए-अच्छे को चुनिए....
जब से चुनाव शुरू हुए हैं अखबार, पत्रिकाएं, टीवी चैनल सब यही कह रहे हैं- 'अब की चूके तो गए। जनता की बारी है। सोच-समझकर वोट डालिए। देश की 70 फीसदी आबादी युवा है तो नेता बूढ़ा क्यों? सच्चे को चुनिए-अच्छे को चुनिए। आदि-आदि...' यही चैनल और अखबार हर पार्टी और लगभग हर नेता में बुराई गिनाते हैं और बुराइयां हैं भी। कहीं सांप्रदायिकता का आरोप है तो कहीं तुष्टिïकरण का। कोई जातिवादी है तो कोई क्षेत्र के नाम पर वोट मांग रहा है। किसी पर परिवारवाद का आरोप है तो कोई सत्ता को पैतृक संपदा ही समझ बैठा है। कहीं भ्रष्टïाचार है तो कहीं अनाचार। सब आरोपी हैं, कोई भी साफ नहीं है, तो चुने किसे? कोई भी माध्यम इस सवाल का जवाब नहीं देता।
विकल्प ही नहीं हैं
माना कि कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर अच्छे होंगे जिनपर कोई आरोप न हों लेकिन एक व्यक्ति तो सरकार बना नहीं सकता। जनता के सामने विकल्प नहीं है। कहीं लड़ाई आमने-सामने की है तो कहीं त्रिकोणीय और कहीं एक कोण ज्यादा बन गया है। ऐसे में आम आदमी क्या करे? उसमें भी गुस्सा है, परिवर्तन की चाहत भी है लेकिन किसे हटाकर किसे वोट दे। सब बुरे हैं तो अच्छा कहां से लाए और अगर बुराई में ही चुनना है तो क्या ज्यादा बुरा-क्या कम? क्या भरोसा की जो कम बुरा है वह ज्यादा नहीं हो जाएगा? मैं भी कई दिन से इसी उधेड़बुन में हूं। आप जरूर बताइएगा कि किसको चुनें और क्यों?

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

इंडियन पॉलिटिकल लीग चालू आहे

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी ड्रामा पूरे शबाब पर है। कुछ लोगों की दशकों पुरानी याददाश्त वापस आ रही है तो कुछ आज का कहा भी भूलने लगे हैं। इंडियन पॉलिटिकल लीग के शुरुआती ओवरों में बढ़त लेता दिख रहा यूपीए चरमराने लगा है। यूपी में मुलायम और बिहार में लालू-पासवान तो अलग हो ही गए थे अब दोनों ने कांग्रेस पर निशाना साधना शुरू कर दिया है।
बेपटरी लालू एक्सप्रेस
पांच साल तक केंद्र में सत्ता की चांदी काटने वाले लालू को अब जा कर याद आया है कि बाबरी विध्वंस की असली जिम्मेदार तो कांग्रेस है। बिहार में अपनी रेल बेपटरी होते देख लालू बौखला गए हैं। ऐसे में साले के सताए लालू अनाप-शनाप बोलने लगे हैं। कांग्रेस को मस्जिद गिराने का आरोपी ठहराया और आडवाणी को कैमरे के सामने गाली दे दी।दरअसलमें भी नहीं, यह चुनाव उनके लिए भारी साबित हो रहा हे। उनके ठेठ माजाकिया एक्सप्रेस को नीतिश-भाजपा की विकास एक्सप्रेस ने पीछे छोड़ दिया है। पासवान का साथ भी लालू को नहीं बचा पा रहा, ऐसे में उनकी खीझ सही भी है। कल तक सिंह इज किंग कहने वाले लालू ने आज जब कहा कि प्रधानमंत्री चुनाव के बाद तय होगा तो प्रणब दा गुस्सा गए। उन्होंने लालू को कांग्रेसी मंत्रिमंडल की रेल में 'नो रूम' की तख्ती दिखा दी है। लालू ने कल ही कहा था कि वे कांग्रेस की वजह से मंत्री नहीं बने। अब इन सब के बीच फंसे हैं बेचारे पासवान। कांग्रेस से भी बुरे बन रहे हैं और लालू का क्या विधानसभा चुनाव में अलग हो गए तो क्या होगा?
मुलायम पर अपने ही सख्त
अब चलते हैं उप्र। यहां मुलायम फंसे हैं। इसका कारण भी है। दरअसल मयावाती के पास गंवाने के लिए कुछ नहीं है। उनकी सीटें बढऩी तय है। भाजपा भी पश्चिमी उप्र में अजित सिंह से समझौते के कारण 10 का आंकाड़ा पार कर जाएगी। लेकिन मुसीबत नेता जी की है। पिछली बार 39 सीटें जीतकर विश्वासमत के दौरान कांग्रेस के खेवनहार बने मुलायम के प्रति जनता इसबार खासा सख्त दिख रही है। दूसरा उनके अपने ही घर में आग लगी हुई है। कल्याण से हाथ मिलाकर उन्होंने जो गलती की वह रामपुर में आजम के गुस्से से और बड़ी हो गई है। अमर सिंह का पूरा ध्यान मनोज तिवारी, लखनऊ में नफीसा अली और रामपुर में जयाप्रदा की सीट पर लगा है। संजय दत्त भी सपत्नीक इस काम में उनकी मदद कर रह हैं। लेकिन पर्दे का मुन्नाभाई चुनावी मैदान में पप्पू साबित हो रहा है। एक तो कोर्ट ने चुनाव लडऩे की अनुमति नहीं दी ऊपर से हर बयान पर चुनाव आयोग में शिकायत। मुसीबत कांग्रेस की भी है। सीटें बढऩा तो मुश्किल जो हैं बची रहें यही बड़ी बात होगी।
आज भी अमेठी-रायबरेली में गरीबी हटाओ नारा...?
अमेठी, रायबरेली से कुछ अपवादों को छोड़कर कांग्रेस ही जीतती रही है। लेकिन इस बार भी जब कांग्रेस (प्रियंका) वहां प्रचार कर रही है तो नारा यही है कि गरीबी हटाएंगे विकास की रोड पर आगे बढ़ाएंगे। आखिर कब तक इसी नारे पर गांधी परिवार यहां की जनता को भरमाता रहेगा? देश की गरीबी तो हटा नहीं सकी कम से कम अपने क्षेत्र की गरीबी तो हटा दें।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

मीडिया स्वतंत्र या स्वच्छंद?

