राज और समाज पर खरी आवाज

Website templates

मंगलवार, 31 मार्च 2009

जनता से धोखा: तीसरा -चौथा मोर्चा

ऐसा कब तक चलेगा.....?
कांग्रेस और भाजपा के बाद अब तीसरे मोर्चे का पोस्टमार्टम। देश की राजनीति में फिर तीसरे मोर्चे का उदय। दरअसल तीसरे और चौथे मोर्चे के नाम पर क्षेत्रीय दल और नेता जनता से धोखा और सत्ता की सौदेबाजी करते हैं। इतिहास इसका गवाह है। इसके गठन का कोई न कोई तात्कालिक लाभ रहा है। जिस पार्टी का विरोध करके चुनाव जीतते हैं बाद में उसी के साथ सत्ता सुख भोगते हैं। यह राज्य का चुनाव नहीं बलि्क राष्ट्रीय सरकार का चुनाव है जो राष्ट्रीय मुद्दों पर लडा जाना चाहिए ताकि सरकार चलाने वाले देश के प्रति उत्तरदायी हो सकें। किसी राज्य या क्षेत्र विषेश के प्रति नहीं जैसा कि अब हो रहा है। ऐसा कब तक चलेगा.....? जनता जवाब चाहती है।


वाममोर्चाः कामरेड भाइयों की मनमोहन जी ने नहीं सुनी तो चार साल के नाटक के बाद करात जी ने अलग होने का फैसला किया। महंगाई,बेरोजगारी,किसानों की हत्या जैसे मामले में तो वामपंथी सिर्फ गरजकर रह गए अलग हुए तो इस बात पर की भारत अमेरिका से करार क्यों कर रहा है। लाल झंडे वालों के लिए अमेकरिका से विरोध पुराना रहा है। दुश्मनी तो उनकी गाहे बेगाहे अपने देश से भी हो जाती है जब बात उनकी तथाकथित विचारधारा की हो तो फिर क्या कहना। परमाणु करार का विरोध भी इसलिए की अगर भारत को परमाणु शकि्त मिल गई तो एशिया में चीन की चौधराहट को खतरा पैदा हो जाएगा। इनके लिए चीन भारत से ज्यादा प्यारा है। इनकी अपनी मजबूरी है। ये कांग्रेस से अलग जरूर हो गए हैं पर चुनाव के बाद अगर राजग को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो वामपंथी भाई 'धर्मनिरपेक्षाता' का नारा लगाते हुए मैडम सोनिया के घर पहुंच जाएंगे खाना खाने। ये 'धर्मनिरपेक्षाता' अपने को समझ नहीं आती खैर इस पर किसी और दिन बात करेंगे। फिलहाल तो इतना समझ लें कि ये कामरेड आज भले कांग्रेस को गरियाकर 60 में से कुछ सीटें बचा ले पर इस बार ये सौदा करने की सि्थति में नहीं होंगे। अगर इनके सांसद जीते तो ये कांग्रेस की ओर ही जाएंगे।

जद-एसः अब तीसरे मोर्चे के दूसरे खिलाडी एचडी देवगौडा जी इनकी जितनी बडाई की जाए कम है। होने को तो देश के प्रधानमंत्री हो गए पर कर्नाटक से नहीं निकल पाए। बेटे को सीएम बनवाने लिए भाजपा से हाथ मिलाया जब भाजपा की बारी आई तो पलट गए। मुझे बचपन के खेल याद आ गए। जब खेलते हुए बैटिंग तो सब कर लें लेकिन जब फिलिडंग की बारी आए तो भाग जाएं। अब इनकी अपनी मजबूरी है। कांग्रेस ने इनको सत्ता से बेदखल किया था सो इन्होंने बदला ले लिया पर इनकी बेईमानी का बदला जनता ने इनसे लिया।

एआईएडीएमकेः एक और नाम है अम्मा का। जी हां हम बात कर रहे हैं तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता की। फिलहाल तो वे तीसरे मोर्चे में हैं लेकिन कभी राजग के साथ रह चुकी हैं। अब इनकी अपनी मजबूरी है। उनकी राजनीतिक कर्मभूमि तमिलनाडु है जहां उनका मुख्य मुकाबला करुणानिधि की डीएमके से है। अब डीएमके यूपीए के साथ है तो अम्मा यूपीए के साथ कैसे जाएंगी। हालांकि तमिलनाडु के दोनों विरोधी अटल सरकार के साथ रह चुके हैं लेकिन अब वैसे स्थिति नहीं लगती।

