राज और समाज पर खरी आवाज

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मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

कहीं बिस्तर में, कहीं सड़क पर

आज सिर्फ तीन बयान दे रहा हूं। यह देश की दोनों बड़ी पार्टियों के हैं। एक जिसने अपनी 125वीं सालगिरह मनाई तो दूसरी जहां पीढ़ी परिवर्तन का दौर चल रहा है। एक के नेता ने बंद कमरे के अंदर बिस्तर पर जनता का विश्वास और संविधान की मर्यादा तार-तार की तो दूसरे पार्टी के नेताओं ने खुलेआम स्थिरता का तकाजा देकर जनता से धोखा किया। दोनों तरफ मामला ब्रीच ऑफ ट्रस्ट का है। मैं ज्यादा लिखूंगा नहीं क्योंकि उनके बयान ही उनकी पोल खोलने के लिए काफी हैं। खैर सोचना जनता को चाहिए कि आखिर ऐसे नेताओं को बार-बार क्यों चुना जाए?

एनडी तिवारी सेक्स स्कैंडल: कांग्रेस के बोल

तिवारी का कदम स्वागत योग्यकांग्रेस महासचिव और मीडिया सेल के प्रभारी जनार्दन द्विवेदी ने कहा, 'तिवारी ने सार्वजनिक जीवन के मापदंडों को स्वीकारते हुए सही निर्णय लिया है। हमें इस फैसले का स्वागत करना चाहिए। उन्होंने इस आधार पर इस्तीफा दिया है कि जब तक उन पर लगे आरोपों की सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक वह किसी पद पर नहीं रहना चाहेंगे। यह अच्छा और सराहनीय कदम है।

तिवारी ऐसा कर ही नहीं सकते: कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि ८६ वर्षीय बुजुर्ग नेता खान माफियाओं के षड्यंत्र के शिकार हुए हैं। उनके ऐसे मामले में लिप्त होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बकौल दिग्विजय, मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाना चाहिए। दिग्गी ने कहा, राज्यपाल ने कुछ खानों को पट्टे पर दिए जाने के राज्य सरकार के फैसले को मंजूरी नहीं दी थी और इसके बाद उन्हें इस मामले में फंसा दिया गया। यह मामला पूरी तरह गलत है।

शिबू सोरेन से हाथ मिलाने पर भाजपा के बोल


समझौते की राजनीति में दागी भी मंजूर: मनमोहन कैबिनेट में मंत्री बनाने पर शिबू सोरेन का इस्तीफा मांगने वाली भाजपा अब उन्हीं को सीमए की कुर्सी पर बिठाने पर जा रही है। भाजपा ने कहा है कि समझौते की राजनीति दागी का भी साथ दिया जा सकता है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने कहा कि शिबू सोरन के साथ जाना पार्टी का तात्कालिक निर्णय है। आज का राजनीतिक परिदृश्य ही ऐसा हो गया कि समझौते की स्थितियां बन जाती हैं। चुनाव के समय इन्हीं सोरेन को भ्रष्टाचार का मसीहा कहने वाली भाजपा अब सफाई की मुद्रा में आ गई है। सोरेन को क्लीन चिट देते हुए सुषमा ने कहा कि जो भी आरोप थे, वर्तमान में शिबू उससे बरी हैं। सुषमा ने कहा कि भाजपा के पास तीन विकल्प थे। उसने कांग्रेस गठबंधन और राष्ट्रपति शासन के विकल्पों से किनारा करते हुए सोरेन को सरकार बनाने में सहयोग को महत्व दिया। यह लिखा ताकि सनद रहे।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

न त्वहम् कामये राज्यम्.......


न त्वहम् कामये राज्यम्, न स्वर्गम् न पुनर्भवम्।

कामये दु:खतप्तानम्, प्राणिनाम् आर्तिनाशम्।।


न तो मुझे राज्य की कामना है और न ही स्वर्ग चाहिए, न ही पुनर्जन्म चाहिए। मुझे तो दु:ख में जलते हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश करने की शक्ति चाहिए।

आजीवन इसी ध्येय के प्रति समर्पित रहे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की आज जयंती है। भारत, भारतीय और भारतीयता के प्रबल समर्थक पंडित जी का जन्म 25 दिसंबर 1861 को प्रयाग (इलाहाबाद) में हुआा। शिक्षा पूरी करने के बाद कुछ दिन तक आपने अध्यापन कार्य किया, फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। पर उनकी क्षमता और प्रतिभा के लिए यह क्षेत्र बहुत सीमित था। मालवीयजी ने सार्वजनिक जीवन में भी प्रमुख रूप से भाग लेना आरंभ किया। वे 1886 में ही कांग्रेस में सम्मिलित हुए। 1885 और 1907 के बीच तीन पत्रों का संपादन किया। वे कालाकांकर प्रतापगढ़ से निकलने वाले हिंदी समाचार पत्र हिंदुस्थान के संपादक रहे। इसके अलावा इंडियन ओपीनियन, अभ्युदय, अंग्रेजी दैनिक लीडर और पाक्षिक मर्यादा का भी गुरुतर संपादन किया। आपने हिंदी पत्रारिता और हिंदी के प्रसार में ऐतिहासिक योगदान दिया। आपके ही प्रयास से अंग्रेज राज में संयुक्त प्रांत की कचहरियों में देवनागरी लिपि और हिंदी का प्रयोग शुरू हो सका। इसके लिए मानवीय जी ने 1890 में ही आंदोलन आरंभ कर दिया था और 1900 में सफलता मिली। मानवीय जी 1909 और 1918 में अखिल भारतीय कांग्रेस के और तीन बार हिंदू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। आपकी विश्व सभ्यता को सबसे बड़ी देन काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना भारतीय संस्कृति के परिवेश में विविध विषयों की उच्चतम शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आपने 1915 में की थी। इसके लिए आपने अथक प्रयास किया। देश भर में घूमे और इसके फलस्वरूप एशिया का सबसे बड़ा विवि गंगा के तट पर आकार ले सका। अपने जीवन के अंत तक मालवीयजी पूरी शक्ति के साथ इस विश्वविद्यालय को विकसित करने में लगे रहे। अपने स्वर्गवास से कुछ समय पूर्व उन्होंने कहा था कि अगर मेरा पुनर्जन्म होता है तो मैं भारत मां और काशी हिंदू विवि की सेवा करना चाहूंगा। आपके कर्मठ जीवन का अंत 12 नवंबर 1946 को वाराणसी में हुआ। भारत मां के महान सपूत को मेरा नमन।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

breaking news: महंगाई सीमा पार से आई

आज मेरी एक मित्र ने एक स्क्रिप्ट भेजी। भेजी तो पढऩे के लिए लेकिन मैं लिखने लगा। मामला ही ऐसा था। मैं इसके सिर्फ दो पैरा आपको पढऩे के लिए दे रहा हूं। उन्होंने संक्षेप खबरें भेजी थीं मैंने थोड़ा विस्तार दिया है। (इसे भेजा है उर्मिला पुरी जी ने जो दिल्ली स्थित एक समाचार चैनल में कार्यरत हैं।) उनकी दो खबरें- संक्षेप में

1- महंगाई बढऩे से झल्लाए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी से नाराज होकर गृहमंत्री पी चिदंबरम को महंगाई के हवाई सर्वेक्षण के निर्देश दिए हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय ने खुफिया सूचनाओं के आधार पर आशंका जताई है कि महंगाई पाकिस्तान से भारत में घुसपैठ कर रही है।

2- बचत बढ़ाने और फालतू खर्च रोकने की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मुहिम को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बार फिर कमर कस ली है। मंगलवार को राज्यसभा ने भी बिना चर्चा के वह विधेयक पास कर दिया गया जिसमें खर्च कम करने की कवायद है। इसके तहत अब मंत्री और सांसद सपरिवार और अपने सहयोगियों सहित मुफ्त हवाई यात्रा कर सकेंगे। सरकार ने परिवार और सहयोगियों की कोई संख्या निर्धारित नहीं की है। इससे माना जा रहा है कि ऐसे लोग विमान में खड़े होकर यात्रा करेंगे। माना जा रहा है कि सरकार को इससे हर साल पांच हजार करोड़ का फायदा होगा। अब इसका खबर का विस्तार पढि़ए मेरी कलम से-

जबरा के मुंह पर किसी का जोर नहीं 
यह है उनकी दो बातें। शब्दों के पैमाने में आंके तो बहुत छोटा लेकिन असलियत में बात बहुत बड़ी है। महंगाई सातवें आसमान को पार कर गई है। दाल और रोटी का रिश्ता कबका टूट चुका है पता नहीं। अब तो चाय के घूंट भी इतने कड़वे हो गए हैं कि हलक से नहीं उतरते। तिसपर सरकार बहादुर कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से महंगाई बढ़ रही है। धन्य है गुरू। उधर, आपके साथी जयराम रमेश जी कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के नाम पर रायता गिराकर आए हैं तो इधर आप दिल्ली में बैठकर वही राग अलाप रहे हैं। खैर जबरा के मुंह पर किसी का जोर नहीं चलता।

अब जोर जुलुम पर मौन ही रहते हैं

एक जमाना था, दाल दो रुपए महंगी हुई तो हल्ला मचती थी। हमारे देपालपुर से लेकर दिल्ली के अंत:पुर तक नारे लगते थे- जोर जुलुम के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। पर अब तो बात नहीं रही। अब जनता के पास समय नहीं है। वह दाल-चावल जुटाने में इतना बिजी हो गई है कि उसके मुंह से नहीं निकलता- जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है। तभी तो घुमंतू भईया कहते हैं भाड़ में जाए सरकार-वरकार, हमारा तो बस 10 फीसदी इन्क्रीमेंट लग जाए। सब की अपनी-अपनी भूख है। सरकार बहादुरों का पेट है कि सुरसा का मुंह जो भरता ही नहीं और बेचारी जनता है कि पेट की आग बुझाने के चक्कर में मुंह से कुछ निकलता ही नहीं।

साजिश की बू आ रही है
अगर किसी दिन आप टीवी खोलें और हेडलाइन चलती रहे कि केंद्र सरकार ने मंहगाई का पता लगा लिया है। सरकार ने खुफिया सूचनओं के आधार पर बताया है कि मंहगाई पाकिस्तान से सीमा पार करके आ रही है। इसके पीछे आईएसआई भी है। यह देखकर आप चौंकिएगा मत। आप तब भी मत चौंकिएगा जब प्रधानमंत्री कहें कि वे विदेशमंत्री को मंहगाई की घुसपैठ के पुख्ता सुबूत देकर अमेरिका दिखाने के लिए भेज रहे हैँं। आप तब भी मत चौंकिएगा जब विदेशमंत्री हिलेरी के हाथ में हाथ डालकर कहें कि अमेरिका पाकिस्तान पर दबाव डालने के लिए तैयार हो गया है। और तब भी नहीं जब पाकिस्तान कहे कि हमें और सबूत चाहिए। हां तब जरूर चौंकिएगा जब विमान में आपको सीट न मिले। वहां पर मंत्री या सांसद जी सपरिवार, समर्थक कब्जा जमाए बैठे हों। संसद ने इसपर मोहर लगा ही दी है।


चलते-चलते दीपू का एसएमएस
हमारा शरीर 75 फीसदी पानी से बना है लेकिन अगर चोट लगती है तो खून निकलता है। जबकि हमारे दिल में रक्त होता है लेकिन दिल में चोट लगती है तो पानी निकता है।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

कोपेनहेगेन, आडवाणी, तेलंगाना आगे क्या होगा?

आज की तीन बड़ी खबरें। दो भारत से और तीसरी कोपेनहेगेन से। कई दिन से मैं अखबारों में कोपेनहेगेन के बारे में पढ़ रहा था। लेकिन हुआ कुछ नहीं। 10 दिन के नाटक, करोड़ों के खर्च और बेहिसाब कॉर्बनडाइक्साइड उत्सजर्न करने के बाद नतीजा कुछ नहीं निकला। निकले भी कैसे? सबके अपने स्वार्थ हैं। बड़ा कार्बन उत्सर्जन तो दूर हम जितना कर सकते हैं उतना भी नहीं कर सकते। ऐसे में औधोगीकरण की नींव पर टिकी देश की अर्थव्यवस्थाओं का क्या होगा? खैर नाटक था सो पटाक्षेप होना ही था। हो गया। बरकू भइया गुस्सा के सम्मेलन छोड़कर चले गए तो अपने प्रधानमंत्री को डेनिश पीएम ने हवाईअड्डे से फोन कर लौटा लिया। धन्य हैं हमारे मन्नू भाई कि लौट भी गए। खैर होना कुछ भी नहीं है। कोई भी देश अपना हित छोड़ नहीं सकता, ऐसे में हम अपने स्तर पर जो कर सकते हैं वही करें तो बहुत हैं। एक नया शब्द आया है लोकल वार्मिंग असल समस्या वही है। भारत लौट आइए।

एक यात्री का एक और पड़ाव

भारत में आज दो खबरें रही। लोकसभा चुनाव के बाद बदलाव की अटकलों पर विराम लगाते हुए आज से भाजपा में बदलाव की शुरुआत हो गई। भारतीय राजनीति के धुरंधर और भाजपा के महारथी लालकृष्ण आडवाणी अब योद्ध से सारथी की भूमिका में आ गए हैं। उनके हटने के पीछे कम से कम मैं उम्र को कारण नहीं मानूंगा क्योंकि उनकी उम्र के नेताओं में सबसे ज्यादा सक्रिय और स्वस्थ्य हैं वो। फिर भी बदलाव तो प्रकृति का नियम है, सो हो गया। अब आज राजनाथ जी की बारी है। उनकी जगह नितिन गडकरी आ रहे हैं। और आडवाणी की जगह सुषमा स्वराज का आना तो पहले से ही तय था। अटल और आडवाणी ने आरएसएस से जन्मे जनसंघ और फिर उसके आगे की पीढ़ी भाजपा को राजनीति के फर्श से अर्श तक पहुंचाया। दो सीटों से 180 सीटें। यह कमाल इसी जोड़ी का था। कांग्रेस के जमे-जमाए एकछत्र राज्य के बीच अपना अस्तित्व बनाए और बढ़ाए रखना चुनौती से कम नहीं था। वर्ना और भी कई पार्टियां पैदा हुईं और कुछ समय में ही खत्म भी हो गईं। वामपंथी इसका अपवाद भले हों लेकिन उनका भी इतनी बार विखंडन हो चुका है कि वे अपने ही अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं। चलिए मुद्दे पर लौटते हैं। राजनीति के महारथी ने आज जब नेता प्रतिपक्ष पद छोडऩे की घोषणा की तो यह भी कहा कि यहां से उनकी नई पारी शुरू होती है। बकौल आडवाणी 14 साल की उम्र में संघ के स्वयंसेवक के रूप में शुरू उनकी यात्रा जीवन पर्यंत जारी रहेगी। मुझे तो लगता है कि होगा भी यही। भारतीय राजनीति में आडवाणी उन नेताओं में शुमार हैं जिनपर भ्रष्टाचार जैसा आरोप नहीं लगा। कमल भले कीचड़ में रहा हो लेकिन उस पर दाग नहीं लगा। जैन हवाला कांड के समय नाम आया तो आडवाणी ने इस्तीफा दिया। राम रथ यात्रा ने आडवाणी ही नहीं भाजपा को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाया तो पाकिस्तान की यात्रा उनके जीवन का सबसे बुरा दौर भी रहा। खैर यात्रा में है तो ऊंच-नीच होगी ही। हमेशा समताल रास्ते नहीं मिलते। खैर आडवाणी ने आज ने नई पारी शुरू कर दी है अब देखते हैं क्या होता है। देखना तो सुषमा, जेटली और गडकरी को भी है। अब भाजपा आडवाणी और अटल के छत्र से निकलने जैसी लगी है, आगे की यात्रा अब दूसरी पीढ़ी के हवाले है।

जिम्मेदार कौन?