कहां चला चौथा खंभा?
कल बीबीसी उर्दू सेवा के पत्रकार का एक लेख ब्लॉग पर डाला था। लोगों ने (ख़बर पैदा करने का सही तरीक़ा) पढ़ा और उनके कमेंट भी आए। इधर बीच कुछ समय से लगातार मीडिया की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह उठने लगे हैं। गुजरात दंगों से लेकर मुंबई हमले और ऐसे ही कई मामलों में। अखबारों में तो फिर भी गनीमत है लेकिन कुछ चैनल ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में सारी हदें ब्रेक करते जा रहे हैं। मुंबई हमले की बात के बाद कुछ गाइडलाइंस बनी। मीडिया स्वतंत्र होनी चाहिए इसमें कोई दो राय नहीं। पत्रकारिता के विद्यार्थी और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने के कारण मैं भी मीडिया पर किसी दबाव और प्रतिबंध का विरोधी हूं लेकिन मुझे लगता है कि हमें स्वतंत्रता और स्वच्छन्दता का भेद जरूर याद रखना चाहिए।
आखिर इससे क्या होगा?
फिलहाल मैं जिस खबर के बारे में बात करूंगा वह है वरुण गांधी के भड़काऊ भाषण की। चुनाव आयोग के पास दर्ज शिकायत और खबरों के अनुसार वरुण ने पीलीभीत में मार्च के पहले हफ्ते में धर्म विशेष के खिलाफ भाषण दिया। वरुण को ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए थी और अगर बोली है तो उन्हें कानूनन उचित सजा मिलनी चाहिए। वरुण के भड़काऊ भाषण से न तो पीलीभीत के उस कस्बे में न ही जिले में और न ही उप्र में किसी प्रकार का सांप्रदायिक तनाव हुआ। लेकिन बीच कुछ चैनलों ने वरुण के आपत्तिजनक टैपों को रोज दर्जनों बार दिखाया। खास बात यह कि टैप दिखाने के पहले वो यह भी कह रहे थे, 'आइए आप को सुनाते हैं वरुण गांधी का वह जहरीला भाषण जो उन्होंने.......'आप जिस टैप को खुद जहरीला कह रहे हैं उसे बार-बार क्यों दिखा रहे हैं? ने बताया कि इसलिए दिखा रहे हैं ताकि मतदाता जागरुक हों। मतदाता इससे जागरुक होगा या द्वेष फैलेगा?
यह कैसी पत्रकारिता?
वरुण ने जो जहर एक, दो या तीन बार उगला उसे हमारे निरपेक्ष चैनलों ने सैकड़ों बार उगला। आखिर क्यों? वरुण ने गलत किया है तो उसे सजा मिलनी चाहिए न कि उस जहर को वहां तक पहुंचाना चाहिए जहां नहीं पहुंचा है। तकलीफ तब होती है जब उन्हें ऐसी खबरें बताते-सुनाते देखना पड़ता है जिन्हें देखकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आया। वरुण और राज ठाकरे जैसे लोगों को कौन बना रहा है? कौन करता है इन्हें महिमा मंडिता। जो व्यक्ति सिंगल कॉलम, या चंद सेंकेंड की खबर का भी हकदार नहीं उसे लीड छाप रहे हैं और उसपर प्राइम टाइम में बहस चला रहे हैं। क्या मेरे जैसा प्रशिक्षु इसे ही पत्रकारिता समझे?
इनके रास्ते पर कोई नहीं
सच तो यह है कि आज का युवा और समाज ऐसे लोगों को न तो महत्व देता है और न ही उनके भड़कावे पर कुछ करता है। राज के साथ कुछ लोग हैं पूरा मुंबई नहीं वैसे ही वरुण के साथ भी कुछ ही लोग हैं। देश का युवा न तो इनसे प्रभावित है और न ही इनके रास्ते पर चलना चाहता है।
मीडिया ने गायब किए मुद्दे!
इस चुनाव में कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं रह गया है। आतंकवाद, भ्रष्टाचार, महंगाई, मंदी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों को कितना याद है यह तो पता नहीं लेकिन चैनलों को बिल्कुल याद नहीं। घंटों इस बात पर लाइव टॉकशो होता है कि कौन कमजोर, कौन गुलाम लेकिन इन मुद्दों पर न तो नेता कुछ बोलते हैं न चैनल कुछ पूछते हैं। कहा जाता है कि जनता जो चाहती है हम वह देते हैं। तो भइया जनता को इस बात से मतलब है कि उसकी नौकरी चली गई है। सुबह की चाय से रात के चावल तक सब महंगे हो गए हैं। क्या खाए, क्या बचाए? घर से निकलता है तो पता नहीं रात को लौटेगा या नहीं? नर्सरी में एडमिशन से लेकर टॉप लेवल नौकरियों तक पैसे का बोलबाला है। यह मुद्दे कौन उठाएगा।
इसको भी हवा कर दिया
इस चुनाव का एक सबसे बड़ा मुद्दा भाजपा के पीएम इन वेटिंग ने उठाया। स्विस बैंकों में जमा काले धन का। हो सकता है उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए उठाया हो? यह मामला पहले भी उठा है लेकिन इतने व्यापक पैमाने पर पहली बार किसी ने यह मसला उठाया है लेकिन हमारे चैनलों से यह मुद्दा गयाब है। बुढिय़ा/गुडिय़ा और कांधार/गुजरात में फंसी मीडिया इस मसले पर चुप है। हमेशा स्टिंग ऑपरेशन करने वाले इस मसले पर क्यों नहीं खोजी पत्रकारिता का कमाल दिखाते हैं? देश को यह सच कौन बताएगा? नेताओं से यह सच कौन उगलवाएगा? उम्मीद मीडिया से है लेकिन............व्यावसायिक प्रतिबद्धता अगर मजबूरी है तो पेशेगत नैतिकता उससे ज्यादा जरूरी है।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

ख़बर पैदा करने का सही तरीक़ा

यह लेख है बीबीसी उर्दू सेवा के पत्रकार वुसतुल्ला खान का। यह उन्होंने आज ही लिखा। उनका पोस्ट अविकल प्रस्तुत है। यह बीबीसी हिंदी से साभार लिया गया है।
मीडिया में राष्ट्रभक्ति


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ख़बर पैदा करने का सही तरीक़ा
वुसतुल्ला ख़ान, बीबीसी उर्दू सेवा
15 Apr 09, 02:40 PM
"आज सीएनएन-आईबीएन, एनडीटीवी जैसे ज़िम्मेदार चैनलों समेत बहुत से भारतीय चैनलों पर यह ख़बर चल रही थी- " नई दिल्ली के इंडियन इटरनेशनल सेंटर में पाकिस्तान के पत्रकारों पर राम सेना के नौजवानों का हमला, हालात पर क़ाबू करने के लिए पुलिस तलब."
मैं भी इस सेमिनार में भाग ले रहे ढाई सौ लोगों में मौजूद था, जो भारत-पाकिस्तान में अंधराष्ट्रभक्ति की सोच बढ़ाने में मीडिया की भूमिका के मौजू पर जानी-मानी लेखिका अरुंधति राय, हिंदुस्तान टाइम्स के अमित बरुआ, मेल टुडे के भारत भूषण और पाकिस्तान के रहीमुल्ला युसुफ़जई और वीना सरवर समेत कई वक्ताओं को सुनने आए थे.
जो वाक़या राई के दाने से पहाड़ बना वह बस इतना था कि रहीमुल्ला युसुफ़जई पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी मीडिया के ग़ैर ज़िम्मेदराना रवैए का तुलनात्मक जायज़ा पेश कर रहे थे तो तीन नौज़वानों ने पाकिस्तान के बारे में नारा लगाया.
प्रबंधकों ने उनको हाल से बाहर निकाल दिया. बस फिर क्या था जो कैमरे सेमिनार की कार्रवाई फ़िल्मा रहे थे वे सब के सब बाहर आ गए और उन नौज़वानों की प्रबंधकों से हल्की-फुल्की हाथापाई को फ़िल्माया और साउंड बाइट के तौर पर उन नौज़वानों के इंटरव्यू लिए. प्रबंधकों ने एहतियात के तौर पर पुलिस के पाँच-छह सिपाहियों को हाल के बाहर खड़ा कर दिया. सेमिनार की कार्रवाई इसके बाद डेढ़ घंटे तक जारी रही. सवाल-जवाब का लंबा सेशन हुआ.
ढाई सौ लोगों का लंच हुआ लेकिन चैनलों को मिर्च-मसाला मिल चुका था. इसलिए उनकी नज़र में सेमिनार तो गया भाड़ में, ख़बर यह बनी कि पाकिस्तानी पत्रकारों पर नौज़वानों का हमला. फिर यह ख़बर सरहद पार पाकिस्तानी चैनलों ने भी उठा ली और पेशावर में मेरी बीवी तक भी पहुँच गई. उसने फ़ोन करके कहा, आप ख़ैरियत से तो हैं. कोई चोट तो नहीं लगी.
जब मैंने कहा इस वाकए का कोई वजूद ही नहीं है तो कहने लगी आप मेरा दिल रखने के लिए झूठ बोल रहे हैं. अब मैं यह बात किससे कहूँ कि जिसे कल तक पत्रकारिता कहा जाता था. आज वह बंदर के हाथ का उस्तरा बन चुकी है और ऐसे माहौल में भारत-पाकिस्तान में जिंगोइज़्म यानी कि अंधराष्ट्रभक्ति बढ़ाने में मीडिया की भूमिका की बात करना ऐसा ही है कि अंधे के आगे रोए, अपने नैन खोए.

