राज और समाज पर खरी आवाज

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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

कथानक

जंगल में चुनाव हुए.... जंगली जनता ने दवाब बनाया की राज शेर को सौपा जाये..... पर पञ्च शेर से डरे हुए थे.... वो गधे को राजा बनाना चाहते थे.. जनता अनशन पर बैठ गई. डरे पंचों ने गीदड़ की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई. कमिटी शेर को राजा बनाने पर तैयार तो गई पर कुछ शर्तों के साथ- शेर के दांत तोड़ दिए गए, उसके नाखून स्थाई रूप से काट दिए गए, उसके गले में सैलेंसेर लगा दिया गया....... इसे कहते हो लोकतंत्र की शक्ति.

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ऐसी भी क्‍या मजबूरी?


देश का दुर्भाग्‍य देखिए कि सवा अरब जनता का सर्वोच्‍च प्रतिनिधि, दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश का मुखिया, देश की सबसे पुरानी और सबसे बडी राजनीतिक पार्टी से बना प्रधानमंत्री मजबूर है? जी हां। यह सच है और इससे भी दुखद यह कि यह बात खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्‍वीकार की है। 15 फरवरी को जब यह पता चला कि प्रधानमंत्री मीडिया से मुखातिब होंगे तो महंगाई और भ्रष्‍टाचार जैसे बडे मामलों से जूझ रही जनता को लगा कि शायद वे कुछ ऐसा बोलें जिससे राहत मिले, लेकिन बंधी मुट़ठी लाख की….यहां भी ऐसा ही हुआ। प्रधानमंत्री जी पूरे समय बस यह कहते रहे कि वे ईमानदार हैं लेकिन मजबूर हैं। वे यह भी कह गए कि वे उतने बेईमान नहीं जितना उन्‍हें प्रचारित किया जा रहा है। बेईमान हैं, यह उन्‍होंने भी मान लिया। अब उस काले चेहरे को छिपाने के लिए गठबंधन का मुलम्‍मा बेमानी है। मुझे नहीं पता कि जो लोग आपसे प्रश्‍न पूछने के लिए वहां बैठे थे उनके मन में यह सवाल उठा या ऐसे सवालों को दबा दिया गया लेकिन मेरे कुछ सवाल जरूर हैं-

- प्रधानमंत्री ने आज जिन अहम मसलों पर बात की उनमें सबसे ऊपर रहा भ्रष्‍टाचार। पौने दो लाख करोड रुपए के 2जी स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन मामले में उनका यह कहना, ‘हमने ए. राजा को पत्र लिखा था। लेकिन ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की नीति पर मुझसे उनकी बात नहीं हुई।‘ क्‍या सही माना जाए? 2004 से राजा ने लूट मचा रखी थी और आठ साल आप धृतराष्‍ट्र बने बैठे रहे।

क्‍या देश के प्रधानमंत्री को यह नहीं पता होना चाहिए कि उसकी सरकार क्‍या कर रही है। एक सामान्‍य आदमी (डॉ सुब्रमण्‍यम स्‍वामी और सीताराम येचुरी) 2005 से कह रहे हैं कि 2 जी मामले में गडबड चल रही है लेकिन आप कहते हैं कि आपको पता नहीं था। अगर विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट का दबाव न होता तो क्‍या 2 जी मामले में कार्रवाई होती? पीएम साहब क्‍या आप जनता की गाढी कमाई के पौने दो करोड के गबन दोषी नहीं हैं?

- आप कहते हैं कि राजा को मंत्री डीएमके के कारण गठबंधन की मजबूरी में बनाया गया। आपकी यह सफाई व्‍यावहारिक रूप से सही हो सकती है लेकिन सैद़धांतिक और संविधानिक प्रावधान तो यही कहते हैं कि मंत्री प्रधानमंत्री की सूझबूझ और पसंद नापसंद से बनते हैं। (वैसे जिस मीडिया से आप मुखातिब थे उसी का कहना है कि आपकी कैबिनेट में कौन शामिल होगा इसे राडिया जैसे लोग भी तय करते हैं।) प्रधानमंत्री जी पद और गोपनीयता की शपथ लेते समय आपने संविधान और देश के प्रति उत्‍तरादियत्‍व निभाने का वायदा किया था या गठबंधन के प्रति नहीं।

गठबंधन की मजबूरी का हवाला देकर आप ही साबित कर रहे हैं कि आपके लिए देश और संविधान से बडी आपकी सरकार हो गई थी। क्‍या भी आपको लगता है कि आपने अपनी शपथ पूरी की है? क्‍या यह दोष नहीं है?

- 2जी मामले में आपने गठबंधन की मजबूरी बताई लेकिन राष्‍ट्रमंडल खेलों की तैयारी में हुए भ्रष्‍टाचार और दुनिया पिटी भद़द के लिए कौन जिम्‍मेदार कौन है? क्‍या राष्‍ट्रमंडल खेलों की तैयारी का मामला सीधा आपसे जुडा नहीं है? लगभग आधा दर्जन बार तैयारियों के लिए बजट बढाया गया वह भी आपकी मंजूरी से।

पीएम साहब का वर्षा जब कृषि सुखाने…जब लाखों-करोडों की लूट हो ही गई तो अब दिखावे की कार्रवाई से क्‍या फायदा?