दूसरी बड़ी खबर देश से संसद की है। आज लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। कारण कांग्रेस। आखिर जल्दी क्या थी बिना तैयारी के तेलंगाना के घोषणा करने की। अब रायत गिराया है तो नुकसान देश को उठाना पड़ रहा है। राहुल जी, सोनिया जी कुछ समझाइये अपने सांसदों को या फिर अपने मंत्रियों को। इस नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?

चलते-चलते
आज इंदौर आईआईएम की एक महिला प्रोफेसर की हत्या कर दी गई। हमारे एक साथी रिपोर्टर मौके पर गए। बगल के ही एक मकान के बाहर खड़ी महिला से उन्होंने पूछा कि आपको पता है क्या हुआ तो उस महिला ने जवाब दिया मेरे पति खान खा रहे हैं मैं अंदर जा रही हूं। दोनों घरों कुछ ही दूरी पर हैं। और इन घरों में वो प्रोफेसर रहते हैं जो भावी प्रबंधक बना रहे हैं। आगे आप खुद समझदार हैं।

सोमवार, 30 नवंबर 2009

कोड़ा'ओं के मानस पिताओं चुप क्यों हो

आज महीनेभर से ज्यादा हो गया ब्लॉग पर कुछ लिखे। मन तो बहुत किया लेकिन कुछ समय और कुछ और दिक्कतें लिखना नहीं हो पाया। इस दौरान जो सबसे जिस बात से सबसे ज्यादा परेशान रहा वह पीएचडी में रजिस्ट्रेशन था। इंदौर विवि में हिंदी विभाग में करवाना था। आरडीसी के एक दिन पहले अंतिम समय पर फॉर्म जमा हो सका। फॉर्म जमा करने गया तो पता चला पात्रता प्रमाण पत्र बनवाना होगा....... खैर लंबी  कहानी  है। इसकी तफसील में जाने का मन नहीं है। इस एक महीने में देश-विदेश में बहुत कुछ घट गया। सब पर नहीं बोलूंगा लेकिन लिब्रहान पर बिना बोले रह नहीं सकता।

17 साल बाद करोड़ों रुपए खर्च करके एक कमीशन ने यह बताया कि बाबरी विध्वंश के जिम्मेदार कौन थे। नाम वही जो पहले सुनते, पढ़ते देखते आए हैं। इतना तो ठीक था लेकिन संसद का सत्र चलते हुए किसी आयोग की रिपोर्ट लीक होना....कुछ समझ में नहीं आया। खैर दिमाग पर जोर डाला तो पता चला कि कोड़ा, स्पेक्ट्रम, महंगाई, झारखंड चुनाव के बीच कुछ तो चाहिए था जो कांग्रेस को बचा सके। मनमोहन भाई को अमेरिका रवाना करके रिपोर्ट लीक कर दी। ऐसा होने से न केवल कांग्रेस ने सालों पुराना मुर्दा खोद दिया बल्कि गन्ना किसानों की समस्या पर एकजुट हुए विपक्ष को भी अलग करने की कोशिश की। खैर कांग्रेस की चाल उलटी पड़ी या सीधी यह तो समय बताएगा लेकिन कांग्रेस ने अपनी रीति-नीति के अनुकूल ही सरकारी तंत्र का फायदा उठाया है। अभी रिपोर्ट मैं भी पढ़ रहा हूं आखिर जानूं तो हुआ क्या था? आप भी बताइएगा।

दूसरी खबर आई कल्याण सिंह की, यह तो होना ही था। दोस्त दोस्त न रहा, रहता भी कैसे? पूरब पश्चिम एक नहीं हो सकते। मुलायम को फायदा नहीं दिखा तो अलग हो लिए। कल्याण अब न घर के रहे न घाट के। अब वे फिर राम-राम कर रहे हैं। वैसे भी उन्हें राम ने राजा बनाया अब राम ही उनके मालिक हैं।

खुलासा कोड़ा के खेल का भी हुआ। पर असली खिलाड़ी पकड़े नहीं गए और न ही पकड़े जाएंगे। ठेका मजदूर से सीएम की कुर्सी तक पहुंचने वाले कोड़ा ने इतना कैसे जोड़ा कोई बताने को तैयार नहीं। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए कोड़ा को सीएम बनाने के लिए दिल्ली से लेकर रांची तक दौडऩे वाले कोड़ाओं के कांग्रेसी मानस पिताओं चुप क्यों हो? क्यों चुप हैं राहुल बाबाï? क्यों चुप हैं सोनिया मैडम? आप ने मधु कोड़ा को जमीन से उठाकर सीएम बनाया जब वो सांसद बना तो उसे अपने साथ मिलाया अब उसके कर्मों में क्या आप सहभागी नहीं? हो सके तो जवाब दें। पता मिलेगा नहीं लेकिन फिर भी मांगना मेरा हक है।

अभी 26/11 बीता है। मेरे सुझाव पर हमारे अखबार ने मध्यप्रदेश में आओ एक दीया जलाएं अभियान शुरू किया। हमारी बात पाठकों तक पहुंची। पाठकों ने इस कार्यक्रम में जोश से सहभाग किया और हमारा अभियान पूरी तरह सफल रहा। इसके लिए प्रबंधन ने मुझे शाबाशी भी दी। खास बात यह कि हमने 26/11 का स्यापा नहीं किया बल्कि एकजुट होकर आंतक के खिलाफ लडऩे का संकल्प लिया। एड़ी का पसीना सिर तक बहने के बाद मेरा पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन भी हो गया। अब बस आपकी दुआएं चाहिए ताकि जल्दी काम पूरा कर सकूं।

चलते-चलते


पिछले कुछ दिनों में छोटे भाई दीपू ने कुछ एसएमएस किए जिन्हें आपको भेज रहा हूं-

1- 
जब छोटे थे तब बड़े होने की बड़ी तमन्ना थी।
मगर अब पता चला....
अधूरे एहसास और टूटे सपनों से अच्छा तो अधूरा होमवर्क और टूटे खिलौने थे।

2- 
कहते हैं अच्छा दोस्त 0 की तरह होता है।
उसकी खुद तो कोई कीमत नहीं होती
लेकिन जिसके साथ जुड़ जाए उसकी कीमत 10 गुना बढ़ जाती है।

3- 
एक बार मोमबत्ती में जलते धागे ने मोम से पूछा जलता मैं हूं पर तू क्यों रोती है और तू पिघलती क्यों है।
मोम ने कहा- जिसे दिल में बसाया हो अगर उसे तकलीफ हो अगर वह जले तो आंसू तो आएंगे ही।

4- 
we live in a funny nation where-
1- Pizza reaches home faster than ambulance or police.
2- U’ll get car loan @ 8% but education loan @ 12%.
3- U must have many qualified degrees to manage a small job but u don’t need any degree to mannage the entire country.

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

चलो अब सब अच्छा होगा


तुलसीदास जी ने सालों पहले ही लिख दिया था- कोउ नृप होई हमइ का हानी, चेरि छोडि़ होबई ना रानी।
मेरे जैसे देश के करोड़ों आम आदमियों के लिए हालात आज भी वैसे ही हैं, जरा भी नहीं बदले। २६ साल की उम्र में मैंने केंद्र में सरकारें बदलती देखीं, राज्य में सरकारें बदलीं लेकिन हमारे गांव का सजीवन, मुख्तार, फकीरे, पप्पू और ऐसे ही करोड़ों लोगों के हालात जस के तस हैं। नाम बदल लें,जगह बदल लें तो ऐसे पात्र आपको आपके आसपास, आपके गांव-शहर में भी दिखेंगे। किसान चाहे विदर्भ को या बीरापुर का परेशान है। मजदूर चाहे मुंबई का हो या मेरठ का मजबूर है। अब हमें राज और राजा बदलने पर खुशी या गम नहीं होता। हम चुनावों का इंतजार नहीं करते। हम पढ़ते भले रोज हों कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं लेकिन मनाते यही हैं कि एक अब चुनाव पांच साल बाद ही हों। क्या होली क्या दीवाली? हम तो दाल-चावल-चीनी-चाय-पेट्रोल-गैस-सब्जियों के दाम बदलने का इंतजार करते हैं। दाम बढ़े तो फिर मायूसी और घटे तो होली-दीवाली। इनता जानने के बावजूद मैं चुनाव परिणामों अपनी चकल्लस सुनाने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं, क्योंकि एक बार फिर जनता जनार्दन ने अपना फैसला सुनाया है, किसी को जिताया और किसी को हराया है। तो हमें भी उम्मीद जगी है कि चलो अब सब अच्छा होगा।

अथ श्री तीन राज्य विधानसभा चुनाव माहात्म
कल घर से लौटा तो सोचा कि इलाहाबाद यात्रा और दीवाली का हाल बताऊंगा, लिखना भी शुरू किया लेकिन आज चुनाव परिणाम आने थे सो काम ज्यादा था, इसलिए प्रयाग प्रवास का विवरण भविष्य के लिए टाल दिया। कल संभावनाओं पर चर्चा के बाद आज सुबह टीवी खोली तो रुझान साफ थे। कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन जारी था। सभी चैनल राजनीतिक पंडितों के साथ परिणामों का महात्म बांच रहे थे। सबकी अपनी राय, सबके अपने तर्क, इसी बीच खबर आई कि भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने बोला है कि ईवीएम कांग्रेस के लिए विनिंग मशीन बन गई है। फिर क्या था, शुरू हो गई मुख्तार की खिंचाई। होनी भी थी। जीत के बाद बोलते तो ठीक था पर हारकर बोलना तो किसी को पचेगा। जनता को भी नहीं, जिसका हाजमा सबसे ठीक माना जाता है। खैर बाद में मुख्तार ने चैनल पर आकर अपना बयान वापस लिया तब जाकर चैनलों को राहत मिली।

अब दिल्ली से विदर्भ तक पहुंचेगा पूरा एक रुपया
दिल्ली में २४ अकबर रोड से ज्यादा खुशी १० जनपथ की डीह पर मन रही थी। बड़े नेता ढोक देने पहुंच रहे थे। पहुंचना भी था। आखिर कांग्रेसियों की दौड़ यहीं से शुरू होकर यहीं तक खत्म जो होती है। महाराष्ट्र में कांग्रेस-रांकपा की जीतपर कांग्रेसियों को दोबारा सत्ता पाने की खुशी थी तो मुझे इस बात की कि चलो अब दिल्ली से चलने वाला एक रुपया पूरा का पूरा विदर्भ तक पहुंच जाएगा। दरअसल, दिल्ली में देने वाले और विदर्भ में खर्चने वाले एक ही हैं, इसलिए मैं यह खुशफहमी पाल रहा हूं। हां फैशन के इस दौर में इस बात की गारंटी मैं नहीं लेता कि यह पैसा वास्तविक जरूरतमंदों तक ही पहुंचेगा। मुझे खुशी इस बात है कि अब विदर्भ के किसान भाईयों को आत्महत्या नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि आम आदमी की जो सरकार केंद्र में राज कर रही है वही राज्य में फिर आ गई है।

कांग्रेस की जीत का राज खुल गया
एक गंभीर चैनल पर एक सिद्धांतवादी अखबार के प्रधान संपादक से जब माहाराष्ट्र के चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने प्रसन्नता जाहित करते हुए कांग्रेस-रांकपा की जीत का राज खोला। कहा, मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि घृणा फैलाकर राजनीतिक करने वालों की हार हुई है। जिस रास्ते पर चलकर बाल ठाकरे ने सत्ता हासिल की थी उसी रास्ते पर उनके ही खून ने उन्हें जबरदस्त हार का सामना करने पर मजबूर किया है। जैसे को तैसा मिला है। मनसे भले महाराष्ट्र की राजनीति में अभी कोई सक्रिय भूमिका न अदा कर सके लेकिन राज ठाकरे ने अपनी ताकत का एहसास करा दिया है। यहां से बाल ठाकरे का पतन और राज का उदय शुरू हो गया है। यह टिप्पणी सुनकर मेरे कान खड़े हो गए। मुझे बीते साल हुएमनसे का आतंक याद आने लगा। क्या राजनीति में गलत को मिटाने के लिए गलत ही करना सही है? अगर ऐसा होता रहा तो राज ठाकरे जैसे लोग रक्तबीज जैसे पैदा होते रहेंगे। राज भले ही पैदाइश ठाकरे परिवार की हों लेकिन उन्हें पाल पोसकर बड़ा किया है कांग्रेस-रांकपा सरकार ने। हम भूले नहीं हैं कि राज के अत्याचार के सामने केंद्र से लेकर राज्य तक पूरी सरकार असहाय दिखी। कांग्रेस कुछ करना भी नहीं चाहती थी क्योंकि वह तो शिवसेना की काट ढूढ़ रही थी जो उसे बैठे बठाए मिल गई। वैसे भी फोटोग्राफर उद्धव में कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे जैसी मौलिक नेतृत्व क्षमता नहीं है और भाजपा के पास महाराष्ट्र में कोई बड़ा नेता, जिसका असर साफ दिखा है। मैं दिल और दिमाग दोनों से राज की जीत पर खुश नहीं हूं और न ही विद्वान संपादक जी की टिप्पणी से सहमत। राज जैसे लोगों को जनता को नकारना ही होगा, नहीं तो ऐसी विनाशक मानसिकता कभी खत्म नहीं होगी। जब मैं यह लाइनें लिख रहा हूं तो मेरे जेहन में भिंडरावाले की याद कौंध गई है। अब क्यों और कैसे यह फिर कभी चर्चा करेंगे।