रविवार, 12 अप्रैल 2009

जनता का आक्रोश

आज मेरे एक वरिष्ठ साथी ने मुझे एक एसएमएस पढ़ाया। जिसने एसएमएस भेजा उसे मैं नहीं जानता लेकिन इस संदेश को पढऩे के बाद मुझे 26/11 याद आ गया। याद आ गया कहना गलत होगा, दरअसल पूरी घटना फिर से आंखों के सामने नाच गई। हमले में 200 से ज्यादा बेकसूर नागरिकों की मौत, जवानों की शहादत और उसके बाद देश भर में नेताओं के प्रति लोगों का गुस्सा बस आंखों के सामने घूम गया। मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया से लेकर दिल्ली के इंडिया गेट तक जब विरोध प्रदर्शन हो रहा था लोगों की आखों में गुस्सा था। व्यवस्था के प्रति, सत्ता और नेता के प्रति। ये तो भला हो देश की संस्कृति का कि हमारे यहां लोकतंत्र की जडे बहुत गहरे जमी हैं, लेकिन जिस दिन जनता जनार्दन ने विरोध का तीसरा नेत्र खोला तो जाने क्या होगा रामा रे....
एसएमएस देखें-
26/11 को मुंबई में 10 आतंकी आए थे 'बोट' से क्या हुआ दुनिया ने देखा.....

16/05 को 539 लोग आ रहे हैं 'वोट' से। भगवान जाने क्या होगा......?

मनमोन का इतिहास ज्ञान

कठघरे में प्रधानमंत्री...
जाने क्या हो गया हमारे प्रधानमंत्री जी को? गोया बोलते नहीं थे और अब बोल रहे हैं तो ऐसा कि खुद कठघरे में खड़े हो रहे हैं। शनिवार को वे कोच्चि में थे। कोच्चि यानि केरल जहां परंपरागत रूप से वाममोर्चे का गढ़ है। फिलहाल वहां अच्युतानंदन जी मुख्यमंत्री है। याद आए अच्युतानंदन? नहीं तो याद करिए ये वहीं नेता हैं जिन्होंने 26/11 में शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्ण से संबंधित आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। खैर वह तो बीती बात है। ताजी बात यह है कि हमारे विद्वान प्रधामंत्री जी ने आज वामदलों पर जमकर निशाना साधा। हम तो जानते थे कि मनमोहन जी अर्थशास्त्र के ही विशेषज्ञ हैं लेकिन आज जाकर जाना कि इतिहास में उनकी बहुत अच्छी पैठ है।
पांच साल बाद याद आया
आइए देखते हैं कि प्रधानमंत्री जिनके सहारे से साढ़े चार साल कुर्सी पर रहे उन दोस्तों को क्या बोला- ('हमेशा ग़लत पक्ष में रहे हैं वामपंथी'-BBC) ...........
'लेफ्ट पार्टियां इतिहास में हमेशा गलत पक्ष में रहीं। वामपंथी इस राज्य की सत्ता में है लेकिन दुर्भाग्य है कि वे हमेशा इतिहास में गलत के साथ रहे। वामपंथी दल इस राज्य में सत्ता में हैं. लेकिन दुर्भाग्य से वे हमेशा इतिहास में गलत पक्ष में रहे हैं. जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तो वामपंथियों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया, जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने कहा, आजादी वास्तविक नहीं है। इंदिरा जी ने जब हरित क्रांति की शुरुआत की तो वामपंथियों ने यह कह कर इसका विरोध किया कि यह विदेशी कंपनियों के फायदे के लिए है। राजीव गांधी ने जब संचार क्रांति की शुरुआत की तो वामपंथियों ने यह कहकर विरोध किया इससे नौकरियां चली जाएंगी। वामपंथियों ने परमाणु करार का भी विरोध किया।'
तब क्यों याद नहीं आया?
प्रधानमंत्री जी ने वामपंथियों की जितनी गलतियां गिनाई हैं उनमें परमाणु करार का विरोध छोड़ बाकी तब भी थीं जब वे उनके साथ सरकार चला रहे थे। तब क्यों नहीं याद आया? मैं उनसे जानना चाहता हूं कि क्या गलत लोगों का साथ दे या लेकर सरकार चलाना देश से ज्यादा महत्वपूर्ण है? अगर नहीं तो फिर क्यों साढ़े चार साल तक वे गलत का साथ लेते रहे? चुनाव बाद अगर कांग्रेस सरकार बनाने लायक अंक जुटाने से कुछ पीछे रही तो उसे वामदलों से हाथ मिलाने में कोई आपत्ति नहीं होगी। यह पहले भी हो चुका है।
इतिहास इसका भी गवाह...
भले ही पीएम और अन्य कांग्रेसी नेता वामदलों को पानी पी-पीकर कोस रहे हों लेकिन उनके एक साथ आने में जरा भी देर नहीं लगेगी। अगर इतिहास वामदलों की गलतियों का साक्षी है तो इस बात का भी साक्षी है लेकिन जब सत्ता ही साध्य हो जाए तो साधन की शुचिता पर ध्यान नहीं रहता। दल कोई भी हो दलीले सब तलाश लेते हैं। कभी धर्मनिरपेक्षता का बहाना कभी परिवर्तन का कभी पार्टी विशेष को सत्ता से दूर रखने का।
यह भी है गलती
प्रधानमंत्री जी का आज के बयान से मैं पूरी तरह सहमत हूं। वामदलों के लिए देश कभी भी पहली प्राथमिकता नहीं रहा। उनकी विचारधार उनके लिए सबसे पहले है। इतिहास गवाह है इसका चीन हमले के समय क्या हुआ? खैर प्रधानमंत्री जी इसकी चर्चा करने भूल गए थे लेकिन कोई बात नहीं। परमाणु करार का विरोध करने लिए कामरेड प्रकाश कारत ने जो कारण बताया उसमें उन्होंने कहा कि अगर भारत अमेरिका से करार करता है तो दक्षिण एशिया में असंतुलन की स्थिति पैदा होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो चीन की चौधराहट को खतरा पैदा होगा।
..... ताकि सनद रहे
यह इसलिए ताकि सनद रहे , चुनाव बाद अगर कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में हुई और कुछ सीटों की जरूरत पड़ी तो कम से कम वह लेफ्ट का समर्थन नहीं लेगी, भले ही उसकी सरकार न बन पाए, क्योंकि जितना गलत, गलत होना है उतना ही गलत का साथ लेना या गलत का साथ देना भी। कहते हैं बुद्धिमान इतिहास की गलतियां वर्तमान या भविष्य में नहीं दोहराते। उम्मीद है इस मामले में भी ऐसा ही होगा।