- आपने आज फिर कहा कि महंगाई मार्च तक काबू में होगी। 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान भी आपने वादा किया था कि सरकार बनने के 100 दिन के अंदर महंगाई काबू में होगी, नतीजा सिफर। उसके बाद आप कम से कम एक दर्जन बार यही बयान दे चुके हैं लेकिन महंगाई में आपके बोल आग में घी जैसे हैं। पीएम साहब आपको 10 फीसदी की ग्रोथ रेट चाहिए और जनता को दो जून की रोटी, आपको आंकडों की बाजीगरी करनी है और जनता को परिवार पालना है। कभी निकलिए बाजार में और देखिए दाल, तेल, चावल, नमक, प्‍याज, लहसुन, सब्‍जी और पेट्रोल जैसी रोजमर्रा की चीजों के भाव क्‍या हैं? कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ तो नहीं पर गरीब के गाल पर जरूर पड रहा है। आपके मंत्री आए दिन महंगाई बढाने वाले बयान देते हैं। उनपर आपकी लगाम नहीं। आखिर कब तक सहेंगे महंगाई की मार।

- आज प्रधानमंत्री ने एक और गंभीर बात कही कि –भाजपा अपने एक मंत्री पर हुई कार्रवाई का बदला निकाल रही है और जेपीसी पर हंगामा खड़ा कर रही है। उनका कहना था कि भाजपा सौदेबाजी कर रही है।

सबसे बडा सवाल यह है कि अगर किसी भाजपाई ने प्रधनमंत्री या कांग्रेस से सौदेबाजी की हिम्‍मत की तो उसके खिलाफ कार्रवाई क्‍यों नहीं की गई? क्‍यों नहीं प्रधानमंत्री उसका नाम बताने की हिम्‍मत दिखाई? आखिर यहां कौन सा गठबंधन धर्म था पीएम साहब?

आप सारी गडबडियों, घोटालों का ठीकरा गठबंधन के माथे फोडकर फारिग हो लिए लेकिन यह मत भूलिए की राजनीति के अंतिम लक्ष्‍य (सत्‍ता) तक पहुंचने के लिए आपको जनतंत्र के अंतिम सत्‍य (जनता) की चौखट पर ही जाना है। और जनता सब समझती है। बिहार के चुनाव बीतने बाद गंगा में ज्‍यादा पानी नहीं बहा है। अभी बंगाल, असम, तमिलनाडु, उप्र आना बाकी है। भारत की सवा अरब जनता को मजबूर नहीं मजबूत प्रधानमंत्री चाहिए।

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

क्‍या हिंदू होना ही सांप्रदायिकता है?

जब से अयोध्‍या मसले पर हाइकोर्ट का फैसला आने की बात चली तब से हर प्रकार का मीडिया यही बात थी कि शांति बनाए रखें। मेरी जानकारी में हर मीडिया ने कमोवेश वही जिम्‍मेदारी दिखाई और उसका असर भी सामने दिख रहा है। इस पूरे लगभग एक महीने हर न्‍यूज चैनल से लेकर अखबार और वेबसाइटस से लेकर सोशल कम्‍यूनिटीज तक बस सफेद फाख्‍ते उड रहे थे।
आज ही मेरे फेसबुक वॉल पर मेरे एक मित्र ने कुछ लिखा। (http://www.facebook.com/photo.php?fbid=147455791963780&set=a.126071017435591.9610.100000980810798&il=0¬if_t=photo_reply#!/profile.php?id=1700751039) मेरे लिए उनके शब्‍द आश्‍चर्यजनक थे क्‍योंकि मैंने ऐसा कुछ नहीं लिखा था जिसका जवाब ऐसा हो…. पर मैं अपने मित्र की व्‍याकुलता समझता हूं! और यह भी समझता हूं यह सारी बातें क्‍यों ताजी हो रही हैं। खैर यह उनका निजी मामला है इसलिए टिप्‍पणी करना उचित नहीं है लेकिन उन्‍होंने मेंरे निजी मामले पर प्रश्‍न उठाए हैं सो उसका जवाब देना भी जरूरी है। यह जवाब सिर्फ इसलिए दिए जा रहे हैं क्‍योंकि इन्‍हें पूछा गया है। हो सकता है मेरे यह जवाब मुझे सांप्रदायिक की श्रेणी में ला खडा करें क्‍योंकि मैं हिंदू हूं लेकिन मुझे इस बात की चिंता नहीं है। मेरे लिखने का निहितार्थ सिर्फ इतना नहीं कि मैं अपनी बात रखूं वरन यह भी है मैं यह तो जानूं कि इस देश में क्‍या हिंदू होना ही सांप्रदायिकता है?

सवाल- राष्ट्रवाद बनाम हिंदूवाद
राष्‍ट्र माने सिर्फ देश नहीं। राष्‍ट्र मतलब राज्‍य नहीं, न ही नेशन, न स्‍टेट और न ही कंट्री। राष्‍ट्र की अवधारणा इससे कहीं व्‍यापक है, जिसका अभिप्राय भौगोलिक सीमाओं, राजनीतिक व्‍यवस्‍थाओं और वैश्‍विक मान्‍यताओं से आगे है। राष्‍ट्र इन सबके साथ सांस्कृतिक परंपराओं, धार्मिक मान्‍यताओं और वैचारिक भिन्‍नताओं और समरूपताओं का समग्र स्‍वरूप है। राष्‍ट्र वह है जिसकी भौगोलिक सीमाएं तो तय हो सकती हैं लेकिन उसका सांस्‍कृतिक और धार्मिक विस्‍तार असीम होता है। जैसे कि हमारा भारतवर्ष। मुझे स्‍पष्‍ट नहीं है कि इन सवालों में हिंदूवाद शब्‍द किस अर्थ में प्रयोग किया है। रही बात राष्ट्रवाद बनाम हिंदूवाद की तो यह तुलना निरर्थक है। इसका कोई मायने नहीं है।