टीडीपीः अब बात करते हैं तेलगू देशम पार्टी की। दस साल आंध्र के मुख्यमंत्री रहकर सत्ता से बेदखल हुई टीडीपी और उसके नेता चंद्रबाबू नायडू वाजपेयी सरकार के संकटमोचक रहे, लेकिन अब तीसरे मोर्चे के साथ हैं। पिछले चुनाव में विस चुनाव में उनकी जबरदस्त हार हुई थी। अगर चुनाव बाद तीसरा मोर्चा यूपीए की तरफ जाता है तो नायडू इससे अलग हो सकते हैं। यह उनकी अपनी मजबूरी है, क्योंकि आंध्र में उनका मुख्य मुकाबला कांग्रेस से ही है। ऐसे में वे केंद्र में कांग्रेस को समर्थन देकर अपना रास्ता मुश्किल नहीं करेंगे। यही कुछ हाल टीआरएस का है। अलग तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर यूपीए से अलग हुई तेलंगाना चुनाव बाद राजग के साथ जा सकती है, क्योंकि राजग ने तेलंगाना बनाने की घोषणा की है।


बसपाः दक्षिण के बाद चलते हैं उत्तर में जहां उप्र की मुख्यमंत्री मायावती को कामरेड भाइयों ने प्रधानमंत्री बनाने की सपना दिखा दिया है। फिलहाल तो वे तीसरे मोर्चे में हैं लेकिन, चुनाव बाद अगर मोर्चा यूपीए की ओर गया तो माया अलग हो सकती हैं। तीसरे मोर्चे के बूते वे पीएम बनने से रहीं और कांग्रेस शायद ही माया को पीएम बनने दे। रही बात माया की तो वे सपा के यूपीए के साथ रहते उधर जाने वाली नहीं हैं। मजबूरी बसपा की भी है। बसपा और कांग्रेस का वोट बैंक कमोबेश एक ही है। जिन दलितों की मसीहा होने का दावा माया मेमसाब करती हैं राहुल बाबा भी उन्हीं के घर रात बिताते हैं। ऐसे में टकराव होना तय है। रही बात मुस्लिम वोटों की तो अब तक सपा और कांग्रेस का वोटबैंक रहा यह अल्संख्यक समुदाय कल्याण सिंह मामले से सपा से खफा चल रहा है और अमेठी और रायबरेली छोड़ कांग्रेस का उप्र में प्रभाव कितना है यह उसके सहयोगियों के रवैये से ही स्पष्ट है। अब बात इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चल रही कानाफूसी की। इसकी माने तो माया और भाजपा चुनाव बाद एक हो सकते हैं। वैसे पहले भी माया भाजपाई भाइयों को तीन बार राखी बांध चुकी हैं। अब आगे का राम जाने...... तीसरे मोर्चे में यही बड़ी पार्टियां हैं।

सपा राजद लोजपाः
अब बात चौथे मोर्चे की जो मुलायम,लालू और पासवान ने बनाया है। ये नेता उप्र और बिहार की 120 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ेंगे। फैसला यह हुआ है कि लालू-पासवान यूपी में और मुलायम बिहार में प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। खैर लालू-पासवान का यूपी में और मुलायम का बिहार में कितना जनाधार है यह सब जानते हैं। यह उनकी अपनी मजबूरी है, जाहिर सी बात है तीनों पुराने अब समाजवादी (अब नहीं) ज्यादा से ज्यादा सीटें लाकर चुनाव बाद उसका फायदा उठाना चाहते हैं।अमर सिंह भले कहें कि कांग्रेस का यूपी में जनाधार नहीं लेकिन वे यह भी कहते हैं कि हम सोनिया जी का सम्मान करते हैं। अमर सिंह जी जनता जानती है कि जिस व्यक्ति का कांग्रेस अध्यक्षा के घर की पार्टी में अपमान हुआ वही अपने आप उनसे मिलकर समर्थन देने क्यों गया।