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

मजबूती का प्रमाण पत्र

मीडिया में मनमोहन
प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने आज दिल्ली में महिला पत्रों से बातचीत की। 2009 लोकसभा चुनावों की घोषणा के बाद यह दूसरी बार है जब उन्होंने पत्रकारों से बातचीत की। पहली बार जब कांग्रेस का घोषणापत्र जारी हुआ और दूसरा आज। आज तो उन्होंने सीधे पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए लेकिन घोषणापत्र जारी करते समय पत्रकारों के प्रश्न उनके पास कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी के जरिए छनकर आ रहे थे। तब उन्होंने आडवाणी पर निशाना साधा, अपनी उपलब्धियां गिनाई, आगे के वादे किए और जाते-जाते वरुण पर भी बरसे और आज भी लगभग वही सब। खैर राजनीति में यह सब होना ही चाहिए।

विद्वान मनमोहन
डॉ. सिंह बहुत बड़े विद्वान, आर्थिक विशेषज्ञ, कुशल प्रशासक रहे हैं। उनकी सभी दलों में तो इज्जत है ही विदेशों में उनका बहुत मान है। मैं भी उनका सम्मान करता हूं। देश में आर्थिक उदारीकण के अगुआ रहे हैं मनमोहन सिंह जी। मृदुभाषी हैं, सिंह होकर भी शर्मीले हैं और भी बहुत सारी खूबियां हैं उनके अंदर।

खुद को भी नहीं मानते पीएम

आज मनमोहन जी ने कहा कि वे लालकृष्ण आडवाणी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं मानते ('प्रधानमंत्री बनने लायक़ नहीं आडवाणी'- BBC) इसलिए उनसे बहस (डिबेट) नहीं करना चाहते। यह तो कुछ भी नहीं, मनमोहन जी तो खुद को भी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं मानते। वे मैडम के कहने से पीएम बने हैं। उनकी कैबिनेट के मंत्री और कांग्रेस संगठन के बड़े नेता अक्सर कहते सुने जाते हैं कि राहुल बाबा को प्रधानमंत्री बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे बोलते नहीं करते हैं इसलिए भी आडवाणी से बहस नहीं करेंगे। जाहिर सी बात है हमने पिछले पांच सालों में यही तो देखा है। जो भी बोलती हैं या तो मैडम या तो राहुल बाबा। आखिर सच ही तो बोला उन्होंने।

इतने मजबूत हैं प्रधानमंत्री
बात मजबूती की है। मैं डॉक्टर मनमोहन सिंह जी का सम्मान करता हूं पहले ही कह चुका हूं लेकिन बड़े ही अदब के साथ कुछ सवाल भी उठाना चाहता हूं शायद जवाब मिले तो मैं भी समझ सकूं कि डॉ. सिंह कितने मजबूत प्रधानमंत्री हैं।

1-
प्रधानमंत्री परमाणु करार मुद्दे पर संसद में बोले कि वामदलों ने साढ़े चार साल तक सरकार को बंधुआ बनाकर रखने की कोशिश की अपनी मनमानी थोपते रहे। लेकिन चाढ़े चार साल तक मनमोहन जी ने कुछ नहीं बोला। पता नहीं उन्हें कुर्सी जाने का डर था या फिर किसी ने कहा था कि न बोलें। खैर यह तो वही जानें। हम आगे चलते हैं।

2-
डॉ. सिंह राजनीति में अपराधीकरण के खिलाफ हैं। कभी उनके मुंह से यह बयान नहीं सुना लेकिन इतना विश्वास है कि उनके जैसा विद्वान खिलाफ ही होगा। उनकी कैबिनेट में एक-दो या कितने आपराधिक पृष्ठभूमि के मंत्री रहे या हैं किसी से छिपा नहीं। कई बार उन्होंने बेमन से इस बात के संकेत भी दिए कि वे इसके खिलाफ हैं लेकिन मंत्रियों को नहीं हटा सके। क्यों...? सरकार चलाने के लिए या किसी ने रोका था। जबकि कैबिनेट का गठन उनका एकाधिकार है।

3-
यूपीए सरकार में लगातार आतंकी हमले होते रहे। हर हमले के बाद शिवराज पाटिल का वही बयान। हम देख रहे हैं। सरकार किसी को माफ नहीं करेगी...। अगर राजग शासित राज्य में हमला हुआ तो यह भी बोलते थे कि केंद्र ने पहले ही दे दी थी जानकारी। लेकिन हमले होते रहे और पाटिल साहब बयान देते रहे। विपक्ष और यूपीए घटक दलों के दबाव के बाद भी पाटिल को साढ़े चार साल तक गृहमंत्री बनाए रखा। हटाया तब जब मुंबई के होटल ताज पर हमला हुआ। पहले क्यों नहीं हटाया, पता नहीं? वैसे अंदर की बात जानने वाले बताते हैं कि पाटिल की पैठ 10 जनपथ तक है, खैर इससे अपना क्या........

4-
प्रधानमंत्री जी ने 1984 दंगों के लिए जनता से माफी मांगी। लेकिन फिर टाइटलर और सज्जन कुमार को टिकट दिया गया। अब हटाया गया तो कह रहे हैं कि कांग्रेस ने सिखों की भावनाएं समझीं। आपके कैबिनेट के मंत्री पर एक पत्रकार ने जूता उछाला, आप चुप रहे। मनमोहन जी अगर जूता न चलता तो टिकट कटता? जबकि स्थितियां वही हैं जो 25 साल पहले थीं।

5-
विश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान संसद में नोट की गड्डियां लहराईं गईं। देश शर्मसार हुआ। लोकतंत्र की कमर टूटी। लेकिन आपके चेहरे पर विश्वासमत जीतने की खुशी थी। यह सब किसने किया और क्यों किया देश जानता है यह बात। यह चुनावी मुद्दा नहीं बना तो क्या, लोकतंत्र पर लगे ऐसे धब्बे नहीं छूटते। इसके पहले शीबू सोरेन से भी डील हुई। तब क्यों चुप रहे प्रधानमंत्री?

6-
राष्ट्ररपति चुनाव के समय वोटों की जरूरत पड़ी तो मायावती का साथ लिया। उसके बदले यूपी को विशेष पैकेज दिया और मायावती के खिलाफ ताज कॉरीडोर मामले में सीबीआई को मामला चलाने की अनुमति नहीं दी। केंद्र और राज्यपाल दोनों ने। फिर विश्वासमत पर साथ की जरूरत पड़ी तो अमर सिंह और मुलायम का साथ लिया। इसके बादले इन समाजवादियों को अंदर से क्या-क्या मिला पता नहीं लेकिन बाहर जो दिखा वो यह कि आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अंतरिम आवेदन वापस ले लिया। जिसपर सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट ने खरी खोटी सुनाई। सीबीआई प्रधानमंत्री के अधीन आने वाली संस्था है यह हम जानते हैं। यह मजबूती थी या....?

