राज और समाज पर खरी आवाज

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गुरुवार, 29 जनवरी 2009

यह अपनी संस्कृति तो नहीं

मंगलोर के पब में हमला, महाराष्ट्र में भोजपुरी गाना गा रहे स्कूली बच्चों पर हमला। दोनों घटनाएं गणतंत्र दिवस के आसपास। एक ने राम नाम पर सेना बनाकर लडकियों और उनके साथ गए लोंगों को कूटा तो महाराष्ट्र में शिव के नाम पर राजनीति कर बडे हुए राज ठाकरे के गुंडों ने उन्हीं शिव के धाम (काशी सहित भोजपुर) की भाषा बोलने वालों पर ताकत दिखाई। राम और शिव के नाम पर अपनी पहचान बनाने में लगे या बना चुके इन लोगों को यह पता राम ने हमेशा नारी शकि्त का सम्मान किया और शिव ने तो जीव मात्र के कल्याण के लिए विष पान कर लिया। अब इनके नाम पर लोगों को पीटने वालों को कानून और इंसान से भले डर न लगे लेकिन भगवान से तो डरना चाहिए। संस्कृति की दुहाई देने वाले ठेकदारों को कम से कम यह तो सोचना चाहिए कि वहीं भारतीय संस्कृति नारियों को पूजती है। उन गुंडों का हाथ उठा कैसे होगा? माना पब कल्चर हमारा नहीं, ये भी माना कि इसके कुछ दोष भी होंगे लेकिन सवाल यह है कि इसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? मेरे हिसाब से उन गुंडों की तो नहीं। खुद जींस की पैंट, टीशर्ट पहनकर किसी को अंग्रेजी गाने सुनने से रोकना कहां की संस्कृति है। भारतीय संस्कृति तो कम से कम ऐसा नहीं सिखाती।
चलते हैं महाराष्ट्र, राज ठाकरे पिछले एक साल से चर्चित लोगों में से रहे। यूपी, बिहार के भइयों का विरोधकर अपने लिए राजनीतिक जमीन तलाश रहे राज समय तो कभी माफ नहीं करेगा लेकिन तब तक कहीं देर न हो जाए। महाराष्ट्र केवल उनका नहीं है। देश का संविधान और मानवता का सार्वभौम कानून किसी को कहीं जाने से नहीं रोकता फिर राज की क्या बिसात?
वैसे राज से मेरा कोई विरोध नहीं है,लेकिन उनके विनाशक विचार का विरोधी जरूर हूं। उनकी अपनी मजबूरियां भी हैं। शिवसेना से निकने के बाद नई पार्टी बनाई लेकिन कोई करिश्मा नहीं कर सके। अब तक वे जमीन की तलाश कर रहे हैं। मैं उनसे मिलना चाहता हूं। उनसे बात करना चहता हूं। हो सकता है कि मैं उनकी मदद कर सकूं। लेकिन मेरा रास्ता वो नहीं है जिसपर अभी वे चल रहे है। राज अपने चचेरे भाई उद्धव से बेहतर नेता थे और आगे भी बेहतर बन सकते हैं। बस अपना रास्ता बदल दें। राजनीति में पुरानी पीढी अब जाने को है। इस लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा, कांग्रेस के पुरानी पीढी के लोग संन्यास लेना शुरू कर देंगे यहा फिर उन्हें विदा ही होना पडेगा। राजनीति में नए लोगों की जरूरत होगी, राज अगर सुधर जाएं तो जनता भी उन्हें स्वीकार कर सकती है।
(मेरा राज से कांटेक्ट नहीं है लेकिन अगर आप में से कोई उनका परिचित हो तो मेरा जिक्र उनसे जरूर करिएगा। हो सके तो मेरी बात भी कराइएगा। या आप ही समझाइएगा। हो सकता है कुछ बदल जाए।)

रविवार, 25 जनवरी 2009

ताकि सनद रहे....

ये हमारे अपने संविधान की प्रस्तावना है। कम से कम आज के ही दिन इसको देख-पढ तो लें क्योंकि हम सब भूल गए हैं.....

प्रधानमंत्री ; कार्यकाल में पहुंचे अस्पताल








जवाहर लाल नेहरू
देश के पहले प्रधानमंत्री को जनवरी 1964 में हार्ट अटैक आया। इलाज के बाद वे इस पद पर बने रहे। 27 मई को उनका निधन हुआ।

लाल बहादुर शास्त्री
नेहरू के निधन के बाद शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने। 1964 में उन्हें भी हार्ट अटैक आया। उन्हें आराम की सलाह दी गई। इसके कारण उन्हें अपनी लंदन यात्रा रद्द करनी पडी। प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में उनके स्थान पर टीटी कृष्णामचारी और इंदिरा गांधी को भेजा गया।

