राज और समाज पर खरी आवाज

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शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

आजाद तुम्हारी जय हो

आजादी के उस महानायक को सलाम,जिसने 25 साल की उम्र में देश के लिए खुद को बलिदान कर दिया।
25 फरवरी 1931 से चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद में थे और यशपाल रूस भेजे जाने सम्बन्धी योजनाओं को अन्तिम रूप दे रहे थे। 27 फरवरी को जब वे अल्फ्रेड पार्क (अब आज़ाद पार्क ) में सुखदेव के साथ किसी चर्चा में व्यस्त थे तो किसी मुखाविर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। इसी मुठभेड़ में आज़ाद शहीद हुए। आज़ाद के शहादत की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिए उनका अन्तिम संस्कार कर दिया। बाद में शाम के वक्त उनकी अस्थियाँ लेकर युवकों का एक जुलूस निकला और सभा हुई। सभा को शचिन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीरामबोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को जवाहरलाल नेहरू ने भी सम्बोधित किया।
आजाद एक देशभक्त थे। अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से सामना करते वक्त जब उनकी पिस्तौल में आखिरी गोली बची तो उसको उन्होंने खुद पर चला कर शहादत दी थी। उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख था और इसका उपयोग उन्होंने कई दफ़े किया। रूसी क्रान्तिकारी वेरा किग्नर की कहानियों से वे बहुत प्रभावित थे और उनके पास हिन्दी में लेनिन की लिखी एक किताब भी थी। हंलांकि वे कुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने मे ज्यादा आनन्दित होते थे। जब वे आजीविका के लिए बम्बई गए थे तो उन्होंने कई फिल्में देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था पर बाद में वे फिल्मो के प्रति आकर्षित नहीं हुए।
चंद्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारंभ किया गया आंदोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों के बाद 15 अगस्‍त सन् 1947 को भारत की आजादी का उनका सपना पूरा हुआ।
भारत माता की जय

दादा रिटायर, लोकसभा स्थगित

दो दादाओं को रिटायर होना पडा
इस वित्तीय साल में दो दादा रिटायर हुए। दोनों पशि्चम बंगाल से। एक को क्रिकेट से रिटायरमेंट लेनी पडी और दूसरे दादा को राजनीति छोडनी पडी। कारण लगभग एक जैसे हैं। इन कारणों पर तो कभी बाद में चर्चा होगी। फिलहाल हम बडे दादा सोमनाथ के रिटायरमेंट की बात करते हैं।
ये पांच साल
गुरुवार को 14वीं लोकसभा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गई। दूसरे शब्दों में कहें तो वर्तमान लोकसभा का अंतिम सत्र भी समाप्त हो गया अब 15वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनावों की अधिसूचना जारी होगी। कार्यकाल के अंतिम दिन लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भले ही मजाकिया मूड में दिखें हों लेकिन पूरे पांच साल वे परेशान रहे। सोमदा कभी सांसदों के सदन में हल्ला करने से, कभी सदन के बाहर पैसा लेने से, कभी सदन में पैसा लाने से और कभी खुद को पार्टी से निकाले जाने से। यह पांच साल उनके 39 साल के राजनीतिक जीवन का सबसे बुरा दौर रहा। सर्वश्रेष्ठ सांसद रह चुके सोमदा को उनकी खुद की पार्टी से निकाल दिया, जिसके कारण उन्हें रिटायरमेंट लेनी पड़ी। लोकसभा के अंतिम सत्र में पहली बार बिना प्रधानमंत्री के अंतरिम बजट पेश हुआ।
दादा का 'शाप'
14वीं लोकसभा कुल 1,738 घंटे तक लगी जिसमें से 423 घंटे सांसदों ने व्यर्थ कर दिए। कुल 332 बैठकों में संसद का 24 फीसदी समय बेकार गया। सदस्यों के शोरगुल से परेशान सोमदा ने पिछले हफ्ते तो सभी को चुनाव हारने का 'श्राप' तक दे दिया था, हालांकि अगले ही दिन उन्होंने शाप वापस ले लिया था।
शर्मसार भी हुई संसद
14वीं लोकसभा के दौरान कई बार संसद शर्मसार हुई। विभिन्न दलों के 10 सांसदों को प्रश्न पूछने के बदले पैसा लेने पर बर्खास्त किया गया। एक सांसद कबूतरबाजी के आरोप में भी धरे गए। 22 जुलाई को भारत-अमेरिका परमाणु करार के मसले पर विश्वास मत के दौरान तीन सदस्यों ने वोट के बदले घूस देने का आरोप लगाते हुए संसद में नोट लहराए। इसी दौरान क्रॉस वोटिंग करने पर नौ सांसदों को सदस्यता भी चली गई।
काम भी हुआ
पांच साल के दौरान सदन में 258 विधेयक भी पारित किए गए। इनमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना, सूचना का अधिकार, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने का विधेयक भी शामिल है।
अब जनता की बारी
अब एक बार फिर गेंद जनता के पाले में है। अब चूके तो पांच साल तक फिर वही पछतावा होगा। कोई अच्छा नहीं है लेकिन जो कम बुरा है उसे चुने। अगर हो सके तो अच्छे को ही चुनें। क्योंकि यह देश के भविष्य सवाल है जो हमारे हाथ है।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