अब आपने सवाल खडे किए हैं कि हिंदूवादी राष्‍ट्रवादी कैसे हो सकता है? हो सकता है आपको हिंदू या सनातन धर्म के बारे ज्ञान न हो क्‍योंकि ऐसा सवाल वही लोग खडा कर सकते हैं। वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिन:……सर्वे संतु निरामय: लेकर परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीडा सम नहिं अधमाई, अष्‍टादश पुराणेशु व्‍यासस्‍य वचनद्वयं, परोपकाराय पुण्‍याय, पापाय परपीडनम जैसे तमाम उदाहरण तो आपको हमारे धर्मग्रंथों में तो मिलेंगे ही साथ ही निरा निरक्षर भारतीय भी प्रकृति पूजा से लेकर चीटियों को आटा देने जैसे जो छोटे छोटे काम रोज करता है वही तो है हिंदुत्‍व की झलक। अन्‍य धर्मों में जो बातें पवित्र ग्रंथों में दर्ज हैं वह हमारे देश में बच्‍चे बच्‍चे की जुबान पर हैं। झूठ बोलना पाप है, जीव हत्‍या पाप है, गरीबों पर दया करो, दादी नानी की कहानियों में छिपे दर्शन को शायद आपने नहीं सुना है। यही नहीं सिर्फ इसी धर्म वाले ही हैं जो मजारों पर सजदे करके चादर पेश करते हैं और गुरुद्वारे में गुरुवाणी सुनने के बाद चर्च में जाकर ईश्‍वर के आगे पापों के लिए क्षमा मांगते हैं। यही तो है हिंदुत्‍व। अब इसमें बुराई क्‍या है। हो सकता है ऐसे सवाल पूछते हुए आपको यह सब याद नहीं आया हो लेकिन मेरा हिंदुत्‍व और हिंदू धर्म तो यही है। अब कानूनी बात करें तो जिस संविधान का आपने नीचे हवाला दिया है उसी संविधानिक उपबंधों के तहत बनी भारतीय न्‍यायपालिका ने यह कहा है कि हिंदुत्‍व जीवनशैली है, धर्म नहीं। इसलिए हिंदुत्‍व को व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में देखिए। अब शायद आप हिंदू समझ गए हों तो हिंदू होगा उसके लिए जननी जन्‍मभूमिश्‍च स्‍वर्गादापि गरीयसी।

1- हमारा राष्ट्र बहुल संस्कृति, बहुधर्मी एवं गंगा-जमुनी है।
भारत की 85 फीसदी आबादी हिंदुओं की है। 15 फीसदी में बाकी के मुस्‍लिम, जैन, बौदध, सिख, पारसी आदि आदि। दुनिया के अधिकांश देशों में बहुसंख्‍यक समाज का धर्म ही राष्‍ट्रीय धर्म है। बावजूद इसके भारत की संविधानसभा ने कोई धर्म विशेष अंगीकार नहीं किया, जबकि उस सभा के अधिकांश सदस्‍य हिंदू थे। यहां तक बाद में देश के संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्‍द जोडा गया वह भी एक हिंदू ने किया। यह हिंदुस्‍तान में भी संभव है साथी जहां एक साथ अजान, गुरुवाणी, आरती और चर्च की प्रे गूंजती है। दुनिया के किसी अन्‍य देश में ऐसा हो तो जरूर बताएं। आप बताइए अगर हिंदू के अलावा दूसरा कोई धर्म भारत में बहुसंख्‍यक होता तो क्‍या तब भी भारत धर्म निरपेक्ष राष्‍ट्र होता?

2- संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा को लक्ष्य माना गया है।
यह बेहद हर्ष की बात है। सबको उस लक्ष्‍य की पूर्ती में सहयोगी बनना चाहिए। एक धर्म निरपेक्ष देश में जन्‍माष्‍टमी, ईद-उल-फितर, गुरुनानक जयंती, बडे दिन जैसे धार्मिक पर्वों पर अवकाश होता है। धार्मिक यात्रा के लिए सरकारें अनुदान देती हैं, धर्मआधारित शिक्षण संस्‍थानों को सरकारी सहायता और स्‍वायत्‍ता दी जाती है, क्‍या यह सही है।