चौटाला की चोट से चोटिल हो गए हुड्डा
हरियाणा में हुड्डा साहब ने छह महीने पहले चुनाव तो घोषित करवा दिए लेकिन इन्होंने भी वही गलती की जो अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। दोनों को अतिआत्मविश्वास ले डूबा। वैसे हरियाणा में कांग्रेस से कुर्सी से महज छह सीटें दूर है लेकिन यह छह सीटें पाना बहुत भारी है। हजकां के कुलदीप विश्रोई ने कह दिया है कि वे कांग्रेस को साथ नहीं देंगे। भाजपा की चार और शिवसेना की एक सीटे तो वैसे भी चौटाला को ही मिलेंगी। इसके अलावा बची बसपा की एक और अन्य की सात अब देखना है कि इसमें से कौन सेंध लगाता है। चौटाला भले परिणाम से खुश हो रहे हों, होना भी चाहिए क्योंकि इस बार उन्होंने पिछली बार की तुलना में २२ सीटें ज्यादा जीती हैं लेकिन मैं खुश नहीं हूं। दरअसल एक तो सरकार अस्थिर बनेगी दूसरा कांग्रेस की इतनी कामकाजी सरकार जिसके सीधे मुकाबले कोई था ही नहीं उसे मुंह की खानी पड़ी है। सरकार जो भी बने मैनेज होकर बनेगी और हमेशा पेंडुलम की तरह झूलती रहेगी। अगर कांग्रेस आंकड़ा जुटाने में कामयाब हो भी गई तो भी हो सकता है कि हुड्डा को आराम करने को कह दिया जाए। खैर जो भी होगा वह तो १० जनपथ को ही करना है, क्योंकि विधायक दल नेता का फैसला हमेशा कांग्रेस अध्यक्ष पर छोड़ता है।

अरुणाचल में अचल रहा कांग्रेस का अहिवात
पूर्वोत्तर के विकसित राज्य में कांग्रेस ने फिर वापसी की है। वैसे पूर्वोत्तर राज्यों में राजनीति से लोगों का उतना राफ्ता नहीं जिनता बाकी भारत में है। अभी आंध्र में रेड्डी साहब के निधन के बाद तो आप को याद ही होगा कि क्या हुआ था? खैर मुझे खुशी इस बात की है कि चीन जो आए दिन हमारे अरुणाचल में चहलकदमी करने चला आता है अब शायद उस पर लगाम लगे। हमारी जमीन भले ही उसपर घास का एक तिनका न उगता हो लेकिन वह हमारी रहे, क्योंकि मां कितनी भी असहाय और नि:शक्त क्यों न हो जाए मां ही रहती है और उसका प्यार वैसा ही अचल रहता है। मुझे खुशी है कि अरुणाचल में कांग्र्रेस का अहिवात अचल रहा और अब हमारी जमीन पर हमारा हक अटल रहेगा। दलों की जीत-हार स्वीकार पर देश की न हो हार
विजयरथ पर सवार कांग्रेस और हार-हारकर घुटनों के बल आ गई भाजपा को अब अगले चुनाव का इंतजार है। भाजपा को हार का सिलसिला तोडऩे के लिए तो कांग्रेस को जीत की सीढिय़ां मजबूत करने के लिए। लोकसभा चुनाव के बाद लग रहा है कि भाजपा अंदर से टूट चुकी है। नेतृत्व का सर्वथा अभाव है। आडवाणी पर्दे के पीछे चले गए हैं तो अध्यक्ष जी नदारद हैं। दूसरी तरफ राहुल बाबा दलितों की बस्ती में घूम-घूमकर लीड लिए जा रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों को मेरी शुभकामनाएं। चाहे जो जीते चाहे जो जो हारे बस देश और देश के लोगों की हार न हो पाए।

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

बरकू भइया को नोबेल मिला कैसे?

आज बड़े दिनों बाद घुमंतू का फोन आ गया। दरअसल वे भारत भ्रमण पर निकले थे आज सुबह लौटते ही फोन घनघना दिया। क्या हाल है मियां? मैं उनींदा सा पूछने ही जा रहा था कि कहिए? लेकिन वो कहां रुकने वाले थे, छूटते ही बोले- क्या गुरु सोते ही रहोगे? लगे हाथ- उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोवत है। जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है- सुना डाला। मैंने पूछा क्या बात है भारत खोज लिया क्या? पर वे मेरी कहां सुनने वाले थे, बोले टीवी खोलो, बरकू भइया को नोबेल मिल गया। अब मेरे जैसे व्यक्ति को क्या घुमंतू भइया के संबंधों का क्या पता। सो मैंने पूछ लिया कि कौन बरकू? दूसरा कोई दिन होता तो उखड़ जाते पर आज बोले अरे अपने बराक ओबामा। मुझे लगा घुमंतू मजाकिया मूड में है। लेकिन तब तक टीवी खोल चुका था। अचानक मुझे लगा कहीं, एक अप्रैल तो नहीं? लेकिन ऐसा था नहीं।

11 दिन में इतना बड़ा सम्मान
टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग खबर थी कि ओबामा को शांति का नोबेल। मुझे आश्यर्च हुआ। होना भी था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ओबामा ने आखिर नौ महीनों में ऐसा क्या किया कि उन्हें इस सम्मान के लायक चुना गया। मेरी मूढ़मति को ऐसा कोई काम नहीं दिखा। वैसे भी ओबामा को राष्ट्रपति के रूप में मात्र 11 दिन के काम के बदले यह अवार्ड मिल रहा है। दरअसल, नोबेल पुरस्कारों के लिए नामांकन की अंतिम तारीख एक फरवरी होती है। यानी इस वर्ष एक फरवरी तक ओबामा ने बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति जो कार्य किए, उनके लिए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया। ओबामा ने 20 जनवरी 2009 को राष्ट्रपति पद ग्रहण किया था। इसका मतलब सिर्फ 11 दिनों के कार्यकाल के आधार पर उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुन लिया गया। यह आश्यर्चजनक है।

सवाल तो उठने ही थे
पुरस्कार कोई भी हो कभी न कभी उनके चयन और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठता ही है। नोबेल के चयन पर भी यह पहली बार नहीं है जब सवाल उठा हो। पहले भी ऐसे मौके आए हैं। अब यह किन कारणों से किया गया, पता नहीं। लेकिन इस सम्मान से ओबामा की प्रतिष्ठा बढऩे के स्थान पर कम ही होगी। क्योंकि दुनिया में ऐसा मानने वाले बहुत लोग हैं कि इसके पीछे 'सेटिंग' है। इस फैसले को सही ठहराने का तर्क दिया जा रहा है कि ओबामा की विश्वशांति को लेकर जो योजनाएं हैं इससे वे सफल होंगी। खैर यह तो भाविष्य के गर्भ में है। यह तो वही बात हुई कि फलां छात्र रोज क्लास करता है तो इसे गोल्ड मैडल दे दो। अब वो क्लास में कितना पढ़ता है उसकी समझ कितनी है, इससे मतलब नहीं। खैर ओबामा ने भी नम्रता दिखाते हुए कहा है कि वे खुद को इस सम्मान के काबिल नहीं मानते, फिर क्यों................ अपनी ओबामा से कोई जातीय दुश्मनी नहीं है, क्योंकि हो भी नहीं सकती है। न ही मेरा उनसे कोई सैद्धांतिक विरोध है लेकिन मैं नोबेल चयन समित के इस फैसले का विरोध करता हूं।

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

हृदयघात से 'बालि' की मौत

जी हां, यह घटना सच है। 27 सितंबर को इलाहाबाद के यमुनापार इलाके के लालापुर गांव में यह घटना हुई। मैं वानरराज सुग्रीव के भाई बालि की ही बात कर रहा हूं, जिसे आमने-सामने के युद्ध में काल भी नहीं हरा सकता था। भगवान विष्णु की आठ कलाओं के अवतार भगवान राम ने भी उसे छिपकर मारा। जी हां मैं उसी बालि की बात कर रहा हूं जिसने छह महीने रावण को अपनी कांख में दबा कर रखा। मैं अश्वतथामा मरो, नरो या कुंजरों की तरह आधी बात को हवा में नहीं उड़ाऊंगा और न ही ऐसा होने दूंगा। हो सकता है यह मात्र संयोग हो लेकिन यह सच है। मैं उस बालि को जानता था। बचपन से लेकर आज तक उसे देखता आया था। हालांकि इधर कुछेक सालों से गिनी-चुनी मुलाकातें ही थीं संबंध वैसे ही अच्छे थे। खैर पहले उनके निधन की  घटना के बारे में बता दूं उसके बाद उनके बारे में।

लालापुर गांव में हर साल की तरह रामलीला चल रही थी। चौथा-पांचवां दिन था। सुग्रीव-राम की मित्रता होती है। आगे की कहानी क्या है इसे बताने की जरूरत नहीं। मुद्दे की बात यह कि बालि का चरित्र निभा रहे थे प्रभाशंकर शुक्ल। जिन्हें हम प्यार से परभा मामा कहते थे। बालि-सुग्रीव के बीच युद्ध हुआ। राम ने ओट लेकर तीर छोड़ा जो बालि बने परभा मामा के सीने पर लगा। तीन कागज के बनाए गए थे ताकि चोट न लगे। रोल की मांग के अनुसार बालि विलाप करता हुआ जमीन पर गिर गया। राम आए, बालि ने अपनी बात कही, राम ने उनका जवाब दिया और पर्दा गिर गया। इसके बाद परभा मामा के सीने में दर्द शुरू हुआ। मंच से नीचे आते-आते वे बेहोश हो गए। अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने बताया कि वे आधा घंटे पहले ही गुजर चुके हैं। इसके बाद क्या था नाना प्रकार की बातें शुरू हो गईं। जितने मुंह उतनी बातें। किसी ने कहा मोक्ष मिला, किसी ने कहा स्वर्ग हुआ, कोई बोला बैकुठ मिला, राम मिले और भी बहुत कुछ। खैर हम इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहेंगे। बस इतना ही कहना है कि परभा मामा आदमी बहुत नेक थे। मैंने भी उनके साथ रामलीला में रोल किया था। मैं लक्ष्मण बना  था मामा ने जनक और बालि का किरदार निभाया था। बात लगभग 16 साल पहले की है। गजब के कलाकार थे। बहुत अच्छी आवाज और बहुत ही अच्छा अभियन। किरदार को जीते थे मामा मंच पर।

एक बार की बात है, मुझे हनुमान का रोल मिला, मेरी तबीयत खराब हो गई थी। उस दिन राम-सुग्रीव मित्रता होनी थी। हनुमान को राम-लक्ष्मण को कंधे पर उठाकर सुग्रीव के पास तक ले जाना था। राम-लक्ष्मण दोनों मेरे हम उम्र थे। मैंने मंच के नीचे उन्हें उठाने की कोशिश की तो नाकाम रहा। मैंने मामा से कहा जैसे ही उनको कंधे पर उठाने लगूं आप पर्दा गिरवा देना। मामा ने कहा तुम उठा लोगे। मैंने कहा अगर गिर गया तो बहुत बदनामी होगी। उन्होंने कहा, भगवान पर भरोसा रखो, फिर भी अगर दिक्क्त हुई तो मैं पर्दा गिरा दूंगा। मैं मंच पर गया राम से हनुमान का संवाद हुआ। मैंने नीचे झुककर दोनों भाइयों को कंधे पर उठाया और जयश्रीराम का उदघोष कर मंच से उतरा और उनको लेकर चल दिया गंतव्य की ओर। यह यह मेरे लिए अविश्वसनीय था। रोल खत्म कर मंच से उतरा तो मामा ने आकर पैर छुआ बोले वाह? भांजे मुझे पता था कि मंच पर भगवान शक्ति देते हैं।
प्रभाशंकर मेरे सगे मामा नहीं थे लेकिन मुझे मानते बहुत थे।

आज उनके जाने की खबर सुनकर आंखें भर आईं। मैंने जो भी लिखा है वह न तो कहानी है, न गल्प, न मिथक, न अंधविश्वास, न किसी का महिमामंडन और न ही काल्पनिक कथा। यह सच है, उनके निधन की खबर सुनकर मैं लिखता चला गया और अब आप के साथ इसे साझा कर रहा हूं। भगवान उनकी आत्मा को शांति दें और उनके परिवार को इस दु:ख से लडऩे की शक्ति।
 इस घटना को इलाहाबाद के लगभग सभी समाचार पत्रों में अच्छी जगह मिली। यह फोटो दैनिक जागरण में प्रकाशित समाचार की कटिंग है।

रविवार, 27 सितंबर 2009

भगत सिंह ने कहा था- क्रांति मतलब व्यवस्था में परिवर्तन


क्रांतिकारी न्याय के लिए लड़ते हैं अन्याय के लिए बल प्रयोग नहीं करते है। क्रांतिकारी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक एवं नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में विश्वास करता है। इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि आप ङ्क्षहसा चाहते है या अङ्क्षहसा? बल्कि सवाल तो यह है कि आप अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए शारीरिक बल सहित नैतिक बल का प्रयोग करना चाहते है या केवल आत्मिक शक्ति का? क्रांति पूंजीवाद, वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अंत कर देंगी। यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खडा करेगी, उससे नवीन राष्ट्र और नये समाज का जन्म होगा। क्रांति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज कायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो राजनीतिक शक्ति को हथियार मान बैठे है। आतंकवाद क्रांति नहीं है। क्रांति का एक आवश्यक और अवश्यंभावी अंग है। आतंकवाद आतदायी के मन में भय पैदा करता है और पीडि़त जनता में प्रतिशोध की भावना जागृत करके उन्हे शक्ति प्रदान करता है। क्रांति के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है और न ही उसमे व्यक्तिगत प्रतिङ्क्षहसा के लिए कोई स्थान है वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय है- अन्याय पर आधारित मौजूद समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। इंकलाब जिंदाबाद

शनिवार, 26 सितंबर 2009

साल में दिन बस 365 हों

आज मैंने जीवन के अनुभव का एक और साल पूरा किया और एक नए साल की शुरूआत की। ढेर सारी शुभकामनाएं मिलीं बड़ों ने आशीर्वाद दिया। कोई खास आयोजन तो नहीं हुआ लेकिन इस बात का एहसास कि 26 सितंबर मेरा जन्मदिन है 25 की रात 12 बजे से ही होने लगा। बनारस भी याद आया। जहां जन्मदिन मनाने का अंदाज ही अलग था। हिंदी विभाग के बगल मैत्री जलपान गृह का केबिन जहां हम सभी साथी जन्मदिन मनाया करते थे। क्लास के सभी 13 लोग वहां पहुंचते। फिर समोसे, कचौरी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन, चाय/कोल्डड्रिंक का टोकन लेते। फिर राउंड टेबल पर बैठकर इन सब का इंतजार करते। जैसे ही सब तैयार होता बहादुर आकर बताते। वैसे वहां सेल्फ सर्विस थी लेकिन बहादुर मुझे कॉमरेड समझकर हमारे गु्रप की मदद करते। इसके बाद शुरू होता खाने का सिलसिला। किसी को समोसा पसंद तो किसी को मिठाई सब अपनी पसंद की चीज दूसरे से समझौते के तहत लेते अगर नहीं मिलता तो शालीन छीना-झपटी तक हो जाती। खैर परिणाम दोनो पक्षों के लिए सकारात्मक ही रहता। इसके बाद कुछ कविताएं, चुटकुले, हंसी-मजाक और फिर सब अगले आयोजन के इंतजार में चले जाते। ऐसा होता था आयोजन।

खैर यह बात पुरानी हो चुकी। इसके बाद गंगा में चार साल से ज्यादा पानी बह चुका है। लेकिन बनारसी सहपाठियों के फोन आने से यादें ताजा हो गईं। इसके अलावा कई दोस्तों के फोन आए। एसएमएस आए। मेल आए, चैटिंग हुई। ऑरकुट पर स्क्रैब आए हर साल की तरह। रात को एक पुराने दोस्त के फोन के साथ यह सिलसिला बंद हुआ। इस बार मुझे मिला सबसे खास एसएमएस मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ, जो मुझे मेरे छोटे भाई दीपू ने भेजा है-