पंजाब,सिंध,गुजरात.....जय,,जय,,जय,,जय हे.......

लॉस एंजिल्स में स्लमडॉग मिलेनियर को 'छप्पर फाड़कर' ऑस्कर मिले तो सचमुच इसके पीछे 'पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल बंग' वाला एकाकार भारतीय प्रयास ही था। इलाहाबाद के विकास स्वरूप ने जब मुंबई की झोपड़पट्टियों के 'सच' को शब्दों पिरोकर 'क्यू एंड ' उपन्यास लिखा तो उन्होंने सोचा भी रहा होगा कि सात समुंदर पार ब्रिटेन का कोई फिल्मकार उनकी कहानी को विश्व पटल पर अमर कर देगा। 'क्यू एंड ' के 'स्लमडॉग' पर फिल्म बनाने वाले डैनी बॉएल ने दिल्ली की लवलीन टंडन के साथ मिलकर देव पटेल को हीरो चुना जिसकी जड़ें गुजरात (बलवा गांव,जामनगर) से निकली हैं तो हिरोइन फ्रिडा पिंटो का नाता मराठा (महाराष्ट) जमीन से रहा है। इनके बचपन का किरदार निभाया मुंबई की रुबीना खान और अजहरुद्दीन ने। फिहलाह दिल्ली के रहने वाले (झेलम-पाकिस्तान में पैदा हुए) गुलजार के शब्दों को सुदूर दक्षिण भारत (चेन्नई) के एआर रहमान ने संगीत से संवार कर फिल्म को 'गुलजार' किया तो रही-सही कसर विल्लाकुपुरा केरल के रसूल पुकुट्टी ने साउंड मिक्सिंग करके पूरी कर दी। रहमान ने पंजाब के सुखविंदर सिंह, तन्वी शाह और महालक्ष्मी अय्यर ने कहा 'जय हो......' तो दुनिया झूम उठी। फिल्म को ऑस्कर के मुकाम तक पहुंचाने में अनिल कपूर, इरफान खान (राजस्थान), संचिता चौधरी, विशाल जैन (मप्र), महेंद्र कुमार सिंह (बिहार), अलका याज्ञिक, इला अरुण, अलीशा चिनॉय नींव का पत्थर बने।
इलाहाबाद से लास एंजिल्स तक
विकास स्वरूप: इलाहाबाद, उपन्यासकार
लवलीन टंडन: दिल्ली, सह निर्देशक
देव पटेल: बलवा गांव, जामनगर, गुजरात, हीरो
फ्रिडा पिंटो, मुंबई, महाराष्ट्र, हिरोइन
अनिल कपूर, मुंबई, महाराष्ट्र, एंकर
रसूल पुकुट्टी- विलाक्कुपरा, केरल
एआर रहमान, चेन्नई, तमिलनाडु
गुलजार, दीनागांव, झेलम जिला (पाकिस्तान)
विशाल जैन- मंदसौर/इंदौर, मध्यप्रदेश, असिस्टेंट कैमरा ऑपरेटर
संचिता चौधरी- नागदा जंक्शन, देव पटेल की मां
इरफान खान- जयपुर, राजस्थान, पुलिस इंस्पेक्टर
सौरभ शुक्ल- दिल्ली, सिपाही
महेंद्र कुमार सिंह- बिहार, लोकेशन कंट्रोलर.....
कबूलनामा
भले ही डेनी बोएल ने भारत की नकारात्मक छवि को रुपहले परदे पर दिखाकर नाम कमाया हो लेकिन सच इससे भी भयानक है। स्लमडाग के शाबि्दक अर्थ पर जाएं तो फिल्म उनती बुरी नहीं जितना सच्चाई है। भगवान करे इसी बहाने मुंबई,दिल्ली सहित देशभर में फैली झोपडपट्टियों में रहने वाले लाखों लोगों के दिन फिरे यह मेरी नहीं हर इंसान की दुआ है। क्योंकि तभी सच में भारत की जय होगी।

(ये धारावी की झोपडपट्टी है) फोटो गूगल से

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

सच है.............