7-
कंधार विमान अपहरण राजग सरकार की विफलता थी। उसका खामियाजा उसने भुगता। सरकार चली गई। आपने कहा, हम विदेशमंत्री नहीं, कमांडो भेजते हैं। सही कहा आपने। आपका कहने का मतलब राजग सरकार को 175 लोगों को छोड़ देना चाहिए था मरने के लिए। विदेश में कमांडो फोर्स जाने से रही ऐसे में आतंकी एक-एक कर नागरिकों को मारते और सरकार को झूठे दंभ में झुकना नहीं चाहिए था। है न पीएम साहब..........? अब आप बताएं हमले पर हमले होते रहे और आप करारा जवाब देने की बात करते रहे। यह हाल तब है जब कि केंद्र सरकार को पता था कि आतंकी समुद्री रास्ते से हमला कर सकते हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार और केंद्र में भी। 200 से ज्यादा लोग मुंबई में मारे गए वह भी इस एक हमले में। यह कैसी मजबूती है..........?
आपने कहा कि संसद हमले के बाद अटल सरकार ने सीमा पर सेना लगाई और करोड़ों रुपए खर्च किए लेकिन बिना कुछ किए सेना वापस बुला ली। मनमोहन जी आपने क्या किया। आप तो इतना भी नहीं कर सके। पड़ोसी हमारे गाल पर तमाचा मार कर चला गया और आपने विदेशमंत्री को अमेरिका भेजा गाल दिखाने के लिए। इसके बावजूद कुछ नहीं हुआ। पाकिस्तान आज भी अमेरिका की गोद में बैठा है। क्या इसे मजबूती कहेंगे?

8- कंधमाल में हिंसा हुई आपने राज्य सरकार को चेतावनी दी लेकिन महाराष्ट्र में उत्तरभारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे एंड पार्टी खुलेआम हिंसा करते रहे लेकिन नोटिस की कौन कहे एक बयान तक नहीं दिया। महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी। असम और पश्चिम बंगाल में भी हिंसा हुई लेकिन कोई नोटिस नहीं कोई बयान नहीं। हां, मुंबई हमले के बाद आपकी कैबिनेट के एक मंत्री ने शहीद हेमंत करकरे की शहादत पर उंगली उठाई लगातार बोलते रहे लेकिन आप तब भी चुप रहे। क्यों? क्या आप इसे गलत नहीं मानते अगर मानते हैं तो चुप्पी क्यों...........?

9- आपने धर्मनिरपेक्षता की बात की है। खैर इस शब्द आपके लिए क्या अर्थ है पता नहीं। हां मुझे उनकी एक चिंता याद आ गई। आपने एक बार कहा कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का होना चाहिए। मुस्लिमों को सुविधाएं मिलें इससे मेरा विरोध नहीं लेकिन दलितों, पिछड़ों का पहला हक संसाधनों पर क्यों नहीं? वे जानबूझकर दलित या अन्य किसी धर्म में तो पैदा नहीं हुए। अगर आप कहते कि देश के संसाधनों पर सबका बराबर हक है तो शायद ज्यादा अच्छा संदेश जाता। लेकिन वहां वोटबैंक की बात थी। भाजपा अगर हिंदुत्व के मुद्दे पर बहुसंख्यकों के वोट की राजनीतिक करती और तो आपने भी वही किया बस फर्क इतना था कि आपने मुसलमानों की बात कर अल्पसंख्यक वोटों को खींचना चाहा। आखिर आप जैसे विद्वान को यह कहना चाहिए...?

10
- वरुण गांधी पर आपका बयान आया। ठीक किया चुनावी समय है आना चाहिए। लेकिन डॉ. सिंह आपके कैबिनेट के एक मंत्री ने खुलेआम कहा कि वे गृहमंत्री होते तो वरुण को बुलडोजर से कुचलवा देते। आपने सुना होगा लेकिन कुछ नहीं बोले? इस मुद्दे पर क्यों चुप रह गए?

कब हटेगी गरीबी?

एक बात और गरीबी हटाओ और कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ जैसे नारों के दम पर कांग्रेस ने 40 साल से ज्यादा राज किया। राजीव गांधी जी की सरकार से लेकर आज तक आप राजनीति में शीर्ष स्तर पर सक्रिय रहे। कभी वित्तमंत्री कभी रिजर्व बैंक के गवर्नर और पांच साल से प्रधानमंत्री, लेकिन आज आप ने स्वंय कहा कि आप गरीबी उन्मूलन नहीं कर पाए। आखिर अभी कितने साल और चाहिए आपको और आपकी पार्टी को कांग्रेस 44 करोड़ से 227 करोड़ की पार्टी हो गई लेकिन देश.....?

आखिर कब तक.............?

चलते-चलते इतना और कहूंगा कि देश में जब किसान आत्महत्या कर रहे थे आप परमाणु करार करने में व्यस्त थे। संसद में लोकतंत्र शर्मसार हुआ तो आपने विश्वासमत जीतने की खुशी मनाई, मुंबई में 200 से ज्यादा लोग मारे गए तो आपने उसे बहादुरी माना, देशभर में आतंकी हमले होते रहे और आपकी सरकार बयान पर बयान देती रही मसले बहुत से हैं लेकिन बस इतना ही। जो गलतियां आप भाजपा और आडवाणी की गिनाते हैं वही आपने भी कीं। बावजूद इसके मैं आपकी विद्वता का सम्मान करता हूं।
यह कहना कहां तक ठीक है कि हम गलत हैं तो तुम भी गलत हो या हमारी गलती तुम्हारी से छोटी है। नेता एक-दूसरे की गलती गिनाकर खुद को पाक साफ बताते रहते हैं और देश दशकों से इसका खामियाजा भुगतता रहा है, आखिर कब तक.............?

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

हजार 84 दंगे...

आखिर दिया क्यों टिकट?
कांग्रेस के चेहरे पर पड़े जूते के बाद उसने टाइटलर और सज्जन कुमार का टिकट काट दिया, लेकिन पार्टी ने दोनों को 'शहीद' बनाने और सिखों की नजर में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को महान बनाने की कोशिश की। खैर यह उनका आंतरिक मामला है। लेकिन जो आम आदमी से जुड़ा मामला है वह यह कि आखिर इनका टिकट काटना ही था तो इन्हें टिकट क्यों दिया गया? वैसे यह भी पार्टी का आंतरिक मामला है। टिकट दिया और बीच चुनाव में टाइटलर को क्लीन चिट भी दे दी। अगर जरनैल का जूता न चलता तो दोनों नेता चुनाव लड़ ही रहे थे। जीत-हार तो जनता पर थी लेकिन पार्टी ने तो इन्हें पाक साफ मान ही लिया था। अब पार्टी बताएगी कि इनका टिकट क्यों काटा? जो कारण आज हैं वहीं पहले भी थे.....

धर्मनिरपेक्षता मतलब क्या?
कांग्रेस ने सज्जन और जगदीश का टिकट काटने के साथ ही एक बार फिर भाजपा पर गुजरात दंगों को लेकर निशाना साधा है। भाजपा पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया है। खैर यह नया आरोप नहीं है। राम मंदिर और गुजरात दंगों का नाम लेकर भाजपा पर ऐसे आरोप लगते ही रहते हैं। एक सवाल मेरा भी है देश के तमाम विद्वान नेताओं से कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब क्या होता है? धर्मनिरपेक्ष किसे कहेंगे और किसे सांप्रदायिक?