भाई आपको जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं। मैं यह नहीं कहूंगा कि आने वाले साल में आपके लिए 50,000 दिन हों। हां, मैं भगवान से यह मनाऊंगा कि आपके आने वाले 365 दिन बीते 365 दिनों से बेहतर हों। जीवन के संघर्ष में सफलता आपका वरण करे और आपका जीवन सार्थक हो।- आमीन-सुम्मामीन

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

शक्ति साधना-4-9


कूष्माण्डेति चतुर्थतकम्
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।। मां दुर्गाजी के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। अपनी मंद, हल्की हंसी से अंड यानी ब्रह्मड को उत्पन्न करने के कारण माता को यह नाम दिया गया है। इनकी आठ भुजाएं हैं। आठों हाथों में क्रमश: कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा तथा जपमाला है। इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। इस कारण कूष्माण्डा कही जाती हैं।
पञ्चमं स्कन्दमातेति
सिंहासनागता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवि स्कन्दमात यशस्विनी।। मां दुर्गा के पांचवें रूप की पूजा मां स्कन्दमाता के रूप में की जाती है। कुमार कार्तिकेय (भगवान स्कन्द) की माता होने के कारण देवि को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। सिंह वाहिनी चतुर्भुजी मां की गोद में भगवान स्कन्द बैठे रहते हैं।
षष्ठं कात्यायनीति च
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शर्दूलवरवाहना। कात्यानी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी।। मां दुर्गा के छठें रूपा की पूजा मां कात्यायनी के रूप में होती है। महर्षि कात्य की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण मां कात्यायनी नाम से जानी गर्ईं। कालान्तर में पृथ्वी पर महिषसुर का अत्याचार बढऩे पर ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अंश से एक देवी अवतरित हुर्ईं। इनकी प्रथम पूजा महर्षि कात्यायन ने की। व्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवि मां अमोघ फलदायिनी हैं। चतुर्भुज मां केहरि वाहन पर विराजित हैं।
सप्तम् कालरात्रीति
एकवेणि जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्याक्तशरीरिणी। वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धनमर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भङ्करी।। मां दुर्गा का सातवां रूप कालरात्रि है। इनके शरीर का रंग घेन अन्धकार की तरह काला है। सिर के केश बिखरे हैं और गले में विद्युत सी चमकने वाली माला है। त्रिनेत्री मां के श्वास-प्रश्वास से भयङ्कïर ज्वालाएं निकलती हैं। गर्दभ वाहिनी मां का रूप भले अत्यन्त भयानक हो लेकिन ये सदैव शुभ फल देती हैं। इसी कारण से इनका एक नाम शुभङ्करी भी है।।
महागौरीति चाष्टमम्
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि:। महागौरी शुभं दद्यन्महादेवप्रमोददा।। मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। श्वेतवर्णा मां के समस्त वस्त्र श्वेत हैं और इनका वाहन वृषभ है। त्रिशूल, डमरू और कमंडलधारी मां ने शिव को वर रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की। गोस्वामी तुलसीदासजी के अनुसार इन्होंने संकल्प लिया था- जन्म कोटि लगि रगर हमारी, बरऊं संभु न त रहउँ कुँआरी।। इनकी उपासना से भक्त के सभी कल्मष धुल जाते हैं।
नवमं सिद्धिदात्री
सिद्धगन्धर्वयक्षद्यैरसुरैरमरैरपि। सिसेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।। मां दुर्गा का नौवां रूप सिद्धिदात्री का है। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया।

एक छोटा सा एसएमएस

कल मेरे छोटे भाई दीपू का छोटा सा एसएमएस आया। उसे अविकल प्रस्तुत कर रहा हूं। इसे पढ़कर बीते दिन तो याद आए ही, यह भी लगा कि दीपू बड़ा हो रहा है।
एक दिन जिंदगी ऐसे मुकाम पर पहुंच जाएगी
दोस्ती तो सिर्फ यादों में रह जाएगी।
हर कप कॉफी याद दोस्तों की दिलाएगी
हंसते-हंसते आंखें नम हो जाएंगी।
पैसा तो बहुत होगा...मगर,
उन्हें खर्चनें की वजह खत्म हो जाएगी।
ऑफिस के चेंबर में क्लासरूम नजर आएगी,पर
लाख चाहने के बाद भी यहां प्रॉक्सी सी नहीं लग पाएगी।
जी ले! खुल के इस पल को मेरे दोस्त
क्योंकि जिंदगी इन पलों को फिर नहीं दोहराएगी.....

रविवार, 20 सितंबर 2009

शक्ति साधना-3

तृतीयं चंद्रघण्टेति


पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यचंद्रघण्टेति विश्रुता।।
मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि के तीसरे दिन शक्ति के चंद्रघंटा स्वरूप की उपासना की जाती है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र होने के कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। शेर पर विराजित मां के दस हाथों में त्रिशूल, गदा, खड्ग आदि शस्त्र-अस्त्र हैं। युद्ध की मुद्रा में उद्यत रहने वाली चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं और समस्त पाप व बाधाएं नष्टï हो जाती हैं।


शक्ति साधना-2

द्वितीयं ब्रह्मचारिणी


दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
मां दुर्गा की नौ शक्तियों में दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या और ब्रह्मचारिणी अर्थात् तप की चारिणी-'तप का आचरण' करने वाली। नवरात्र के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की आराधना करते हुए भक्तों को आचरण की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। शुद्ध और संयमित आचरण के साथ ही तप, त्याग, वैराग्य और सदाचार का मार्ग प्रशस्त होता है। संयमता व्यवहार, दृष्टि, वाणी व आचरण में रहनी चाहिए। इससे व्यक्ति लक्ष्य को आसानी से प्राप्त करता है। वहीं गुरु और माता-पिता की तपस्या (उपासना) से गुणों की वृद्धि श्रेष्ठ समाज निर्माण में सहायक होती है। ब्रह्मïचारिणी माता के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमण्डल रहता है।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

शक्ति साधना-1

प्रथमं शैलपुत्री



वंदे वांछितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।
नवरात्रि में मां दुर्गा के पहले रूप की पूजा मां शैलपुत्री के रूप में की जाती है। पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। बैल पर विराजित माता दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल धारण किए हैं। हिमालय शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरता का प्रतीक है, इसलिए इस दिन अपने स्थायित्व व शक्तिमान होने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। वहीं बिना निमंत्रण कहीं भी जाने का भाव का त्याग करना जरूरी है। पूर्व जन्म में पिता प्रजापति दक्ष के नहीं बुलाने पर भी सती यज्ञ में सम्मिलित हुई और तिरस्कार से व्यथित सती ने अपने शरीर को भस्म कर दिया।
शक्ति साधना के पर्व नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं।।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

कांग्रेस की क्लास, चीन की कुदृष्टि, देश की इकॉनमी और गांधी-आजाद

विधानसभा उपचुनाव परिणाम की बात छोड़ दें तो राजनीति में जो खबर सबसे ज्यादा चर्चा में है और जिस खबर को सबसे ज्यादा चर्चा दी जा रही है वह है सोनिया गांधी का इकॉनमी क्लास में सफर करना। कांग्रेस अध्यक्ष ने सोमवार को इकॉनमी क्लास में यात्रा की तो मंगलवार को उनके साहबजादे ने शताब्दी एक्सप्रेस में। कहीं ब्रेकिंग न्यूज चली और कहीं फोटो के साथ खबर। इसके पहले खबर आई थी कि मैडम ने केंद्रीय मंत्रियों को किफायत की नसीहत क्या दी, मंत्री उलटा बोलने लगे। खैर पहल की सरकार के खजांची प्रणब दा ने उन्होंने सामान्य यात्रियों के साथ विमान में यात्रा की। दूसरी ओर, महीनों से देश के सबसे महंगे होटलों के सबसे महंगे कमरों (सुइट) में रह रहे विदेशमंत्री और उनके जूनियर भी यहां से निकलकर सरकारी अतिथि गृहों में पहुंच गए। वैसे दोनों नेताओं ने तो कहा कि उनका किराया उनकी जेब से गया लेकिन इस दौरान इन होटलों में हुई मीटिंग का खर्च सरकार के खाते से लिया गया। जब रायता ढुल गया तो सरकार लगी उसे साफ करने की कोशिश में। खैर लगी रहे सरकार......

कांग्रेस के इस दांव से भाजपा के पेट में दर्द तो होना ही था, सो हुआ भी। पार्टी के प्रवक्ता कहने लगे कि यह ढोंग है। इतना तो चलता है लेकिन वरिष्ठ राजनीतिक विचारक ने एक चैनल पर कांग्रेस की इस पूरी कवायद को पाखंड बताया। पाखंड ही तो है। जिनकी एक यात्रा में लाखों का पेट्रोल दर्जनों गाडिय़ों के लिए चाहिए। सुरक्षा अभेद कवर, जिसका खर्च सरकार की जेब से जा रहा है और ऐसी ही तमाम सुविधाएं मिल रही हैं तो क्या मतलब चाहे इकॉनमी क्लास हो या चेयरकार? कांग्रेस ही नहीं अन्य दलों के सभी पाखंडी नेताओं से कहना चाहता हूं कि अगर कुछ करना है तो निकलिए लोकल ट्रेन या दिल्ली की बसों में। या फिर गोरखपुर से मुंबई, पटना से मुंबई, हाजीपुर से असम वाली ट्रेन के स्लीपर और सामन्य कोच में। तब समझ में आएगा कि कैसे रह रही है जनता और कैसे चल रही है भारत की जनता?

होना और दिखाना
बहुत साल पहले एक कविता सुनी थी। उसमें गांधीजी और चंद्रशेखर आजाद की तुलना करते हुए कवि ने जो कहा था उसका भावार्थ यह है कि गांधी जी के बंदी घर भी महलों और भवनों में होते थे, जबकि आजाद जंगलों में मौत के साए में सोते थे। बकरी का दूध ही सही गांधी जी कुछ तो पीते थे, जबकि आजाद को भुने चने भी कभी-कभी किस्मत से मिलते थे। बुजुर्ग गांधी ने चौथेपन में आधी धोती पहनना शुरू किया जबकि आजाद भरी जवानी में एक लुंगी में रहते थे और जो सबसे आखिरी बात उन्होंने कही वो यह कि गांधी जी हमेशा झुकते रहे, पर आज गरजता रहा। गांधी जी गुलाम से आजाद हुए आजाद सदा आजाद रहा। किसी ने कहा था कि गांधीजी को जैसा वो दिखते थे वैसा दिखाने में कांग्रेस बहुत खर्च करना पड़ता था।

यहां मेरे यह कहने का निहितार्थ यह था कि राहुल-सोनिया या ऐसे ही अन्य राजनेता अगर सामान्य कोच में भी बैठेंगे तो वह एसी जैसा होगा, जबकि आम आदमी को एसी में भी वह सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। दूसरा यह कि इस दिखावे में जो खर्च हो रहा है और सुरक्षा के साथ खिलावड़ किया जा रहा है वह ठीक नहीं है। खैर हरि अनंत, हरि कथा अनंता.....

चलते-चलते
इन दिनों डै्रगन फिर भारत की ओर मुंह बाए खड़ा है। खड़ा तो वह पहले से ही था लेकिन अब दिखने लगा है लेकिन खास बात यह कि हमारी सरकार मौन है। यह मौन वैसा ही जैसा 1962 में था, जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ा। चीनी चीटियां आए दिन भारत में घुसकर बिल खोद रही हैं लेकिन सरकार किफायत की कवायद के दिखावे में लगी है। खास बात है कि चीन इस बार भारत को तीन ओर से घेर रहा है। पाकिस्तान तो उसकी गोद में बैठा ही है, नेपाल भी उसके सामने घुटने टेक चुका है। नेपाल की राजशाही कम से कम भारत के लिए अपेक्षाकृत ठीक थी। पाक रॉकेट पर रॉकेट दाग रहा है। नेपाल ऊटपटांग बयान दे रहा है लेकिन हमारे विदेशमंत्री इकॉनमी क्लास में यात्रा करने की घोषणा कर रहे हैं और उनके जूनियर बांगाली छोले भटूरे खाने में मशगूल हैं। कहने कहा लब्बो-लुबाब सिर्फ इतना है कि अगर सरकार अब भी नहीं चेती तो कहीं देर न हो जाए.......?

रविवार, 13 सितंबर 2009

हिंदी




बिहरो बिहारी की बिहार वाटिका में चाहे
सूर की कुटी में अड आसन जमाइए।

केशव के कुंज में किलोलि केलि कीजिए,कि 
तुलसी के मानस में डुबकी लगाइए।

देव की दरी में दूर दिव्यता निहारिए
या भूषण की सेना के सिपाही बन जाइए।

अन्य भाषा भाषियों मिलेगा मनमान सुख, 
हिंदी के हिंडोले में जरा सा बैठ जाइए।।

जै हिन्दी, जै हिन्दुस्तान 


(ये पंकि्तयां हिंदी की सुंदरता और समृद्धता बताती हैं। आप को पता हो तो जरूर बताएं किसकी लिखी हैं और पूरा छंद कहां मिलेगा.....?उत्तरापेक्षी

क्षणभर सोचा

एक शाम तेरे नाम 

कट गई लंबी जुदाई
मिलन की बेला आई
चेहरे पर हंसी रहे
घडिय़ां थमीं रहें

सिलसिला हो बात का
स्नेह के जज्बात का
एहसास हो तेरे साथ का

न दूर तक कहीं कोई
न आसमां, न जमी कहीं
न किसी की हो खबर
न किसी को हो खबर
बेखबर, सब बेखबर
तुम रहो और हम रहें
न तुम रहो, न हम रहें.