नई बस्ती, नये हैं लोग और सब कुछ अलग सा है,
यहां सूरज भी छिपकर के अंधेरे से निकलता है।।
पुराने लोग, चीजें पुरानी और पुराने घर,
शजर बूढे गिराकर के, नया रस्ता संवरता है।।
शहर के कायदे कानून से परिचित नहीं है वो,
तभी हर आदमी के दर्द को अपना समझता है।।

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

दुनिया कहेगी जय हो....

आज महाशिवरात्रि पर भारत के लिए मंगल खबर आ सकती है। सोमवार को पौ फटते ही केदारनाथ से सेतुबंध रामेश्वरम तक 'हर-हर महादेव' की जयकार हो रही होगी तो लॉस एंजिल्स में भारत की जय हो... गूंजेगा। करोड़ों भारतीय ऑस्कर में १० श्रेणियों में नामित 'स्लमडॉग मिलेनियर' से उम्मीदें लगाए बैठे हैं। यह तो सुबह १०.३० बजे तय होगा कि एआर रहमान, गुलजार, रसूल पुकुट्टी सहित स्लमडॉग को ऑस्कर मिलता है या नहीं लेकिन, इस फिल्म ने दुनियाभर में अपना डंका जरूर बजा दिया है।
परिणाम चाहे जो हो लेकिन दुनिया कह रही है भारत की...... जय हो
आमीन............

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

गंगा नदी नहीं....