पीवी नरसिम्हा राव
1991 से 1996 तक प्रधानमंत्री रहे। राव भी दिल के मरीज थे। इसके चलते उन्हें समय-समय पर डाक्टरों की सलाह लेनी पडती थी। 1991 में उनकी अमेरिका में बायपास सर्जरी हुई।

अटल बिहारी वाजपेयी
नवंबर 2000 में अटल जी के घुटने का आपरेशन हुआ। उनकी सर्जरी मुंबई के ब्रिचकैंडी अस्पताल में डाक्टर चितरंजन राणावत ने किया।

मनमोहन सिंह
अब मनमोहन को बायपास सर्जरी के लिए एम्स जाना पडा। 25 जनवरी को एम्स दिल्ली में उनका आपरेरशन हुआ। आपरेशन कामयाब रहा और प्रधानमंत्री के दिल के सारे अवरोध दूर हो गए। मनमोहन की 1990 में भी बायपास सर्जरी, 2004 एंजियोग्राफी, 2005 में कलाई का आपरेशन, 2007 में प्रोटेस्ट ग्रंथि का आपरेशन और 2008 में मोतियाबिंद का आपरेशन हुआ था।

शनिवार, 24 जनवरी 2009

बेटी बचाओ

बलाएं कौन फिर बांधकर राखी उतारेगा...
अगर मां कोख में आई हुई बचची गिरा देगी।।
बेटी को आने दें, नहीं मानवजति संकट में पड जाएगी।

सेहत से हारकर सौंपा उत्तराधिकार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बीमार हैं। उनकी बायपास सर्जरी होनी है। उनकी जगह प्रणब दा को कामचलाऊ पीएम बनाया गया है। मनमोहन की सेहत से जुडे इस घटनाक्रम के बहाने सियासी अटकलें भी तेज हो गईं हैं। इनमें से एक यह कि लोकसभा चुनाव के बाद मनमोहन "स्वास्थ्य कारणों" से पीएम पद की दावेदारी से हट सकते हैं।
इधर, प्रणब दा भले ही कामचलाऊ पीएम बन गए हों लेकिन मनमोहन के उत्तराधिकारी के तौर पर राहुल का ही नाम चर्चा में सबसे आगे है। प्रणब दा खुद राहुल को पीएम बनाए जाने की बाते करते रहे हैं। दरअसल, भारतीय राजनीति में रिटायरमेंट और संन्यास की परंपरा भले ही न हो लेकिन स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर होने और दूर किए जाने के कुछ उदाहरण तो हैं ही, जिसके बाद सत्ता का सरल स्थांतरण हो सका।

नंबूदरीपाद- हरकिशन सिंह सुरजीत - प्रकाश करात
1992 में ईएमएस नंबूदरीपाद ने खराब सेहत के कारण माकपा महासचिव का पद छोडा तो सुरजीत को पार्टी की कमान मिली। सुरजीत ने 2005 में 89 साल की उम्र में सेहत के नाम पर ही यह पद करात को सौंप दिया।

कांशीराम- मायावती
दलित राजनीति के अगुआ और बसपा संस्थापक कांशीराम 2004 में बीमारी के चलते सक्रिय राजनीति से दूर हुए तो दोबारा राजनीति में नहीं आ सके। 9 अक्टूबर 2006 को निधन से पहले तक वे मायावती के संरक्षण में रहे। माया को उन्होंने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

अलट बिहारी वाजपेयी - लालकृष्ण आडवाणी
50 सालों से अधिक के साथी रहे अटल आडवाणी का मामला भी कुछ ऐसा ही है। 1998 में वाजपेयी के पीएम बनने पर आडवाणी गृहमंत्री बनें। बाद में घुटने का आपरेशन कराने के बाद अटल जी ने आडवाणी को उप प्रधानमंत्री बनाया। 2004 में राजग के सत्ता से बाहर होने पर वाजपेयी की सक्रियता कम हुई। सेहत के साथ न देने से आडवाणी को अटल जी का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। अब आडवाणी जी पीएम पद के उम्मीदवार हैं।

ज्योति बसु -बुद्धदेव भट्टाचार्य
भारतीय इतिहास में सबसे लंबे समय तक सीएम रहे बसु बाबू ने सेहत का हवाला देकर 6 नवंबर 2002 को 80 साल की उम्र में सीएम की कुर्सी भट्टाचार्य को सौंप दी। बसु बाबू 21 जून से लगातार पशि्चम बंगाल के सीएम रहे।

बाल ठाकरे- उद्धव ठाकरे
बाल ठाकरे ने हालांकि कोई चुनाव कभी नहीं लगा लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में हमेशा चर्चा में रहे। शिवसेना की स्थापना की और 2004 तक पार्टी के सर्वेसर्वा रहे। 78 साल की उम्र में सेहत को कारण बताकर बडे बेटे उद्धव को पार्टी की कमान सौंप दी।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

नेताजी को नमन

आज भले नेता शब्द गाली बन चुका है
लेकिन, एक नेता की स्मृतियां हमें बताती हैं कि नेता होना कितना कठिन है और
नेता होना दरअसल
होता क्या है।
जी हां! एक ऐसे महामानव जो आज भी नेता के रूप में पूजे जाते हैं...
सुभाष चंद्र बोस।
शत शत नमन....