3- हिंदूवादी हिंदू को छोड़कर अन्य किसी धर्म का अस्तित्व नहीं मानते हैं।
ऊपर की बातों से आपको इतना तो स्‍पष्‍ट हो गया होगा कि आपकी तीसरी बात स्‍वत: खारिज हो जाती है। वैसे मैं यह भी नहीं समझ पाता हूं कि आप हिंदुत्‍व और राष्‍ट्रवाद की बात करते करते आडवाणी और कटियार आदि तक क्‍यों जाते है। अरे ये हिंदुत्‍व का झंडाबरदार नहीं हैं और न ही इनके पास ठेकेदारी है हिंदुत्‍व की। मैं हिंदू हूं सभी धर्मों का सम्‍मान करता हूं आप भी अगर नौकरी के फार्म में धर्म का कॉलम भरेंगे तो उसमें हिंदू ही टिक करेंगे आपभी सभी धर्मों का सम्‍मान करते हैं तो हिंदुत्‍व दूसरे धर्मों का विरोधी कहां हुआ। हिंदू धर्म ही है जहां पूजा करो तब भी, न करो तब भी, बुत पूजो तब भी न पूजो तब भी, साकार मानो तब भी निराकार मानो तब भी, वैष्‍णव हो तब भी शैव हो तब भी, द्वैत मानो तब भी अद्वैत मानो तब भी, व्रत रहो तब भी न रहो तब भी, तीरथ जाओ तब भी न जाओ तब भी, रहेंगे हिंदू ही। न हमें धर्म छोडना पडेगा और न ही ऐसा कोई नियम है। तो हिंदू दूसरे धर्मों के विरोधी कहां हुए?

4- तोड़-फोड़ की बात करने वाले राष्ट्रवादी नहीं हो सकते!
तोडफोड की बात करने वाला राष्‍ट्रवादी तो बहुत दूर की बात वह तो इनसान कहलाने लायक भी नहीं है। हिंदुत्‍व का मूल सृजन है, समाप्‍ति तो नियति है।

5- हिंदू मूलत: दलित, आदिवासी एवं मूल भारतीय विरोधी है। ये किस हिंदू की बात है। ऐसा कौन सा हिंदू है जो ऐसा है। और अगर कोई व्‍यक़ति ऐसा है तो हिंदू नहीं है। मैं जिस हिंदुत्‍व को मानता और जानता हूं वह ऐसी कोई सीख नहीं देता।

6- हिंदूवादियों के कृत्य मालेगांव एवं हैदराबाद के मक्का मस्जिद में बम धमाका कराने के मामले में आए हैं।
दरअसल अब आए हैं आप अपनी असली बात पर, इसके पहले तो आपने भूमिका बांधी थी। इन कृत्‍यों के बाद किस राष्‍ट्रवादी हिंदू ने कहा कि इन स्‍थानों पर जो हुआ वह बहुत अच्‍छा था। इसका जवाब देते समय आप राजनीतिक लोगों के नाम मत गिनाइएगा क्‍योंकि अगर ऐसा है तो मेरे पास भी कुछ नाम हैं।
वैसे क्‍या इन तीन धमाकों के अलावा देश में कभी धमाके नहीं हुए हैं। या आपको याद नहीं हैं। उनके बारे में भी सवाल उठाइए। या डर है कहीं सांप्रदायिक न हो जाएं? हर मसले के सभी पहलू देखेंगे तभी सच दिखेगा नहीं तो अर्धसत्‍य।

8- हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं ने अपने घर भरे
ऐसा करने वाले चोर हैं। उन्‍हें राजनीति में रहने का कोई हक नहीं है।

9- --------------------------------- यह टिप्‍पणी किसी व्‍यक़ति विशेष पर लगाया गया आरोप है, इसलिए इस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा। क्‍योंकि इससे मेरा कोई वास्‍ता नहीं है।

10- 1992 में अयोध्या में उत्पात मचाने वालों को राष्ट्रविरोधी ही मानना पड़ेगा
जरूर मानेंगे। आपकी बात से सहमत हूं। उसके बाद से देश बदला, लेकिन उसके पहले भी बहुत कुछ हुआ था। उसे भी तो मानिए। अयोध्‍या में जब यह सब हुआ उस दिन आपके प्रिय संगठनों के दर्जनभर ही नेता अयोध्‍या में थे। इसके अलावा हजारों लोगों की पहचान सिर्फ और सिर्फ एक भीड की थी जो धर्मिक भावनाओं के ज्‍वार में बहकर आए थे। कहिए सबको राष्‍ट्रविरोधी।
वैसे वे लोग तो राष्‍ट्रविरोधी नहीं होंगे न जो खाते भारत की हैं और गाते पडोसी की। राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो जो देश पर हमला होने पर खुशी मनाते हैं। राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो देश के एक हिस्‍से को देश से अलग करने की मांग करते हैं, राष्‍ट्रविरोधी वे भी नहीं होंगे जो उनका समर्थन करते हैं जो देश के खिलाफ ही युद़ध छेडे बैठे हैं? कहिए मैं सही कह रहा हूं न।

11- अयोध्या में उत्पात मचाने वाले राष्ट्रविरोधियों के खिलाफ मुकदमा विचाराधीन है।
तो करने दिजिए कोर्ट को अपना काम। अच्‍छा ही तो है जितना जल्‍दी फैसला आ जाए और दोषियों को सजा मिले। लेकिन बाद में मुकरिएगा मत कोर्ट के फैसले से जैसा अभी लखनऊ बेंच के फैसले के बाद केंचुल उतार फेंकी है।

12- उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को इस मामले में एक दिन की सांकेतिक सजा हो चुकी है।
इसके लिए भारतीय न्‍यायपालिका की जय और यह याद दिलाने के लिए आपको धन्‍यवाद।

13- मालेगांव बम धमाके की आरोपी प्रज्ञा सिंह का पक्ष लेने वाले लोग संघ एवं हिंदूवादी संगठनों से जुड़े लोग हैं।
गलत है। नहीं लेना चाहिए आरोपी का पक्ष। मैं आपकी बात से सहमत हूं। लेकिन क्‍या आप मेरी बात से सहमत होने की हिम्‍मत रखते हैं- पक्ष उसका लेना चाहिए जो देश पर हमले के मामले में देश की उच्‍चतम अदालत द्वारा मौत की सजायाफ़ता है। पक्ष उसका लेना चाहिए जो आंतकियों के साथ शूटआउट में मारा जाता है और लोग उसे निर्दोष ठहराने में लगे रहते हैं। पक्ष उसका लेना चाहिए जो छद़म हो।

14- मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती जेल में आतंकी प्रज्ञा ठाकुर से मिलन के लिए गईं।
तत्‍काल प्रभाव से माननीय कोर्ट को इस मसले को संज्ञान में लेकर उमा को सजा देनी चाहिए। लेकिन आपका अयोध्‍या फैसले के बाद कोर्ट से भरोसा तो नहीं उठ गया। पर क्‍या जेल में किसी से मिलना गलत है। राजीव गांधी के हत्‍या के दोषियों से उन्‍हीं के परिवार के लोग मिले हैं। वैसे मिलने तो लोग आजमगढ भी जाते हैं आपको पता है कि नहीं यह बात।


15- देश में अशांति फैलाने एवं दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने वाले राष्ट्रवादी कैसे हो सकते हैं।
इसका जवाब पहले दे चुका हूं। ऐसे लोग राष्‍ट्रवादी तो दूर इसान कहलाने लायक भी नहीं हैं।

चलिए नवरात्रि की शुभकामनाएं।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

एक पाती रामजी के नाम

हे रामलला!
मुझ अकिंचन का प्रणाम स्‍वीकार करें।


लिखता तो नहीं, पर हालात ऐसे हैं कि मुझे आपको ही लिखना पड रहा है। आज मैं आपको अपनी कुछ चिंताओं से अवगत कराने के लिए पत्र लिख रहा हूं। रामजी इस समय आपकी अयोध्‍या और आपको लेकर पूरे भारतवर्ष में अजब सी बेचैनी का माहौल है। सब तरफ सांसें रुकी हैं। अजब सा सन्‍नाटा है। ऐसा पहले न था।
हे राघव, जिस अयोध्‍या के स्‍मरण मात्र से मोक्ष मिलने का विश्‍वास हजारों साल से बना हुआ है आज उस अयोध्‍या का स्‍मरण चित्‍त को बेचैन कर रहा है। लोग सप्‍तपुरियों में प्रथम अयोध्‍या और अयोध्‍यापति राम को याद तो कर रहे हैं पर उन्‍हें शांति नहीं मिल रही। अयोध्‍या का जिक्र होते ही एक आशंका जन्‍म ले रही है।
प्रभू! मैंने जब से होश संभाला तब से राम-राम सुनाता आया। और बडा हुआ तो राम को जाना। पर मैंने जितना जाना उतने में तो राम दीनबंधु, दयासागर, करुणानिधान, भक्‍तवत्‍सल ही हैं। फिर आपको लेकर ऐसा वातावरण क्‍यों बन गया?

अन्‍याय और अत्‍याचार के अंत के लिए ही पृथ्‍वी पर अवतरित होने वाले हे राम, सुना है आपके मंदिर को लेकर कोई फैसला आने वाला है और यह सब बेचैनी उसी के लिए है। लोगों ने बताया, आज अयोध्‍या में जहां आप विराजमान हैं वहां, पहले आपका मंदिर था या कोई और इबादतगाह, इस पर किसी अदालत को फैसला सुनाना है। रामजी मैंने तो सुना था कि आप कण-कण में हैं। हर चल-अचल, जीव-निर्जीव, जड-चेतन, भूत-भविष्‍य-वर्तमान में आप ही का अंश है, फिर आपके मंदिर को लेकर यह सब… क्‍या यह आपकी लीला है या……..विधि का विधान?

मुझे नहीं पता कि गोपाल सिंह विशारद का दावा सही है, या सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड का? मैं नहीं जानता कि निर्मोही अखाडे और देवकी नंदन अग्रवाल की दलीलें खरी हैं या नहीं? मैं यह भी नहीं जानता कि अदालत ने किसके दावे को सही माना है, पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि आप इन दावों, वादों, दलीलों, वकीलों, अदालतों और मुगालतों से परे हैं। हे कौशलेश! अयोध्‍या की उस जमीन पर आपका मंदिर बने या नहीं, मुझे नहीं पता। मैं तो इतना जानता हूं, अयोध्‍या ही नहीं, पूरी दुनिया अवधेश की है। जब तक दुनिया है तब तक राम हैं और जब तक राम हैं तभी तक दुनिया।

हे राघवेंद्र! कुछ शताब्‍दी पहले आपके उस अवध में सरयू का रंग खून से लाल हो गया जिस अवध का अर्थ ही था जहां कभी वध न हुआ हो। सुना है कि तब किसी मीरबांकी ने आपके मंदिर को तोडकर वहां फरिश्‍तों के उतरने की जगह बनाई थी। सालों से यह विवाद चल रहा है। हे अयोध्‍यापति, कुछ साल पहले तो कभी युद्ध न देखने वाली आपकी अयोध्‍या रणभूमि भी बन गई थी।

अन्‍याय का अंत करने के लिए अवतार लेने वाले हे राघव! जब मीरबांकी ने वहां कहर ढाया या जब कुछ हजार की उत्‍तेजित भीड ने ढांचा ढहाया तो आप चुप क्‍यों रहे? क्‍या तब रघुकुल नायक की भुजाएं फडकी नहीं थीं? क्‍या जब मीरबांकी के कहर और ढांचा गिरने के बाद देश दुनिया में हजारों निर्दोंष निशाना बनाए जा रहे थे तो आपके करुणा का सागर सूख गया था? हे जनार्दन! आपने ही तो कहा था कि जब-जब पृथ्‍वी पर संकट आएगा तो आप आएंगे! क्‍या इससे बडा भी कोई संकट आएगा? हे प्रभू! जब आपके अस्‍तित्‍व पर ही सवाल उठा तब भी आप मौन रहे क्‍या यह भी आपकी लीला थी!