किसने कहा नदी है, कहता है कौन पानी?
गंगा हमारी मां है, गंगा से जिंदगानी।।

गंगा, इतना सुनते ही इहलोक से परलोक तक संवरने का भास होता है। भागीरथी,गंगा कहें चाहे जो भी पवित्रता वही। 17-02-08 की रात डिस्कवरी चैनल पर गोमुख से बंगाल की खाडी तक गंगा का सफर दिखाया जा रहा था। हिमालय की चोटियों से निकलकर बंगाल तक 2,510 किलोमीटर लंबी यात्र के सभी बडे पडाव दिखाए गए। गोमुख से निकलने वाली गंगा करोडो भारतियों का पालन तो करती ही है उनके मरने के बाद उन्हें स्वर्ग पहुंचाने का भी विश्वास दिलाती है। वैज्ञानिक भी मान चुके हैं कि गंगाजल सामन्य पानी से अलग होता है। कई मायनों में। कभी सडता नहीं हैं,कीडे नहीं पडते और हमेशा ताजा रहता है। पर टीवी प्रोग्राम में जो देखा उससे न केवल आंखे खुल गई वरन आंखे भर आईं। सदियों से जीवन देने वाली गंगा का जीवन संकट में पड गया है। जी हां, जीवनदायिनी गंगा का असि्त्तव संकट में है। कारण है स्वार्थी इंसान। बांध बनाकर गंगा का प्रवाह रोका। नहरे निकालकर गंगा का पानी सोख लिया,शहरों की गंदगी उडेलकर गंगा पतितपावनी गंगा को गंदली बनाया। इसके बावजूद यह रुकने का नाम नहीं ले रहा है। गंगा पर अत्याचार बढता ही जा रहा है। कानपुर में तो गंगा जल आचमन करने लायक भी नहीं रहा है।
कानपुर से इलाहाबाद
2002 में मुझे एनसीसी की ओर से कानपुर से बनारस तक नौका अभियान में शामिल किया गया। तैरना न आने के बावजूद मैं इसमें शामिल हुआ। इलाहाबाद से सडकमार्ग से हम कानपुर पहुंचे थे। वहां से दूसरे दिन एक नाव से हम पांच कैडेट्स, दो नेवी स्टाफ और कमांडिंग अफसर पठानिया बोट से इलाहाबाद की ओर रवाना हुए। जहां तक मुझे याद है हमारी यात्रा गणेश घाट से शुरू हुई थी। वहां पानी का प्रवाह तेज था। यहां से जैसे जैसे कानपुर शहर की ओर बढ रहे थे गंदगी बढती जा रही थी। कानपुर चमडा उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन उसकी कीमत गंगा को चुकानी पडती है। चार बडे नाले टेनरियों की गंदगी को सीधे गंगा में छोडते हैं। जिनमें कैंसर फैलाने वाले केमिकल से लेकर जहरीली राख,चमडे का अवशेष आदि होता है। यहां हमें नाक पर कपडा बांधकर चप्पू मारना पड रहा था। कानपुर के आगे उन्नाव आया। मुझे जो याद है वह यह कि यहां लगभग एक किमी तक की दूरी में हमें करीब 12 इंसानी शव मिले थे जो तैर रहे थे। इन्हें उनके परिजनों ने मृतक के मोक्ष की कामना से गंगा में बहाया था। इनके मोक्ष की तो नहीं जानते लेकिन गंगा जरूर तडप रही हैं। उन्नाव के एक छोटे से गांव के प्राइमरी स्कूल में रात रुकना था। रुके,रात का खाना बनाया,खाया और सो गए। सुबह यहां से चले रायबरेली की ओर रास्ते में एक दो जगह बडी मझलियां दिखाई दीं। सुबह यहां से चले रायबरेली की ओर रास्ते में एक दो जगह बडी मझलियां दिखाई दीं। दोपहर का नाश्ता बोट पर ही होता था। गर्मी के दिन थे। रायबरेली से आगे बढे तो प्रतापगढ की कालाकांकर रियासत पहुंचे। दोपहर में यहीं रुकना था। राजशाही का पुराना महल था। बाहर अहाते में रुके,खाना खाया और पीपल के बडे से दरख्त के नीचे सो गए। पता चला इसी महल में कभी कविवर सुमित्रानंदन पंत रहते थे। यहीं पूनम की रात को नौका विहार करते समय उन्होंने कविता भी लिखी नौका विहार। अगला मुकाम श्रृंगवेरपुर था। वही श्रृंगवेरपुर जहां से भागवान राम ने वन जाते समय गंगा पर की थी। यहीं मिले थे निषादराज केवट। यहां रात रुकना था। एक स्कूल में रात रुके। श्रृंगवेरपुर में पुरातात्तिवक खोज में कुछ पुराने अवशेष मिले हैं। यहां से चले फाफामऊ के लिए जो इलाहाबाद शहर की सीमा है। जिला तो श्रृंगवेरपुर से ही शुरू हो जाता है। फाफामऊ में यूनिट के लोगों ने हमारा स्वागत किया और अपरिहार्य कारणों से हमारी यात्रा यहीं रोक दी गई। सच कहूं तो गंगा का जो रूप मैंने इस यात्रा में देखा वह बहुत दी तकलीफदेह था।
बाद में बनारस में पढाई के दौरान यहां भी गंगा को करीब से देखने का मौका मिला। कई बार अकेले ही राजघाट से अस्सी घाट तक पैदल चला। हर घाट की अपनी कहानी,अपनी मान्यता और अलग खासियत। लेकिन एक चीज हर जगह समान थी वह था प्रदूषण।
मामला गंभीर है
यह सब इसलिए लिखा ताकि कुछ भूमिका बन सके। इंसान गंगा को चाहे जितना प्रदूषित करले लेकिन गंगा मां के प्रति श्रद्धा नहीं कम होगी हां जो गंगा एक नदी के रूप में जरूर विलुप्त हो जाएगी। याद रखें भारत की पहचान गो,गंगा,गायत्री से है। गोवंश पहले ही संकट में है। गंगा का यह हाल है और गायत्री यानी आध्यति्मकता का तब कोई मतलब नहीं रहेगा जब मोक्षदायिनी गंगा ही नह हों। तो सोचिए गंगा को कैसे बचाएं,इसमें हमारा आपका क्या योगदान हो सकता है,जरूर बताएं,चर्चा करें,आगे आएं,क्योंकि गंगा हैं तो हम हैं। बात जारी है............................