शनिवार, 12 सितंबर 2009

जनता महा ज्ञानी मैं जानी

आजकल देश की राजनीति में ज्यादा हलचल नहीं है। दो राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं लेकिन तैयारी अभी अंदरखाने ही चल रही है। हरियाणा में कांग्रेस ओवरकॉन्फीडेंस में है तो महाराष्ट्र में उसे हालिया लोकसभा चुनाव परिणाम दोहराने की आस है। खैर यह इंडिया की जनता है। जैसे कोस-कोस पर पानी बदले और चार कोस पर बानी वैसे ही हर चुनाव के साथ जनता का मन भी बदलता रहता है। इतिहास इसका गवाह है। वैसे भी महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ डाली है। अब लगता है जनता महंगाई के साथ जीना सीख गई है। तभी तो न कोई धरना, न प्रदर्शन न मोर्चा। ये तो जनता जाने लेकिन हम जो जानते हैं वो यह कि जनता महा ज्ञानी मैं जानी मैं जानी। इधर सरकार किफायत पर जुट गई है। एक अखबार ने दो मंत्रियों के फाइव स्टार होटल में रहने की खबर क्या ब्रेक की सरकार हिल गई। होटल भी क्या? जहां एक कमरे का एक दिन का किराया एक लाख रुपए। आम जनता यह नहीं समझ पाई कि आखिर एक लाख रात वाले कमरे में हमारे नेता जी करते क्या होंगे? मैडम ने बोला कि नेता किफायत बरतें। कैबिनेट में बात आई तो कुछ ने एतराज भी जता दिया। इधर, सरकार के खजांची प्रणब दा भी कुछ ऐसा ही ज्ञान दे रहे हैं। ऐसे में राहुल बाबा कैसे चुप रहें। जहां थे वहीं से खर्च कम करने का ज्ञान दे दिया। अब कोई बात हो तो बाबा का बोलना जरूरी है, सो बोल दिया। देखना है कि होता क्या है? लेकिन एक बात पर कांग्रेस बोलने से कन्नी काट रहे हैं। वो यह कि आंध्र का अगला सीएम कौन होगा? कांग्रेस की परंपरा पर चलें तो जगनमोहन रेड्डी को बनना चाहिए, लेकिन आलाकमान अभी कुछ कह नहीं रहा। रुकावट उनके अनुभव को लेकर पैदा की जा रही है। खैर अनुभव तो कांग्रेस में मायने रखता नहीं। यहां तो परिवार सबसे ऊपर है। कोई बताएगा क्यों? यही सबसे बड़ी काबिलियत,जो जगन के पास है।
चलते-चलते
आजकल गुजरात फर्जी मुठभेड़ को लेकर खूब हो-हल्ला है। अगर मुठभेड़ फर्जी थी तो गलत था। अन्याय किसी के साथ हो गलत है। सबसे ज्यादा हल्ला कांग्रेस और वामपंथी भाई मचा रहे हैं। वही कांग्रेस जिसकी सरकार कोर्ट में यह हलफनामा देती है कि इशरत का आतंकियों से रिश्ता था। केंद्रीय गृहसचिव कहते हैं, इशरत का आतंकियों से संबंध तो था लेकिन मुठभेड़ गलत। खैर गलत सही बताने का काम तो सरकार और कानून का है। अपन तो बस इतना याद दिला रहे हैं कि मणिपुर में हाल ही में दो फर्जी मुठभेड़ के मामले सामने आए हैं। जम्मू-कश्मीर में ऐसे मसले आए दिन होते रहते हैं। और वामपंथी भाइयों क्या सिंगूर, नंदीग्राम भूल गए क्या? अपना काम तो था याद कराना सो करा दिया, बाकी पहले ही कह चुका हूं- जनता महा ज्ञानी मैं जानी।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

ब्रेकिंग न्यूज... भाजपा में कलह

देश की सबसे बड़ी समस्या भाजपा की अंतर्कलह

आज कल हमारे ईमानदार, जिम्मेदार, गंभीर, राष्ट्रभक्त समाचार चैनल (लों) में दिनभर लगभग यही ब्रेकिंग न्यूज चल रही है। वह भी तब जब देश बहुत कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। सूखा, बाढ़, स्वाइन फ्लू और महंगाई ये बड़ी समस्याएं जो देश के सामने मुहं बाए खाड़ी हैं। देश का आम आदमी इसमें पिस रहा है। लेकिन हमारे चैनलों के प्राइम टाइम तो छोडि़ए किसी भी टाइम इन मुद्दों पर खबर दिखाने के लिए टाइम नहीं है। क्यों नहीं है यह तो वही जाने लेकिन हम जो देख रहे हैं वो यह कि भाजपा के किसी नेता ने कुछ बोला तो वह नेशनल लीड बनाया जा रहा है। जसवंत सिंह जो अक्सर बोलते रहे और जब बोला कुछ न कुछ विवाद जरूर हुआ। ऐतिहासिक तथ्यों का ज्यादा ज्ञान तो मुझे भी नहीं है लेकिन आम धारणा यही है कि जिन्ना देश के बंटवारे के सूत्रधार रहे। धारणा यह भी है कि गांधी जी चाहते या दूसरे शब्दों में कहें तो अड़ जाते तो शायद विभाजन न होता। यही चीज पंडित नेहरू के बारे में भी लागू होती है। (यह मैं आम लोगों में प्रचलित धारण की बात कर रहा हूं। न तो यह मेरे शोध का परिणाम है और न ही ज्ञान का।) लोगों का मानना है कि अगर पंडित नेहरू की जगह सरदार पटेल प्रधानमंत्री बने होते तो देश की दिशा-दशा दोनों अलग होती। खैर पंडित नेहरू प्रधानमंत्री क्यों बन गए ओर सरदार पटेल क्यों नहीं बने यह तो इतिहास के विद्वान बताएं। हम तो आज की बात करते हैं।

यह करो, फिर यह भी करो

जसवंत ने अपनी किताब में विभाजन का जिम्मेदार सरदार पटेल और नेहरू को ठहराया और जिन्ना को महान बताया (जैसा की खबरों में पढ़ा है) यह भाजपा क्या देश की आम जनता को भी स्वीकार नहीं होना था। अगर केवल पंडित नेहरू या गांधी जी को ठहराया होता तो भाजपा इतना सख्त कदम न उठाती। किताब के मार्केट में आने से पहले ही देश के कुछ 'गंभीर' समाचार चैनलों ने पटेल के बारे में कही बातें कोट कर यह कहना शुरू किया कि भाजपा के जसवंत के खिलाफ कार्रवाई करे (अपरोक्ष)। चैनलों के प्राइम टाइम में इस पर डिबेट हुई। एसएमएस मंगाए गए और फिर चैलन के जरिए कथित तौर पर जनता का फैसला भी सुनाया गया। जब भाजपा ने जसवंत को निकाल दिया तो भाजपा के पीछे पड़ गए कि अब लालकृष्ण आडवाणी को क्यों नहीं निकाला जा रहा? भाजपा से निकल चुके या निकाले जा चुके लोगों को टीवी पर घंटों जगह दी गई। देश के नामी पत्रकार ने अरुण शौरी का इंटरव्यू किया। उनका पूरा इंटरव्यू टीवी पर तो दिखाया नहीं इतना जरूर है जो दिखाया वह भाजपा के खिलाफ था। शौरी जी देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। जहां तक मुझे याद है- बोफोर्स मामले का खुलासा शौरी जी की ही कलम से हुआ था जिससे देश में कांग्रेस की जड़ें हिल गर्ईं थीं। वे पढऩे-लिखने वाले राजनेता हैं, जिनकी की देश को जरूरत है।

इस खबर से किसका फायदा होगा?
चुनाव और चुनावी मौसम बीतने के बाद मैं राजनीति पर लिख नहीं रहा था लेकिन आज रहा नहीं गया। मैं यह समझना चाहता था कि आखिर हमारे गंभीर और जिम्मेदार समाचार चैनलों की इस कवायद से फायदा किसका होगा? क्या जनता का होगा? क्या देश का होगा? या किसी और का होगा? बड़ी माथापच्ची के बाद भी मुझे इसमें आम आदमी या देश का कोई फायदा नहीं नजर आया। हां! आम आदमी की धारणा है कि इससे कांग्रेस का फायदा जरूर होगा। दअसल, अगले कुछ महीनों में तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र। तीनों राज्यों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है। हरियाणा को छोड़ दें तो महाराष्ट्र कांग्रेस की हालत ठीक नहीं है और झारखंड में भी उसकी हालत पतली मानी जा रही है। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि चैनल कांग्रेस के कहने पर चलते हैं लेकिन जो दिखा रहा है उससे तो यही लगता है कि चैनल कांग्रेस की आवाज बोल रहे हैं। मनमोहन ने 100 दिन में आम आदमी को राहत देने का वादा किया था लेकिन इन 100 दिनों में आम आदमी का खून चूस लिया। चैनलों पर महंगाई की खबर नहीं है। जनता पिस गई है। लगभग आधा देश सूखे से और आधा देश बाढ़ से त्राहि-त्राहि कर रहा है लेकिन हमारे चैनलों को इसकी चिंता नहीं है। उन्हें चिंता है कि भाजपा की कुनबा बिखर रहा है। पता नहीं चैनल कुनबा सुधारने में जुटे हैं या फिर और बिखराकर कांग्रेस का रास्ता साफ करने में यह तो समय बताएगा।

आम आदमी की धारणा
मेरी एक आम आदमी से बात हुई उसने कहा, मेरी भाजपा से सहानुभूति है लेकिन मैं यह नहीं चाहता कि चैनल उसकी खबरें न दिखाएं। हां इतना जरूर चाहता हूं कि चैनल यह भी दिखाएं-

* हरियाणा में जाति पंचायत ने एक युवक की जान ले लीं। वहां की पंचायतें आए दिन ऐसे आदेश दे रही हैं। हरियाणा में कांगे्रस की सरकार है क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं। क्या किसी चैनल ने हरियाणा के मुख्यमंत्री को कठघरे में खड़ा किया? नहीं किया लेकिन क्यों नहीं?

* पिछले पांच साल में विदर्भ सैकड़ों किसानों ने आत्महत्या कर ली। पांच साल से केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार है। इन मौतों का जिम्मेदार कौन होगा? क्या किसी चैनल ने प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष, कांग्रेस के वरिष्ठ महासचिव राहुल गांधी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, केंद्रीय कृषि मंत्री से यह सवाल पूछा? राहुल बाबा यूपी और एमपी सहित संसद में जिस कलावती का जिक्र करते हैं वह महाराष्टï्र की ही है।

* देश बाढ़ और सूखे की दोहरी मार से जूझ रहा है। क्या किसी चैनल से केंद्र या राज्य सरकार से जानने की कोशिश की कि हर साल आने वाली इस विभीषिका से निपटने के लिए क्या दूरगामी कदम उठाए जा रहे हैं? किसी राज्य को करोड़ों का अनुदान और किसी को ठेंगा। बुंदेलखंड जैसे इलाके जहां की राहत की जरूरत है, उसपर निरा राजनीति क्यों? जैसा बुंदेलखंड के लिए प्राधिकरण बनाया जा रहा है वैसा ही विदर्भ के लिए क्यों नहीं? नदी जोड़ो परियोजना का क्या हुआ?

* महंगाई आसमान छू रही है। गरीबों के मुंह का निवाला छीना जा रहा है। दाल 100 किलो तक बिकी। चीनी 40 तक पहुंची। चावल, गेहूं, दूध सब में आग लगी है। सरकार क्या कर रही है। नारा दिया 'कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ' और चुनाव के 100 दिन नहीं बीते कि वही हाथ सीधे आम आदमी के मुंह पर दे मारा। पेट्रोल पांच रुपए महंगा, डीजल तीन रुपए महंगा... एक बार की बात है जब प्यास 80 रुपए किलो बिकी। मीडिया और चैनलों ने हाहाकार मचा दी। दिल्ली की सत्ता पलट गई। पर आज महंगाई पर कोई चैनल कुछ नहीं बोल रहा क्योंï? आखिर दिल्ली में आज दाल 100 रुपए किलो बिक रही है? यह भी सनद रहे कि एक केंद्रीय मंत्री की महाराष्ट्र में दर्जनों चीनी मिले हैं।

* मायावती यूपी में हाथी की मूर्तियां लगवा रही हैं। गलत हैं। मैं माया का पक्षधर नहीं। पर देश में मूर्तियां लगवाने की परंपरा शुरू किसने की? बांद्र-वर्ली पुल का नाम वीर सावरकर के नाम से बदलकर राजीव गांधी सेतु कर दिया गया। पर किसी चैनल ने सवाल नहीं उठाया। क्या पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के अलावा देश में महान विभूतियां नहीं हैं। क्या किसी चैनल ने कभी यह सवाल पूछा किया देश में कितने नामकरण गांधी-नेहरू परिवार के लोगों के नाम पर किए गए हैं? अगर किसी ने कांग्रेस को ऐसा करने से रोका होता तो आज मायावती की हिम्मत न होती हाथियां लगवाने की या अपनी मूर्तियां सजवान की।

* सोमनाथ चटर्जी को माकपा ने निकाल दिया। तब माकपा का कुनबा टूटता नहीं दिखा। विजयन और अच्युतानंदन विवाद सड़कों पर आया लेकिन माकपा का कुनबा टूटता नहीं दिखा। पश्चिम बंगाल में एबी बर्धन माकपा पर बरसे तब भी वाममोर्चा टूटता नहीं दिखा। आखिर क्यों? जितनी बड़ी हार भाजपा की हुई उससे ज्याद बड़ी माकपा की लेकिन.....

* अब बात स्वाइन फ्लू की। बीमारी दुनिया में फैली लेकिन हमारी सरकार नहीं चेती। पुणे में पहली मौत हुई तो स्वास्थ्य मंत्री ने कहा गलती मरीज के परिजनों की थी। किसी चैनल ने उनकी जुबान नहीं पकड़ी। यही कारण है कि आज देश में इससे 75 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। स्वाइन फ्लू के सबसे ज्यादा शिकार महाराष्ट्र में बने जहां कांग्रेस की सरकार है। क्या इन मौतों की जिम्मेदार कांग्रेस नहीं? अगर है तो क्यों नहीं कांग्रेस से सवाल होता? यह मामला प्राइम टाइम की खबर क्यों नहीं बनता? क्यों नहीं इस सवाल एसएमएस मंगाए जाते- स्वाइन फ्लू से महाराष्ट्र में हुई मौतें केंद्र की लापरवाही से हुईं या राज्य सरकार की लापरवाही से?