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

धर्मनिरपेक्षता

'हो सकता है कि मेरे पिता इस फैसले पर दुखी होते, पर मैं उन्हें मना लेता। मुझे लगता है कि धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के विच्हार एक जैसे हैं। मुझे लगता है इसी लिए दोनों पार्टियों में गठबंधन हुआ है।'
(ये बोला है संजय दत्त ने।)
संजू बाबा धर्मनिरपेक्षता के मायने पता है?

बुधवार, 21 जनवरी 2009

'मुल्ला' का कल्याण

उत्तर प्रदेश की गलियों में कभी एक नारा गूंजा करता था 'कल्याण सिंह कल्याण करो, मंदिर का निर्माण करो।' 1991 में उप्र विधान सभा चुनाव में एक हीरो बनकर उभरा वह थे कल्याण सिंह। पहली बार भाजपा की अकेले के दम पर सरकार बनी और बाबरी मसि्जद गिरी। 6 दिसंबर को उधर अयोध्या में बाबरी शहीद हो रही थी और लखनऊ में कल्याण सरकार। फिर क्या था अटल, आडवाणी और डा. जोशी के बाद उप्र में कोई नाम था तो कल्याण का था। भाजपा और कल्याण को गरिया कर राजनीति करते थे मुलायम सिंह यादव। दोनों के बीच दुआ-सलाम तक नहीं थी। कल्याण ने तो मुलायम सिंह को 'मुल्ला' मुलायम तक कह दिया। राजनीति की रेखागणित में 180 अंश के विरोधी कल्याण और मुलायम अब 0 अंश पर एक साथ हैं। जो किसी ने कभी सोचा भी नहीं था वह हो गया। शायद इसीलिए लोग कहते हैं कि भारतीय राजनीति में कुछ भी संभव है। धन्य हो भारतीय लोकतंत्र।
भाजपा छोडते समय कल्याण सिंह ने कहा कि वे पार्टी में हो रही अपनी बेइज्जती अब बरदाश्त नहीं कर सकते। कल्याण एक बार पहले भी भाजपा छोड चुके हैं। तब कई सालों बाद उनकी घर वापसी हुई थी। घर वापसी पर अटल के गले लग
कल्याण रोए भी थे। हम उन्हीं कल्याण की बात कर रहे हैं जिन्होंने उप्र की राजनीतिक में एक फूल (कमल) को खिलाने में अपनी आधी उम्र बिता दी और एक फूल (कुसुम) के चक्कर में अपनों के से बेगाने हो गए। भद्द पिटी। अब जब कुसुम को भाजपा ने राज्यसभा में भेद दिया तब कल्याण ने पार्टी क्यों छोडी? आखिर उन्हें जरूरत क्यों पडी भाजपा छोडने की, छोडी तो ठीक सपा में जाने की मजबूरी क्यों ?
दरअसल, कल्याण राजनाथ के विरोधी रहे है। राजनाथ ने उन्हें भले उपाध्यक्ष बनाया हो लेकिन उनकी अनदेखी की जा रही थी। दूसरी ओर अशोक प्रधान के टिकट का मामला था। अजित चौधरी से भाजपा की नजदीकियां भी कल्याण को नहीं भा रही थीं। इन सब के साथ ही बेटे राजबीर के लिए राजनीति के अखाडे की जमीन भी तैयार करनी थी। भाजपा भी इन्हें ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं दिख रही थी। ऐसे असि्त्तव बचाए रखने के लिए उन्होंने भाजपा छोड दी। अब भाजपा छोडी तो ठीक, लेकिन सपा में जाना समझ नहीं आया।
पहली बार जब कल्याण भाजपा से निकले तो अपनी पार्टी बनाई, 'राष्टीय क्रांति पार्टी' लेकिन क्रांति तो दूर पार्टी कल्याण का भी कल्याण न कर सकी। चार विधायक जीते। ऐसे में कल्याण यह जान गए थे पार्टी खडी कर कुछ कर पाना उनके बस में नहीं। वैसे गोविंदाचार्य, उमा भारती, बाबूलाल मरांडी,खुराना का हश्र भी वे देख चुके थे ऐसे में नई पार्टी बनाना उनके बस में नहीं था। अब जाएं तो कहां? कांग्रेस बाबरी विध्वंशक को लेती नहीं। बसपा प्रमुख मायावती को कल्याण बरदाश्त नहीं हैं। बाकी बची सपा,सो उधर ही चल दिए। सपा भी अपने को मजबूत करने में लगी है। यहां भी पहुंचे अमर सिंह। कल तक जिन कल्याण को फूटी आंख नहीं देख सकते थे,जाकर उनका पैर छुआ तो कल्याण भी गदगद हो गए और अमर को 'चाणक्य' की उपाधि दे डाली (कल्याण जी अमर को चाणक्य कहकर आपने एक महान विभूति का अपमान किया है)
भाग दो.....
.....अपमान तो जनता की भावनाओं का भी होगा। कल्याण जी क्या कहकर जनता से वोट मांगेंगे कि भाजपा सांप्रदायिक पार्टी है? और मुलायम जी आप बडे भाई कल्याण का कैसे परिचय कराएंगे कि ये हैं बाबरी विध्वंशंक.....? नेता जी बहुत समझदार हो गई है। अखाडे में आपके चित्त किए पहलवान तो फिर उठ जाते रहे होंगे लेकिन जनता जिसे धोबी पछाड लगाती है वह दोबारा उठ नहीं पाता। खैर जो पहले से ही गिरे हों उन्हें उठने की क्या जरूरत?
बात जरूरत की चली तो कांग्रेस का भी जिक्र कर लें। अब उप्र में उसकी सपा से दोस्ती रहना संदिग्ध हो गया है।
सपा से दोस्ती कांग्रेस की जरूरत है तो कल्याण का विरोध उसकी मजबूरी। मुसि्लम वोटों की बात है, खिसक गए तो क्या होगा। वहीं कांग्रेस भी सपा की मजबूरी है। माया से दुश्मनी निभानी है तो साथी चाहिए। कल्याण सपा के लिए कितने फायदेमंद रहेंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन भाजपा को कुछ नुकसान जरूर पहुंचाएंगे। 'कुछ' इसलिए कहा क्योंकि फिलहाल उप्र में भाजपा ने 9 सीटें जीती है। उनमें से एक अटल जी की लखनऊ सीट भी है। अब अटल जी नहीं लडे तो वहां भी भाजपा की जीत आसान नहीं होगी। आसान तो कुछ भी नहीं है। न मनमोहन का फिर से प्रधानमंत्री बनना, न अडवाणी का सपना पूरा होना।