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

हर भारतीय के सिर 30,000 कर्ज

लो भइया अब ये नया खुलास हुआ है। अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाने के लिए सरकार जिस तरह बाजार से उधार ले कर निवेश बढ़ाने में लगी है उसे देखते हुए अनुमान है कि मार्च 2010 के अंत तक देश का प्रति व्यक्ति सार्वजनिक भार 30,000 हजार रुपये जाएगा। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के ताजा अनुमानों के अनुसार इस समय 115.4 करोड़ की आबादी वाले इस देश में प्रति व्यक्ति औसत आय 38,000 रुपये है। इस तरह प्रति व्यक्ति कर्ज जनता की दस महीने की औसत इनकम के बराबर है। सरकार पिछले कुछ सालों से हर साल करीब 3,00,000 करोड़ रुपये का उधार ले रही है। मार्च 2010 तक सरकार पर कुल बकाया कर्ज 34,06,322 करोड़ रुपये हो जाएगा जो 7 साल पहले का दोगुना होगा। अंतरिम बजट के अनुसार सरकार 2008 -09 में कुल 2,62,000 करोड़ रुपये का उधार लेने जा रही है।
अब आप भी सोचिए हम भी सोचते हैं।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

कुछ आंखखोलू आंकडे

भारत में तलाक की दर फिलहाल दुनिया में सबसे कम है। इसके बावजूद हर साल हर 100 में से एक शादी तलाक के कारण टूटती है,यानी 1000 में 11 शादियां टूट जाती हैं। 1990 में तलाक का आंकडा प्रति 1000 केवल 7.40 था।
देश में दुष्कर्म के मामले किस तेजी से बढे हैं उसका नमूना इसी से पता चलता है कि 1971 की तुलना में जनवरी 2008 तक रेप के मामले 678% तक बढ गए हैं। यह आंकडे नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने जारी किए हैं।

आखिर कारण क्या है इसका आप भी बताएं और मैं भी खोजता हूं।

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

वैलेंटाइन डे नेशनल फेसि्टवल बने!

