राज और समाज पर खरी आवाज

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बुधवार, 31 दिसंबर 2008

शेख से उमर तक

राजनीति में परिवारवाद की जगह वंशवाद की बात कहनी चाहिए। देश को एक ही परिवार ने तीन प्रधानमंत्री दिए, चौथा भी हो गया होता लेकिन 'अंतरआत्मा' की आवाज कौंध गई। खैर चौथे की तैयारी शुरू हो गई है। मनमोन जी जानते हैं वे तब तक ही पीएम हैं जब तक, राहुल बाबा पीएम नहीं बनना चाह रहे। जिस दिन मैडम का इशारा हुआ सत्ता 'युवा नेतृत्व' को सौंप दी जाएगी। कांग्रेस में भले दर्जनों युवा नेता हों लेकिन पीएम की कुर्सी तो सिर्फ गांधी परिवार के लोग ही संभाल सकते हैं।
(ऊपर फोटो को देखिए इसमें उमर अपने बेटे के साथ कार की छत पर बैठे हैं। आगे चलकर इनको भी पिता की विरासत संभालनी हैं।)
खैर छोडिए इस बात को ये तो लगा ही रहता है। हम आप को कुछ ऐसे नाम बता रहे हैं जो देश की राजनीति में अलग मुकाम रखते हैं। राजनीतिक विरासत बेटे को सौंपना आम बात है लेकिन अब तक ऐसे चार नाम मेरी जानकारी में हैं जो पिता और पुत्र एक ही राज्य के मुख्यमंत्री रहे।
शुरुआत होती है जम्मू -कश्मीर से जहां आजादी के बाद प्रधानमंत्री बने (पहले राज्य के मुखिया को पीएम ही कहा जाता था)। बाद में शेख सीएम भी रहे उनकी राजनीतिक विरासत संभाली उनके बेटे फारुख अब्दुल्ला ने तीन बार में सीएम रहे। फारुख की विरासत अब उनके बेटे उमर संभालने जा रहे हैं।
दूसरा राज्य मध्यप्रदेश- पहले मुख्यमंत्री रहे रविशंकर शुक्ल के बाद उनके बेटे श्यामा चरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने। श्यामा भइया के नाम से प्रसिद्ध श्यामा चरण के भाई विद्या चरण केंद्र में मंत्री रहे अब उनके बेटे छत्तीसगढ की राजनीति में सक्रिय हैं।
तीसरा राज्य है महाराष्ट्र- जहां शंकरराव चव्हाण मुख्यमंत्री रहे। शंकर बाद में केंद्र की राजनीति में चले गए। हाल ही में मुंबई हमले के बाद जब महाराष्ट्र के सीएम विलासराव देशमुख को हटाया गया तो तमाम नामों को पीछे छोड शंकर के पुत्र अशोक चव्हाण मुख्यमंत्री बने।
अब बात कर्नाटक की- पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा कभी कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी रहे। बाद में उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी ने पहले कांग्रेस और बाद में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई।
ये कुछ नाम हैं। इनके अलावा लालू प्रसाद यादव ने अपनी पत्नी राबडी देवी को सीएम बनाया। चंद्रबाबू नायडू भी कुछ ऐसा ही उदाहरण है। धन्य है भारत का लोकतंत्र, जहां जनतंत्र के नाम पर राजतंत्र आगे बढ रहा है और जनता ऐसी भोली कि उसे लगता है कि वोट देना ही लोकतंत्र है। जय लोकतंत्र...