और चलते-चलते....
मुझे पूरी उम्मीद है कि इस बारे में चर्चा होगी। उम्मीद तो यह भी है कि सवालों का जवाब मिलेगा। लेकिन मेरा मकसद यह नहीं। मकसद यह है कि महंगाई कम हो, बाढ़ और सूखे से हमेशा के लिए निजात मिले, स्वाइन फ्लू और ऐसी ही अन्य महामरियां आम आदमी को अपना शिकार न बनाएं, समाचार चैनलों के प्राइम टाइम में और अखबारों के फं्रट पेज पर महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या, पंचायतों की तानाशाही की खबरें हों और इसे लिए जिम्मेदार सरकारों से भी सवाल किए जाएं।
आमीन....सुम्मामीन

बुधवार, 5 अगस्त 2009

मेरी दी

जेठ की दुपहर में फुहार बनके आई,
मेरे सूखे जीवन में बहार बनके आई।
रेशम की डोर से बांधकर मुझको,
मेरे लिए बहन का प्यार बनके आई।।

दी को समर्पित यह पंक्तियां 2004 में मुझसे अनायास ही बन गई थीं। लोग कहते थे कि वो मेरी मुंहबोली बहन थी पर मुझे ऐसा कभी नहीं लगा। वो तो सिर्फ बहन थी मेरी, जिसे प्यार से मैं दी कहता था। दी मुझे बहुत प्यार करती थी/है। इसे संयोग कहें या विधि का विधान? मेरे और दी के जन्मदिन में साल को छोड़ दें तो पांच दिन का फर्क था और मेरी उसकी शादी भी एक ही महीने में हुई। यहां भी तारीखों का फर्क सिर्फ पांच ही दिनों का था। मेरे उसके विचार-व्यवहार और कार्य में भी ढेरों समानताएं थीं। मेरा दर्द उसकी आंखों में झलकता था तो उसकी तकलीफ मेरे आंसू बनकर निकलती थी। ऐसा था हमारा प्यार।

अब
सुनिए कि दी कैसी थी। गिलहरी जैसा छोटा सा मुंह, वैसी ही चंचलता। खाने की इतनी शौकीन की पूछिए मत। जैसी गिलहरी मस्ती से दीन-दुनिया से बेखबर हाथ लगे फल को खाती है वैसी ही वो थी। राह चलते मूंगफली खाना, भूजा खाना, समोसा खाना उसकी पसंदीदा आदतें थीं। उसे यह भले न पता रहे कि कल किस विषय का एग्जाम है लेकिन किस हलवाई की दूकान का समोसा अच्छा है, कहां की लस्सी, किसका लौंग लता और किसके गुलाब जामुन उसे जरूर पता रहता था। सिर्फ पता ही नहीं, उसके खाने का तरीका भी बहुत अच्छा था। समोसे का एक कौर काटने के बाद अपनी आंखें पूरी फैलाकर मेरी ओर देखती थी। बोलती नहीं थी, यूं कहूं मुंह में इतना भरा रहता था कि बोल नहीं पाती थी। पता नहीं वह समोसे का स्वाद महसूस करती थी या आखों के जरिए सबको बताती थी? उसका खाना भी उसकी ही तरह अद्भुत और अद्वितीय था।

खाने की आदत पर जब मैं कहता तुम्हारी शादी हलवाई से करवा दूं तो खुश हो जाती और कहती तुम जब आओगे तो तुम्हें भी खिलाऊंगी। सड़क पर चलते-चलते पता नहीं किस गाने पर थिरकने लगे? एक बार की बात है, हम बहुत व्यस्त बाजार से गुजर रहे थे। तभी कहीं गाना बज रहा था- मुझसे शादी करोगी..... बस फिर क्या लबे रोड थिरकने लगी तो उसे रोकना पड़ा। एक बार हमलोग विंध्याचल गए थे। बस से लौटने लगे तो बोर हो रहे थे। मैंने कहा तुम्हारी शादी में मैं आऊंगा तो क्या करना पड़ेगा? बस फिर क्या शुरू हो गई। सब के काम बंट गए। कोई नाई बना, कोई हलवाई, किसी के जिम्मे सफाई का काम आया और किसी के बधाई गाने का। मेरे जिम्मे आया उसको खिलाने का।
तब तक मैंने एक मोबाइल ले लिया था। यूनिवर्सिटी में दो दिन की छुट्टी थी सो मैं घर आया था। उधर दी हॉस्टल में अपनी प्रिय सहेली के साथ घूम रही थी। तभी उन लोगों ने हॉस्टल के गार्डन में किसी लड़की को रोते और फोन पर बात करते सुना। संयोग से वह लड़की जिससे बात कर रही थी उसका और मेरा नाम एक था। इतना सुनते ही उनके कान खड़े हो गए। दी ने मुझे फोन मिलाया। अब दुर्योग देखिए उस समय मेरा भी फोन व्यस्त था। फिर क्या हुआ पूछिए मत? मेरे बारे में सारी भड़ास निकाल ली। बिगड़ गया है, आने दो बताती हूं आदि, आदि.....। थोड़ी देर बाद मेरा फोन मिल गया। छूटते ही पूछा किससे बात कर रहे थे? मैंने बताया तो बोली मेरी कसम झूठ मत बोलना और जब मैंने उसकी कसम लेकर वही बात कही तो वह मान गई। उसे पता था कि मैं उसकी झूठी कसम नहीं ले सकता। उसके गुस्से की बात मुझे आने के बाद उसकी सहेली से पता चली।

समोसे या खाने पीने की चीजों की छीना झपटी और बस में खिड़की के बगल बैठने की बात छोड़ दें तो मेरी उससे कभी लड़ाई नहीं हुई। हां हमारा प्यार और विश्वास रिश्ते की उम्र के साथ बढ़ता गया। वो क्या-क्या करती थी बताने बैठूं तो उम्र गुजर जाए। 2005 में वह वह अपने घर चली गई और मैं अपने घर। उससे बात किए चार साल भले बीत गए हों लेकिन वो आज भी मेरे मन में है। मेरे दिल में है। वैसे तो साल के 365 दिन वह मुझे याद आती है लेकिन आज के दिन मैं उसे भूलता ही नहीं। चार साल पहले उसने मुझे राखी बांधी थी। मुझे घर जाना था। सुबह मैं उससे मंदिर में मिला। राखी और मिठाई लेकर राखी बांधकर एक मिठाई मेरे मुंह में डाली और एक अपने। वो सुबह आज भी मुझे याद है। उससे मिलने के बाद मुझे आज तक यह कभी नहीं लगा कि मेरी कोई बहन नहीं। लगे भी कैसे मिल जो गई थी। ये कहानी मेरे दिन के बहुत करीब है। उतनी है जितनी दी। दी जहां भी हो खुश रहे, क्योंकि उसके चेहरे पर सिर्फ खुशी अच्छी लगती है।
आप सबको रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं।

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

आजाद तुम्हारी जय हो

सादर नमन
आज ही के दिन 1906 में पैदा हुए आजाद अंग्रेजों का सामना करते हुए 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के आजाद पार्क (तब अल्फे्रड पार्क) में शहीद हो गए। तब उनकी उम्र मात्र 25 साल थी। मैं स्वातंत्र समर के महान सेनानी को नमन करता हूं।
वाह रे नेता, बहुत खूब मीडिया
...और आजाद को भी भुला दिया। सरकार ने तो भुलाया ही हमारे देभभक्त चैनल वाले भी भूल गए। राखी का स्वयंवर का और सच का सामना जैसे भोथरे कार्यक्रमों की क्लिपिंग दिखाकर टीआरपी बढ़ाने वाले न्यूज चैनलों को लानत है। सरकार की क्या कहूं? आजाद के नाम पर वोट थोड़े लेना है जो उनको याद करें। अरे जिनकी वजह से आजाद हवा में सांस ले रहे हो उनको रस्म आदयगी के लिए ही सही याद करने का नाटक भर तो कर देते। खैर लिखा इसलिए नहीं कि तुम्हारे याद करने से कोई फर्क पड़ता है, ये लिखा इसलिए ताकि हमको तो सनद रहे....

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

अब आदमी का आदमी से प्यार करना जायज

देश में समलैंगिकता को वैध करने की ओर एक कदम और बढ़ गया। हाईकोर्ट के फैसले के बाद आदमी सरकार पहले से ही ऐसे लोगों के प्रति उदार रुख दर्शा रही थी। अब कोर्ट ने उसका रास्ता साफ कर दिया है। माननीय कोर्ट ने परिस्थतियों के आधार पर फैसला दिया होगा, लेकिन देश की संस्कृति की अनदेखी की गई है। कानून भले इसे मान्यता दे लेकिन समलैंगिक संबंध को सामाजिक मान्यता मिलना नामुमकिन है। क्योंकि प्रकृति विरुद्ध होने के साथ ही यह सभी धर्मों के विरुद्ध है। ऐसा हो तो कैसा होगामैं जो भी कह रहा हूं वह कोर्ट के फैसले पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर जो इस फैसले का समर्थन कर रहे हैं उनके लिए कह रहा हूं। अब पुरुष से पुरुष का (गे) और महिला से महिला (लेस्बियन) का संबंध अपराध नहीं माना जाएगा।

सोचिए जरा कैसा होगा
किसी का बेटा अपने मां-बाप से कहे कि वह एक लड़के से प्यार करता है और अगर उसकी शादी नहीं कराई तो वह जान दे देगा। कोई लड़की अपनी मां को बताए कि वह अपनी सहेली से शादी करना चाहती है।

प्रकृति की ऐसी की तैसी

स्त्री का पुरुष से संबंध प्रकृति ने बनाया है। प्रकृति ने दोनों की शारीरिक संरचनाएं एक दूसरे के अनुकूल बनाई हैं। समाज भले पुरुष प्रधान कहा-माना जाता हो लेकिन वंशवृद्धि और जनन की क्षमता सिर्फ स्त्रीयों में ही है। अब नए संबंध बनने के बाद यह कैसे होगा। पुरुष युगल है तो बच्चा गोद लेगा और स्त्री युगल कृत्रिम गर्भाधान कराएगा। जैसे सूरज पूरब से निकलकर पश्चिम में ही ढलता है, हर जीव का अस्तित्व बीज में होता है, जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है वैसे ही प्रकृति ने पुरुष और स्त्री के संबंध से संसार क्रम आगे बढऩे की व्यवस्था बनाई है। विज्ञान अपवाद स्वरूप इसमें कुछ बदलाव तो कर सकता है लेकिन कुल के बावजूद सूरज पश्चिम से नहीं निकलेगा, जो जन्मा है उसकी मृत्यु को नहीं टाल सकता। जब भी प्रकृति की व्यवस्था से छेड़छाड़ हुई है, तबाही आई है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग, अतिवर्ष, अकाल, सुनामी, आइला जैसी विपत्तियां प्रकृति से छेड़छाड़ का ही नतीजा है। ऐसे में मनोविकृयों के शिकार कुछ लोगों के कहने पर प्रकृति के शास्वत नियम से छेड़छाड़ कितनी भारी पड़ेगी? बात-बात में प्रकृति की दुहाई देने वाले प्रकृति कार्यकर्ता भी इस बात पर चुप हैं।

सामाजिक ढांचा हो जाएगा चौपट
मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे के चलते परिवार तो पहले से ही खत्म हो रहा है अब समलैंगिक संबंधों से केवल मैं और तुम बचेंगे। आधुनिकता और प्रगतिशीलता के नाम पर देश पहले ही बहुत आगे हो चुका है, अब ये नया कदम तो देश को विकसित बना ही देगा। परिवार और समाज के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं रह जाएगा। मुस्लिम, ईसाई धर्मगुरुओं ने इसका विरोध किया है। हिंदू धर्म की तो पूरी व्यवस्था ही तार-तार हो जाएगी। 16 संस्कारों में से बहुतों को तो कथित आधुनिकता पहले ही निगल चुकी है अब बाकी बचे संस्कार भी समाप्त हो जाएंगे। न कोई बच्चों का नामकरण संस्कार करेगा न ही पितरों को पिंडदान होगा। वैश्विक मंदी के दौर में देश को बचाए रखने वाली परिवार व्यवस्था खत्म हो जाएगी।

घूस को भी दी जाए कानूनी मान्यता
अब तक ऐसा होता था लेकिन चोरी-छिपे पर अब होगा खुले आम। कुछ लोग इसे मानसिक समस्या तक मानते हैं। लेकिन इसके समर्थकों का तर्क है कि देश में लगभग 5 करोड़ लोग ऐसे संबंधों में लिप्त हैं। भारत से पहले 126 देशों में ऐसे संबधों को मान्यता प्राप्त है। यह लोग भी इंसान है, इनके भी मूल अधिकार हैं। इन्हें समान जीवन का पूरा हक है, लेकिन क्या इतने मात्र से समलैंगिकता को वैध ठहराया जा सकता है। अगर ऐसा है तो अवैध हथियार का लाइसेंस दिया जाए, घूस को कानूनी मान्यता दी जाए, क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में लोगों के पास अवैध हथियार मिलते रहते हैं और लगभग हर सरकारी दफ्तर में घूस चलता है। तब तो भ्रष्टाचार को भी जायज ठहराया जाना चाहिए। उम्मीद है कि आम आदमी की सरकार देश की सांस्कृतिक, धार्मिक भावना को समझते समलैंगिकता को कानूनी जामा पहनोन से बचेगी।
(प्रवीण भाई की शादी का किस्सा अभी जारी है। सिलमायन, बारात, शादी, चौथी का हाल बजट के बीच या उसके बाद जरूर दूंगा।)

बुधवार, 1 जुलाई 2009

प्रवीण भाई की शादी-2

18 को तिलक और यज्ञोपवीत
18 को बहुत व्यस्त कार्यक्रम था। सुबह से यज्ञोपवीत शुरू हो गया था। वल्कल वस्त्र में प्रवीण भाई कुश के मंडप में बैठकर आचार्य के निर्देशों का पालन कर रहे थे। यह संस्कार पहले शिक्षा ग्रहण के लिए बच्चे को भेजे जाते समय किया जाता था। जिसमें बच्चे को सूत की जनेऊ पहनाई जाती थी और ब्रह्मचर्य का पालन करने का संकल्प दिलाया जाता था। इसके बाद गुरुकुल का कठिन जीवन। बच्चे को यज्ञोपवीत संस्कार के बाद गुरुकुल जीवन यापन के लिए पहले घर से भिक्षा मांगनी पड़ती थी। प्रवीण भाई भी प्रतीकात्मक झोली लेकर खड़े हुए। उनके हाथ में एक तख्ती, एक दंड भी था। अब के लोग तख्ती क्या जाने? आचार्य जी ने कहा- कहो माम् भिक्षाम् देहि, इसके लिए बाद मां, चाची, दादी, मामी, और अन्य रिश्तेदारों ने उन्हें भिक्षा देनी शुरू की। था सबकुछ प्रतीकात्मक लेकिन अपने आप में अद्भुत अनुभव था। सबसे भिक्षा मांगने के बाद परंपरानुसार प्रवीण भाई पूरव की ओर चल पड़े। यह प्रतीक था शिक्षा ग्रहण के लिए काशी जाने के। अब बारी आती है मामा की। मामा जी पहले से ही तैयार थे। बुलाए गए। उनका काम था अपने भांजे को काशी जाने से रोकना। डर था कहीं वहीं पढ़ते-पढ़ते संन्यासी न हो जाए। सो मनाना शुरू किया। तमाम वास्ते दिए, कारण बताए पर नहीं। सो आधुनिक परंपरा के तहत जेब से सोने की अंगूठी निकालकर प्रवीण भाई की अंगुली में डाली और लौटा लाए। यह सब प्रतीकात्मक था। खैर लौटने के बाद आचार्य ने उन्हें गृहस्थ जीवन के नियम बताए और इसके साथ उन्हें वल्कल वस्त्र की जगह सामन्य कपड़े पहनाकर यज्ञोपवीत कार्यक्रम संमन्न हुआ।