किसकी कितनी जिम्मेदारी?
देश में आजादी के बाद से कितने दंगे हुए हैं, किसी से छिपे नहीं हैं। 1947 से लेकर 1976 तक कांग्रेस की सरकार रही। पंडित नेहरू, नंदा जी, शास्त्री जी और इंदिरा जी प्रधानमंत्री रहीं। फिर 1976 से दो साल से कुछ महीने ज्यादा तक जनता पार्टी की सरकार रही। फिर 1980 से इंदिरा जी, 1984 से राजीव जी, 1989 और 1990 में जनता पार्टी की सरकार ही, कांग्रेस का सहयोग रहा चंद्रशेखर जी को। फिर पांच साल नरसिंहराव, इसके बाद देवगौड़ा, 13 दिन के लिए अटल जी, फिर गुजराल और 1998 से 2004 तक अटल जी और उसके बाद मनमोहन सिंह। चुनाव जारी है। इसमें 40 साल से ज्यादा कांग्रेस की सरकार रही। क्या कांग्रेस के समय हुए सभी दंगों में न्याय हो चुका है? दूसरों पर आरोप लगाने के पहले अपने गिरेहबान में झांकना जरूरी है।

दंगों की आजादी
1947 में देश की आजादी के साथ ही दंगों की शुरुआत हुई। आजाद भारत की शुरुआत किन दंगों से हुई बताने की जरूरत नहीं। 1967 और 1989 का भागलपुर दंगा, 1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद सिख विरोधी दंगा ये केवल बड़े उदाहरण हैं। इनमें 1993 का मुंबई दंगा भी शामिल है। इन सब के साथ ही हमें कश्मीर से लाखों हिंदुओं को खदेडऩे की बात भी नहीं भूलनी चाहिए। ये रही कांग्रेस और उसे राज की बात। अब बात भाजपा की 1989 और उसके बाद राम मंदिर आंदोलन, 2002 में गोधरा कांड और इसके बाद गुजारात दंगा, 2008 में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद कंधमाल दंगा। ये भाजपा के राज की बात है।

यह कैसी चिंता?
गुजरात में मारे गए लोग मुस्लिम अल्पसंख्यक थे तो 1984 में मारे गए सिख भी अल्पसंख्यक ही थे। कश्मीर से भगाए गए हिंदू भी वहां अल्पसंख्यक थे, भागलपुर में मरने वाले....? और भी बहुत सी बाते हैं। गुजरात में अगर किसी की मौत हुई तो मरे वे भी थे जिन्हें गोधरा में ट्रेन के अंदर जिंदा जला दिया गया। फिर उनकी मौत का हिसाब क्यों नहीं?

कौन है धर्मनिरपेक्ष?
अब सवाल यह है कि कौन कितना धर्मनिरपेक्ष और कौन कितना सांप्रदायिक है। भाजपा पर तो हिंदूवादी होने और धर्मआधारित राजनीति करने का आरोप लगता ही रहता है लेकिन क्या कांग्रेस और लालू, मुलायम जैसे लोग धर्मनिरपेक्ष हैं? धर्मनिरपेक्षता का मुलम्मा ओढऩे-बिछाने वाले क्या इस बात का जवाब देंगे कि शाहबानो मामले में क्या और क्यों हुआ था? जो संविधान सबको समान मानता है उसकी ही आड़ में धर्म विशेष को आरक्षण देने का प्रयास? आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने और सिमी से प्रतिबंध हटाने की बात, बाटला हाउस के शहीद मोहन चंद्र शर्मा की शहादत पर शक कर वहां मारे गए आतंकियों को बेकसूर बताना, मुंबई के शहीदों की शहादत पर उंगली उठाना? क्या यही धर्मनिरपेक्षता है? अगर हां तो मैं तो दावे के साथ कहता हूं कि देश की कोई भी पार्टी धर्मनिरपेक्ष नहीं है। कुछ अल्पसंख्यकों को अपना वोटबैंक बनाने के लिए पांसा फेंकती हैं तो कुछ हिंदू बहुसंख्यकों को।
दर्द पुराने घावों में भी होता है
इतना लिखने का आशय केवल इतना था कि चुनाव के मुद्दे हम तय करें। चुनाव विकास के मुद्दे पर हो न कि छद्म धर्मनिरपेक्षता और कट्टïर सांप्रदायिकता पर। आप बताएं कि क्या होंगे हमारे मुद्दे। दंगे चाहे जहां हो, जिस भी कारण से हों हमेशा गलत होते हैं, इंसान मरते हैं, इंसानियत हारती है। पीडि़तों को न्याय मिलना चाहिए लेकिन मौत पर राजनीति बंद होनी चाहिए। गड़े मुर्दे उखाडऩे से बदबू फैलती ही है और दर्द पुराने घावों में भी होता है। इसलिए बार-बार उन्हें कुरेदकर ताजा नहीं करना चाहिए।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

गरीबों के अमीर नेता.....

माया आगे मनमोहन-आडवाणी कुछ नहीं
15वीं लोकसभा चुनाव की प्रकिया जारी है। कांग्रेसनीत यूपीए ने डॉ. मनमोहन सिंह को तो भाजपानीत राजग ने लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। नवगठित तीसरे मोर्चे से भी उप्र की मुख्यमंत्री मायावती का नाम उछल रहा है। कुर्सी के कई और दावेदार हैं लेकिन फिलहाल मुकाबला मनमोहन, आडवाणी और मायावती के बीच दिख रहा है। मायवती जी खुद को गरीब के बेटी कहती हैं और देश के सबसे बडे राज्य का प्रतिनिधत्व कर रही हैं। अपना परिवार वे पहले बहुजन समाज अब सर्वजन समाज को अपना परिवार बताती हैं खैर इस बारे में ज्यादा नहीं लिखेंगे। आर्थिक स्थिति देखी जाए तो मायावती सबसे धनी हैं, जिन्होंने अपनी संपत्ति 52 करोड़ रुपए घोषित की है। आइए देखते हैं कि गरीब देश का प्रधानमंत्री बनने की लाइन में लगे नेताओं की आर्थिक स्थिति कैसी है-----
मायावती
कुल संपत्ति- 52 करोड़, नकद- 52.27 लाख, जेवर/हीरे- 51 लाख, सोना-1034.260 ग्राम,चांदी- 18,500 किग्रा, हीरा- 76.040 ग्राम, एफडी- 12.88 करोड़, मकान- 39 करोड़ 3 दिल्ली, 97.42 लाख, लखनऊ
(जून 2007, उप्र विधान परिषद चुनाव में दाखिल हलफनामे के अनुसार)


डॉ. मनमोहन सिंह

कुल संपत्ति- 3.96 करोड़, न्रकद- 10 हजार, एफडी- 1.89 करोड़, बॉण्ड- 23.10 लाख, डाक बचत- 5.35 लाख, वाहन- मारुति 800 (1996 मॉडल), मकान- 90 लाख, चंडीगढ़, 88 लाख वसंतकुंज अपार्टमेंट दिल्ली

(मई 2007, असम विस सचि. में रास चुनाव के लिए दाखिल हलफनामे के अनुसार)

लालकृष्ण आडवाणी
कुल संपत्ति- 3.50 करोड़, अचल संपत्ति- 2.35 करोड़, नकद- 20 हजार रुपए, जेवर- 16 लाख
एफडी- 67.56 लाख, गाड़ी- नहीं, मकान-50 लाख, गांधीनगर

(2009 लोस चुनाव में दाखिल हलफनामे के अनुसार)


यह सिर्फ तीन नेताओं की बानगी है। बाकी तो इनसे कहीं ज्यदा अमीर लोग है। जी हां करोडपति,अरबपति जो जनता की सेवा के लिए राजनीति में आना चाहते हैं। कभी उनकी भी चर्चा होगी।

बुरे फंसी कांग्रेस

अब तेरा क्या होगा जरनैल?
जरनैल सिंह के कांग्रेस मुख्यालय में गृहमंत्री पी. चिदंबरम के साथ जो कुछ किया उससे क्या-क्या होगा यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन फिलहाल जो लग रहा है वह यह कि जैरी की नौकरी चली जाएगी। इसके बाद वे क्या करते हैं पता नहीं? चिदंबरम जी ने और कांग्रेस ने उन्हें माफ कर दिया। वर्ना देश के गृहमंत्री को जूता दिखाने के बाद कोई बच सकता है। इराक वाले जैदी का क्या हश्र हुआ सबने देखा। मैंने आज ही कहीं पढ़ा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला देने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज का शव बाद में उनके गांव में पड़ा मिला था। उनकी मौत का इतिहास न मैंने पढ़ा न बता सकता हूं। हां आपको पता हो तो जरूर बताएं।