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

लोकतंत्र का राजतंत्र जारी है

दो अच्छी खबरें एक साथ हैं। पहला ये कि कश्मीर को 'नया' नेतृत्व मिल गया और दूसरा बांग्लादेश में लगता है जम्हूरियत कायम हो गई। पर राजशाही के अंदाज में। शेख अब्दुल्ला और फारुख के बाद अब शेख परिवार की तीसरी पीढी को जम्मू की सत्ता मिल रही है। खैर बांग्लादेश में तो दो ही परिवार राजनीति में हैं। अब इनके रहते तीसरे का उभरना मुमकिन नहीं लगता। दो साल के आपातकाल को जोडकर सात साल बाद बांग्लादेश में हुए चुनाव के बाद आवाम ने हसीना की पार्टी को जैसा प्रचंड बहुमत दिया है उससे लगता है वहां स्थायित्तव आएगा। हमारी भी दुआ है कि ऐसा हो, क्योंकि यह भारत के लिए भी अच्छा होगा। अब आते हैं जम्मू-कश्मीर पर। जनता ने जम्हूरियत को तो जिता दिया अब देखना है हुक्मरान उसके लिए क्या करते हैं। शेख और नेहरू की दोस्ती चौथी पीढी में एकबार फिर परवान पर है। शेख और नेहरू के बीच आजादी से पहले हुआ समझौता ज्यादा दिन नहीं चला था। 1953 में तो हालात यहां तक बिगड गए कि नेहरू ने शेख को गिरफ्तार करवा दिया। इसके बाद सत्ता खेल दिल्ली से जारी रहा। शेख के बाद फारुख और इंदिरा में नहीं पटी लेकिन राजीव ने फारुख को 1987 में सीएम बनने में मददकर एकबार फिर रिश्ते सुधारे। राजीव गांधी की हत्या के बाद गांधी-शेख परिवार के संबंध ठंडे बस्ते में चले गए। इसके चलते फारुख भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए में चले गए। फारुख जम्मू-कश्मीर के मुखिया बने तो उनके बेटे अटल जी की कैबिनेट में वजीर। लेकिन राज गया साथ गया। अब गांधी-शेख परिवार की दोस्ती को आगे बढा रहे हैं राहुल गांधी। उमर को सीएम बनाकर वे आगे अपना रास्ता भी रोशन कर रहे हैं। अच्छा है शायद इसे ही कहते हैं सियासत।
लोकतंत्र का राजतंत्र जारी है

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

जीत जम्हूरियत की

अमरनाथ भूमि विवाद के कारण पीडीपी ने कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस लेकर जम्मू-कश्मीर में समयपूर्व चुनाव की भूमिका तैयार कर दी थी। घाटी बनाम जम्मू हो चले चुनाव में हमेशा की तरह अलगाववादियों ने बहिष्कार की घोषणा की तो पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई पर हमलाकर लोकतंत्र को चुनौती दी। ऐसे में राज्य में हुए जबरदस्त चुनाव ने अलगाववादियों के साथ ही पाकिस्तान को भी करारा जवाब दे दिया है। रविवार को चुनाव मशीनों ने परिणाम बताने शुरू किए तो यह भी स्पष्ट हो गया कि जनता ने किसी पार्टी को नहीं वरन जम्हूरियत को जिताया है। जम्मू में सालों से विस्थापित जीवन बिताने वाले कश्मीरी पंडितों ने बता दिया कि अब उनको नजरंदाज नहीं किया जा सकता। भाजपा को 1 से 11 सीटों तक पहुंचाने वाले मतदाताओं ने राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि जम्मू से सौतेला व्वहार बर्दाश्त नहीं होगा।खैर सबसे अहम है जम्मू-कश्मीर में शांति, विकास और स्थायित्व।

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

बिगडे हुए साथी को सुधारा जाए

देश की सीमाओं पर तनाव है। दोंनों तरफ की सेनाएं मुंहतोड जवाब देने के लिए तैयार हैं। लेकिन युद्ध होगा ऐसा लगता नहीं है। पिछले दो दिनों में बहुत कुछ बदल गया है। पाकिस्तान की जबान और अकड भी। सउदी विदेशमंत्री का आना, चीनी, ईरानी और अमेरिकी विदेशमंत्रियों का समझाना लगता है जंग की हवा पलट रहा है। अब दोनों देश सुलह समझौते और भाईचारे की बात कर रहे हैं। वैसे भी जंग इतनी आसान नहीं है। दोनों मुल्क परमाणु हथियारों से लैस हैं।
एक बार जंग शुरू हुई तो तबाही तय है। 'युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है' यह बात जितनी तब सही थी जब कही गई आज भी उतनी ही सही है। तमाम तजुर्बे हमारे सामने हैं। इसी एक दशक की बात करें तो इराक, अफगानिस्तान दो बडे उदाहरण हैं। जहां समाधान होने की बात तो दूर बीमारी और बढ गई है।
भारत पर दो तरफा दबाव है। एक बाहर से तो दूसरा देश के अंदर से ही। अगले साल आम चुनाव हैं। सत्तारूढ कांग्रेस के पास उपलबि्ध के नाम पर ज्यादा कुछ नहीं है। आतंक के मामले पर लगातार विपक्ष के निशाने पर रही कांग्रेस की मुसीबतें मुंबई हमलों ने बढा दी है। ऐसे में अगर मनमोहन पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकी अड्डों पर हवाई हमले का फैसला करते हैं तो इसे अनहोनी न माना जाए। बस डर परमाणु हमले का है। हो भी क्यों न पाक के परमाणु हथियारों की कमान ऐसे व्यकि्त के हाथ है जो कभी 'मेंटल केस' रह चुका है। वैसे भी बेचारे की चलती कहां है