क्या है पेंच?
तीसरा मोर्चा बने इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती, मुझे भी नहीं है लेकिन एक पेंच है जिसने मुझे लिखने को कहा।
दरअसल साढ़े चार साल सत्ता की रेवड़ी खाने के बाद वाममोर्चा अपनी 60 सीटें लेकर यूपीए से अलग हो गया। सोनिया जी, सोनिया जी कहने वाले कामरेड भाई लाल हो गए। उधर पश्चिम बंगाल में ममता दीदी ने उनका जीना हराम कर दिया नैनो को बाहर जाना पड़ा। नैनो कहीं और जाती तो शायद कामरेड इतने न गुस्साते गई तो नरेंद्र मोदी के राज्य में सो अब क्या करें। ममता को कोस रहे हैं। लेकिन गाहे बेगाहे करात साहब कह देते हैं कि सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से दूर रखने के लिए वे कांग्रेस को समर्थन कर सकते हैं। चुनाव लड़ेंगे कांग्रेस का विरोध कर, जनादेश मिलेगा कांग्रेस के विरोध में लेकिन फिर जाएंगे हाथ के साथ। वैसे इस बार जो हालात हैं उससे लाल झंडे के लहराने की उम्मीद बहुत कम है।
यही हाल लालू-मुलायम-पासवान के गठजोड़ का भी है। यूपी और बिहार में जहां देश की 22 प्रतिशत लोकसभा सीटें हैं वहां तो यह कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें देने को राजी हुए लेकिन मनमोहन जी को पीएम बनाने के लिए समर्थन देने को तैयार हैं कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे, जनता से वोट मांगेंगे कांगे्रस के विरोध के नाम पर लेकिन फिर जाएंगे यूपीए के साथ। आखिर क्यों, अगर यूपीए के साथ रहना है तो कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ें अलग क्यों होते हैं। जो पार्टियां चुनाव के पहले सीटों के बंटवारे में इतनी सौदेबाजी कर रही हैं वह सत्ता का सुख भोगने के लिए कितनी सौदेबाजी करेंगी, किसी से छिपा नहीं है। बात चाहे सपा की हो या झारखंड मुक्ति मोर्चा की। एक तरफ सीबीआई से क्लीन चिट के बदले समर्थन दिया जाता है तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री की कुर्सी के बदले।
लोचा राजग में भी है लेकिन उसके जो साथी छोड़कर गए आते नहीं दिखते। हां उसकी पुरानी सहयोगी बीजद ने उड़ीसा में अलग रास्ता चुना है बात तो तब है जब चुनाव बाद भी वह राजग के साथ न आए। रही बात टीडीपी की तो आंध्र में भाजपा का ज्यादा जनाधार नहीं है।

अब जनता की बारी
खैर यह तो हरि अनंत, हरि कथा अनंता है, जितना कहो कम, जितना समझो कम। लेकिन जतना सब समझती है कामरेड। वैसे समर्थन का क्या है। जनता भूली नहीं है कि राजीव गांधी की हत्या में हाथ होने के आरोप पर कांग्रेस से डीएमके को जब मोर्चा सरकार से निकालने का दबाव डाला था लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो समर्थन वापस ले लिया और देश का मध्यावधि चुनाव देखना पड़ा। ऐसे में कामरेड भाइयों का क्या, चार साल फिर सत्ता सुख। पर अब तक नेताओं ने जनता को नचाया अब जनता की बारी है।

गुरुवार, 26 मार्च 2009

नव संवतसर मंगलमय हो

वीणा पाणि का कर वंदन, भारत मां को कर नमस्कार,
नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है, इस आर्य भूमि पर बार-बार।।
भारत में समृद्धि लेकर आओ, सवर्त्र प्रेम रस बरसाओ,
तम,मन,धन से सब संपन्न हों, सबको उच्च शिखर तक पहुंचाओ।।
खेतों में हरियाली हो हरदम,फसलों की बाली झुकी रहे,
हर आंगन में हो फूल खिलें, हर जीव विश्व सुखी रहे।।
निज स्वार्थ और निज लाभ भूल, सब देश के हित में काम करें,
विज्ञान,कृषि और खेलकूद, हर क्षेत्र में ऊंचा नाम करें।।
दुनिया के लिए आदर्श बनें, शांति का परचम लहराएं,
हम मिटा परस्पर द्वेष भाव, भारत को आगे ले जाएं।।
भय-भूख और भ्रष्टाचर मिटे, सबको सबका हक मिल जाए,
कट जाए दुख की रजनी अब, सुख का सूरज फिर उग आए।।
नववर्ष स्वप्न है यह मेरा, अब की तुम कुछ ऐसे आओ,
नव युग के नव आगाज हेतु, नव दिशा सभी को दिखलाओ।।

नव संवत,नवरात्रि,चेटीचंड,गुरु अंगददेव जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।

बुधवार, 25 मार्च 2009

कहां बचा डिफरेंस?