सोमवार, 19 जनवरी 2009

मनमोहन का डीएल

आज चैनलों ने एक ब्रेकिंग न्यूज चलाई- प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह अपना ड्राइवरिंग लाइसेंस रिन्यू कराने खुद सपत्नीक आरटीओ आफिस पहुंचे। बडी बात कि खुद पीएम साहब अपना काम करवाने पहुंचे। बाकायदा फोटो खिंचवाई, फार्म भरा और आधे घंटे में सारी औपचारिकता पूरी करके डीएल लेकर चले गए। क्या यह सचमुच बहुत बडी बात है या फिर इसे बडा बनाने की कोशिश की गई है। किसी बडे विचारक ने कहा था कि जो हमारा काम उसे अगर हम उसे करते हैं तो कोई महानता नहीं है।
वैसे भी पीएम साहब अब खाली चल रहे है। पार्टी का सारा काम मैडम संभाल रही हैं। बाकी बची सरकार तो प्रणब दा, चिदंबरम जी संभाल रहे हैं। अपने पीएम साहब तो बोलते भी बहुत देर से हैं। उनकी भी कोई गलती नहीं, अच्छा करेंगे तो मैडम के खाते में बुरा हो तो गाली खाएं मन्नू भइया। ऐसे में उनके पास चुप रहने के अलावा कुछ और नहीं। क्या करें? जब तक मैडम की दया है कुर्सी पर हैं। जब राहुल बाबा का मन किया कुर्सी उनकी। अब तदर्थ कुर्सी के लिए क्या करना?
वैसे इस खबर से एक बात अच्छी हो गई। अब अगर जरूरत पडी तो पीएम साहब खुद गाडी चलाकर मौके पर पहुंच जाएंगे। बात अभी जारी है...