हे मर्यादा पुरुषोत्‍तम!
जिस देश में संस्‍कार, मर्यादा और राजधर्म का पालन करने के लिए आप ने 14 वर्ष का वनवास काटा, अपनी प्राणप्रिय पत्‍नी को त्‍याग दिया उसी देश के सत्‍ताधीश और राजनेता राजधर्म भूलकर सत्‍ता के मद में चूर पथभ्रष्‍ट हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं। तब आपने क्‍यों नहीं उन्‍हें राजधर्म की याद दिलाई? हे दशाननहंता! क्‍या आप ऐसे धर्मभ्रष्‍ट, पथभ्रष्‍ट, अमर्यादित, जनद्रोही सत्‍ताधीशों के वध के लिए अवतार नहीं लेंगे? जिस रामराज्‍य की कल्‍पना मात्र से लोग पुलकित होते हैं उसी देश में क्‍यों नहीं रामराज्‍य आ पाया? उल्‍टे अब राम को अदलातों में खुद को साबित करना पड रहा है। क्‍या यह भी आपकी लीला है?


हे राजेंद्र! आपने ही कहा था-जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । मैं भी अपनी उसी जन्‍मभूमि को बचाने के लिए आपसे आग्रह कर रहा हूं। हे प्रभू! फैसला मंदिर के पक्ष में आए या इबादतगाह के पर राम तो राम ही रहेंगे। आप उस विवादित जमीन पर आलीशान मंदिर बनवाकर उसमें रहें या अभी मौजूद टेंट के मंदिर में या फिर वहां भी नहीं, पर राम तो राम ही रहेंगे? क्‍योंकि मेरे राम किसी महल, अटटालिका, भवन, मंदिर, राजसिंहासन से नहीं मेरी आस्‍था से हैं, और मेरी आस्‍था जिस राम में है, वह अपने पिता का वचन पालन करने के लिए 14 साल जंगल में भटका था, उसने शबरी के जूठे बेर खाए थे, उसने केवट का अहसान लिया था, उसने अहिल्‍या का उद़धार किया था, उसने उस अधर्मी बालि का भी वध किया जो सीता को चुटकी में रावण के बंधन से आजाद का सकता था, उसने राजधर्म का आदर्श स्‍थापित किया और रामराज्‍य चलाया। मैं उस भरतवंशी राम से आग्रह करता हूं कि हे रघुवर! आपकी अयोध्‍या की केवल 67 एकड जमीन पर आने वाले फैसले का सीधा असर आपके और मेरे भारतवर्ष पर पडेगा। हे करुणानिधि! फैसला जो भी आए आपके देश की फिजा न बिगडने पाए।

हे प्रभू! समस्‍याएं और वेदनाएं तो बहुत हैं, लेकिन फिलहाल तो सबकी निगाहें अयोध्‍या की ओर हैं और मेरी आपकी ओर। आप सर्वज्ञ हैं, इसलिए ज्‍यादा कहने की जरूरत नहीं। मुझे पूरा विश्‍वास है कि मेरे राम पर मेरी आस्‍था और अटल होगी।

हे राघव मेरी प्रार्थना स्‍वीकार करें।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