सुशासन,विकास और सुरक्षा?
आज पार्टी विद डिफरेंस भाजपा की बारी है। ये भाजपा की वेबसाइट का होमपेज है। पार्टी की यहां भी त्रिमूर्ति है। राजनाथ,आडवाणी और अटल जी। बगल में लुभावना वादा सुशासन,विकास और सुरक्षा का। पार्टी की संस्थापक पुरुषों पंडित दीनदयान उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ऊपर छोटा सा चित्र दिया गया है ताकि देखने वालों को सनद रहे पार्टी का नाम सिर्फ ऊपर दिया गया है। यहां पार्टी से बडा व्यकित्तव है। त्रिमूर्ति का। इनके आगे पंडित दीनदयान उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कद भी बौना कर दिया गया है। खैर यह उनकी वेबसाइट है जो चाहे सो करें,अपन से क्या।
सिर्फ नेता और नारे अलग
कल कांग्रेस पर लिखा इसलिए भाजपा पर लिखना जरूरी नहीं था लेकिन एक पेंच यहां भी था। दरअसल जैसे ही मैंने भाजपा की साइट खोलने के लिए गूगल पर लिखा bjp वहां आया Bharatiya Janata Party - The Party with a Difference यहां अपन को थोडा रुकना पडा ये Difference वाला जुमला समझ में नहीं आया। काहे का डिफरेंस। केवल कांग्रेस से ही तुलना करें तो उन्होंने ऐसा क्या किया जो भाजपा ने नहीं किया। परिवारवाद,सांप्रदायिक दंगे,भ्रष्टाचार,जोड-तोड सब तो किया। कहां है अंतर। अंतर बस झंडे,चुनाव चिन्ह,नेताओं और नारों में है।
सांप्रदायिकता: कुर्सी पाने के लिए राम का सहारा लिया, सब लेते हैं पर राम के नाम पर कत्लेआम हुआ आम आदमी। यह कैसी राजनीति थी। गुजरात में दंगे हुए। रामराज का नारा बुलंद करने वाले नेता भूल गए कि राजधर्म क्या होता है। अटल जी ने जब मजबूरन राजधर्म की याद दिलाई तो पार्टी में उनकी ही आलोचना हुई। यह माना कि मोदी जनता की अदालत में पास हुए लेकिन इंसानियत की अदालत में उनका जुर्म अक्षम्य है। कांग्रेस पर संविधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाने वाले आडवाणी जी उस संस्था का सम्मान करके अगर वरुण गांधी का टिकट काट देते तो शायद उनका कद उतना बढ जाता जितना जिन्ना की मजार पर फातिहा पढने से नहीं बढ पाया था। आडवाणी लाख उस बयान पर सफाई दें लेकिन वो अच्छा करने निकले थे लेकिन दांव उल्टा पड गया। बडे बडे पहलवान भी दांव चूक जाया करते है। वरुण ने जो बोला वह किसी भी नजरिए से उचित नहीं कहा जा सकता। कम से कम चुनाव के समय बिल्कुल नहीं। भले ही भाजपा को इस मसले का चुनावी फायदा मिल जाए लेकिन वह पार्टी विद डिफरेंस नहीं कहला सकती।
भ्रष्टाचारः अब बात आती है भ्रष्टाचार की। हालांकि इस मामले में कांग्रेस अव्वल है क्योंकि उसने 50 साल राज किया है। लेकिन भाजपा पांच साल में ही इस दलदल में फंस गई। तहलका,ताबूत,जूदेव, जैसे कई मामले हैं जो बातते हैं कि भाजपा कहीं से भी अलग नहीं है। जब तक भाजपा विपक्ष में थी इसके नेताओं को देखसुन कर लगता था कि सांप्रदायिकता के अलावा इस पार्टी में कोई ऐब नहीं पर यह गलत साबित हुआ। कुर्सी के साथ स्वतः मिलने वाले सारे ऐब भाजपा में आए। वैसे भी जब शकि्त मिले और उसका दुरपयोग न हो तब तो कोई बात हुई यहां तो कुर्सी मिलते ही सारा अंतर मिट गया।
सुशासन,विकास और सुरक्षाः ये तीन भाजपा के सूत्र अब बात इन पर। सुसाशन का तो नहीं कह सकते पर विकास का नारा तो सब को देना ही होगा। भाजपा इस मामले में थोड सा आगे है। इसके साशित राज्यों में विकास हुआ है। अब पता नहीं यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू होगा या नहीं। इसकी छोडिए अब आते हैं सुरक्षा पर। भाजपा के राज में गोधरा,अक्षरधाम,रघुनाथ मंदिर,संसद,लालकिला जैसे कांड हुए। कारगिल में भले देश को जीत मिली हो लेकिन देश को उसकी कीमत चुकानी पडी। आतंक के खिलाफ बात चलेगी तो कंधार विमान अपहरण की बात जरूर आएगी। कहां डिफरेंस?
आडवाणी के बाद कौन? बात जब निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। पार्टी ने नारा दिया है मजबूत नेतृत्व,मजबूत सरकार। त्रिमूर्ति में से अटल जी ने संन्यास ही ले लिया है। रही बात आडवाणी जी की तो उम्र के लिहाज से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी वाला यह उनका अंतिम चुनाव हो सकता है। अब आते हैं राजनाथ सिंह पर। राजनाथ जी न तो मास लीडर हैं न कास्ट लीडर। इनका गृह प्रदेश है उप्र लेकिन इनके अध्यक्ष बनने के बाद वहां भाजपा की क्या दशा हुई है बताने की जरूरत नहीं। रही बात सेकेंड लाइन की तो कई दावेदार हैं। अटल के बाद तो आडवाणी लेकिन आडवाणी के बाद कौन,इस सवाल का जवाब मुशि्कल है।
...तो अच्छा होता
दीन दयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद उनके चित्र की ही तरह पार्टी ने अपने घोषणा पत्रों कार्यालयों की शोभा बढाने के लिए रख छोडा है। मुझे खुशी होती अगर भाजपा पार्टी विद डिफरेंस बनी रहती।
बातें और भी हैं लेकिन फिर कभी
यह पार्ट टू है। पार्ट वन के लिए पढे कोई तो बताएं क्यों