शनिवार, 17 जनवरी 2009

खलनायक से मुन्नाभाई

भारतीय सिनेमा की एक हिट फिल्म है खलनायक'। यह फिल्म इसलिए भी यादगार बन गई क्योंकि इसका जो हीरो था वह बाद में सचमुच का खलनायक निकला। जी हां, हम बात कर रहे हैं संजय दत्त की। वही संजय जो महान कलाकार और राजनेता सुनील दत्त और नरगिस दत्त के बेटे हैं। मुंबई दंगों के समय एके 47 रखने के मुजरिम संजय, जिन्हें भारतीय न्यायपालिका ने छह साल की सजा सुनाई है। वही संजय जिनकी बुरी आदतें छुडाने के लिए उनके पिता को उन्हें विदेश तक भेजना पडा। वही संजय जो मान्यता के पति भी हैं। जी हां, संजय दत्त जिन्हें समाजवादी पार्टी ने चुना है अटल बिहारी वाजपेयी की सीट से चुनाव लडाने के लिए। खैर उनका चुनाव लडना तो कोर्ट के फैसले पर निर्भर है लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि अगर संजय को लडने की अनुमति मिलती है तो अबू सलेम को भी मिलनी चाहिए और भारतीय जेलों में बंद हजारों-हजार सजायाफ्ता लोगों को भी अनुमति मिलनी चाहिए।
देश का आम आदमी से अगर देशी लिए कट्टा पकडा जाए तो उसपर रासुका, गैंगेस्टर लगेगा और जाने कैसी-कैसी सजाएं दी जाएंगी लेकिन इनके लिए तो कानून मजाक है। इनको जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है फिर संजय दत्त को क्यों नहीं ? जब जो चाहा सो किया, फिर राजनीति में उतर गए। अब राजनीति में उतरे तो सौ खून माफ। संजू बाबा! हमें रत्नाकर डाकू भी याद है और जयचंद भी। रत्नाकर को बाल्मीकि बनने पर हमने पूजा लेकिन देश के साथ गद्दारी करने वाले को कभी माफ नहीं किया, फिर चाहे जो हो।
बाबा! खलनायक से मुन्नाभाई बनने में कई साल गुजर गए। जनता सब समझती है। यह रुपहला पर्दा नहीं, लखनऊ की सडके हैं। आप आज जो हैं उसमें आपके पिता और बहन प्रिया का बहुत बडा हाथ है। संयुक्त राष्ट्र के सद्भावना दूत भी आप यूं ही नहीं बन गए। कलाकार के रूप में मैं भी आपका सम्मान करता हूं, लेकिन नेता के रूप में आपके खिलाफ हूं, कारण यह नहीं कि मैं किसी दूसरी पार्टी का समर्थक हूं, बलि्क इसलिए कि आप देश के गुनहगार हैं। आप ये मत भूलिएगा कि लोगों को मुन्नाभाई पसंद है, लेकिन खलनायक भी याद है।

संजू बाबा! आपको फ्लैशबैक में ले जाना चाहता हूं। किसी जमाने में अमिताभ बच्चन भी राजनीति में उतरे थे। जितने आप अमर सिंह खास हैं उससे ज्यादा खास अमित जी राजीव गांधी के थे। बच्चन इलाहाबाद से चुनाव लडे और जिनको हराया वह उस समय देश की राजनीति में सबसे ज्यादा सम्मानित हसि्तयों में थे। जी हां, हेमवतीनंदन बहुगुणा जी को। बहुगुणा जी का इलाहाबाद में बहुत सम्मान था, लेकिन जीते अमिताभ बच्चन। यहां तक तो ठीक था, लेकिन अमिताभ बच्चन ने सिर्फ दो साल में ही इस्तीफा दे दिया उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। फिर बच्चन जो राजनीति से गए तो आज तक लौटकर नहीं आए। आए, तो अमर अमर सिंह के एहसान का बदला चुकाने। लेकिन बिग बी इस बार भी ऐसा फंसे कि जेल तक जाने की नौबत आ गई, भला मनाईए कानूनी दांवपेंचों का, बच गए। जया जी की कितनी फजीहत हुई किसी से छिपी नहीं है। अमर सिंह के एक और साथी हैं अनिल अंबानी। कभी दांतों काटी रोटी खाने वाले मुकेश-अनिल में पिता की मौत के बाद अलगौझी नहीं हुई लेकिन...खैर कम कहना ज्यादा समझना अच्छा होता है। चलते-चलते एक बात और, अगर अमिताभ बच्चन केवल सपा के होकर रहते तो देश के भी शहंशाह होते।
याद रखिए संजू बाबा! अमर के ही चलते पुराने समाजवादी - दिग्गज बेनी बाबू, जनेश्वर जी को मुलायम सिंह ने साइड कर दिया। खुद मुलायम जो खांटी नेता माने जाते थे जमीन से जुडे हुए धरती पुत्र। उन मुलायम को अब लोग सपा लिमिटेड कंपनी का सीईओ कहते हैं। जिसके फाइनेंसर अनिल अंबानी और सहारा जैसे लोग हैं, जिस कंपनी के सबसे सबसे बडे शेयर होल्डर अमर सिंह हैं और अमिताभ सपरिवार जिसके ब्रांड एंबेसडर हैं।
संजू बाबा भगवान करें कि आप 100 साल तक हिट फिल्में देतें रहें आपको दादा साहब फाल्के और आस्कर मिले, आप करोडो लोगों के दिलों पर राज करें लेकिन देश पर नहीं। क्योंकि गलती गलती होती है भले ही वो गलती से की जाए और आप मुन्नाभाई होने से पहले खालनायक हैं और देश के गुनहगार भी।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