काश परवरदिगार पाकिस्तान को अक्ल बख्शे और वो नापाक हरकतें करना बंद कर दे। कुछ भी हो है तो अपना ही भाई। जुमा-जुमा 60साल ही तो बीते हैं जुदा हुए। एक भाई बिगड गया तो पहले उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। मैं दुष्टों को सजा के खिलाफ नहीं हूं लेकिन चोट जड पर होनी चाहिए।
सोचिए अगर भारत अखंड होता तो सचिन सहवाग बैटिंग की ओपनिंग करते और शोएब अख्तर बालिंग की। इतना ही नहीं अब तक भारत के पास दो विश्वकप होते। पांच हमारे और पांच उनके मिलाकर 10 परमाणु बम परीक्षण भारत के नाम दर्ज होते और भी जाने क्या-क्या। सोचिएगा क्योंकि अच्छा सोचने से अच्छा हो सकता है और इसमें कुछ लगता नहीं है।

दूसरों के पास जाकर दुहाई देने से बेहतर चलो किसी बिगडे हुए साथी को सुधारा जाए......

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

माया को 'अधिकार' पर वे 'बीमार'

'उत्तम' प्रदेश फिर जल उठा। बस फर्क इतना है कि इस बार जो जला रहे हैं कल तक वही लोग शासन में थे। माया मैडम के बारे में तो लोगों को पहले से ही पता है लेकिन आज लखनऊ में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में उनका जो रूप सामने आया कम से कम मुख्यमंत्री को नहीं शोभा देता। माफ करिएगा मैं यह तो भूल ही गया कि यह लोकतंत्र है, जहां माया मैडम को जनता ने चुनकर 'कुछ भी' बोलने, कहने, करने का 'अधिकार' दिया है। नहीं तो वे सीएम की कुर्सी पर बैठकर दोषियों के खिलाफ पत्रकारों से तथ्य न मांगतीं।
मांगने की बात चली है तो 'अनतुली' बातें याद आ जाती हैं। धन्य हैं अंतुले जी जिनके कारण कम से कम यह तो साफ हो गया कि हेमंत करकरे जी शहीद ही हुए थे। खैर हमसे ज्याद अंतुले साहब का शुक्रिया जरदारी और गिलानी अदा कर रहे होंगे। करें भी क्यों न उनके मुंह की बात जो अंतुले साहब ने कह दी। वैसे भी इस समय 'ना'पाक नेताओं को समझ नहीं आ रहा है कि क्या बोलें, कभी सहयोग का वादा तो कभी मुकाबले की धमकी और फिर सबूत का राग। भले ही जरदारी साहब 'सदर ए जम्हूरिया' बनने से पहले 'जरा सटके' रहे हों लेकिन अब पूरी तरह ठीक हैं। उनका डाक्टरी प्रामण पत्र भी अमेरिका के पास है। उनकी छोड. दें तों गिलानी, कुरैशी, शेरी जैसे हुक्मरान तो पहले पूरी तरह ठीक थे, कहीं कुछ लोचा तो नहीं है कि रोज नए बयान दे रहे हैं।
मेरी माने तो भारत को सब छोड.सिर्फ यह पता करना चाहिए कि पाकिस्तानी नेताओं के लिए सि्क्रप्ट कौन लिख रहा है, कहीं भारत का 'नया परमाणु' दोस्त तो नहीं....।
आप भी सोचिएगा

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

विनम्र निवेदन

इस फील्ड का नया खिलाड़ी हूं। पहली बार ब्लागिंग की पिच पर हाथ आजमाने उतरा हूं। खैर बड़े-बड़े खिलाड़ी कभी न कभी नए ही होते हैं यही सोच कर हिम्मत की है। क्या लिखूंगा इस बारे में सीमा या विषय नहीं तय किया है, लेकिन इतना तय है जिन बातों पर दिल कहेगा जरूर लिखूंगा। आपके मार्गदर्शन,सुझाव और आलोचनाओं का हमेशा इंतजार रहेगा।

किस शहर से आए हैं

कहां - कहां से

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