मंगलवार, 24 मार्च 2009

कोई बताएगा क्यों?

मेरे तो बस मनमोहन
सोनिया जी ने मंगलवार को दिल्ली में प्रेस कान्फ्रेंस कर पार्टी का 2009 चुनाव के लिए घोषणा पत्र जारी किया और कहा की मनमोहन ही होंगे अगले प्रधानमंत्री। राहुल का नाम आया तो मैडम ने घोषणा पत्र पर छपी अपनी फोटो भी ढक ली। उन्होंने कहा दावेदार कई हैं पर मनमोहन जैसा कोई नहीं। मैडम ने कहा जीते तो पांच साल मनमोहन ही रहेंगे पीएम। घोषणा पत्र पर छपी फोटो में मैडम ने भारती लोकतंत्र के शीर्षस्थ पद पर आसीन व्यकित(प्रधानमंत्री) की पीठ पर हाथ रखा है। खैर यह अपना इश्यू नहीं हैं।
कांग्रेस की त्रिमूर्ति
अब देखिए कांग्रेस का दूसरा पहलू, यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट का होमपेज है। जिसमें मनमोहन, सोनिया के समकक्ष राहुल बाबा की फोटो लगाई गई है। मेरी अधिकतम जानकारी के मुताबिक राहुल बाबा कांग्रेस के महासचिव है और अपनी पैतृक सीट अमेठी से सांसद। जहां से अब तक सिर्फ कांग्रेस ही जीती है। सिर्फ कांग्रेस ही। लेकिन उनकी फोटो यहां क्यों? क्या वे कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ सांसद हैं,सबसे वरिष्ठ महासचिव है,पार्टी के अध्यक्ष हैं या इसके अलावा कोई अन्य जिम्मेदारी जो उन्हें पार्टी ने अघोषित तौर पर दी है,आफ द रिकार्ड? अगर ऐसा है तो जनता को भी मालूम चलना चाहिए अगर नहीं तो भी जनता को मालूम चलना चाहिए की उनकी फोटो क्यों लगी है?
इसलिए बोला
खैर पार्टी उनकी है जो चाहे वह करें। लेकिन यहां एक पेंच के कारण मैंने इतनी मेहनत की है। होमपेज पर लिखा है The largest democratic party in the world। बोले तो दुनिया की सबसे बडी लोकतांत्रिक पार्टी। अपने को इस दावे में कोई आपत्ति नहीं। पर किस लोकतांत्रिक प्रक्रिया या परंपरा के तहत राहुल बाबा का फोटो लगाया गया है?
फिर इनका क्यों नहीं?
इसके साथ ही एक और फोटो है जिसमें पार्टी के बाकी महासचिवों की फोटो और उनके नाम दिए गए हैं। इनमें Motilal Vora Ex gov।Treasurer, MP, Ahmed Patel Political Secretary,और पार्टी महासचिवों B। K। Hari Prasad Digvijaya Singh, Ex-CM, Ghulam Nabi Azad, Janardan Dwivedi, Mohsina Kidwai, Mukul Wasnik, Prithviraj Chavan, Rahul Gandhi, V. Narayanasamy, A. K. Antony, Ex-CM, Iqbal Singh, K. Keshava Rao, Luizinho Faleiro M. Veerappa Moily, Ex-CM, Oscar R. K. Dhawan, Satyavrat Chaturvei के नाम शामिल है। इनमें कुछ नेताओं ने उम्र कांग्रेस में बिता दी। कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री रहे हैं। कुछ अभी केंद्रीय मंत्री हैं। कुछ वरिष्ठ सांसद। वो भी हैं जिनका लिखा पार्टी अध्यक्ष बोलते हैं। इन नेताओं का चेहरा भी ऐसा नहीं कि उनका फोटो सोनिया,मनमोहन की बराबरी में न लगाया जा सके। प्रणब दा सिर्फ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठे बाकी सरकार चलाने,बचाने में उनका योगदान छिपा नहीं है।
राहुल बाबा अनुभव के आधार पर इनके सामने कहीं नहीं टिकते। उम्र के मामले में भी। रही बात योग्यता की तो इनमें वह नाम भी हैं जो तब कांग्रेस में रहे जब वहां भगदड मची थी। मैडम ने जिसको जो कहा किया फिर उनकी क्यों नहीं, और उनकी नहीं तो राहुल की क्यों?
परिवार सब पर भारी
हां एक योग्यता जो राहुल बाबा में लेकिन बाकी नेताओं में नहीं वह उनका नेहरू-गांधी परिवार से जुडा होना है। नेहरू के पडपोते, इंदिरा जी के नाती,राजीव और सोनिया के पुत्र होने का गौरव। शायद, यह ऐसी काबिलियत है जो कांग्रेस में शीर्ष पर होने के लिए पहली,अंतिम यह यूं कहिए कि एकमात्र योग्यता है। इतिहास इसका गवाह है और वर्तमान साक्षी।
शायद इस सवाल का जवाब मिले? न मिले तो भी कोई बात नहीं मैं तो सवाल उठाता रहूंगा
यह फोटो कांग्रेस की वेबसाइट http://www.aicc.org.in से ली गई है।