धन्‍यवादनामा खबरों के थोक विक्रेताओं के नाम

नमस्‍कार। मैं एक पत्रकार हूं। सीखने की शास्वत परंपरा का पालन करते हुए स्‍याही की मोहक खुशबू के साथ इतिहास को रोज अखबार के पन्‍नों पर टांक रहा हूं। खबरें गढना, बुनना, रचना और बेचना यही काम है मेरा। गढना, बुनना और रचना इसलिए क्‍योंकि अंतत खबरों को बेचना भी तो है। इसी बेचने की कवायद में सुबह नींद खुलने से रात में नींद आने तक लगे रहते हैं। सच कहूं तो जब पत्रकारिता की पढाई का मन बनाया तब पता ही नहीं था कि खबरें बेची जाती हैं। वो तो इस पेशे में उतरा तब पता चला कि यहां भी कहावत चलती है कि जो दिखता है वही बिकता है। सब अलग अलग तरह के व्‍यापारी हैं। एक ही खबर को अलग अलग तरह से सजा संवार कर बेचने में लगे हैं। कई बार तो न्‍यूजरूमों में भी यह बात होती है कि ऐसे उठेगी तभी बिकेगी। खैर अब जब मैं भी व्‍यापारी हो गया हैं तो मुझे भी बेचने और खरीदने में कोई शर्म नहीं रही, बस इतना ध्‍यान रहता है कि हर पेशे की तरह इस पेशे की भी एक नैतिकता है। गनीमत है कि अभी भी कुछ अखबारों में नैतिकता बची है और मेरी खुशकिस्‍मती यह है कि मैं भी फिलहाल ऐसे ही अखबार जुडा हूं जहां बेचने और खरीदने में इनसानी जज्‍बातों की कदर होती है। जहां व्‍यावसायिक हित पर पेशेगत नैतिकता हमेशा हावी रहती है। वैसे मैंने अभी तक ऐसा कुछ नहीं बताया जो अलग हो या जो एक्‍सक्‍लूसिव हो। इसलिए यह नहीं बिकेगा। चलिए अब आप को बताता हूं कि हम पत्रकार बेचने के लिए माल खरीदते कहां से हैं। इससे पहले मैं यह भी बता दूं माल की जरूरत क्‍या है।
अखबारों में शाम चार बजते ही लीड स्‍टोरी तलाशी जाने लगती है। रिपोर्टर से लेकर डेस्‍क तक सब तलाशते हैं। माल ऐसा होना चाहिए जो पहली नजर में ग्राहक को जम जाए यूं कहिए कि बिकाऊ होना चाहिए। वो किसी नेता की नोट लेती तस्‍वीर, आतंकी हमले में मरा आम आदमी, नक्‍सली निशाना बने पुलिसवाले, करोडों के भ्रष्‍टाचार में फंसा कोई अफसर/नेता, भूख से दम तोड चुका कोई इंसान, किसी गोली का शिकार कोई शेर/बाघ या हिरण, रैंप पर कैटवाक करती मॉडल के फिसल चुके कपडे, कलावतियों के घर का मखौल उडाता कोई राजकुमार, क्रिकेट के मैदान पर छक्‍का जडते खिलाडी हों, बालीवुड की कोई मसालेदार चटपटी खबर आदि, आदि या ऐसा ही कुछ जो बिके। तो साहब ये हैं माल जिनकी हमें तलाश रहती है। मैं पत्रकारों को प्रवक्‍ता तो नहीं लेकिन उस बिरादरी के एक जिम्‍मेदार सदस्‍य के नाते मैंने सोचा उन लोगों को शुक्रिया अदा करूं जिनसे हमें ये माल मिलता है और आपको भी बताऊं कि जो आप तक पहुंचता है वो कौन देता है।

दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र होने के नाते सबसे पहले शुक्रिया हमारे विधायकों, सांसदों का। जो कभी नोट लेते कभी देते, कभी दिलवाते, कभी लहराते, कभी दिखाते हुए हमें खबरें देते हैं। शुक्रिया इसलिए की अगर ये लोग लोकतंत्र के मंदिरों को अखाडा न बनाएं तो हमें खबर न मिले। शुक्रिया इसलिए भी कि ये सदन में मां बहन करते हैं, सदन में कुर्सियां मेज चलाते हैं माइक फेंककर निशानेबाजी का नमूना दिखाते हैं। धन्‍य हैं हमारे जनप्रतिनिध जो इतनी मेहनत सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें वर्ना उन बेचारों का क्‍या। वे तो जनसेवक हैं।

फिर मैं शुक्रिया अदा करना चाहूंगा देश के प्रशासनिक और पुलिस अमले का। सुबह से शाम तक जन सेवा। कितना कैसे खाना है, किससे खाना है और किसको खिलाना है सब का ध्‍यान रखना पडता है। ऊपर से नीचे तक सब तय है। जेल में फाइव स्‍टार सुविधाएं मुहैया कराना और क्राइम कंट्रोल में और क्रिमिनल जहन्‍नमुम में यह दिखाने के लिए मुठभेड आदि कार्यक्रम की व्‍यवस्‍थाएं करना कितना कठिन काम है। फिर हमारे देश में होता है ताकि हमें खबरें मिल सकें। बाढ आई तो, सूखा पडा तो ये बेचारे तो हमेशा खबरों के लिए हरा ही हरा करते हैं। सो इनका भी शुक्रिया।
अब शुक्रिया दुनिया की सबसे बडी यातायात व्‍यवस्‍था यानि भारतीय रेल का जिसमें सबसे ज्‍यादा कर्मचारी सेवारत हैं। साहब है ऐसा किसी देश में। बीस साल में पांच हजार हदासे और चार हजार की मौत का आंकडा और किसी विकसित या विकासशील देश के देने की हिम्‍मत है। नहीं। यह सिर्फ सिर्फ हमारी भारतीय रेल में ही हो सकता है। साल में औसतन दो सौ की जान लेने वाला रेल महकमा क्‍या कम खबरें देता है। लगे हाथ वायु सेवा की भी बात करते चलें। कभी टायर फटा, कभी कुत्‍ता पहुंचा, कभी चिडिया फंसी, कभी हवा में भिडे, कभी जमीन से फिसले यानि नाना प्रकार के व्‍यवधान हमारी वायु कंपनियां सिर्फ इसीलिए तो लेती हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें। सो शुक्रिया।

शुक्रिया मैदान के धुरंधरों का। हां भाई सही समझे आप। मैं अपनी टीम इंडिया की ही बात कर रहा हूं। भले उन्‍हें देश के लिए पदक लाने का शौक नहीं लेकिन छक्‍के जडने में क्‍या कम मेहनत लगती है। शतक मारना क्‍या मामूली काम है। यही नहीं खेलने के बाद क्‍लबों में जाकर सिर्फ इसलिए मारपीट, मां बहन करना ताकि अखबारों को मसाला मिल सके क्‍या कोई पराया इतना करता है। हमें कौन सी कोल्‍डड्रिंक पीनी चाहिए, कौन सी गाडी चलानी चाहिए, यानि आप तो यूं समझों कि सुबह सोकर उठने से रात में सोने और उसके बाद तक हमें क्‍या यूज करना चाहिए सब ये बेचारे खिलाडी हमें बताते हैं। धन्‍य हैं ये तभी तो इनक शुक्रिया अदा किया।