बचकर रहना

आज सुबह अखबार खोला तो एक कार्टून देखा सच मानिए बहुत देर तक इस बारे में सोचता रहा। कैसे बिना कुछ कहे कलाकार ने बहुत कुछ कह दिया है। सोचिए अगर लालू यादव, अमर सिंह, आडवाणी, मायावती, उमा भारती राजनीति छोड दें तो अखबारों और टीवी चैनलों को खबरें कैसे मिलेंगी। आज ज्यादा लिखने का मन नहीं है, इसलिए ये कार्टून और उसका लिंक पेश कर रहा हूं। आप को भी अच्छा लगेगा ये गारंटी है

ये कार्टून दैनिक भास्कर अखबार में 16 जनवरी 2009 को प्रकाशित हुआ।

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

अमरवाणी-आडवाणी-अंबानी

फिलहाल राजनीति के अखाडे में दो खबरें चर्चा में है। एक तो संजू बाबा का चुनाव लडना दूसरा मोदी को प्रधानमंत्री बनने का शिगूफ। एक खबर तो खुद अमर सिंह ने पैदा की और दूसरे के पीछे भी वही लगते हैं। अमर ने संजय को लखनऊ से चुनाव लडाने की घोषणा की तो दूसरी ओर उनके अभिन्न मित्र अनिल अंबानी ने अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का शिगूफा छोड दिया। जिसके बाद भाजपा में हडकंप मचा हुआ है। हालांकि पार्टी ने साफ कर दिया है कि प्रत्याशी तो आडवाणी ही होंगे। वैसे भी मोदी के नाम पर एनडीए घटक दलों में सहमति बनना आसान नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे संजय दत्त का चुनाव लडना अभी तय नहीं है लेकिन अमर ने शिगूफ छोड दिया। लखनऊ की सीट इसलिए भी खास है क्योंकि इसका प्रतिनिधत्व पिछले कई चुनावों से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी कर रहे हैं। मुसि्लम मतदाताओं की बहुलता के बावजूद अटल जी इस सीट से भारी अंतर से जीतते रहे हैं। कांग्रेस, बसपा और सपा उनके खिलाफ कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं उतार पाई जो उन्हें टक्कर दे सके। अब बसपा ने पूर्व कांग्रेसी अखिलेश दास को उतारा है तो सपा ने संजू को लडाने की घोषणा की है। हालांकि भाजपा ने अब तक अटल जी के चुनाव न लडने की सूरत में अपना प्रत्याशी नहीं घोषित किया है। अमर ने कहा था कि अगर संजू को कोर्ट ने लडने की अनुमति नहीं दी तो उनकी पत्नी 90 मान्यता लखनऊ से लडेंगी। राममनोहर लोहिया के चेले मुलायम को ऐसा कोई समाजवादी नहीं मिला जो लखनऊ से ताल ठोक सके। खैर ये भी समाजवाद है। देखना ये है कि अटल का जादू चलेगा या मुन्ना भाई की झप्पी।झप्पी तो अंबानी ने भी दी है, मोदी को। अब पता नहीं उनसे अमर भइया ने कहलवाया या वे खुद बोले। खुद बोले तो अमर नाराज हो जाएंगे लेकिन अमर ने बुलवाया तो लगता है अडवाणी जी की मुसीबतें बढ जाएंगी। 50 साल की मेहनत के बाद पीएम की कुर्सी की दौड में शामिल हुए आडवाणी पर अन्य आरोप चाहे जो लगें लेकिन उनकी ईमानदारी बेदाग रही है। वैसे गोधरा और गुजरात दंगों को छोड दें तो मोदी भी बुरे नहीं हैं लेकिन आडवाणी के सामने उनका कद अभी छोटा है। आडवाणी के बाद वाली कतार में वे जरूर सबसे आगे हैं। आडवाणी जी के लिये ये दौड फाइनल है अबकी चूके तो अगले फाइनल तक वे ओवरएज हो जाएंगे। अगर उन्हें पीएम बनना है तो बिखरे परिवार को एकजुट करना होगा और परिवार बढना भी।

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

दागी राजू, जागी जनता, बागी बाबा

आज कई दिनों बाद लिखना हो रहा है। मसले तो कई आए लेकिन खबरें बनाने, लगाने में ही उलझा रहा। बात सत्यम से शुरू करते हैं। अपना इस इलाके में ज्यादा दखल नहीं है। फिर भी इस खुलासे से फायदा किसका हुआ यह तो वही जाने लेकिन नुकसान देश का हुआ है। वैसे भी इज्जत एक बार चली गई तो कुछ नहीं