सोमवार, 23 मार्च 2009

शहादत को सलाम


बड़ी खुशनसीब होगी वह कोख और गर्व से चौडा हो गया होगा उस बाप का सीना जिस दिन देश की आजदी के खातिर उसका लाल फांसी चढ़ गया था। आज 23 मार्च को देश भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है। 23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने इन्हें फांसी पर चढा दिया था, तब भगत की उम्र सिर्फ 24 साल थी। हम भारत मां के इन अमर सपूतों को नमन करते है।
इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय, भगत सिंह अमर रहें
आज उस महान देशभक्त के नाम पर एक दिया जरूर जलाएं, ताकि सनद रहे....

शनिवार, 21 मार्च 2009

मीठा-मीठा गप्प,तीखा-तीखा थू

इन दिनों टीवी पर कांग्रेस का एक विज्ञापन प्रसारित हो रहा है जिसमें 'हाथ' की ताकत बताई गई है। बताया गया है कि कैसे 1947 और उसके पहले कांग्रेस के हाथ ने देश को आजाद करवाया,लालकिले पर तिरंगा लहराया,संविधान बनाया,पाक को हराया,देश चलाया,हरित क्रांति,बांग्लादेश बनाया,पाक को हराया,बैंकों का राष्ट्रीयकरण,संचार क्रांति,परमाणु करार,अंतरिक्ष में चंद्रयान के जरिए तिरंगा और भी बहुत कुछ। यह तो वही बात हुई की मीठा-मीठा गप्प,तीखा-तीखा थू। इतने भर से कांग्रेस की सूची अधूरी है। इसे पूरा करना चाहिए। कुछ बातें मैं भी कहना चाहता हूं।
वाह री कांग्रेस
सबसे पहले तो ये कि यह वो कांग्रेस नहीं जिसने आजादी दिलाने की लडाई लडी थी वह तो 15 अगस्त 1947 को उसी समय दफन हो गई जब पंडित नेहरू ने लालकिले पर यूनियन जैक की जगह तिरंगा लहराया। तब कहा गया था कि कांग्रेस का काम खत्म हो गया है अब इस संगठन को भी समाप्त कर देना चाहिए लेकिन पंडित नेहरू कांग्रेस नाम की शकि्त जानते थे। सो कांग्रेस चुनावी पार्टी बन गई। बीच-बीच के कुछ कालखंड को छोड दें तो कांग्रेस पर एक ही परिवार का अधिकार रहा। जिसने उस परिवार का विरोध करने की कोशिश की उसे पार्टी में दरकिनार कर दिया गया। इंदिरा से लेकर आज तक इसके कई उदाहरण हैं। खैर यह तो दूसरा विषय हो गया। मैं कहना यह चाह रहा था कि यह कांग्रेस आजादी के पहले वाली कांग्रेस नहीं।
अब आते हैं उन बातों पर जिन्हें कांग्रेस ने अपनी लिस्ट में नहीं जोडा है। अगर-नेहरू गांधी कांग्रेस ने देश को आजाद कराया है तो देश के विभाजन का श्रेय भी उसी पार्टी और उन्हीं नेताओं को जाता है। कश्मीर विवाद जो आजादी के 60 साल बाद भी देश का सबसे बडा सिरदर्द बना हुआ है यह भी कांग्रेसी प्रधानमंत्री की देन है। देश में तीन हमले पाकिस्तान से हुए अगर उनमें कांग्रेसी सरकार की वजह से जीत हुई तो चीन से करारी हार भी कांग्रेस प्रधानमंत्री के समय ही हुई। अक्साई चीन विवाद भी उसी समय हुआ जो आज भी जारी है।