पांच सितारा बनाम पंचमेल
अब बारी आई तिलक की। सुबह से तैयारियां शुरू हो चुकी थी। दरवाजे से थोड़ा से दूर तिलकहारों के रुकने के लिए शामियाना और टेंट आदि लगवाया गया था। उम्मीद थी कि 12 बजे तक तिलकहार आना शुरू करेंगे। लेकिन आने लगे 11 बजे से ही। तैयारियां पूरी थी, इसलिए कोई दिक्कत नहीं हुई। काम-धाम संभालने वाले दीपू के साथी थे। सुबह से ही आ गए थे। दरअसल हमारे बगल के गांव में एक तिवारी जी गुजर गए थे सो उस गांव वाले लोग सूदक मानकर नहीं आए। सबकुछ इलाहाबादी छात्रों को ही करना पड़ा। खैर मेनू बता दूं। गर्मी का मौसम था सो आते ही शरबत की व्यवस्था थी। पहले बेल, नींबू, दही, गुड़ का शरबत था लेकिन अब मिश्रांबु, रूह आफजा, रसना जैसे नाम आ गए हैं। पहले तो कुंओं का पानी ही कलेजा तर कर देता था पर अब न तो कुएं बचे हैं और जो हैं भी उनमें पानी नहीं रहा। वैसे भी गांव-गांव तक पानी का पाउच पहुंच गया है। सो पानी ठंडा करने के लिए बरफ मंगाई गई थी। तिलकहार आने शुरू हुए तो लगभग 12:30 तक किश्तों में आते ही रहे। शरबत पीने के गरमी से राहत मिली तो पंचमेल मिठाई की व्यवस्था थी। शहरों में भले ही पांच सितारा होटलों का जलवा हो लेकिन गांवों में आज भी पंचमेल मिठाई (पांच तरह की मिठाई) ही स्तर बताती है। गुलाब जामुन, छेना, कलाकंद, लड्डू के साथ काजूकतली थी। अब पंचमेल की प्लेट में कहीं-कहीं समोसा तो कहीं-कहीं कटलेट ने भी जगह ले ली है। खैर ये भी परोसा गया। इस बीच स्टोर रूम में जहां मिठाई रखी थी वहां बच्चों और कुछ मनचले बड़ों की भीड़ बराबर पाई जाती रही। क्या डायबिटीज क्या सुगर सबने हाथ डुबाकर खाया।पता पहले से भी था लेकिन जब बड़ों ने कहा, तो देखना पड़।

तिलकहारों में लड़की के पिता, चाचा, फूमा, मामा, नाना और ऐसे ही रिश्ते वाले लड़के के घर का पानी तक नहीं पीते। उनके लिए अलग व्यवस्था करानी थी। हमारे बगल के इंटर कॉलेज के अध्यापक आए थे। उन्होंने अपने पैसे से शरबत की व्यवस्था कराई तो इन लोगों ने भी पानी पिया। खैर मिठाई के बाद खस्ता और दमालू गया। इसके बाद पेट को राहत देने के लिए दही बड़ा। इस बीच दिन ढल गया था, दरवाजे पर छाया आ गई थी। तिलक चढ़ाने की व्यवस्था की जाने लगी। हमारे आसपास जिसे जेंवार कहा जाता है, रिश्तेदार और शुभचिंतक आने शुरू हो गए थे। और हमलोगों ने फल काटने शुरू कर दिए। कहते हैं कि तिलकहारों को फल खिलाकर फलदान लो तो फल ज्यादा मिलता है। खैर.... फल दिया गया और मैं अपने कार्यकर्ताओं के साथ दरवाजे की व्यवस्था देखने लगा। हमारे पुरोहित आसन पर बैठे। लड़की वाले आकर जमे। मंत्रोच्चार शुरू हुआ। लड़के को बुआ, भाभी, चाची, बहन दरवाजे तक पहुंचाने आईं। इसके बाद साथ दिया दोस्तों ने। क्रीम कलर की शेरवानी में प्रवीण भाई बहुत अच्छे लग रहे थे। आर्चायगणों ने पृथ्वी सहित सभी ग्रहों को शांत कराते हुए वैदिक रीति रिवाज से कर्मकांड आगे बढ़ाया। लड़की के भाई ने तिलक चढ़ाई। वर की पूजा की गई उसे फलदान दिया गया। परिवार के लिए उपहार था, आदि, आदि... वर ने फलदान लेने के बाद अपने पूज्य जनों का वरण किया। चरण धोकर उन्हें यथा सामथ्र्य दक्षिणा दी। इधर, अंदर से महिलाओं ने- हमार भइया बीए पास, तिलक कम काहे चढ़ाई जैसे लोकगीत गाने शुरू किए। ये लोकगीत उससे भी पहले के हैं जब बीए करना बहुत बड़ी बात होती थी। वर और लड़की के भाई के बीच पान बीड़ा की रस्म हुई। दोनों ने एक दूसरे को पान खिलाया। इसके बाद आचार्यगणों ने स्वातिवाचन कर दोनों पक्षों को आशीर्वाद दिया। नाऊ-आचार्य को दक्षिणा के साथ तिलक पूरी हुई।

लड़के को मय फलदान के सामान कोहबर में ले जाया गया। कोहबर लोक परंपरा है। जिसमें घर की उस दिशा में जिस ओर सूर्य होते हैं, की दीवार पर वर और वधु का प्रतीकात्मक चित्र बनाकर पूजा की जाती है, वहां ले जाया गया। लगभग 60 तिलकहार आए थे। पहले की बात होती तो 10 गुना बराती जाने चाहिए थे लेकिन अब किसके पास समय है। अब तिलकहारों के खाने की व्यवस्था करनी थी। गांवों में अब पनीर का बहुत के्रज है। सो तीन सब्जियां, कोफ्ता, कलौंजी, रायता, चटनी, अचार, सलाद, कचौरी, पूड़ी, दही, पुलाव, आइसक्रीम के साथ रसमलाई की व्यवस्था थी। तिलकहारों को खाना खाते समय तमाम प्रकार की गालियां (महिलाओं ने) सुनाई गई। अब जेंवार के खाने की बारी थी। आज भी हमारे गांव में जमीन में पंगत लगाकर खाने का चलन है। इसका अपना अलग मजा है। थोड़ बदलाव जरूर आया है पहले लोटा लेकर जाते थे लेकिन अब नहीं। खैर पांत पर पांत खिलाई जाती रही और यह क्रम चला रात 11 बजे तक। सबसे बाद में लगभग 12 बजे मैंने, दीपू और मनू के साथ खाना खाया। हम थक चुके थे। 17 को सिलमायन था और 20 को बारात। सो बिस्तर पर पड़े और सो गए।
खैर तिलक अच्छी बीती अब आगे का हाल कल।

सोमवार, 29 जून 2009

प्रवीण भाई की शादी

आज बड़े दिन बाद ऑनलाइन हूं। दरअसल भाई की शादी के सिलसिले में इलहाबाद गया था। इतने दिनों राजकाज पर कुछ नया नहीं दे सका। इसके लिए क्षमा चाहता हूं। फिलहाल कुछ खास हो भी नहीं रहा है। बजट की तैयारी चल रही है। दिल्ली में ममता और प्रणब दा कर रहे हैं और दफ्तरों में हम जैसे पत्रकार।
बहुत दिनों बाद गांव की शादी में शामिल हुआ। जब से इलाहाबाद छूटा न तो किसी की बारात जा सका और न ही किसी शादी में गारी सुनी। लगभग 10 साल बाद गांव की शादी में शामिल हुआ। तिलक से लेकर चौथी छुड़ाने तक की सारी रस्में देखीं। बारात अपनी भी हुई थी लेकिन शहर की थी, सो गांव वाला मजा नहीं आ सका था। आपको बारात का न्यौता नहीं दिया, जानता था कि व्यस्तता के चलते आना हो नहीं सकेगा। सो, सोचता हूं आपको राजकाज के जरिए ही सही बारात करा दूं। मैं आपको एक-एक रस्म की तफसील से जानकारी देने की कोशिश करूंगा।
सुविधा का भूगोल
पहले परिचय दे दूं। बात परंपरा से शुरू करते हैं। इलाहाबाद और लगभग पूरे पूर्वी उप्र में परंपरा है कि बेटियां उत्तर और पश्चिम में ही ब्याही जाती हैं। उस पर भी कुल, गोत्र, रिश्तेदारी भी देखनी पड़ती है। इलाहाबाद वैसे तो बहुत बड़ा जिला है लेकिन शादी-ब्याह के लिए उसे तीन हिस्सों में बांट लिया गया है। पहला गंगापार बोले तो फाफामऊ के उत्तर प्रतापगढ़, जौनपुर की सीमा तक, दूसरा यमुनापार, जो मीरजापुर की सीमा तक फैला है। बाकी बचा बीच का शहर जिसमें अब नैनी, मुंडेरा भी जुड़ गया है, इसे शहर कहते हैं। तो हमारा घर गंगापार फूलपुर तहसील में पडि़ला महादेव के नजदीक कमलानगर बीरापुर और लड़की यमुनापार मेजा तहसील की अकबरशाहपुर गांव की। लंबे समय से बातचीत चल रही थी। इसी मार्च में होली के पहले लड़की देखने की आधुनिक रस्म के बाद रिश्ता तय हो गया। जून की 18 को तिलक, और 20-21 की शादी तय हुई। घर पर पिता जी और दीपू ने पूरी तैयारी की।
बदल गया इलाहाबाद
शादी प्रवीण भाई की थी, जो फिलहाल लखनऊ में एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रहे हैं। वो भी 15 को इलाहाबाद पहुंचे। कार्ड छपवाने से लेकर, टेंट हाउस, हलवाई, बैंड पार्टी, खरीददारी, बहिन-बिटिया को बुलाना, घर की साफ-सफाई सारे काम दीपू और पापा ने किए। हम इंदौर में थे। अखबार की नौकरी के चलते कई बार रिश्ते-नातेदार नाराज हो जाते हैं। दरअसल, एक तो उनको फोन नहीं करते और करते भी हैं तो रात 12 के बाद। अब इसके बाद फोन मतलब सामन्य परिस्थितियों में मन में ही सही गाली सुनना होगा। खैर 15 को चले और 16 को कामायनी से दोपहरबाद 3 बजे इलाहाबाद पहुंचे। घर से गाड़ी आई थी। कुछ खरीददारी अपने लिए और भाइयों के लिए करनी थी सो सिविल लाइंस पहुंचे। अब तो इलाहाबाद में भी बिग बाजार और मैक डॉनल्डस खुल गया है। सो आसानी हुई। नहीं तो पहले चौक, घंटाघर और कटरा की गलियों में चक्कर लगाने पड़ते थे। दो-तीन घंटे खरीद के बाद शाम ढले घर पहुंचे। तिलक में एक दिन टाइम था। घर में सबसे बड़ा हूं सो पहुंचते ही सारा कामकाज संभाल लिया। 17 का पूरा दिन तैयारी और रिश्तेदारों की स्वागत में बीता।
बाकी 18 को तिलक का, यज्ञोपवीत, सिलमायन की कहानी कल के लिए छोड़ते हैं।

बुधवार, 3 जून 2009

मुंबई जैसी ही है ऑस्ट्रेलियाई आग

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की पिटाई जारी है। रोज कोई न कोई नया मामला प्रकाश में आता है। हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी कि मामले बहुत ज्यादा होते हैं लेकिन अप्रवासी भारतीय वहां की नागरिकता के लालच में सारे जुल्म सहते हैं और चुप रहते हैं। लेकिन अब तो अति हो गई है। हाल तो देखिए लुधियाना नरदीप वहां पढ़ाई करने गया है। हाल ही में जब वह कॉलेज जा रहा था तो पांच लोगों ने उसे रोक लिया और सिगरेट देने को कहा, जब उसने कहा कि वह सिगरेट नहीं पीता तो उन लोगों ने पैसे मांगे। जब नरदीप ने पैसे देने से इनकार किया तो उन लोगों ने मारपीट शुरू कर दी। उसके पेट में चाकू मार दिया। हर आम आदमी की तरह मैं भी समझना चाहता हूं कि आखिर ऐसा क्या है कि वहां भारतीय के साथ इतने अत्याचार किए जा रह हैं। ऑस्ट्रेलिया में लगभग एक लाख भारतीय छात्र हैं जो करोड़ों रुपए कर चुकाते हैं, फिर भी उनके साथ ऐसा व्यवहार.........

कोई बताएगा 'बाहरी' कौन हैं?
ऑस्ट्रेलिया में जो रहा है वह पिछले साल (सालों) मुंबई में उत्तरभारतीयों के खिलाफ हुई हिंसा का ही एक स्वरूप है। यहां हमला करने वाले हमारे ही भाई थे बस बोली और राज्य अलग थे और ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों को मारने वालों की भी बोली अलग है। उन्हें भारतीय प्रतिभा से डर लगता है और इधर मुंबई के नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन खोने का। मुंबई में हो रहे अत्याचार पर तब तक कोई नेता नहीं बोला जब तक कि पानी सिर से ऊपर नहीं चला गया वही हाल ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है। हमारे नेता बयान दे रहे हैं बस। ऑस्ट्रेलिया में जो हो रहा है वह न तो सही है और न ही बर्दाश्त के काबिल लेकिन सरकार कोई कड़ा कदम उठाने से कतरा रही है। यही हाल महाराष्ट्र में भी था। हिंसा और विरोध की राजनीति करने वाले मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को प्रताडि़त कर रहे थे और नेता दिल्ली में बैठकर बयान दे रहे थे। वैसा ही हाल फिर होने वाला है। महाराष्ट्र की सरकारी संस्था ने किराए पर सरकारी घर देने की बात क्या कही शिवसेना वाले उद्धव ठाकरे फिर अपनी बिल निकल पड़े। कहा अगर 'बाहरियों' को घर दिया तो घर गिरा देंगे। इन तोडफ़ोड़ की राजनीति करने वालों से और उम्मीद ही क्या की जा सकती है। कोई इन नेताओं से पूछेगा कि बाहरी कौन है? कोई नहीं पूछेगा क्यों कि उनकी राजनीतिक रोटी इसी आग में तो सेंकी जाती है।

चलते-चलते
हाल पाकिस्तान का भी बुरा है। वहां अल्पसंख्यकों (हिंदू+सिखों) से जजिया वसूला जा रहा है। इसाईयों से नहीं क्यों कि ऐसा करने की न तो पाकिस्तान में हिम्मत है और न ही उनके पाले सांपों (तालिबानियों) में। मुझे लगता है यह खबर उन लोगों को जरूर पढऩी चाहिए जो भारत में अल्पसंख्यकों से भेदभाव का आरोप लगाते हैं।

रविवार, 31 मई 2009

जब जरूरत तब उपयोग, फिर काहे सुधारें शिक्षा?

इधर बीच घुमंतू दो-तीन दिन की छुट्टी पर गए थे। आज आते ही उन्होंने मेरी ओर मिसाइल दाग दी-देखा कांग्रेस को देश को पहली महिला लोकसभा स्पीकर मिलने जा रही है। खैर बोले आज राजनीति पर बात नहीं करूंगा। दरअसल घुमंतू बनारस से लौटे हैं सो पूरे मस्त मूड में हैं। बोले यार आज तो भारतीय छात्रों ने ऑस्ट्रेलिया में गांधीगीरी की। विकसित देश का तगमा लगाए घूम रहे ऑस्ट्रेलिया में जैसा नस्लभेदी व्यवहार हो रहा है उससे तो लगता है मेरा भारत ही भला है। माना कि कुछ सिरफिरे मेरे देश में भी हैं लेकिन ऐसा तो नहीं ही होता। हम तो बाहर से आए लोगों को सिर पर बैठाते हैं। हमें तो उनसे बेहतर कोई लगता ही नहीं। बोले अपने देश का योग था लोग नाम तक नहीं लेते थे विदेशियों ने योगा कर दिया तो सब टीवी खोले शीर्षाशन कर रहे हैं।

इसी बीच, खबर आई कि मीरा कुमार को सोनिया से मिलने उनके घर पहुंचीं। सो उनके स्पीकर बनने की खबर पक्की। मैंने कहा तो यह अच्छी बात है, साथ में मैंने यह टुल्ला भी जोड़ दिया कि कांग्रेस चाहती तो ऐसे बहुत पहले ही हो गया होता। उनको मेरी बात से भड़कना था भड़के। बोले आज जरूरत है महिला को स्पीकर बनाने की तो आज ही न बनाएंगे। मुझे भी लगा भाई ठीक ही बोल रहे हैं। जब जिसकी जरूरत हो तब उसका उपयोग करो। सही है आज कांग्रेस को दलित चेहरे की जरूरत है जो यूपी बिहार में उसकी जमीन संभाले। खैर राजनीति पर बात नहीं तो नहीं...