अब बात पर्दे के सितारों की। आम इनसान की किस भावना को कैसे कैश कराया जा सकता है। कैसे लाखों खर्च करके लोगों से करोडों कमाए जाते हैं, कब किस फिल्‍म को हिट कराने के लिए किसके खिलाफ क्‍या और कितना बोलना है, किस फिल्‍म में क्‍या मसाला डालना है, सब तो करते हैं बेचारे हमारे हीरो, हिरोइन। इनका क्‍या इनके पास पैसे की कमी थोडे है यह तो सिर्फ इसलिए ताकि अखबार छप सकें।

अब बात आतंकियों, नक्‍सलियों अलगाववादियों की। अखबारों में इनका बहुत योगदान है। भले खबर बनाने के लिए इन्‍हें मजलूमों की जान लेनी हो लेकिन ये लेते हैं। भले उन्‍हीं लोगों को मारना पडे जिनके हक की लडाई का ये दावा करते हैं पर ये मारते हैं। ये लाशों पर जश्‍न मनाते हैं ताकि हमें खबरें मिल सकें। अपने ही देश और अपने ही लोगों पर पत्‍थर, लाठी, गोली, बम बरसाते इन्‍हें कितना कुछ करना पडता होगा यह तो सिर्फ यही जान सकते हैं। मैं तो सिर्फ इनका शुक्रिया अदा करता हूं।
शुक्रिया ठेकेदारों का। मुंबई से मदुरई तक, कश्‍मीर से कटक तक। हर तरफ फैले हैं ये। अरे ठेकेदार मतलब भाषाई, जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय पंचों की बात कर रहा हूं। कब कहां कौन सी भाषा बोली जाए, कपडे पहने जाएं, कौन कहां आए कहां न जाए आदि आदि संविधान के खिलाफ जाकर अगर ये शूरवीर न तय करें तो क्‍या उस दिन अखबार छपेगा भला। कभी नहीं। धरने प्रदर्शन के नाम पर अपनी संपत़ति का नुकसान करना, सडके, रेल जाम करना, फूंकना। कब मंदिर के आगे गाय फिकवानी है कब मसि़जद के आगे वाराह, कब मंदिर के नाम पर आंदोलन शुरू करना है कब मसिजद के नाम पर जिहाद सब यही बेचारे तो करवाते हैं सिर्फ इसलिए ताकि हमें माल मिलता रहे। यह सब इसलिए ताकि हम पत्रकारों की रोजी रोटी चलती रहे। तो क्‍या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम इनका शुक्रिया अदा करें।

कहते हैं कोई भी बात बिना पडोसी की चर्चा के खत्‍म नहीं होती। फिर इस मामले में तो हमारे मुल्‍क और हमारे मुल्‍क के अखबारों की किस्‍मत से तो दूसरी और पहली दुनिया के लोग भी खार खाते हैं। चीन, भूटान, अफागानिस्‍तान हो या धार्मिक सहोदर नेपाल या फिर हमारा ही अंश पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश क्‍या नहीं करते। कहां हमारी जमीन पर कब्‍जा करना है, कब, कैसे, कितने, कहां और किन आयुधों से सुसज्‍जित जिहादी भेजने है इसकी व्‍यवस्‍था करना। कब बातचीत और मुलाकात के आयोजन के साथ ही सीमा पर आतिशबाजी करनी है। कब कब और कहां कहां जिहादियों का मार्गदर्शन करना, उन्‍हें हिदायतें देते रहना कोई आसाना काम है। चोरी करना और फिर सीना जोरी करना, मेरा तो दावा है कि अगर कुछ पडोसी मुल्‍क अपनी जात से बाज आ जाएं तो कितने अखबारों को अपने पेज कम करने पडेंगे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

सच कहूं तो दोस्‍तों इन्‍हीं की वजह से हमारा पालन पोषण हो रहा है। आप यकीन नहीं मानेंगे पर यह सच है कि अगर कहीं कोई ट्रेन बेपटरी होती है, कहीं बम धमाका होता है, कहीं किसी पर जूते फेंके जाते हैं, कहीं करोडों किसी के बिस्‍तर तले निकलता है तो न्‍यूज रूम में जान जाती है, हलचल मच जाती है, लोग सक्रिय हो जाते हैं, कंप्‍यूटर और की बोर्ड की खटखट के अलावा टीवी वाले चीखते चिल्‍लाते एंकरों की आवाजे ही सुनाई पडती है। यूं समझिए की अजीब तरह का उत्‍सवी माहौल। भयंकर।

यह था एक पत्रकार का धन्‍यवाद पत्र तमाम शुभचिंतको के लिए। ऐसा नहीं है कि सब बिकाऊ माल ही देते हैं कुछ ऐसा भी हैं जिनके माल नहीं बिकते, उनकी भी चर्चा कभी जरूर करूंगा। भोर हुई जाती है और नींद चढी आती है। इन दिनों जैसा माल मिल रहा है भगवान करे कि वैसा आगे न मिले इसी उम्‍मीद के साथ शुभ रात्रि।

किस शहर से आए हैं

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