अब आते हैं कुछ और मामलों पर- बांग्लादेश बनाने वालीं इंदिरा जी ने देश के लोकतंत्र के इतिहास में सबसे काला धब्बा लगाया आपातकाल के जरिए यह भी तो कांग्रेस की ही देन थी। आज कांग्रेसी संजय गांधी को गाली दे रहे हैं लेकिन संजय के पीछे इंदिरा जी ही थीं। इमरजेंसी के बाद आए तो 1984 का दंगे। सिखों का सरेआम कत्लेआम भी कांग्रेस की लिस्ट में ही जुडा है। बात दंगों की आई तो नोआखाली से लेकर भागलपुर के दंगे भी याद जरूर आएंगे। याद तो तो बाबरी मसि्जद विध्वंश की भी उसी के खाते में है।...

रविवार, 8 मार्च 2009

होली की शुभकामनाएं

रंगों का त्योहार मुबारक हो।
खुशियों की फुहार मुबारक हो।
सात रंग से सजे आपका तन-मन जीवन।
एक नहीं,दो नहीं सौ-सौ बार मुबारक हो।
नव संवत और होली की हार्दिक शुभकामनाएं

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

बापू की यादें नीलाम!

(महात्मा गांधी के स्मृति चिह्न चश्मा, घडी, सैंडल और अन्य चीजें सरकारी प्रयासों के बावजूद देर रात नीलाम हो गए। भारत के प्रमुख शराब व्यवसायी विजय माल्या ने इन चीजों को नीलामी में 18 लाख डॉलर यानी करीब साढे नौ करोड रूपए में खरीद लिया। विजय माल्या की ओर से बोली लगाने वाले टोनी बेदी ने घोषणा की कि ये निशानियां भारत लाई जाएंगी और इन्हें जनता के दर्शनार्थ रखा जाएगा।)
अच्छा हुआ बापू नहीं हो...
यह बापू का चश्मा, घडी, सैंडल नहीं उनकी यादें नीलाम हो गईं। हमारी सरकार देखती रही। अच्छा ही तो हुआ,वहां तो कुछ करोड रुपए के लिए नीलामी हुई देश में तो बापू के सिद्धांत,बापू की शिक्षा रोज नीलाम होती है। रोज उसकी बोली लगती है। कभी मेज के नीचे से,कभी पर्दे के पीछे से। बोली भी कितने में पांच रुपए से लेकर अरबों तक में। जो जहां हैं, वहां बेच रहा है। सौदा कर रहा है कुछ नोटों के बदले। वाह रे देश,जिसके लिए गांधी जी ने अपना पूरा जीवन अर्पित कर दिया,बैरिस्टरी छोडकर जेल गए,नंगे पैर चले, सारे सुख त्यागे उस देश की सरकार ने गांधी जी को जगह दी तो 10 रुपए से लेकर 1000 तक की नोट पर। नोट,मुद्रा,लक्ष्मी,धन नाम चाहे जो दे लो। और अपने देश में तो कहावत है न कि धन हाथ की मैल है....। बापू की बडी सी प्रतिमा संसद के बाहर लगी है। अंदर उनका विशाल चित्र वहीं, उसके सामने सांसद अपना ईमान बेंचते हैं,कभी पैसे के बदले कभी कुर्सी के बदले। अहिंसा के पुजारी के नाम पर शपथ लेकर कभी धर्म के नाम पर,कहीं जाति,कहीं भाषा,कहीं क्षे़त्र और कहीं रंग के नाम पर हिंसा का तांडव करते हैं। अच्छा हुआ बापू तुम नहीं हो। नहीं ये सब देखकर....।
और उनका क्या होता...?

गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले,गांधी के नाम की रोटी खाने वाले और गांधीगीरी का नाटक फैलाकर अपनी दूकान चमकाने वालों को कम से कम शरम आए ऐसा तो होने से रहा पर चुल्लू भर पानी में उनको जरूर डूब मरना चाहिए। जो सरकार राष्ट्रपिता की यादों को नीलाम होने से नहीं बचा सकी और नीलामी के बाद कह रही है कि यह तो सरकार ने प्राइवेट सेक्टर से मिलकर किया है उससे हम क्या आशा रखें। भला हो माल्या का,जिसने गांधी जी की यादें खरीद लीं? वरना न जाने वो किसके हाथ लगती और उनका क्या होता...?

मंगलवार, 3 मार्च 2009

कुछ खास होगा ये चुनाव

इस चुनाव का खास- खास
पीढ़ी परिवर्तन का चुनाव
देश की दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिए यह पीढ़ी परिवर्तन का चुनाव होगा। कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए की ओर से फिलहाल मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं लेकिन स्वास्थ्य को देखते हुए माना जा रहा है कि यह उनका अंतिम चुनाव हो सकता है। इसके बाद वे सक्रिय राजनीति से अलग हो सकते हैं। भाजपा का भी कुछ ऐसा ही हाल है। भाजपानीत राजग की ओर से पीएम इन वेटिंग आडवाणी भी 83 साल के हो चुके हैं। उम्रदराज नेताओं में आडवाणी भले ही सबसे स्वस्थ हों, लेकिन 2009 के पांच साल बाद होने वाले आम चुनाव में उनकी उम्र 88 साल होगी। ऐसे में भाजपा में भी नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। इस तरह दोनों दलों में पांच साल बाद नई कमान ही नजर आने की उम्मीद है।
बिना अटल के पहला चुनाव
स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार है जब अटलबिहारी वाजपेयी सक्रिय राजनीति से अलग हैं। 1957 में पहली बार बलरामपुर से लोकसभा चुनाव जीते भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने स्वास्थ्य कारणों से राजनीति से संन्यास ले लिया है। 1998 और उसके बाद 1999 से 2004 तक प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी के नेतृत्व में ही राजग ने पिछला लोकसभा चुनाव लडऩा पड़ा था। पिछले चुनाव में हार के बाद यूपीए की सरकार बनी। अटल के नेतृत्व में ही पहली बार केंद्र में किसी सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।
राहुल बाबा की अग्नि परीक्षा
2004 लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी से लड़े और जीते। बाद में उन्हें कांग्रेस महासचिव बनाया गया। इसके बाद बाद कई राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए, लेकिन कांग्रेस कोई बड़ा उलटफेर नहीं कर पाई। अब यह उनका पहला आम चुनाव है। अटकलें तो ये भी हैं कि यूपीए जीती तो मनमोहन को कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री बनाकर बाद में राहुल को प्रधानमंत्री बना दिया जाएगा। इस बार संगठन के गठन से लेकर गठबंधन तक में राहुल ने सक्रिय भूमिका निभाई है, यह चुनाव उनके लिए अग्नि परीक्षा साबित होगा।
दो मुख्य चुनाव आयुक्त
देश के चुनावी इतिहास में पहली बार दो मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव कार्यक्रम संपन्न कराएंगे। वर्तमान सीईसी एन गोपालस्वामी चुनाव के बीच में 20 अप्रैल को रिटायर हो रहे हैं उनके बाद नवीन चावला यह पद संभालेंगे।
ऐतिहासिक महंगा चुनाव
इस बार आम चुनाव में 10 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है, जो देश में अब तक का सबसे महंगा चुनाव है। यह आंकड़ा 2004 के चुनाव खर्च (4,500 करोड़ रुपए) के दोगुने से भी ज्यादा है। 1996 के चुनाव में यह खर्च सिर्फ 2,200 करोड़ था जो 1998 में 3,200 करोड़ और 2004 में 4,500 करोड़ हो गया।
परिसीमन के बाद पहला चुनाव
2008 में पूरे हुए परिसीमन के बाद यह पहला आम चुनाव है। परिसीमन के बाद हालांकि लोकसभा की सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन सीटों का भौगोलिक स्वरूप और आरक्षण स्थिति में बदलाव हुआ है।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

Related Posts with Thumbnails