पिछले कुछ दिनों से वैलेंटाइन डे की बडी चर्चा है। इस बार तो हद हो गई। वैलेंटाइन डे ड्रामे के लिए महीने भर पहले से ही ड्रामा होने लगा। चुनावों की तरह शांतिभंग की आशंका के चलते कुछ शहरों में कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया। मंगलोर के एक 'नाचीज' को मीडिया ने 'चीज' बना दिया देखते ही देखते प्रमोद मुतालिक संस्कृति के ठेकेदारों का हीरो और अधिकारों की रक्षा का दावा करने वालों, अभिव्यकि्त की स्वतंत्रत का हनन करने की कोशिश में की सो वह रातों रात विलेन बन गया। मंगलोर से म्यूनिख तक। लोगों ने उसे उसकी औकात बाता दी और अभिव्यकि्त आजाद हो गई। इंटरनेट के जरिए एक बहादुर महिला ने मुतालिक के विरोध के लिए 'पिंक चढ्ढी' अभियान शुरू किया। बहुत ही मौलिक अभियान। चल निकाल ये वरोध का तरीका। जिधर देखो उधर 'पिंक चढ्ढी'। दूकानों पर शार्टेज हो गई। ने भी इसका विरोध अपने तरीके से शुरू किया साडी देकर लेकिन जो चड्ढी पर उतर आया हो वह साडी क्या करेगा।
खैर विरोध समर्थन के बीच मनाया गया वैलेंटाइन डे। वैलेंटाइन डे के समर्थक कहते हैं कि वे चाहे जो करें उनकी मर्जी पर इन भगवा गमछे वालों को कौन समझाए कि 'जब मियां बीवी राजी तो क्यों टांग अडा रहे हो भइया जी।' वैसे मेरे दिमाग में एक माइंड ब्लोइंग आइडिया कुलबुला रहा है। चलो आपसे शेयर कर लेता हूं। तो मैं ये कह रिया था कि वैलेंटाइन डे को नेशनड फेसि्टवल घोषित कर देना चाहिए। इस दिन देश में पबि्लक हालीडे भी होना चाहिए। ताकि लोंगों को आजाद होने एहसास हो। आखिर स्वंछंदता ही तो हमारी स्वतंत्रता की पहचान बन गई है। तो जाने दो जिधर जाना चाहते हैं लोग। बहने दो नदी को बिना रोकटोक फिर बाढ आए तो भी क्या। संस्कार के लिए कोई जीना नहीं छोड सकता। मीडिया को वैलेंटाइन डे पर सालभर प्रमोशनल प्रोग्राम चलाने चाहिए। आखिर बाजार भी तो यही चाहता है। वही बाजार जिसने क्रिकेट को तो हिट कर दिया लेकिन हाकी की कीमत पर। इसमें साथ दिया मीडिया ने।
इतिहास में पढा था कि पहले लोग नंगे रहथे थे,नाखून बडे,बाल बडे,कपडे नहीं। जानवरों की तरह खुले में रहते और सारा आचार-व्यवहार जानवरों की तरह ही था। फिर धीरे धीरे विकास की परंपरा में पत्ते और छाल से होते हुए शरीर पर कपडे आए लोगों ने नाखून काटने शुरू किए फिर धीरे धीरे विकास की सडक पर लोग यहां तक पहुंचे। लेकिन अब धीरे धीरे फिर उसी आदिकाल की ओर जा रहे हैं। शरीर पर कपडे कम होते जा रहे हैं और नाखून बढते। कम से कम बंबई-दिल्ली में तो मैंने ही देखा है। खुले आम सडकों पर लोगों को वह करते जो कभी घर के अंदर भी करने में शर्म आती थी। यह हाल पूरे देश का है। हर शहर में कोई न कोई ऐसा पार्क जरूर हैं जो अभिव्यकि्त की स्वतंत्रता के लिए (कु)ख्यात है। इसकी भी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भाई देश का संविधान बालिगों को कुछ भी करने की आजादी जो देता है। ऐसे माहौल में अगर एक दो चांद फिजा की कहानी सामने आ भी गई तो क्या।
ये बाजार की ही तो ताकत है। वैलेंटाइन डे जो प्यार का त्योहार है जिस पर प्यार की चीजों का व्यापार और प्रचार होना चाहिए या फिर नवरात्रि (गरबे) के मौके पर जो देवी आराधना का पर्व है भकि्त का महौल बनाना चाहिए, उन दिनों कंडोम,आईपिल या ऐसे ही अन्य उत्पादों के प्रचार बढ जाते हैं। सुरक्षा का मामला जो है। खैर इसमें बुराई ही क्या है अबार्शन से अच्छा है...। तमाम ऐसी खबरें मीडिया ही देता है कि उन दिनों गर्भपात के मामले बढ जाते हैं। भाई इसमें बुराई क्या है? 26 जनवरी को हम गणतंत्र हुए अधिकारों की गारंटी मिली, जीवन जीने और अपने तरह से जीने की सुविधा भी।
गोली मारिए प्रमोद मुतालिक और उसकी सेना को। दरअसल असली मामला यह है कि 'अंगूर खट्टे हैं।' उनको नहीं मिला होगा तो विरोध कर रहे हैं (कुछ लोग ऐसा भी कहते है।) खैर मैं वैलेंटाइन डे का विरोधी नहीं हूं। वैसे मेरे आइडिया के बाद अगर यह नेशनल फेसि्टवल बना तो यह मेरे सुझाव और मौलिक आइडिया की जय होगी....