शुरू हो गया विरोध-प्रदर्शन
हम बात कांग्रेस की कर रहे हैं, जूते वाली घटना के दो घंटे के अंदर ही साफ हो गया कि कांग्रेस 8 नंबरी जूते के जंजाल में फंस चुकी है। इसकी पुष्टिï तब हुई जब कांग्रेसी मीडिया प्रभारी वडक्कन साहब ने कहा कि गृहमंत्री ने जरनैल को माफ कर दिया है। शाम होते-होते पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि पार्टी टाइटलर और सज्जन कुमार को प्रत्याशी बनाने पर विचार कर सकती है। खैर रात बीती। कौन कहे मामला दबने की सुबह से ही पंजाब और दिल्ली में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। पंजाब में ट्रेनें रोकी गईं। इधर टाइटलर और सज्जन प्रचार करते रहे। टाइटलर ने चैलेंज दिया है कि इस बार अगर वे दिल्ली में सबसे ज्यादा वोटों से नहीं जीते तो जीतने के बाद भी इस्तीफा दे देंगे। टिकट कटने की कौन कहे।

कांग्रेस की मुसीबत
दरअसल, कांग्रेस दो तरफा फंस गई है। पंजाब में अगर अपनी स्थिति सुधारने के लिए अगर वह सिखों को खुश करने की कोशिश के तहत टाइटलर और सज्जन का टिकट काटती है तो उसकी नियत पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। टाइटलर मामले में गुरुवार को सुनवाई होनी है। इसके पहले अगर वह टाइटलर का टिकट काटती है तो यह संदेश जा सकता कि कांग्रेस को पता था कि टाइटलर गलत हैं तो टिकट क्यों दिया? विपक्ष को भी बैठे बैठाए एक और मुद्दा मिल जाएगा। दूसरी तरफ अगर वह टाइटलर को मैदान से नहीं हटाती तो दिल्ली की तो नहीं कह सकते लेकिन पंजाब में उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

जूते से निकला विद्रोह
हो सकता है कांग्रेस डॉ. मनमोहन सिंह के जरिए सिखों को मनाने की कोशिश करे जैसा कि विश्वासमत पर वोटिंग के समय कुछ अकाली सांसदों ने आत्मा की आवाज पर वोटिंग की थी। लेकिन इस बार मुश्किल लगता है, क्योंकि विद्रोह पर एक पत्रकार उतरा है और उनसे आगाज भी जूता फेंक कर किया है। हम मानते हैं कि जरनैल का तरीका गलत था, यह जरनैल भी कह चुका है लेकिन उसका मुद्दा सही था यह वह भी कह रहा है और यही बात सब कह रहे हैं।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

ये तो होना ही था

दाग नहीं छूटता
आज जो हुआ वो होना ही था। 15 दिसंबर को जब इराक में जॉर्ज बुश को जूता मारा गया और मारने वाले पत्रकार जैदी को दुनिया भर की मीडिया ने हीरो बनाकर पेश किया तभी आशंका हो गई थी कि भारत में भी ऐसा हो सकता है और आज हो गया। मसले अलग हो सकते हैं, स्थितियां अलग हो सकती हैं लेकिन एक बात जो दोनों घटनाओं में कॉमन थी वह यह कि जूता मारने वाले दोनों पत्रकार थे। एक के गुस्से का कराण अपने देश की बर्बादी था और आज दूसरे का कारण उसके समुदाय पर अत्याचार। हुआ वो भी गलत था और हुआ ये भी गलत ही है। आज बुश भी मानते हैं कि उनका इराक और अफागानिस्तान का फैसला सही नहीं था। कांग्रेस सरकार भी मान चुकी है कि 84 में गलत हुआ। डॉक्टर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर इसकी भरपाई करने की कोशिश की गई लेकिन जैसे आडवाणी के ऊपर लगा रथयात्रा का दाग, मोदी पर लगा गुजरात का दाग कांग्रेसी भाई नहीं भूलते वैसे ही 84 का दाग भी भुलाए नहीं भूल रहा।
कुछ तो गड़बड़ रही
चिदंबरम जी लाख कहें कि सीबीआई (सीबीआई बोले तो..........) सरकार के दबाव में नहीं लेकिन जनता ने देखा है। जरनैल सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। रक्षा जैसी बीट उनके पास है। ऐसे में अगर वे कोई आरोप लगा रहे हैं तो कुछ तो गड़बड़ रही होगी.....................खैर यह अपना मुद्दा नहीं। अपना मुद्दा यह है कि बीच चुनाव के दौरान सीबीआई टाइटलर को क्लीन चिट देती है और कहती है कि उनके खिलाफ मामला बंद किया जाए। ऐसे में अगर किसी का गुस्सा फूट पड़ा तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस की मजबूरी
जरनैल को पुलिस ने हिरासत में लिया, पूछताछ की और फिर छोड़ दिया। कारण बताया कि चिदंबरम ने इन्हें माफ कर दिया। लेकिन क्या देश के गृहमंत्री पर जूता फेंकने वाले व्यक्ति को ऐसे ही माफ किया जा सकता है। वह चिदंबरम का अपमान या उनके प्रति गुस्सा नहीं था गुस्सा था व्यवस्था के प्रति। ऐसे में गृहमंत्री ने उन्हें क्यों माफ किया। इसके पीछे भी कांग्रेस की मजबूरी है। चुनाव चल रहे हैं अगर जरनैल को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाता तो सिख समुदाय के लोग भड़क सकते थे। जिसका नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ता। जूता फेंकने की खबर प्रसारित होने के कुछ मिनटों के अंदर ही अकाली दल जरनैल के समर्थन में आ गई और दमदमी टकसाल ने उनको सम्मानित करने की घोषणा कर ऐसे संकेत दिए थे। ऐसे में कांग्रेस के पास कोई और रास्ता नहीं था। अवधी की एक कहावात है... 'सौ-सौ जूता खाई.....'
मजबूरी भाजपा की
मजबूरी भाजपा की भी है। जरनैल को गलत कह नहीं सकती नहीं तो अकाली और सिख नाराज होंगे। और जरनैल को सही भी नहीं कह सकती क्योंकि न जाने कब किस पत्रकार को......। ऐसे में भाजपा ने कांग्रेस को सबक लेने की नसीहत दे दी। नसीहत तो सभी पार्टियों और नेताओं को लेनी चाहिए।

जवाब चाहिए

खैर पूरे मामले के लिए दो लाइने लिख रहा हूं किसी मशहूर शायर की हैं-

सवाल यह नहीं कि उसने पत्थर * चलाया क्यों था?
सवाल यह है कि पत्थर * में आया क्यों था?
(*जूता)

रविवार, 5 अप्रैल 2009

यह कैसी चिंता?

‘We will have to devise innovative plans to ensure that minorities, particularly the Muslim minority, are empowered to share equitably the fruits of development. These must have the first claim on resources.’