इज्जत तो शीबू सोरेन की भी गई। राजनीति के आखाडे के धुरंधर गुरु सोरेन को राजा पीटर ने धूल चटा दी। खास बात यह कि राजा ने झारखंड के मुख्यमंत्री को हराया। जिस कुर्सी को पाने के लिए सोरेन ने सौदेबाजी से लेकर सबकुछ किया वह कुर्सी राजा के एक झटके से चली गई। झारखंड मुकि्त मोर्चा घूस कांड और कई आपराधिक मामलों के आरोपी सोरेन को हराने वाले राजा संत तो नहीं लेकिन इतना जरूर है कि जनता ने गुरु जी को उनकी औकात जरूर बता दी। गुरु जी ने भी बी रामलिंगा राजू की तरह ही इस्तीफा दे दिया। अब केंद्र की कांग्रेसनीत यूपीए सरकार बचाने में लगी है। हैदराबाद में सत्यम को और रांची में सरकार

हो सकता है सत्यम की ही तरह कांग्रेस झारखंड में भी कोई 'सरकारी संकटमोचक' भेज दे। क्योंकि जरूरी है बचना। चाहे सरकार हो या कंपनी।दूसरा मसला यह है कि अगर बांगवां ही चमन उजाडने पर लग जाए तो क्या होगा। राजू ने सत्यम की नींव रखी और उसे 53000 हजार कर्मचारियों का विशाल परिवार बनाया लेकिन डुबोया भी खुद ही ऐसा क्यों यह तो समय बताएगा, लेकिन सबक जरूर मिल गया। झारखंड को अलग राज्य दर्जा दिलाने के लिए सोरेन ने भी बहुत संघर्ष किया है।
संघर्ष की बात चली है तो भैरों बाबा की चर्चा जरूर होगी। पुलिस हवलदार से देश का उपराष्ट्रपति बनने तक का सफर आसान नहीं होता। भाजपा के संस्थाकों में से रहे भैरों सिंह शेखावत जी अब भाजपा की सफाई में जुटे हैं। उन्होंने बताया है कि पार्टी में बहुत भ्रष्टाचार हो गया है।

समझ में यह नहीं आ रहा कि बाबा बगावत पर क्यों उतर आए हैं। आखिर गंगा नहाने के बाद कुएं पर नहाने की जरूरत कैसे आ गई। वैसे शेखावत का कहना भी सही ही है कि गंगा नहाने के बाद भी नहाना मना नहीं है। फिर राष्ट्रपित का चुनाव हारे भी बहुत दिन हो गए हैं, अब नहाने का मन कर गया तो क्या बुरा है। फिर बाबा ठहरे संघर्षशील आदमी। खाली बैठें कैसे। सो निकल पडे हैं सफाई करने। यह तो तय है कि निकले हैं तो सफाया जरूर करेंगे, चाहे गंदगी साफ हो या पार्टी।सफाई के पक्ष में तो मैं भी हूं। शुरुआत तमाड की जनता ने गुरुजी को साफ करके कर दिया है। अब बारी राजू की है। अगर राजू ने गलत किया है तो उनकी भी सफाई होनी चाहिए। रही बात भाजपा की तो चाल, चरित्र, चेहरा का नारा देने वाली भाजपा और स्वच्छ छवि, सक्षम नेतृत्व का दावा करने वाले भाजपाइयों को आत्ममंथन करना होगा। आखिर शेखावत भाजपा के पितृ पुरुष

भाजपा ही नहीं, सोचना उन सब को होगा जो 'सत्यमेव जयते' की गूंज को अनसुनाकर असत्य की जय-जयकार करने में लगे हैं। क्योंकि सत्यम के भ्रष्टाचार ने राजू को, तमाड की जागी जनता ने गुरुजी को और बागी भैरों बाबा ने भाजपा को बता दिया है कि जीत सत्य की होती है।