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

मर्यादा तार-तार

फिर मर्यादा तार तार हो गई। एक ही दिन में दिल्ली से लेकर लखनऊ तक। दिल्ली दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का सबसे बडा मंदिर जहां है और दूसरी ओर लखनऊ इस सबसे बडे लोकतंत्र का सबसे बडा राज्य। दिल्ली में जब सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बडी कथित स्वतंत्र जांच एजेंसी सीबीआई को सरकार के इशारे पर काम करने के आरोप में फटकार लगा रही थी ठीक उसी समय लखनऊ में राम मनोहर लोहिया के स्वघोषित उत्तराधिकारी विधानसभा में लोकतंत्र का चीरहरण कर रहे थे। स्वघोषित उत्तराधिकारी विधानसभा में लोकतंत्र का चीरहरण कर रहे थे। यह उप्र के लिए पहला मामला नहीं था। 1997 में तो सारी हदें टूट गई थीं। माइक उखाडकर मार की थी 'माननीयों'ने। कई मंत्रियों के सीर फूटे थे। इसकी निंदा हुई लेकिन फिर सबकुछ वैसा ही जैसा 12 साल पहले हुआ था।
मुलायक के पट्ठे सदन में पिले रहे। विस अध्यक्ष बार-बार चिल्लाते रहे, राज्यपाल खडे थे,नेता सदन और नेता प्रतिपक्ष दोनों सदन में मौजूद थे। धिक्कार है इन नेताओं को। जिस संविधान पर हाथ रख इसकी रक्षा करने का संकल्प लिया उसी संविधान सभा में खुलेआम उसके साथ दुष्कर्म किया। बेशर्मी की हद ये कि सपा के गुंडे इसे सरकार का विरोध बता रहे हैं। बसपा प्रमुख को तो सीधे धन से मतलब है, फिर चाहे जन्मदिन के बहाने चंदा हो या पार्टी फंड के लिए सहायता। एक इंजीनियर की हत्या में विधायक अभी भी बंद हैं। सारे बाहुबली बहन जी की शरण में हैं। मुलायम भी कम नहीं थे। सपा की गुंडागर्दी से त्रस्त होकर के ही जनता ने बसपा को जिताया था लेकिन कुर्सी पर बैठने वाले तो बदले पर उनका व्यवहार नहीं।
आजादी के आंदोलन और उसके बाद लंबे समय तक उप्र देश की राजनीति को दिशा देता रहा है। वह तो अब भी जारी है,क्योंकि यूपी के सहयोग के बिना दिल्ली की कुर्सी मिलना मुशि्कल है। लेकिन यूपी खुद दिशाहीन हो गया है। उसकी पहचान पिछडे, जातिवादी राज्य के रूप में हो गई है। आज मेरे लिखने मकसद सिर्फ इतना है कि मैं नेताओं को बता सकूं कि अंग्रेजों को उखाड फेंकने की लडाई यूपी से ही शुरू हई थी। मंगल पांडेय,आनंद भवन,बागी बलिया,चौरीचौरा सब यहीं पर ही है। माननीयों अगर जनता अपने पर उतर आई तो आपको भागने के लिए जमीन नहीं मिलेगी। इसी यूपी में इंदिरा गांधी को भी हार का सामना करना पडा था तो आप किस खेत की मूली हो। सुधर जाइए। अब अगर कोई भगत सिंह पैदा हुआ तो वह असेंबली क्या करेगा आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते। अपनी नौटंकी बंद कीजिए। आपको देश चलाने के लिए भेजा गया है, नेता जी को बचाने के लिए नहीं। वैसे जनता सब समझती है बस बोलती नहीं जिस दिन बोलने लगी शिव की तीसरी आंख खुलने जैसा ही होगा।


शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

अटलजी बीमार हैं

अटल जी बीमार हैं। इस एक खबर पर देशभर की निगाह है। हो भी क्यों न आजादी के बाद के भारत में इतना विशाल व्यकित्तव किसी राजनेता का नहीं रहा है। अटलजी से संपूर्ण भारत का बोध होता है। गंगा की धारा सी मुस्कान,हिमालय सी अटल और गंभीर वाणी जो हर किसी का मन मोह ले। बचपन से अटलजी को सुनता,पढता आ रहा हूं। तब गांवों में टीवी और रेडियो का इतना संचार नहीं था। फिर भी याद है जब अटलजी का भाषण आना हो गांव भर में चर्चा हो जाती थी। समय पर सब टीबी वाले मिश्र जी या रेडियो रखने वालों के घर पहुंच जाते थे। फिर मत पूछिए, लोग उतनी ही श्रद्धा से अटल जी को सुनते थे जितनी श्रद्धा से रामायण देखते थे। आवाज का जादू ऐसा की सब बंधकर रह जाते। भाषण खत्म होती तो लोगों की चर्चा शुरू हो जाती
सब को अटलजी के भाषण में देश की सारी समस्याओं का समाधान दिखता। गांधीजी और नेताजी से तुलना नहीं हो सकती लेकिन आजाद भारत में अटलजी जैसा वक्ता कोई नहीं। जिनके भाषणों के कायल नेहरू,इंदिरा से लेकर आजतक के नेता हैं। जब उनका इलाहाबाद या आसपास कहीं उनका भाषण होता तो लोग अपने साधन से उन्हें सुनने जाते थे। निर्विवाद और सर्वमान्य छवि। उनका ही कमाल है कि जयललिता और करुणानिधि एक साथ बैठे। यह कमाल सोनिया जी भी नहीं कर पाईं।
भगवान करे कि भारतीय राजनीति का यह नक्षत्र दीर्घायु हो। आमीन....

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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