बात ऑस्ट्रेलिया की चल रही थी। मैंने कहा यार घुमंतू ऑस्ट्रेलिया भी अंग्रेजों का गुलाम रह चुका है। यह अलग बात है कि उसको आजादी हमसे पहले मिली फिर वहां की सरकारों और व्यवस्था ने ऐसा क्या किया कि हमारे भारतीय छात्र विदेशों में पढऩे जाने को मजबूर हैं। घुमंतू बोले, यार अब सरकार क्या करे। इतने स्कूल खोले, इतने कॉलेज, इतने विवि अब सरकार कहती थोड़े है कि बाहर जाओ पढऩे के लिए जो जा रहे हैं जाएं। वैसे भी हमारे देश के लोगों को अपनी देश की चीजें हमेशा दोयम दर्जे की लगती हैं। मैं भी अपनी बात पर अड़ा था। मैंने कहा नेता तो अपने बच्चों को महंगे कॉन्वेंट स्कूलों में, विदेशी विवि में पढऩे भेजते हैं, फिर वो जब विदेश से पढ़कर आते हैं तो राजनीति में पिता की विरासत संभालते हैं और अपने बच्चों को भी विदेश भेजते हैं। उन्हें क्या जरूरत है देश में शिक्षा का स्तर सुधारने की। बड़ी कबाहत के बाद घुमंतू मुझसे सहमत हुए।

शुक्रवार, 29 मई 2009

ये हमारे देश का मंत्रिमंडल

मैंने कल (राहुल की नहीं चली,अगाथा ने जीता दिल) कुछ परिवारों के नाम गिनाए थे, लेकिन आज पूरी लिस्ट जारी है। हो सकता है इसके बावजूद कुछ नाम भूल गया हूं या मेरी जानकारी में न हों,अगर आपको पता है तो जरूर बताएं। यह लिस्ट खोजने का मकसद सिर्फ याद कराना है। ताकि सनद रहे और मैं शाम को घुमंतू के सवालों की मिसाइल झेल सकूं। खैर मैं यह लिस्ट घुमंतू को ईमेल कर रहा हूं और एक कॉपी आपको, देखिए शाम को मिलते हैं तो क्या होता है। खैर तबतक आप तो देख लीजिए।

फारुक अब्दुल्ला----- ----- ----शेख अब्दुल्ला के पुत्र (जम्मू-कश्मीर के पहले सीएम)
मीरा कुमार----- ----- --- -----बाबू जगजीवन राम की पुत्री (पूर्व उप प्रधानमंत्री)
एसएम कृष्णा----- ----- --- --एससी मैल्लैया के पुत्र (पूर्व एमएलए)
सलमान खुर्शीद ----- ----- --- खुर्शीद आलम खां के पुत्र (पूर्व सांसद और गवर्नर)
पृथ्वीराज चह्वाण----- ----- ---आनंद राव( कैबिनेट मंत्री)प्रोमिला (प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष) के पुत्र
अजय माकन----- ----- --- ---ललित माकन के भतीजे (पूर्व सांसद)
प्रफुल्ल पटेल----- ----- --- -- सेठ मनोहर भाई के पुत्र (पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष)
दयानिधि मारन----- ----- --- मुरासोली मारन के पुत्र (पूर्व कैबिनेट मंत्री, करुणानिधि के नाती)
अझगरी----- ----- --- ------- एम करुणानिधि के पुत्र (तमिलनाडु के सीएम)
पल्लमराजू ----- ----- --- --- संजीवा राव के पुत्र (इंदिरा कैबिनेट में मंत्री)
जीके वासन----- ----- --- -----जीके मूपनार के पुत्र (पूर्व मंत्री)
प्रतीक पाटिल----- ----- --- ---प्रकाश पाटिल (सांसद) के पुत्र, वसंत पाटिल (पूर्व सीएम) के प्रपौत्र
डी. पुरंदेश्वरी----- ----- --- -----एनटीआर की पुत्री (पूर्व सीएम)
मुकुल वासनिक----- --- ----- --कृष्ण वासनिक के पुत्र (पूर्व सांसद)
ज्योतिरादित्य सिंधिया ------ --माधवराव सिंधिया के पुत्र
सचिन पायलट----- ----- --- ---राजेश पायलट के पुत्र
जतिन प्रसाद----- ----- ----- - -जीतेंद्र प्रसाद के पुत्र
अगाथा संगमा----- ----- ----- -पीए संगमा की पुत्री
परनती कौर----- ----- ----- -- -अमरिंदर सिंह की पत्नी
भतर सोलंकी----- ----- ----- - -माधवसिंह सोलंकी के पुत्र (गुजरात के पूर्व सीएम)
अरुण यादव ----- ----- ----- - -सुभाष यादव के पुत्र (एमपी के पूर्व डिप्टी सीएम)
तुषार चौधरी ----- ----- ----- - अमरसिंह चौधरी के पुत्र (गुजरात के पूर्व सीएम)
आरपीएन सिंह----- ----- ----- सीपीएन सिंह के पुत्र (उप्र से पूर्व केंद्रीय मंत्री)
कुमारी शैलजा ----- ----- ------दलबीर सिंह की पुत्री (हरियाण के दलित नेता

राहुल की नहीं चली,अगाथा ने जीता दिल

दिन की शुरुआत घुमंतू के एसएमएस से हुई। स्वातंत्रवीर सावरकर को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी याद कराई थी। सच कहूं तो मैं भी भूल गया था। खैर याद आया तो उस महान स्वतंत्रता सेनानी को नमन किया। (इससे ज्यादा हम लोग करते ही क्या हैं।) आज तबीयत थोड़ी नासाज लग रही थी लेकिन समय तो अपनी गति से चल ही रहा था। तभी अचानक घुमंतू घर आ धमके। मैं भी टीवी चलाकर अखबार पढ़ रहा था। टीवी पर शपथ ग्रहण का कार्यक्रम चल रहा था। एक के बाद एक नेता आकर शपथ ले रहे थे।

विलासराव देशमुख का नाम आया तो घुमंतू बोले यार छह महीने पहले जिस आदमी को नकारेपन की वजह से हटाया उसे अब और बड़ी जिम्मेदारी दी जा रही है। यहां भी गुल खिलाएंगे। फारूख ने शपथ ली और करुणनिधि के परिजनों ने भी। बात स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्रियों तक पहुंची। आए कानपुर वाले श्रीप्रकाश जायसवाल। धुर हिंदी क्षेत्र के। महीने भर भी नहीं हुए जब कानपुर की सड़कों पर हिंदी में चिल्ला-चिल्लाकर वोट मांग रहे थे लेकिन शपथ लेने आए तो अंग्रेजी में ली। घुमंतू को गुस्सा आ गया। बोले- हो क्या गया है जायासवाल को? अब आएं कानपुर तो पूछता हूं।

अगाथा के नाम रहा दिन
शपथ ग्रहण के दौरान जब बड़े-बड़े दिग्गज जब अंग्रेजी बघारने में लगे थे तब अंग्रेजी महौल में पली बढ़ी पीए संगमा की बिटिया अगाथा ने हिंदी में शपथ लेकर श्रीप्रकाश जैसे लोगों के मुंहपर तमाचा जड़ा। घुमंतू ने तो कांग्रेस की जीत पर अगाथा की चंद हिंदी शब्दों को भारी बताया और समारोह अगाथा के नाम कर दिया। खैर बात तमाचे की तो घुमंतू जानते हैं कि ऐसे तमाचों की चोट अगर इनको लगती तो आज देश का यह हाल न होता।

इसमें सोनिया-राहुल का क्या कसूर?
उधर, नाम पुकारा जाता और इधर घुमंतू मुझे बताते कि फलां नेता किसके परिवार और किस राजनीतिक वंश की बेल हैं। मैंने फिर घुमंतू को छेड़ दिया या यहां तो किसी की बेटी, किसी का बेटा, किसी पत्नी, किसी का दामाद, किसी का भाई, किसी का पोता सब हैं मनमोहन की इस 'राहुल कैबिनेट' में। लेकिन वे गुस्साए नहीं। बोले राजनीति में यही तो होता आया है। मैंने कहा- पंडित नेहरू की विरासत (लालबहादुर शास्त्री की अकाल मौत के बाद।) इंदिरा ने संभाली। इंदिरा के बाद कांग्रेस में राजीव गांधी से ज्याद योग्य कोई नहीं था और राजीव के बाद अब सोनिया और राहुल ही सबसे योग्य हैं। मनमोहन को तो पीएम बनाना सोनिया और राहुल दोनों की मजबूरी है। पिछली सरकार में रिमोट सोनिया के पास था और इस बार राहुल के हाथ में होगा। घुमंतू भड़क गए बोले सोनिया गई थी कहने की उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बना दो? ये तो कांग्रेसी हैं जिन्हें पता है कि अगर सत्ता पानी है तो गांधी परिवार की परिक्रमा करनी ही होगी। सोनिया तो महान हैं, देखा नहीं पीएम की कुर्सी छोड़ दी और अब मनमोहन राहुल बाबा के पीछे पड़े हैं कि मंत्रालय ले लो लेकिन वे हैं कि पार्टी की सेवा करना चाहते हैं। इसे कहते हैं त्याग। बोले देखना राहुल भी पापा की तरह बिना मंत्री बने प्रधानमंत्री बनेंगे।

40 के नीचे सिर्फ 7
जब ज्योतिरादित्य ने शपथ ली तो घुमंतू बोले देख रहे हो युवा चेहरा? मैंने कहा गिन के देख ले कितने हैं 40 से नीचे वाले। और जब गिनती हुई तो 79 में केवल 7 निकले और महिलाओं की संख्या भी पिछली बार से एक कम। युवाओं ने कांग्रेस को वोट दिया और युवा जीतकर सदन में तो पहुंचे लेकिन मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। 9 मंत्री ऐसे हैं जो मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इनमें वीरभद्र सिंह, फारुख अब्दुल्ला, सुशील कुमार शिंदे, शरद पवार, एसएम कृष्णा, वीरप्पा मोइली, एके एंटनी, ग़ुलाम नबी आजाद और विलासराव देशमुख शामिल हैं।

राहुल की नहीं चली!
मैंने जब परिवारवाद की बात की तो घुमंतू ने सिर खुजाते हुए कहा शायद मंत्री बनाने के मामले में राहुल की नहीं चली, नहीं तो ऐसा न होता। मैंने कहा आप अपनी खीज नहीं छिपा सकते तो बोले मैं कांग्रेस का प्रवक्ता नहीं। खैर यह भी उन्होंने ही बताया कि कौन कैसे आया है। शपथ समारोह पूरा हुआ तो फारुख अब्दुल्ला ने राज्यमंत्री बने अपने दामाद सचिन और जे-के के मुख्यमंत्री, अपने बेटे और राहुल के दोस्त उमर अब्दुल्ला के साथ फोटो खिंचवाई। नाम उन्होंने बाबू जगजीवन राम की बेटी मीराकुमार और करुणनिधि के कुनबे के भी गिनाए। खैर जितना मैं जानता हूं-

ज्योतिरादित्य सिंधिया ------ माधवराव सिंधिया के पुत्र
सचिन पायलट----- ----- --- राजेश पायलट के पुत्र
जतिन प्रसाद----- ----- ----- - जीतेंद्र प्रसाद के पुत्र
अगाथा संगमा----- ----- ----- पीए संगमा की पुत्री
डी पुंरदेश्वरी----- ----- ----- -- एनटी रामाराव की पुत्री
परनती कौर----- ----- ----- -- अमरिंदर सिंह की पत्नी
भतर सोलंकी----- ----- ----- - माधवसिंह सोलंकी के पुत्र (गुजरात के पूर्व सीएम)
अरुण यादव ----- ----- ----- - सुभाष यादव के पुत्र (एमपी के पूर्व डिप्टी सीएम)
तुषार चौधरी ----- ----- ----- - अमरसिंह चौधरी के पुत्र (गुजरात के पूर्व सीएम)
आरपीएन सिंह----- ----- ----- सीपीएन सिंह के पुत्र (उप्र से पूर्व केंद्रीय मंत्री)
प्रतीक पाटिल ----- ----- ----- - वसंतराव पाटिल के पौत्र (महाराष्ट्र के पूर्व सीएम)
कुमारी शैलजा ----- ----- ----- - दलबीर सिंह की पुत्री (हरियाण के दलित नेता)

इसमें गलत क्या है?
मैंने ये लिस्ट गिना ली तो, घुमंतू ने कहा अगर सरकारी नौकरी रहते किसी म़ृत्यु हो जाए तो उसके आश्रितों को नौकरी मिलती है कि नहीं? मैंने कहा हां। तो बोले इनमें से कई नाम ऐसे हैं जो अब नहीं रहे, उनके बच्चे या परिजन उनके काम को आगे बढ़ रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है? मैंने कहा जो हैं- तो बोले राजनीति के जरिए अगर पूरा घर देश की 'सेवा' करे तो गलत क्या है? मैं अनुत्तरित था। खैर शपथ खत्म हुई और घुमंतू निकल पड़े अपने काम पर।

चलते-चलते...... न्यूज फ्लैश
घुमंतू का अखबार छूट गया था। लेकिन दिनभर उनके मन में एक कसक थी, जो शाम होते-होते उन्होंने मेरे सामने रख दी। बोले यार मैं दिन भर टीवी देखता रहा, दर्जनों वेबसाइट्स देखीं लेकिन कहीं भी स्वातंत्रवीर सावरकर का जिक्र नहीं हुआ। कल पंडित नेहरू को श्रद्धांजलि देने के लिए शांतिवन पर दिनभर लाइन लगी रही लेकिन आज किसी को समय नहीं मिला कि संसद में जाकर सावरकर के चित्र पर दो फूल चढ़ा आए। कुछ भाज.. वाले गए थे रस्म आदयगी करने सो रस्मी खबर भी थी। घुमंतू गुस्से में थे। बोले कांग्रेसी और वामपंथी तो सावरकर के नाम से चिढ़ते हैं लेकिन इन चैनल वालों को क्या हुआ? एक बाइट तक नहीं। नई पीढ़ी को कैसे मालूम चलेगा कि सावरकर ने क्या किया था देश के लिए? खैर घुमंतू अपने आप को समझाने लगे, बोले देश में शहीद तो सिर्फ 'परिवार' के लोग हुए हैं.......... यही सोचते-सोचते वे अपने घर की ओर चल दिए और मैं अपने।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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