शनिवार, 3 जनवरी 2009

जंगलराज और रामराज

उत्तर प्रदेश की दो खबरें इन दिनों खासा चर्चा में हैं। पहला तो मुख्यमंत्री मायावती के 'भाईयों' की करतूत और दूसरा लखनऊ के आस पास की बसाहट में आदमखोर शेर का कहर। वैस इन दोनों खबरों में सीधे कोई रिश्ता भले न हो लेकिन दोनों जिस एक बात की ओर इशारा करती हैं वह है 'जंगलराज'। कहीं बहन जी के भाइयों ने जंगलराज मचा रखा है तो कहीं जंगल के असली राजा ने आतंक मचा रखा है।
ज्यादा दिन नहीं हुए जब माया मैडम को उप्र की जनता ने सपा के 'गुंडाराज' के खिलाफ बहुमत देकर जिताया और बदलाव की अपेक्षा की। सत्ता और कुर्सी पर बैठे लोगों को छोड दें तो और कुछ नहीं बदला। कल तक जो आरोप लगाते थे आज उनपर आरोप लग रहे हैं। आरोप लगाने वाले भी पाक साफ नहीं हैं। सवाल ये है कि हालात क्यों नहीं बदले? तिवारी और उसके गुंडों ने औरैया के जिस इंजीनियर को पीट-पीट कर मारा अभी उसकी चिता की आग ठंडी भी न हुई थी कि उप्र के मत्स्य विकास निगम के अध्यक्ष के कुकर्म का खुलासा हुआ। बहन जी ने भले गर्ग को कुर्सी से हटाकर मामले कों ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की हो लेकिन जनता सब जानती समझती है। सरकार की सफाई आई कि बहन जी ने शेखर को टिकट देने से पहले पूछा तो तिवारी ने कहा था कि सारे मुकदमे साजिशन विरोधियों ने दर्ज कराए थे। यही बात अब गर्ग जी कह रहे हैं कि उनके खिलाफ साजिश है। साजिश है तो सरकार जांच क्यों नहीं करवाती की कौन है पीछे?
अब बात जंगली जानवरों के शहर में घुसने की। जब बहन जी के विधायक और मंत्री खुले आम जो चाह रहे हैं कर रहे हैं तो बेचारे जंगली जानवरों का क्या? जहां इंसान जानवर से गिरकर हैवान बन गया है वहां अगर जानवर अपनी जात पर उतरा है तो बुरा क्या है। वह तो जानवर ही है न? जब इंसानों ने उसका घर उजाड दिया तो वह नए घर की तलाश करेगा ही। फिर वह चाहे राजधानी लखनऊ हो या गाजीपुर। जानवर आदमखोर तभी होता होगा जब उसे अपने अनुकूल खाना नहीं मिलता होगा लेकिन कोई ये बता सकता है कि पहले से ही 'जानवरखोर' इंसान 'आदमखोर क्यों हो गया? कोई हमारी एक इंच जमीन ले ले तो हम मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं, इंसानों ने तो जानवरों की पूरी बस्ती ही उजाड दी है। अब वे जाए कहां? आप भी सोचिएगा?
बहन जी आप भी सोचिएगा, क्योंकि अभी आपको प्रधानमंत्री बनने का बस सपना भर दिखाया गया है। सपने को हकीकत में बदलना है तो बहुत कुछ बदलना होगा। वर्ना देश में पहले भी कईयों ने पीएम बनने के सपने देखे लेकिन सपना सच नहीं हुआ, वो भी तब जब सपने बहुत कम लोग देखते थे। फिर आज तो पीएम बनने का सपना देखने वालों की लाइन लगी है। भगवान करे कि सबके सपने सच हों लेकिन उससे पहले जंगल के राजा का जंगल में राज और इंसानी बस्ती में रामराज कायम हो।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

सुरक्षित आज-सुनहरा कल चाहिए

आतंक का एक और करारा तमाचा मुंह पर पडा है। इसे संयोग कहें यह दुर्योग कि 1 जनवरी से ही 'कडा सुरक्षा कानून' और 'संघीय जांच एजेंसी' असतित्व में आई। पाटिल की जगह लेने वाले 'काबिल' गृहमंत्री पी चिदंबरम अपने पहले दौरे पर गुवाहाटी पहुंचे। इसी दौरान दहशतगर्दों ने एक के बाद एक तीन धमाके करके सरकार की सारी कडाई की पोल खोल दी। खास बात यह कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 2 जनवरी को गुवाहाटी जाने वाले हैं। बतातें चलें कि 26 नवंबर को जब मुंबई हमला हुआ उसके अगले दिन प्रधानमंत्री को मुंबई जाना था। इसके मायने क्या हैं, आप सोचिएगा... आखिर अब कहां कमी है? सवाल फिर वही है, आतंक पर लगाम कैसे? अगर कानून बनाना और एजेंसी खडी करना समाधान होता तो पहले इससे कडे कानून थे।
हर धमाके के बाद वही बयान 'हम जवाब देंगे', 'पाकिस्तान का हाथ है' , कब तक चलेगा। आतंक की जड पर प्रहार क्यों नहीं होता। मुंबई हमले के बाद जनता के गुस्से के बाद भी नेता राजनीति से बाज नहीं आए। अंतुले हों, मुख्तार अब्बास नकवी हों यह दिगि्वजय सिंह सबने शिगूफे छोडे। केवल कुछ लोग आकर ऐसे हमले करके चले जाते हैं। हमारी सेना, खुफिया तंत्र सब सांप निकलने के बाद लकीर पर लाठी पीटती है। कब तक चलेगा ऐसा? आम आदमी को अब आश्वासन नहीं हल चाहिए, सुरक्षित आज और सुनहरा कल चाहिए।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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