Dr. Manmohan singh honorable prime minister of India said in his address at the 52nd meeting of the National Development Council (NDC) in New Delhi on Saturday, December 09,2006

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हमें यह सुनिशि्चत करने के लिए नई योजनाएं बनानी होंगी कि अल्पसंख्यक समुदाय खासतौर पर मुसि्लम, विकास का लाभ पाने में समानता से साझा करने में सक्षम हों। संसाधनों पर पहला दावा इनका ही होना चाहिए।
माननीय प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह का नई दिल्ली में राष्ट्रीय विकास परिषद की 52वीं बैठक में दिए गए
भाषण का अंश ।
9 दिसंबर 2006 शनिवार।)

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यह बयान दिए दो साल हो गए, शायद लोग भूल गए हों, इसलिए यह यहां दिया प्रधानमंत्री वैसे तो पूरे देश की नुमांइदगी करते है लेकिन इस बयान को देखकर आपको क्या लगता है? क्या मनमोहन सिंह जी को देश की फीसदी जनता का ख्याल है या फिर इसके कुछ हिस्से का? यह आप तय करें, वैसे डाक्टर सिंह खुद अल्पसंख्यक समुदाय (सिख धर्म) से ताल्लुक रखते है। देश में ईसाई,बौद्ध,जैन,पारसी,सिख जैसे और भी अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन सिर्फ मुसि्लम ही क्यों? इसमें खासतौर पर मुसलमानों के लिए कहने का औचित्य क्या है? आप जरूर बताएं, क्योंकि यह मसला हम सब से जुडा है। इसे जरूर पढे और अपनी राय दें।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

संजय इतने जरूरी हैं?

मजबूरी या सीनाजोरी?
इसे मजबूरी कहें या सीनाजोरी? देश का दुर्भाग्य कहें या नेताओं की सत्ता लोलुपता? जिस व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लडऩे से रोक दिया है उसे समाजवादी पार्टी ने अपना महासचिव बनाया। यह लोकतंत्र का मजाक नहीं तो क्या है? मेरी संजय दत्त से कोई जातीय दुश्मनी नहीं है और हो भी नहीं सकती। मैं उनके अभिनय का कायल हूं। लेकिन इन दिनों वे कुछ भी बोलते जा रहे हैं? खैर ये तो उनका अपना मामला है। सबको कुछ भी बोलने की आजादी है। डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के राजनीतिक वारिस मुलायम सिंह यादव जी के दिन ऐसे आ गए हैं कि उन्हें संजय दत्त के व्यक्तित्व का सहारा लेना पड़ रहा है।
हर शाख पर उल्लू बैठा है
एक पार्टी की बात नहीं है। सभी अपने काम से ज्यादा सितारों के चमक की चकाचौंध में चुनाव जीतना चाहती हैं। भले सभी दल गरीबों की पार्टी होने का दंभ भरें लेकिन पांच सितार होटलों के एसी कमरों में बैठकर विदर्भ के किसानों की समस्या नहीं हल की जा सकती। जिस पार्टी में देखों अपराधियों और सितारों की बाढ़ है। कोर्ट ने संजय को आम्र्स एक्ट के तहत छह साल की सजा सुनाई है। मैं ऐसे लोगों को जनता हूं जिन्हें देसी पिस्तौल (कट्टा) रखने पर पुलिस ने जमकर पीटा तमाम धराएं लगाई। वे आज भी कोर्ट का चक्कर लगा रहे हैं। गांव और मोहल्ले के लोग उन्हें देखकर रास्ता बचाते हैं, समाज में उनको बुरी निकाह से देखा जा सकता है। फिर संजय के साथ ऐसा व्यवहार क्यों नहीं? माना वे बहुत बड़े अभिनेता हैं लेकिन कानून की नजर में सब बराबर हैं फिर ऐसे क्यों?
गलती गलती है, भले गलती से हो
मैं उन कारणों के पीछे नहीं जाना चाहता जिनके कारण संजय ने ऐसा किया लेकिन गलती तो गलती ही है, भले गलती से की जाए। जब संजय ने किया था तो वे बच्चे नहीं थे। गलती की सजा मिलनी चाहिए। संजय को सजा मिली है तो उन्हें भोगनी चाहिए। खलनायक से मुन्नाभाई बने संजू बाबा (खलनायक से मुन्नाभाई) की देश में इज्जत बढ़ गई थी। लेकिन अब अपने मरहूम पिता की मौत का जिम्मेदार व्यक्ति विशेष को ठहराना, केंद्रीय मंत्री का स्टिंग ऑपरेशन और नेताओं से सी बोली से एक बार फिर उनकी छवि को धक्का लगा है। मुन्नाभाई अगर समाजसेवा करनी है तो उसके लिए चुनाव लडऩा जरूरी नहीं है।

सीबीआई बोले तो..........

'कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन'
आम चुनावों के बीच सीबीआई ने कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर को 1984 सिख दंगों के मामले में क्लीन चिट दे दी। इसके साथ ही एक बार फिर कांग्रेस पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लग गया है। यह पहला मामला नहीं है जब कांग्रेस ने सीबीआई (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन) को 'कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' के तौर पर इस्तेमाल किया है।

सुप्रीम कोर्ट की लताड़
विपक्षी पार्टियों को छोडि़ए सुप्रीम कोर्ट कई बार इस बारे में सरकार को लताड़ लागा चुकी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई द्वारा मुलायम सिंह के खिलाफ अंतरिम आवदेन वापस लेने पर जमकर फटकारा था। कोर्ट ने कहा,
'आप (सीबीआई) केंद्र सरकार और कानून मंत्रालय के इशारों पर काम कर रहे हैं। आपको एक स्वतंत्र एजेंसी के रूप में काम करना चाहिए।'


सीबीआई का इस्तेमाल: जाहिर सी बात है धुंआ तभी उठता है जब आग लगी हो। और सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप आए दिन लगते ही रहते हैं। कांग्रेस का इस मामले में इतिहास कुछ ज्यादा बुरा रहा है। रहे भी क्यों न आखिर 50 साल राज जो किया है। (मीठा-मीठा गप्प,तीखा-तीखा थू - भी देखें) 1984 के सिख दंगों और बोफोर्स जैसे बड़ी और पुरानी बातें भुला भी दें तो हाल ही में कुछ ऐसे मामले आए हैं जो सीबीआई का सच बेनकाब करते हैं। देखिए केंद्र में बैठी सरकार राजनीतिक लाभ के लिए कैसे सीबीआई का इस्तेमाल करती है-

मुलायम सिंह यादव: कभी कांग्रेस के विरोधी रहे मुलायम सिंह यादव के आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला सीबीआई के सुपुर्द किया गया तो कांग्रेस और सपा के बीच खटास बढ़ी। दोनों तरफ से आरोपों के तीर चले। लेकिन बीते साल जब परमाणु करार मसले पर मनमोहन जी के कामरेड भाइयों ने समर्थन वापस लिया तो लोकसभा में विश्वासमत पेश करने की नौबत आई। इस दौरान मुलायम और अमर यूपीए सरकार के खेवनहार बने। क्यों और कैसे ये तो अंदरखाने की बात है। हम जैसे क्या जानेंगे। लेकिन जो पता चला वो यह कि इस मसले में सीबीआई ने कोर्ट में यू-टर्न ले लिया। सीबीआई ने यह कहते हुए आवेदन वापस ले लिया कि जिस संपत्ति का जिक्र किया गया है वह उनके रिश्तेदारों की है। इससे नाराज कोर्ट ने सीबीआई पर बेहद तल्ख टिप्पणी की।

जगदीश टाइटलर : इनका जिक्र इसलिए क्योंकि हालिया मामला यही है। टाइटलर को लेकर सीबीआई पहले भी कठघरे में आ चुकी है। सीबीआई ने नवंबर 2007 में भी टाइटलर को क्लीन चिट दे दी थी, लेकिन सीबीआई की भूमिका पर सवालिया निशान उठने के बाद उसी साल मामला दोबारा खोलने के आदेश दिए गए थे। अब आज क्या हुआ उसे बताने की जरूरत नहीं है।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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